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कोपेनहेगन : भारत की डांवाडोल उपस्थिति

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/17/2009 06:00:00 PM


प्रफुल्ल बिदवई
जैसे-जैस कोपेनहेगन सम्मेलन बातचीत के निर्णायक दौर में प्रवेश कर रहा है वैसे-वैसे भारतीय प्रतिनिधिमंडल को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी चुनौती यह कि ऐसे महत्वाकांक्षी कड़े, व्यापक और न्यायसंगत करार के लिए कैसे उघम किया जाए ताकि जल्द से जल्द विश्व के ग्रीन हाउस उत्सर्जन को नियंत्रित किया जा सके और जलवायु संबंधी महासंकट रोका जा सके। उसके अलावा जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने की जिम्मेदारी में विकसित उत्तरी देशों और विकासशील दक्षिणी देशों के बीच के अहम अंतर को बनाए रखना भी कम जरूरी नहीं है। चीन सहित जी-77 के विकासशील देशों के बीच दरारें आ गई हैं। इसके साथ-साथ भारत पर स्वेच्छा से कार्बन घटाने के कदम उठाने का भी दबाव भी है। उस पर विकास के अधिकार की रक्षा करने की भी जिम्मेदारी है। यह अधिकार बहुसंख्यक गरीबों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
खेद की बात है कि भारत की शुरूआत डांवाडोल रही। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने वर्ष 2020 तक अर्थव्यवस्था के कार्बन उर्त्सजन में 20-25 प्रतिशत कमी करने की घोषणा कर दी। भारत हर दो वर्ष के बाद संयुक्त राष्ट्रसंघ की जलवायु परिवर्तन संबंधी ढांचा सभा सचिवालय को कार्बन घटाने संबंधी घरेलू कार्रवाइयों की रिपोर्ट भी प्रस्तुत करेगा जबकि दूसरे विकासशील देशों को यह रिपोर्ट हर छह साल बाद प्रस्तुत करनी होगी। इसकी वजह से यूपीए सरकार को अमेरिकी दबाव के सामने घुटने टेकने के आरोपों का सामना करना पड़ा और इस बात को लेकर भारतीय जनता पार्टी और वामपंथ ने संसद से वाकआउट भी किया। इससे भारतीय जलवायु प्रतिनिधिमंडल में भी मनमुटाव पैदा हो गया। दो वार्ताकारों ने त्यागपत्र देने की धमकी धमकी तक दे डाली। श्री रमेश ने उन्हें प्रतिनिधिमंडल में बने रहने के लिए रजामंद कर लिया। लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था। पूरा विश्व जान गया है कि भारत के जलवायु संबंधी रूख को सर्वसम्मत समर्थन प्राप्त नहीं है। भारत के उर्त्सजनों में कार्बन की सघनता को कम करने का यह अर्थ नहीं कि उसे कुल ग्रीन हाउस उर्त्सजन में कटौती करनी पड़ेगी। यह उत्सर्जन बढ़ते चले जाएंगे क्योंकि वर्तमान विकास दर के चलते वर्ष 2020 तक सकल घरेलू उत्पाद 100 प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ जाएगा। भले ही उत्पादन के प्रति रूपए के हिसाब से संसाधनों की खपत में 20-25 प्रतिशत तक की कमी भी क्यों न आ जाए। भारत के पहले के रूख में यह बदलाव स्वागतयोग्य है। पहले का रूख गैर लचीला था और बाकी सब बातों को ताक पर रखकर प्रति व्यक्ति उत्सर्जनों के मानदंड पर बहुत ज्यादा बल दिया गया था लेकिन यह परिवर्तन नीति-निर्माताओं के बीच, जिनमें स्वयं वार्ताकार भी शामिल थे, पर्याप्त विचार-विमर्श किये बिना एक अनाड़ी ढंग से किया गया। यह भी सही है कि भारत ने अपने रूख में परिवर्तन पिछले महीने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति बराक आ॓बामा के बीच हुई द्विपक्षीय चर्चाओं के बाद अमेरिकी दबाव में ही किया। बल्कि व्हाइट हाउस के एक बयान में भद्र अंदाज में यहां तक कहा गया है कि द्विपक्षीय चर्चाओं के बाद चीन और भारत ने पहली बार कार्बन संसाधनों को घटाने के लक्ष्य निर्धारित किये। सच यह है कि अमेरिका ने कुछ महीने पहले पांच विकासशील देशों (चीन, भारत, ब्राजील, मेक्सिको और दक्षिण अफ्रीका) के बारे में एक विशेष रणनीति तैयार की। वह जानता था कि वह उत्सर्जनों की कानूनी तौर पर बाध्यकारी कटौतियों के लिए उन्हें रजामंद नहीं कर सकता है लेकिन वह उनसे उत्सर्जनों की सघनता को कम करने और हर दो वर्ष बाद इन कटौतियों की रिपोर्ट प्रस्तुत करने की वचनबद्धता ले ले सकता था जबकि हर दो वर्ष में रिपोर्ट प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी केवल विकसित देशों की थी। अमेरिका अपने दोनों उद्देश्यों को पूरा करने में कामयाब रहा। चीन 2020 तक अपने कार्बन उत्सर्जनों में 40-45 प्रतिशत कटौती करने के लिए सहमत हो गया। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका अपने उत्सर्जनों में 30 प्रतिशत से अधिक की कटौती करेंगे लेकिन इसके जवाब में अमेरिका ने कोई वचन नहीं दिया। वह 2020 तक (1990) की तुलना में 4-7 प्रतिशत की कमी करने की बहुत मामूली पेशकश पर अड़ा हुआ है जबकि उस समय तक 40 प्रतिशत कटौती करना जरूरी होगा। इस प्रकार यह बराबरी का सौदा नहीं था। चीन सहित पांच देशों ने अमेरिकी सरकार से जवाबी वचन न लेकर नीतिगत गलती की लेकिन नीतिगत गलती को भारी रणनीतिक चूक नहीं माना जाना चाहिए। भारत अब भी अमेरिका पर कुछ ज्यादा महत्वाकांक्षी पेशकश का दबाव डाल सकता है और उसे डालना भी चाहिए। बहरहाल कार्बन उत्सर्जनों की मात्रा में घोषित कटौती का अर्थ दो घोषित लाल रेखाओं से पीछे हटना नहीं है। भारत उत्सर्जन में कमी करने के कानूनी तौर पर बाध्यकारी लक्ष्यों को स्वीकार नहीं करेगा और वह किसी ऐसे करार पर भी दस्तखत नहीं करेगा जिसमें यह शर्त रखी गयी हो कि उसके ज्यादा से ज्याद उत्सर्जन किसी खास वर्ष तक ही होने चाहिए। यदि भारत कार्बन की मात्रा में 1990-2005 तक की अवधि के दौरान 17.6 प्रतिशत की कमी का रिकार्ड बनाये रखे तो वह 40 प्रतिशत कमी का लक्ष्य आसानी से पूरा कर सकता है। उदाहरण के तौर पर यदि बिजली पूरी तरह से मीटर के जरिये सप्लाई की जाए और सिंचाई पंप और मोटर की शक्ति के बीच तालमेल बिठा दिया जाए तो कृषि में 40 प्रतिशत बिजली बचा सकती है। बत्तीवाले लैंपों जिनकी सालाना बिक्री 70 करोड़ है, के स्थान पर कंपेक्ट फ्लोरोसेंट लैंपों के इस्तेमाल से 75 प्रतिशत की बचत हो सकेगी। ऐसा करने जो फालतू खर्च आएगा वह 4-6 महीने की बचत से ही पूरा हो जाएगा। पंखों में 40 और टेलीविजन सेटों में 25 प्रतिशत ऊर्जा की बचत की जा सकती है। भारत को इन संभावनाओं का लाभ उठाना चाहिए लेकिन दुर्भाग्यवश राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्रवाई योजना, सौर बिजली, ऊर्जा कुशलता, कृषि तथा जल आदि संबंधी उसके आठ मिशन युक्तियुक्त और महत्वाकांक्षी कार्यक्रम तैयार करने में असफल रहे हैं। राष्ट्रीय योजना स्वतंत्र विशेषज्ञों व संगठनों से परामर्श के बिना ही पिछले वर्ष जापान में होने वाले जी-आठ शिखर सम्मेलन में पड़ने वाले दबाव से बचने के लिए जल्दी में तैयार की गई थी। इससे पता चलता है कि भारत में जलवायु संबंधी नीति निर्माण में कितना बंद, तंग और अनुदार नजरिया अपनाया गया है जिनका उन लोगों से कोई संबंध नहीं जो पहले से जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हो चुके हैं या जिनके प्रभावित होने की संभावना है। इस प्रकार का नीति-निर्माण वास्तविक प्राथमिकताओं को अनदेखा कर देता है और वे प्राथमिकताएं हैं अमीर और गरीबों के बीच और गैर बराबर क्षेत्रों के बीच खपत के मामले में सम्यकता का अभाव। जिन राज्यों में कम से कम और अधिक से अधिक कार्बन उत्सर्जन होता है, उनके बीच प्रति व्यक्ति उत्सर्जनों का अंतर 16:1 के अनुपात में है जो योरोपीय संघ और भारत के बीच प्रति व्यक्ति अंतर से भी ज्यादा है। जिसका भारतीय नीति-निर्माता औचित्यहीन विश्व जलवायु व्यवस्था के सूचक के रूप में उल्लेख करते नहीं थकते।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ कोपेनहेगन : भारत की डांवाडोल उपस्थिति ”

  2. By Krishna Kumar Mishra on December 17, 2009 at 11:37 PM

    अमर उजाला बरेली में ब्लाग कोना कालम में आप के ब्लाग लेख को पढ़ा, बधाई

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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