हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

प्रजा, प्रजातंत्र और प्रताड़ना

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/19/2009 04:00:00 PM


उड़ीसा के इस सुदूर गांव में सवाल उठाने वाली हर आवाज माओवाद है, नारायणपटना और मलकानगिरी में आदिवासियों और नक्सलवादियों के बीच फ़र्क मिटाती पुलिस की कोशिश की तफ़तीश कर रही हैं संजना, तहलका से साभार.

उड़ीसा का नारायणपटना ब्लॉक राजधानी भुवनेश्वर से तकरीबन 500 किमी दूर है. आंध्रप्रदेश की सीमा से लगा यह छोटा सा कस्बा कुछ साल पहले तक भारत के बाकी कस्बों सा ही था मगर बाद में यह माओवाद के प्रभाव में आ गया और उनके हमलों की वजह से गाहे-बगाहे चर्चा में आता रहा. करीब 45 हजार की आबादी वाले इस ब्लॉक को - जिनमें 90 फीसदी आदिवासी हैं - माओवाद का गढ़ बताने वाली पुलिस के मुताबिक पिछले कुछ सालों में यहां माओवादियों द्वारा कई मुखबिरों और ठेकेदारों को सरकार का एजेंट बताकर उनकी निर्ममता से हत्याएं की जा चुकी हैं और कई थाने भी फूंके जा चुके हैं.

हाल ही में यहां एक ऐसी घटना हुई जिसने फिर से हमें नक्सलवाद, आदिवासियों की समस्याएं, पुलिस ज्यादतियां और इनपर सरकार के रुख से जुड़े वे सब सवाल याद दिला दिए जिनकी हमारे लोकतंत्र की सफलता में अहम भूमिका है. गत 20 नवंबर के दोपहर की बात है. नारायणपटना थाने के सामने तकरीबन डेढ़ सौ आदिवासी विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. विरोध प्रदर्शन के दौरान ही कुछ ऐसा हुआ कि अर्धसैन्य बल की रिजर्व बटालियन के जवानों ने आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाना शुरू कर दिया. फायरिंग में दो आदिवासी नेताओं वडेगा सिंगन्ना और आंद्रू नचिका की मौत हो गई और तकरीबन 60 अन्य आदिवासी घायल हो गए. ये लोग नारायणपटना में आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम कर रहे संगठन चासी मुलिया आदिवासी संघ (सीएमएएस) के सदस्य थे और आसपास के गांवों में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे तलाशी अभियानों के नाम पर की जा रही ज्यादतियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे.

घटना के दो दिन बाद यहां के पुलिस अधीक्षक दीपक कुमार द्वारा दिए आधिकारिक बयान के मुताबिक सीएमएएस के नेताओं ने पुलिस थाने का गेट तोड़ दिया और थाना प्रभारी इंस्पेक्टर गौरांग साहू से हाथापाई करने लगे. विवाद बढ़ने लगा और इसी बीच आदिवासियों ने पुलिस से एक स्वचालित राइफल छीनकर कुल 22 राउंड गोलियां चलाईं. इनमें से एक गोली इंस्पेक्टर साहू के पैर में भी लगी. इसके बाद पुलिस को आत्मरक्षा में गोलियां चलानी पड़ीं. मगर फायरिंग के तुरंत बाद घटनास्थल पर पहुंचे जिले के कुछ आला अधिकारी और सरकार द्वारा नियुक्त एक वकील तकरीबन दस दिन बाद तहलका को एक अलग ही कहानी बताते है. मृतकों का पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सीय दल के एक सदस्य के अनुसार मृतकों को पीछे से उनकी पीठ में गोली मारी गई थी न कि उनके पैरों में. इसका मतलब यह कि गोली उन्हें निष्क्रिय करने के लिए नहीं बल्कि मारने के लिए चलाईं गई थी. सीएमएएस के  नेता सिंगन्ना को 14 गोलियां लगीं, जिनमें से कुछ उनपर तब चलाई गईं जब वे जमीन पर गिर चुके थे.

तहलका  ने जब इस सदस्य से इंस्पेक्टर साहू के घायल होने के बारे में पूछा तो बहुत डरते हुए उसका कहना था कि उनके घाव बेहद मामूली थे. क्या साहू के पैर में गोली लगी थी? इस सवाल पर वह अपने बाल-बच्चों और नौकरी की दुहाई देने लगता है. नारायणपटना पुलिस थाने का एक सिपाही नाम न छापने की शर्त पर तहलका को बताता है कि घायल होने के बाद साहू ने इलाज के लिए हवाई मार्ग से विशाखापत्तनम जाने से मना कर दिया था और उसने साहू को घटना वाले दिन ही शाम को थोड़ा सा लंगड़ाते हुए चलते देखा था.

इस घटना से जुड़े और भी कई अनुत्तरित सवाल हैं. मसलन, यदि आदिवासियों ने 22 राउंड गोलियां चलाईं तो साहू को एक गोली लगने के अलावा बाकियों का क्या हुआ? थाने के उस छोटे से परिसर में आदिवासियों द्वारा चलाई गोलियां बाकी पुलिस वालों को क्यों नहीं लगीं? नारायणपटना की दो मुख्य सड़कें जहां मिलती हैं यह पुलिस थाना उसी जगह है. ऐसे में यह स्वाभाविक ही रहा होगा कि घटना के वक्त वहां काफी लोग इकट्ठे थे. लेकिन ऐसा कोई चश्मदीद नहीं है जो यह कहता हो कि उस दोपहर दोनों तरफ से फायरिंग हो रही थी. सभी यही बताते हैं कि गोलियां केवल थाने की छत की ओर से ही चल रही थीं. कथित तौर पर अर्धसैन्य बल के दो जवानों ने छत से पहले तो सीएमएएस के दोनों नेताओं को गोली मारी, उसके  बाद भीड़ पर फायरिंग कर दी थी. इस मामले में जब तहलका ने गौरांग साहू से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया.

उस अस्पताल कर्मी के हमसे ज्यादा बात न करने, पुलिस के कोई भी बात ऑन रिकॉर्ड न कहने और यहां तक कि हमारे किसी भी सवाल से बचने की कोशिश का मतलब आपको तब पूरी तरह से समझ में आता है जब आप इस घटना के समय इकट्ठे हुए आदिवासियों से बात करते हैं. उस दिन विरोध प्रदर्शन में शामिल रहे रंजू वडेका हमें बताते हैं, ‘डुंबागोडा और ओडिपेंटा गांव में 18 और 19 नवंबर को पुलिसवालों ने महिलाओं के साथ दुर्व्‍यवहार किया था, हम उसी का विरोध जताने थाने के सामने जमा हुए थे. हमारी मांग थी कि थाना प्रभारी बाहर आकर हमसे बात करें. हमने आधे घंटे से भी ज्यादा इंतजार किया, उसके बाद हमारे चार नेता थानेदार से बात करने भीतर चले गए. कुछ देर की नोंकझोंक  के बाद जब हमारे लोग वापस आ रहे थे तो थानेदार ने थाने की छत पर खड़े जवानों से चिल्लाकर फायरिंग करने को कहा. उन्होंने सिंगन्ना को गोली मार दी. फिर हम पर फायरिंग शुरू कर दी.’ यह पूछने पर कि क्या आदिवासियों के पास कोई हथियार, जैसे तीर-कमान आदि थे? वडेका हंसते हुए कहते हैं, ‘यदि हमें पुलिसवालों को मारना होता तो क्या हम थाने जाते? वे तलाशी अभियान में हमारे गांव आते रहते हैं, क्या उन्हें वहां मारना आसान नहीं होता?’

इस घटना के बाद से पुलिस 60 से ज्यादा आदिवासियों को गिरफ्तार कर चुकी है. यहां सीएमएएस के नेता नचिका लिंगा की तलाश में पुलिस ने एक सघन खोजी अभियान चला रखा है. लिंगा की जानकारी देनेवाले को ईनाम देने की घोषणा करते पोस्टरों से दूरदराज तक के गांव पटे पड़े हैं. इस इलाके में अतिरिक्त पुलिस और सैन्य बल के जवान भी आ चुके हैं. विशेष अभियान समूह और कोबरा फोर्स इस इलाके में निगरानी कर रहे हैं और अलसाया सा रहने वाला यह कस्बा युद्धक्षेत्र में तब्दील हो चुका है. यहां चारों तरफ संदेह और डर का ऐसा माहौल है जिसका असर 70 किमी दूर नारायणपटना के जिला मुख्यालय कोरापुट तक में महसूस किया जा सकता है.

कोरापुट की टैक्सी ड्राइवर एसोसिएशन से तहलका को पता चला कि पुलिस ने उन्हें बाहरी लोगों को इस इलाके में ले जाने के खिलाफ चेतावनी दे रखी है. 20 नवंबर की घटना के बाद ही पुलिस ने सीएमएएस को माओवादी समूह घोषित कर दिया था और दो सप्ताह बाद गृह मंत्रालय से सीएमएएस पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश कर दी गई. हमने जिन छह गांवों का दौरा किया उनमें हमें गिनती की आदिवासी महिलाएं मिलीं, जिन्होंने हमें बताया कि गांव के लोग पुलिस के डर से जंगलों में भाग गए हैं. पुलिस यहां सीएमएएस के कई कार्यकर्ताओं को माओवादी बताकर गिरफ्तार कर चुकी है. सीएमएएस के  एक समर्थक तपन कुमार मिश्रा को भी पुलिस ने माओवादी बताकर गिरफ्तार किया है. 2009 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उड़ीसा विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले तपन राज्य के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हैं. पुलिस का दावा है कि उसके तलाशी अभियान में अब तक 150 माओवादी पोशाकें, एक शक्ितशाली बारूदी सुरंग और 2 किलो भारी विस्फोटक पदार्थ के साथ एक संचार उपकरण बरामद हुआ है.

पुलिस, प्रशासन और आदिवासियों के बीच इस खींचतान में चासी मुलिया आदिवासी संघ का नाम कई बार सामने आया. दरअसल, यह संगठन यानी सीएमएएस पिछले 15 सालों से कोरापुट में दो मुद्दों पर काम कर रहा है; अवैध रूप से आदिवासियों की भूमि का हस्तांतरण और शराबबंदी. उड़ीसा के भूमि हस्तांतरण कानूनों में आदिवासियों की भूमि का गैर आदिवासियों को हस्तांतरण प्रतिबंधित है. जबकि यहां की कई एकड़ जमीन गैर आदिवासियों के पास है. सीएमएएस का दावा है कि यह जमीन आदिवासियों की है और इसपर दूसरे लोगों ने अवैध रूप से कब्जा जमाया हुआ है. संगठन आदिवासियों को यही जमीन वापस दिलाने के लिए काम करता है. तहलका के साथ बातचीत में आदिवासियों का कहना था कि गोलीबारी की घटना से पहले तक सीएमएएस आदिवासियों की करीब दो हजार एकड़ भूमि वापस करवा चुका है. कुछ मामलों में सीएएमएस ने कानून या राजस्व विभाग की मदद लेने की बजाय हिंसा का सहारा भी लिया है. पिछले दिनों जमीन विवाद के चलते सीएमएएस कार्यकर्ताओं ने गैरआदिवासियों - जिनमें कुछ दलित परिवार भी शामिल थे - के कुछ घरों को नष्ट कर दिया. जैसे-जैसे इसकी खबर फैली दलित परिवार अपना गांव छोड़कर भागने लगे. इनमें से कई परिवारों से हमारी बात हुई. सीएमएएस के डर से दोमसिल गांव छोड़ने वाले जिहोया केंद्रुका तहलका से कहते हैं कि पिछली मई में सीएमएएस द्वारा जमीन को वापस लेने के प्रयास में कम से कम एक व्यक्ति की मौत हो गई और दोनों तरफ के घरों को नुकसान पहुंचा.

सीएमएएस के पीछे की शक्ति इसका नेता नचिका लिंगा है. अत्यंत गरीबी में जीवन गुजारने वाला लिंगा स्थानीय निवासियों के मुताबिक एक ऐसा व्यक्ति है जिसने सीएएमएस के प्रभाव वाले इलाकों में शराबबंदी का आह्वान कर रखा है और जो अपने शराबी पिता की नशाखोरी की कहानियां सुना-सुनाकर लोगों को शराब छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करता रहा है. यही लिंगा आज उड़ीसा पुलिस के वांछितों की सूची में सबसे ऊपर है और पुलिस का कहना है कि वह माओवादियों के बीच छिपा हुआ है.

मगर यह पहली बार नहीं जब सीएमएएस को माओवाद से जोड़ा गया है. जून, 2006 में जब लिंगा को उसके तीन और साथियों के साथ पुलिस ने हिरासत में लिया था, उस पर आरोप था कि वह पीपल्स वॉर ग्रुप (पीडब्ल्यूजी) का सदस्य है. पीडब्ल्यूजी और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) ने ही बाद में मिलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी ) का गठन किया था. नवंबर, 2007 में एडीशनल सेशन जज जीसी पाणीग्रही ने लिंगा पर सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा था, ‘सीएमएएस आदिवासियों के शोषण के खिलाफ एक शांतिपूर्ण राजनैतिक आंदोलन है..इसका सरकार के खिलाफ युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है..’ जज ने ‘माओवादी’ शब्द के मनमाने प्रयोग पर आपत्ति जताते हुए कहा था, ‘एक प्रजातांत्रिक समाज में सभी तरह के मतों को व्यक्त करने की जगह होती है. बैठक करना, झंडे लहराना और भाषण देना ये सब प्रजातंत्र का हिस्सा हैं.’ अब लगभग दो साल बाद फिर से सीएमएएस पर वही आरोप लगाए गए हैं,  लेकिन इस बार खुद सीपीआई (माओवादी) ने इसका खंडन किया है, सीपीआई (माओवादी) का कहना है कि वे सीएमएएस का समर्थन करते हैं, लेकिन उनका इस संगठन से कोई लेना देना नहीं है.

दरअसल, इन अशांत इलाकों में सरकार के अत्याचार के खिलाफ अब जो भी आवाज उठती हैं उसे दबाने का सबसे आसान तरीका यही है कि उसे माओवादी कह दिया जाए. पड़ोसी राज्यों छत्तीसगढ़ और झारखंड में भी यही किया जा रहा है लेकिन उड़ीसा इस मामले में कहीं आगे निकल चुका है. अवैध भूमि हस्तांतरण के खिलाफ संघर्ष करने वाले एक और संगठन मलकानगिरी आदिवासी संघ (एमएएस) का तहलका से कहना है कि यहां बेवजह गिरफ्तारियां आए दिन की बात हो गई हैं. एमएएस के कार्यकर्ता विदेश गौड कहते हैं, ‘कोरापुट की तरह मलकानगिरी जिले में भी माओवादी सक्रिय हैं. हमें पता है कि माओवादी हमले के जिम्मेदार लोगों को हिरासत में लेना सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी है. लेकिन इसके लिए निर्दोष आदिवासियों, जिनका माओवादियों से कोई संबंध नहीं है, को परेशान करने से क्या मतलब?’ एमएएस ने उन लोगों की एक विस्तृत सूची बना रखी है जिन्हें पुलिस ने माओवादी बताकर हिरासत में रखा हुआ है.

मलकानगिरी के हालात इस लिहाज से और ज्यादा खराब हैं कि नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए गठित आंध्रप्रदेश का विशेष सुरक्षा दस्ता ग्रेहाउंड यहां अक्सर उड़ीसा पुलिस की जानकारी के बिना तलाशी अभियान चलाता रहता है. चित्रकोंडा पुलिस थाने के प्रभारी इंस्पेक्टर राजेश चत्रिया भी उनके इलाके सें गायब हुए एक आदिवासी साधूराम खारा के बारे में पूछने पर मानते हैं कि ग्रेहाउंड अपनी गतिविधियों के बारे में स्थानीय पुलिस को कोई जानकारी नहीं देता.
एक ऐसी जटिल दुनिया जहां आपको ध्यान खींचने के लिए प्रतिरोध की अलग भाषा बोलनी होती है, जहां सरकार से सवाल-जवाब उसके खिलाफ युद्ध माना जाता है, वहां नारायणपटना और मलकानगिरी के आदिवासियों की आवाजें महज आवाजें न होकर ऐसे बड़े सवाल हैं जिनका हल हमें ढूंढ़ना ही होगा.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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