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बीच सफ़हे की लड़ाई

अन्याय को यहां न्यायिक समर्थन मिला हुआ है

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/16/2009 10:00:00 AM


भुखमरी और मानवाधिकार का सवाल : नए सिरे से सोचें और लड़ें
सुनीत चोपडा, मानवाधिकार कार्यकर्ता
मानवाधिकार अभी अपने सबसे नाजुक दौर से गुजर रही है। बेहद संकट की स्थिति है। मानवाधिकार संरक्षण में सूचना के अधिकार को एक कारगर युक्ति माना गया। सरकार इसमें बदलाव लाना चाहती है जो मानवाधिकारों के संरक्षण के विपरित है। देश के 24 करोड लोग आज 9 रु प्रतिदिन पर जिंदा हैं। 84 करोड लोग ऐसे हैं जो 20 रु रोजाना पर जिंदगी जीने को मजबूर हैं। ऐसी स्थिति में मानवाधिकार के संरक्षण का सवाल ही नहीं उठता। अर्थात समाज की इतनी बडी ज़मात आज आधारभूत मानवाधिकार से भी वंचित है। गरीब इलाकों में लोग महीने के तीन-चार दिन तो भूखे पेट सोते हैं।
इसके पीछे महंगाई जिम्मेदार है। साढ़े सत्रह प्रतिशत महंगाई के साथ मानवाधिकार के संरक्षण की बात सोचना बेमानी है। कई इलाकों में सारे दिन की मजदूरी पचास रु है।  वह मजदूर क्या खाएगा और क्या बचाएगा। दिनभर की मजदूरी कर वह आधी किलो दाल भी नहीं खरीद सकता। जातिवाद समाज का असल चेहरा बन गया है। यहां अन्याय को न्यायिक समर्थन मिला हुआ है। पुलिस और कानून का गरीबों के लिए कुछ नहीं करना और उल्टे उन्हें दबाना मानवाधिकारों के प्रतिस्थापन में किसी दृष्टिकोण से जायज नहीं हो सकता। समस्या विकराल इसलिए बन गई है क्योकि आज कोई भी आदमी अपने व्यक्तिगत मानवाधिकार के खिलाफ भी आवाज नहीं उठाता तो वह दूसरे के लिए क्या उठाएगा? मानवाधिकार को बचाने के लिए भारत में सामूहिक संघर्ष की आवश्यकता है। धन्यवाद है सीटू और इंटक जैसे मजदूर संगठनों का जिसने भोपाल मसले पर आवाज उठाई। आम जनता को अब राशन के लिए लडना होगा। ग्रामीण लोगों को नरेगा के लिए लडना होगा। पूरे समाज को सूचना के अधिकार के लिए लडना होगा। मानवाधिकार संरक्षण के सरकारी दावे खोखले हैं।
उसकी नीतियां ही मानवाधिकार उल्लंघन के लिए दोषी हैं। सही शब्दों में कहें तो सरकारी पाटों के बीच आज आमजन पीसने को मजबूर है। समाधान तो तभी संभव है जब जातिवाद, संप्रदायवाद, धार्मिक उन्माद और छूआछूत जैसे मसलों का व्यापक विरोध हो। लेकिन इस व्यवस्था में ऐसे सुधार संभव नहीं। मुद्दों पर लडाई लडने की आवश्यकता है। क्या केंद्र या क्या प्रदेश सरकारें, कोई भी आम आदमी के लिए कुछ नहीं कर रहा। जरूरी है कि धनी और साधन संपन्न लोग समाज को तोडने वाली ऐसी बुराइयों को समझें। मौजूदा व्यवस्था में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं दिखती। छूआछूत, दलितों पर अत्याचार, महिलाओं पर अत्याचार, बाल श्रम, महंगाई की समस्या आदि ऐसे विकट कारण हैं जिनसे निबटने पर ही मानवाधिकार का संरक्षण हो सकता है। मूल रूप से इसके दो कारण हैं-आज प्रदेश सरकारें जनअधिकारों के प्रति पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुकी हैं। उदारीकरण ने व्यवस्था को इतना चौपट किया कि जनता का ख्याल रखना सरकार अपना कर्तव्य मानती अब नहीं मानती। प्रदेश सरकार आज अपने लोगों को आगे लाना चाहती है जिसके लिए साधारण जनता के अधिकारों का हनन तो होगा ही। मुट्ठी भर लोगों के लिए समाज के बडे तबके को दबाना कहां तक उचित है?  (देशबंधु से साभार)

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ अन्याय को यहां न्यायिक समर्थन मिला हुआ है ”

  2. By परमजीत बाली on December 16, 2009 at 4:02 PM

    सरकार सोई है और आम आदमी उलझा है रोटी रोजी के चक्कर मे....ऐसे मे क्या उम्मीद कर सकते है.....

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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