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बीच सफ़हे की लड़ाई

ऑपरेशन ग्रीनहंट: जनता के खिलाफ जंग

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/31/2009 01:19:00 PM


प्रफुल्ल बिदवई

जो
कुछ मीडिया में कहा जा रहा है, यदि वह सही है तो श्री मधु कोडा ने दो वर्ष तक झारखंड के मुख्यमंत्री पद पर काम करने के दौरान 4000 करोड रुपए की विपुल धनराशि गैरकानूनी ढंग से एकत्रित की और उसे दुनिया भर में अलग-अलग परिसंपत्तियों में निविष्ट किया, जिनमें जहाजरानी कंपनियां, होटल और स्विस बैंक खाते शामिल हैं।
जैसा कि बताया जाता है, इसमें से अधिकतर राशि झारखंड में, जो कि भारत के खनिज समृध्द तीन राज्यों में से एक है, खनन परियोजनाओं को मंजूरी देने के एवज में ली गई रिश्वत के जरिए इकट्ठी की गई। इनमें से अधिकतर परियोजनाएं गैरकानूनी थीं और जितनी अवधि और जितने क्षेत्र के लिए अनुमति दी गई थी वह भी कानूनी सीमा के बाहर थी। आदिवासी झारखंड का सबसे बडा जाति समूह है और वे वहां के मूल बाशिंदे हैं जिनका अपनी भूमि पर से उत्तरोत्तर कब्जा छिनता चला गया है।
 यदि कारोबारियों ने श्री कोडा को 4000 करोड रु रिश्वत में दिए, तो मंजूर की गई परियोजनाओं से उन्हें कम से कम 10,000 करोड रु क़ा लाभ तो हुआ ही होगा। 20 प्रतिशत लाभ की गुंजाइश रखते हुए, कुल व्यापार कम से कम 50,000 करोड रु क़ा रहा होगा। इतनी बडी रकम झारखंड के कुल राजस्व से तीन गुना ज्यादा है। जैसा कि कहा गया है, यदि अकेले कोडा ने इतनी राशि हडप ली है जो झारखंड के वार्षिक बजट की एक चौथाई के बराबर है, तो यदि राज्य न्यूनतम सार्वजनिक सेवाएं भी नहीं जुटा पाता तो यह हैरानी की बात बिल्कुल नहीं होगी। पुलिस का जनता के प्रति रवैया शत्रुतापूर्ण है और वे जनता को परेशान करते रहते हैं। इस स्थिति के प्रति स्वाभाविक प्रतिक्रिया नक्सलवाद का प्रसार है। अपने सब दोषों के बावजूद नक्सली एकमात्र संगठित राजनीतिक धारा है जो ताकतवरों की लूटपाट के खिलाफ अल्पाधिकार प्राप्त और शोषित लोगों की रक्षा करती है। नक्सलियों का प्रभाव इसलिए बढा है क्योंकि लोगों के पास कोई और सहारा नहीं है। जो स्थिति झारखंड की है, वही स्थिति छत्तीसगढ, अादिवासी उडीसा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के कुछ भागों की भी है। पूरी आदिवासी पट्टी में सार्वजनिक संसाधनों को लूटा जा रहा है। उडीसा में 16,000 करोड रु क़ा एक खनन घोटाला अभी-अभी सामने आया है। यहां तक की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह स्वीकार किया कि उन आधुनिक आर्थिक प्रक्रियाओं में, जो बेरहमी से आदिवासियों के रहने की जगहों पर दखल कायम करती जा रही है, उन्हें कुछ हिस्सा देने में हमारी व्यवस्था नाकाम रही है और यह कहा कि दशकों से आदिवासियों के बीच पैदा हुई अलगाव की भावना अब खतरनाक मोड लेती जा रही है। उन्होंने यह भी कहा था कि हमारे आदिवासियों के बराबर शोषण और उनके सामाजिक तथा आर्थिक दुरुपयोग को अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। व्यवस्था की नाकामी को स्वीकार करने वाले एकमात्र सरकारी पदाधिकारी नहीं हैं डा. सिंह। योजना आयोग द्वारा नियुक्त की गई बंदोपाध्याय समिति ने भी इसे नक्सलवाद के बढने के लिए उचित रूप से जिम्मेवार ठहराया है। टाटा स्टील छत्तीसगढ में 5000 एकड भूमि पर 19,500 करोड रु का स्टील प्लांट लगाने जा रहा है जिसके लिए पूरे 10 गांव खाली कराने पडेंग़े। एस्सार कॉर्पोरेशन छत्तीसगढ क़े बस्तर इलाके में घुसने के लिए जोर लगा रहा है। आदिवासियों को कई दशकों से लूटा जा रहा है। न्यायपालिका भी इस अपराध में शामिल है और कुछ शीर्ष कॉर्पोरेट वकील तो इस फिराक में हैं कि संविधान की पांचवीं अनुसूची को, जो कि आदिवासियों को कानूनी रक्षा प्रदान करती है, समाप्त कर दिया जाए ताकि विनाशकारी विकास परियोजनाओं को मंजूरी मिल सके। ऑपरेशन ग्रीनहंट के पिछे तर्काधार यही है। आदिवासी पट्टी को ''नपुंसक'' बनाकर उसे ''शांत'' करने के लिए एक बहुत बडे पैमाने पर सैनिक हमला किया जा रहा है। नक्सली तो केवल प्रतीक रूप में निशाना बनाए जा रहे हैं। असलीयत में यह राज्य द्वारा जनता के खिलाफ छेडी ग़ई एक जंग है। इस हमले की शुरूआत बस्तर मे की जाएगी और यह पांच साल तक चलेगा। इसमें लगभग 60,000 तक की संख्या में सशस्त्र सैनिक होंगे जिसमें 27 बटालियन सीमा सुरक्षा बल और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस भी शामिल होगी। इसका लक्ष्य होगा बस्तर में अबझमढ नामक 4,000 वर्ग किमी में फैला हुआ घने जंगलों का इलाका। भारतीय सेना बिलासपुर में एक ब्रिगेड मुख्यालय स्थापित करेगी जो भविष्य में माओ विरोधी ऑपरेशनों में भाग ले सकेगी। भारतीय वायु सेना बंदूकवाहक हेलीकॉप्टर जुटाएगी जिनमें उसके गरुड नामक विशेष बल तैनात होंगे। ऐसा पहली बार हो रहा है कि भारत की नियमित सशस्त्र सेनाएं जो हमारे बाहर के दुश्मनों से हमारी रक्षा करती है, देश के केंद्रीय भाग में भारतीय नागरिकों के खिलाफ बडे पैमाने पर हमला करने के लिए तैनात की जाएगी। यह आक्रामक ऑपरेशन एक बहुत बडे पैमाने पर मासूम नागरिकों को अपने पाशविक हमलों का शिकार बनाएगा और कष्ट और दुख में बढाेतरी करेगा। हमें इस ऑपरेशन के खिलाफ इसलिए नहीं खडा नहीं होना चाहिए कि हम माओवादियों का समर्थन करते हैं, बल्कि इसलिए कि बुनियादी लोकतांत्रिक मूल्य दांव पर लगा है। माओवादियों की हिंसक मनोवृति का किसी हाल में समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन राज्य द्वारा अपने ही लोगों के खिलाफ एक सामूहिक दंड के रुप में जंग छेडने का विचार ही घिनावन है। सामूहिक दंड न्याय के लिए घोषित मुद्दों के दौरान भी अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार वर्जित है। यदि भारतीय राज्य एक बडे पैमाने पर संगठित और सोची समझी हिंसा का सहारा लेती है, जिसमें मुख्यत: नागरिक ही मारे जाएंगे तो वह अपना कद छोटा कर लेगा और थोडा सा भी सभ्य कहलाने का दावा नहीं कर पाएगा। इस ऑपरेशन से तो अन्याय बढेंग़े और भागीदारी का विकास संभव नहीं होगा। आजादी के समय से ही राज्य आदिवासियों के साथ अनुचित व्यवहार करता रहा है और आदिवासी इलाकों में विकास और लोकतंत्र को क्षति पहुंचाता रहा है। उसे अपना रास्ता सुधारना चाहिए और एक ऐसी चेष्टा करनी चाहिए जो गुणात्मक दृष्टि से नई और अलग हो। ऑपरेशन ग्रीनहंट को हरगिज अंजाम नहीं दिया जाना चाहिए।

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ ऑपरेशन ग्रीनहंट: जनता के खिलाफ जंग ”

  2. By Anonymous on December 31, 2009 at 2:45 PM

    ऑपरेशन ग्रीन हंट देर से शुरू किया जा रहा सकारात्मक कदम है। नक्सलियों के सफाये से आदिवासियों को पुनर्जीवन मिलेगा और वह अपनी जिन्दगी फिर जी सकेंगे।

  3. By aniruddh on December 31, 2009 at 3:09 PM

    लोक तंत्र में खामिया हैं और इससे किसी को इनकार नहीं है और इसके लिये आगे आने की आवश्यकता है। आज भी बदलाव होते हैं तेलंगाना मामले में चंद्रशेखर राव का लोकतांत्रिक तरीके से लडा जा रहा आन्दोलन देखिये। नक्सलवादी आतंक का रास्ता छोडे तो फिर समस्या कहाँ है। ऑपरेशन ग्रीनहंट जनता के खिलाफ जंग नहीं आतंकवाद के खिलाफ जंग है। आपकी एक पंक्ति काबिलेगौर है कि - माओवादियों की हिंसक मनोवृति का किसी हाल में समर्थन नहीं किया जा सकता। इस लिये माओवादियों की खिलाफत भी आवश्यक है न कि इस तरह के लेखों के माध्यम से उनके पक्ष में प्रचार।

  4. By बस्तरिहा on January 2, 2010 at 2:38 PM

    बुद्धिजीवियों, चिंतकों, कलाकारों, साहित्यकारों और पत्रकारों के नाम अपील

    प्रिय मित्रो,
    बस्तर, माओवाद और नक्सलवाद को लेकर देश में घमासान मचा हुआ है। माओवादी संगठन, पूर्ण कालिक एवं अल्पकालिक बुद्धिजीवी, तथाकथित स्वयंसेवी संगठन न केवल बस्तर की लगातार विकृत तस्वीर चित्रित कर रहे हैं, बल्कि देश में युद्ध का भ्रामक वातावरण भी पैदा कर रहे हैं । यदि आप हाल ही में प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और वेब मीडिया में प्रकाशित/प्रसारित विज्ञप्तियों, लेखों, अपीलों की मीमांसा करें तो साफ़ जाहिर हो जायेगा कि इनकी वास्तविक चिन्ताओं में देश, समाज, जनता (विशेष कर आदिवासी, पिछड़े, दलित) नहीं, बल्कि उनकी आड़ में और प्रकारांतर से माओवादी क्रांति के रास्ते पर देश को ले जानेवालों के लिए वातावरण निर्माण करना और प्रजातांत्रिक इकाइयों को ध्वस्त करना है । जाहिर है ऐसे कार्यों के पीछे की मंशा प्रजातांत्रिक न हो कर अराजकतावादी है ।
    नक्सली हिंसा के तांडवकारी, अधोसंरचना के विध्वसंक और विकास के सारे रास्तों को रोककर आम जनता को हिंसक व्यवस्था के अधीन रहने के लिए विवश करनेवालों द्वारा कथित मानवाअधिकारों का प्रश्न ही अपने आप में संदेहास्पद है। मानव अधिकार के दावे उनके मुँह से फबता है जो मानव अधिकार की रक्षा के लिए कटिबद्ध हैं । जो निहत्थे आदिवासियों की हत्या पर विश्वास करते हैं, जो आदिवासियों को भय और आंतक अर्थात् अशांत वातावरण में जीने को मजबूर करते हैं, जो आदिवासियों के साथ जोर-जबरन करके उन्हें सशस्त्र सैनिक बनाकर देश में अवांछित युद्ध जैसी स्थिति निर्मित करते हैं उनके द्वारा मात्र मानवाधिकार के नाम पर बौद्धिक प्रलाप कितना उचित है, यह भी सोचने का समय आ गया है ।
    शेष पढ़ने के लिए http://www.janganmanindia.blogspot.com/ क्लिक करें...
    डॉ. बलदेव
    संस्कृति कर्मी
    बस्तर का अध्ययन पश्चात लिखे गये किताब से कुछ अंश

  5. By मिहिरभोज on March 25, 2010 at 1:55 PM

    आपका लेख किसी देशद्रोह से कम नहीं

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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