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कोपेनहेगन : दलाली और धोखेबाजियों की नयी दास्तान

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/30/2009 05:02:00 AM


प्रफुल्ल बिदवई

ब्राजील,
दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन ने मिलकर यह प्रतिज्ञा की थी कि वे जलवायु संबंधी अपने दायित्वों से पल्ला झाडने पर उतारू विकसित देशों की चालों से जलवायु संबंधी बातचीत को प्रभावित नहीं होने देंगे। लेकिन विकसित देशों के हाथ की कठपुतली बन कर उन्होंने यह सुनिश्चित कर दिया है कि जो देश जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं, वे अपने यहां हो रहे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी करने की कोई जिम्मेदारी नहीं लेंगे। तीन पृष्ठ का कोपनेहेगन समझौता संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन ढांचा सभा का करार नहीं है। और न ही उसे आम राय की वैधता प्राप्त है। यह करार जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लडने के लिए एक महत्वाकांक्षी, सख्त, कारगर और पूरे विश्व के लिए बाध्यकारी करार को जल्दी से लागू करने की आवश्यकता के विरुध्द जाता है। इस स्थिति में यह एक अत्यंत गैर-बराबरी का करार है जो बहुत ही निराशाजनक है और जिसके खतरनाक अंजाम देखने को मिल सकते हैं। विश्व के गरीब लोगों पर जिन पर पहले से ही जलवायु परिवर्तन का जबरदस्ती अधिक बोझ डाला गया है, इस समझौते से इसमें और भी इजाफा होगा। इस समझौते के लिए कोई मात्रागत बाध्यताएं निर्धारित नहीं की गई है, जैसा कि 1977 के क्योटो समझौते के अंतर्गत किया गया था, और न ही अनुपालन संबंधी या दंडात्मक व्यवस्थाएं की गई हैं। देशों को मनमर्जी के मुताबिक या दूसरे शब्दों में कुछ भी कार्रवाई न करने के लिए आजाद छोड दिया गया है। जो पिछला अनुभव रहा है, या जिस तरह से ताकतवर कॉर्पोरेट लॉबियां विकसित देशों की सरकारों पर दबाव डालती रही हैं, उसके मद्देनजर इस बात की कोई संभावना दिखाई नहीं देती, कि वे स्वेच्छा से कोई गंभीर दायित्व अपने ऊपर लेंगे। क्योटो समझौते के अंतिम वर्ष 2012 तक उनके 1990 के उत्सर्जन में 5.2 प्रतिशत की मामूली कमी करने की व्यवस्था की गई थी। उत्तरी देशों में थोडे से ही ऐसे देश हैं जो उन लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में बढ रहे हैं। अपेक्षाकृत बडी अौर तेजी से विकसित हो रही दक्षिणी अर्थव्यवस्थाओं खास कर चीन, भारत, ब्राजील और दक्षिणी अफ्रीका को इस समय के अपने सामान्य लक्ष्यों की तुलना में उत्सर्जनों में कटौती करनी पडेग़ी ताकि विश्व जलवायु के स्थिरीकरण और कम कार्बन वाले विकास की ओर बढ सकें। कोपेनहेगन समझौता पर चुपके से केवल 26 देशों की सहमति प्राप्त कर ली गई और ऐसा करने में अगुआनी की अमरीका और चीन ने। कोपेनहेगन समझौता सत्यापन संबंधी सीमा रेखा को भी लांघ गया है। इसके अंतर्गत भारत अपनी घरेलू कार्रवाईयों के बारे में ''अंतरराष्ट्रीय परामर्श और विश्लेषण'' के लिए सूचना प्रस्तुत करेगा। इसके परिणामस्वरूप कई बखेडे शुरू हो जाएंगे, क्योंकि अनुचित हस्तक्षेप के द्वारा हमारी घरेलू कार्रवाइयों का सत्यापन किया जाने लगेगा। अमरीका ने परामर्श की व्याख्या पहले से ही ''समीक्षा'' यहां तक कि ''आपत्ति'' के अर्थों में कर दी है। सत्यापन तभी स्वीकार्य होगा जब दक्षिण की कार्रवाइयों के लिए उत्तर, आर्थिक-सहायता प्रदान करेगा। लेकिन जिन कार्रवाइयों के लिए आर्थिक सहायता प्रदान नहीं की जाएगी उनके मामले में निगरानी रखने या सत्यापन करने की इजाजत देने का कोई मतलब नहीं है। लेकिन इस समझौते का पूरे विश्व पर जो व्यापक प्रभाव पड़ेगा, उसके सामने भारत का इससे पीछे हटना बहुत ही महत्वहीन दिखाई देता है। भारत एक ऐसे समझौते को स्वीकार करने का सहअपराधी बन गया है, जो कि महत्वकांक्षाहीन और कानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं है और जिसमें विश्व स्तर पर या देशों के समूहों के लिए उत्सर्जन की अधिकतम मात्रा या उत्सर्जनों में कटौती के कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किए गए हैं। यह समझौता अल्पविकसित रूप से भारतीय विशिष्ट वर्ग के हित में हो सकता है। जैसा कि मैंने हाल ही में विमोचित अपनी पुस्तक ''ऐन इंडिया दैट कैन से येस: ए क्लाइमेट-रेसपांसिबल डिवलपमेंट अजेंडा फॉर कोपेनहेगन एंड बियांड'' में कहा है, भारतीय नीति निर्माताओं के बीच एक ऐसा अंश है जो लंबे समय से एक गैरकारगर और कमजोर सौदे का जोरों से स्वागत करता है, क्योंकि उससे भारत को अपने उत्सर्जन बढाने में मदद मिल पाएगी, भले ही विश्व पर और खास तौर भारतीय गरीबों पर कैसा भी प्रभाव पडे। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं कि ऐसे सौदे से भारतीय गरीबों पर इस तेजी से होने वाले जलवायु परिवर्तन के कारण ज्यादा भूख, पानी की ज्यादा कमी, ज्यादा बाढाें और ज्यादा विस्थापन और बीमारियों का सामना करना पडेग़ा। नीति-निर्माताओं में से ऐसे लोगों ने एक अच्छे, न्यायपूर्ण और कारगर समझने की बजाए एक खराब और गैरकारगर समझौते को तरजीह दी है। यह आत्महत्या का रास्ता विश्व को कई वर्षों तक बहुत ज्यादा उत्सर्जन के चक्कर में डाल देगा, जिसके भयंकर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। भारत यह बहाना नहीं कर सकता कि उसे इस समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया गया था। वह अपनी खुशी से इसके लिए रजामंद हुआ, बल्कि बताया तो यह जाता है कि उससे कानूनी तौर पर बाध्यकारी समझौते का विरोध भी किया। इस बहुत बडी ग़लती के लिए श्री रमेश को दोषी ठहराना निरर्थक है। भारत की इस नीतिगत अव्यवस्था और उसके परिणामस्वरूप एक सख्त, कानूनी बाध्यकारी सौदे पर बल देने के अपने रूख से भारत के पलटने और एक असम्मानजनक घृणित परिणामों के लिए स्वयं डा. मनमोहन सिंह व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार हैं। यह कार्रवाई विदेश नीति की एक व्यापक असफलताओं की परिचायक है। भारत ने इससे विश्व में अपना कद छोटा कर लिया है। विभिन्न सूत्रों से प्राप्त सूचनाओं को एक दूसरे से जोडने के बाद हमें यह पता चलता है कि अगले कुछ सप्ताहों में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन ढांचा सभा की प्रक्रिया को और ज्यादा नुकसान पहुंचने से बचाने का एक मौका मिलने की छोटी सी संभावना अभी और बाकी है। हम भार के न्यायपूर्ण बंटवारे की मांग करके और एक तुरंत सामूहिक कार्रवाई के द्वारा जिसके एक समतापूर्ण और कारगर वैश्विक सौदे के लिए जबरदस्त दबाव डाल सकते हैं। 

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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