हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

क्या हुआ उन सुझावों का? बदलते बिहार की बानगी

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/29/2009 04:48:00 AM




भूमि सुधार आयोग की रपट
बिहार में भूमि सुधारों को गति देने के इरादे से देवव्रत बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में भूमि सुधार आयोग बना था. श्री बंदोपाध्याय ने तय समय पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी. रिपोर्ट में व्यापक भूमि सुधार की अनुशंसा की गयी थी. इस अनुशंसा से बड़े भूस्वामी और सामंती मिजाज के वैसे लोग जो जमीन पर काबिज रहना चाहते हैं, प्रभावित हो सकते थे. इस रिपोर्ट को सरकार ने कूड़ेदान में फेंक दिया. (पिछले विधान सभा चुनाव के ठीक पहले इसे कचरे के डब्बे से बाहर निकाला गया. लेकिन जैसे ही सवर्ण सामंतों ने आंखें तरेरीं सरकार बैकफुट पर आ गयी. नीतीश कुमार ने फरमाया, हमारा इरादा कभी भी इसे लागू करने का नहीं था, इस पचड़े में नहीं पड़ेंगे हम. सिर्फ यही नहीं कि भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को नीतीश कुमार ने हमेशा के लिए दफन कर दिया बल्कि उससे बुरी बात यह रही कि मुख्यमंत्री और उनके कारिंदे भूमि सुधार को एक घृणित काम के रूप में प्रचारित करने में जुट गये. देश के नामी विद्वान देवव्रत बंदोपाध्याय को भी इस पूरे प्रकरण में काफी अपमान झेलना पड़ा. इन दिनों मुख्यमंत्री के सामने उनके मंत्री बंदोपाध्याय के लिए सार्वजनिक रूप से अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं.)

समान स्कूल शिक्षा प्रणाली आयोग
भारत के पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दूबे की अध्यक्षता में बने समान स्कूल शिक्षा प्रणाली आयोग ने अपनी अनुशंसाएं सरकार को सौंप दी हैं. इन अनुशंसाओं के लागू होने पर अमीर और गरीब, डीएम और चपरासी के बच्चे एक समान स्कूल में पढ़ पाएंगे. शिक्षा के क्षेत्र में ये क्रांतिकारी काम होता. लेकिन सरकार को क्रांति की नही भ्रांति की जरूरत है. इस आयोग की रपट भी कचराघर के हवाले है.

अति पिछड़ा वर्ग आयोग
सरकार ने अति पिछड़ों के लिए एक आयोग बनाया. उदयकांत चौधरी अध्यक्ष बनाये गये. श्री चौधरी लंबे समय से अति पिछड़ों के लिए कार्य करते रहे हैं. उनसे गलती हुई कि रिपोर्ट अंगरेजी में लिख दी. नीतीश कुमार बिफरे. अंगरेजी तो ऊंची जात के लोगों की भाषा है. आप क्यों अंगरेजी लिखते हैं. फिर उस रिपोर्ट को उलटा-पुलटा गया. बाप रे! यह तो उदयकांत चौधरी नहीं, नाग चौधरी है. इन अनुशंसाओं को मानने का मतलब है अति पिछड़े इतने ताकतवर हो जाएंगे कि राज सत्ता हथिया लेंगे. मुख्यमंत्री ने गुस्से में रिपोर्ट फेंक दी. हिदायत दी गयी कि वेतन, भत्ता लेना है तो मुंह बंद रखिए वर्ना इस्तीफा देकर कचहरी पकड़िये.
(चौधरी को कचहरी पकड़ा दिया गया. कार्यकाल समाप्त होने पर आयोग को विस्तार नहीं दिया गया. जबकि 'पिछड़ा वर्ग आयोग' को उस दिन ही विस्तार मिल गया. स्मरणीय यह भी है कि पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष नीतीश के स्वजातीय हैं.)

प्रशासनिक सुधार आयोग

तीन महीने के लिए आयोग बना. गलती से एक वामपंथी बुद्धिजीवी को भूमिहार होने के कारण इसका सदस्य बना दिया गया. वामपंथी बुद्धिजीवी ने भूमिहारी करने से इंकार कर दिया. बेचारे त्याग पत्र देकर बाहर हो गये. रिपोर्ट सरकार के हवाले है. सिफारिश थी कि नागरिक परिषद् बेमतलब की चीज है. नीतीश कुमार बिफरे. अपने यहां कुछ बेमतलब के लोग भी तो हैं. बेचारे भोला बाबू कहां जाएंगे. नागरिक परिषद् का गठन हुआ और भोला बाबू काबिज हुए. भांड में जाये सिफारिश.

किसान आयोग
रामधार पुराने आइएएस हैं. आलू-प्याज उपजाने वाली जाति से आते हैं. किसान आयोग का अध्यक्ष बना दिये गये. आयोग की सिफारिशों लेकर घूम रहे हैं. सिफारिश देखने की किसे फुरसत है. रोड मैप तैयार है. किसान उस पर दौड़ें. जादे काबिलियत छांटेंगे तो बंदोपाध्याय और दुबे वाली दशा में ला देंगे-हां.
(अंततः इन्हें हटाकर नब्बे वर्षीय उपेंद्र वर्मा को अध्यक्ष बना दिया गया, जिन्हें किसानी से कभी लेना-देना नहीं रहा.)

अल्पसंख्यक आयोग
इस आयोग के अध्यक्ष कभी काबिल नेता जाबिर हुसेन थे. उस समय आयोग ने चार रिपोर्टें दी थीं जो अल्पसंख्यकों के उत्थान के लिए मील का पत्थर साबित हुईं थी. अशराफ जाबिर ने अरजाल मुसलमानों की हालत का गहन सर्वेक्षण करवाया था. आयोग ने आद्री से अल्पसंख्यकों की माली और तालीमी हालत का जो सर्वेक्षण कराया था उसका इस्तेमाल नीतीश कुमार ने चुनाव में मुसलमानों को पटाने के लिए किया. लेकिन जब राजपाट में आये तो इसका अध्यक्ष एक मिडलची को बना दिया, जिसका काम मुख्यमंत्री के लिए जादू-टोना करना और ताबीज बटोरना भर है. अध्यक्ष पर कई मुकदमे चल रहे थे. राज शक्ति से सब मुकदमे खत्म हुए. (इस आयोग ने अभी तक कोई रिपोर्ट नहीं सौंपी है.)

महादिलत आयोग
महादलितों के लिए भी एक आयोग बना. ऐसा लगा कि इस आयोग के बनने से पहले ही इसकी रिपोर्ट तैयार हो गयी थी. आयोग के गठन के चंद माह बाद ही उसकी पहली रिपोर्ट आ गयी. नीतीश कुमार का दिल खिलखिल. बेलछी में दलितों को जिंदा आग में क्षोंकन का अभ्यास काम में आया. आयोग की दूसरी रिपोर्ट भी जल्दी ही आयी. रिपोर्ट में धोबी और पासी को भी महादलित माने जाने की सिफारिश की गयी. जहां अन्य आयोगों की रिपोर्टें कचरे में पड़ी कराहती रहीं वहीं महादलित आयोग की इस रिपोर्ट को राज्य सरकार ने दूसरे-तीसरे दिन ही पूरा का पूरा स्वीकार करने की घोषणा की.
नीतीश से बेहतर कौन जानता है कि उन्हें चमार और दुसाध के वोट तो मिलने से रहे. एक मायावती के साथ, दूसरे रामविलास के. दोनों को उपेक्षा की टोकरी में डालो. कुल दलितों के 60 फीसदी वोट इन जातियों के पास हैं. धोबी और पासी को जोड़ दें तो महादलित 40 प्रतिशत हो जाएंगे (कुल दलित वोटों के). नीतीश कुमार का मन बाग-बाग हुआ. मायावती, रामविलास तीस-तीस, नीतीश के हिस्से चालीस. दलितों में यह बांट-बखरा काम आया. आग से नीतीश कुमार का काम नहीं चलता. आरी से चलता है. काटो-बांटो और राज करो. (अब चमार को भी महादलित में शामिल करने की तैयारी है.) हो गया दलितों का सत्यानाश! डॉ. अम्बेदकर की आत्मा को कराहने दो. महादलितो ंके वोट रणवीर सेना-भूमि सेना-कुंवर सेना के खुर्राट नेताओं को दिलाने दो. इसी रास्ते बिहार का विकास होगा.
पुस्तिका सुशासन का असली चेहरा से साभार 

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ क्या हुआ उन सुझावों का? बदलते बिहार की बानगी ”

  2. By संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari on December 29, 2009 at 8:42 AM

    शश्वत बानगी.

    कोलकाता मे बिरला कला अकादमी मे हमारे प्रदेश की ख्यात चित्रकार (चित्रकारा) डा. सुनीता वर्मा की प्रदर्शनी आज और कल के लिये लगी है. कोलकाता के ब्लागर भाई समय निकाल कर सुनीता जी के पेंटींग्स का अवलोकन करे.

  3. By Amit on December 29, 2009 at 3:51 PM

    तो आप क्या यह समझते हैं कि नितीश जी भूमिहारों-सवर्णों के कब्जेवाली जमीने दलितों-पिछड़ों को बाँट दें? और खुद धाह जाएँ? बहुत समझदार मालूम पड़ते हैं.

  4. By राम कुमार राम on December 29, 2009 at 3:58 PM

    जिन लोगों को लोकतंत्र ही असली व्यवस्था दिखाई पड़ती है और जो कम्युनिस्टों को गाली देते हैं वे इसका क्या जवाब देंगे कि इस लोकतंत्र में, वोट फैक्टर के बावजूद सरकारें संख्या में अधिक-गरीबों, दलितों, पिछड़ों आदि- के हित में तर्कसंगत भूमिसुधार करने से लगतार इनकार करती रही हैं? जबकि ऐसा करना उन लोगों के हक़ में है जो संख्या में अधिक है, और वोट भी उनका कुल मिलकर अधिक है. फिर भी सरकारें उन लोगों के हित में काम कर रही हैं-जो संख्या में कम है, लेकिन प्रभावशाली और संपन्न हैं. वोट का फैक्टर कहाँ चला गया? लोकतंत्र कहाँ चला गया? कुछ बोलो भाइयों. फिर यह कैसे अन्तोम और श्रेष्ठ है? या फिर शायद यह इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि यह धनवानों, सम्पन्नों, ब्राह्मणों, पूंजीपतियों के हित में काम करता है और मार्क्सवाद इसलिए गलीज़ है क्योंकि वह गरीबों, मज़दूरों, किसानों, दलितों, पिछड़ों, अकलियतों कि तानाशाही कि बात करता है.
    तय कर लो कि क्या चाहिए-दलितों, पिछड़ों, मज़दूर्ण, किसानों ki तानाशाही या पूंजीपतियों और ब्राहमणों कि तानाशाही -जो अभी चल रही है.

  5. By रंजना on December 29, 2009 at 4:51 PM

    YAH STHITI KEWAL BIHAAR BHAR KI TO NAHI????

    RAJNITI AISI HI HOTI HAI,SAB JAGAH.....

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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