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बीच सफ़हे की लड़ाई

यह नीतीश राज नहीं, पुलिस राज है-एक पुरानी चिट्ठी

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/28/2009 05:52:00 PM

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को शिवानंद तिवारी का लिखा पत्र


ए-107, जगत अमरावती अपार्टमेंट
महेश नगर, बेली रोड, पटना.
19 जुलाई, 2006
प्रिय नीतीश जी,
बहुत चिंतित होकर यह पत्र लिख रहा हूं. पिछले दिनों की कुछ घटनाओं पर आपकी तथा आपके कुछ मंत्रीमंडलीय सहयोगियों की प्रतिक्रिया ने मुझे गंभीर चिंता में डाल दिया है. यह चिंता लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर है. आप-हम सभी ने लोकतंत्र की स्थापना के लिए आपात काल का विरोध किया था और जेल यातनाएं सही थी. उसके बाद सन्‌ 80 में जब पंडित जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री थे, तब उनके द्वारा प्रेस की आजादी का गला घोंटने के उद्देश्य से तथाकथित प्रेस बिल लाया जा रहा था. उस काले कानून के विरुद्ध अन्य साथियों के साथ आप-हम भी लड़े थे और जेल गये थे. मैं समझता हूं कि आपको अच्छी तरह स्मरण होगा, जब प्रेस बिल के विरुद्ध प्रदर्शन पर बेली रोड पर पुलिस द्वारा बर्बर ढंग से लाठी चार्ज किया गया था. हमलोग बचने के लिए तत्कालीन मंत्री डॉ ईशा के आहते में आ गये थे. लेकिन जब पुलिस का एक वरीय पदाधिकारी टेम्पू पर सवार विजय कृष्ण को बुरे ढंग से पीटने लगा तब आप-हम अपने को रोक नहीं पाये और बगैर परवाह किये कि हमें चोट लग सकती है, हम लोगों ने उक्त पदाधिकारी की उस वहशी कार्रवाई का मजबूती से विरोध किया था. हमलोगों की गिरफ्‌तारी हुयी और हम साथ ही जेल गये. उस साल का दशहरा हमलोगों ने जेल में ही बिताया था.
आज आप मुख्यमंत्री हैं. उपरोक्त घटनाओं का स्मरण जानबूझ कर करा रहा हूं ताकि लोकतंत्र के लिए उन संघर्षों की याद ताजा हो जाए. इस लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आघात नहीं पहुंचे, यह कमजोर नहीं हो यह देखना और इसकी रक्षा करना हम सबका धर्म है. इस लोकतंत्र ने ही लालू यादव को मुख्यमंत्री बनाया, एक ताकतवर नेता के रूप में देश में स्थान दिया. तो इसी लोकतंत्र ने उन्हें हटाकर आज आपके हाथ में शासन की बागडोर सौंपी है. लेकिन सत्ता की कुर्सी के गंभीर रोग हैं. दुनिया भर के मनीषियों ने इस रोग के विषय में सत्ता की कुर्सी पर बैठने वाले को आगाह किया है. लोकतंत्र में सत्ता किसी की स्थायी नहीं होती है. लेकिन सत्ता का यह भी रोग है कि इस पर बैठने वाले को भ्रम हो जाता है कि उसका स्थान स्थाई है. अगल-बगल के चाटुकार कैसे हवा देकर फुलाने की चेष्टा करते हैं इसका अनुभव संभवतः आप करते होंगे. मैंने भी लोगों को फुलाते और फुलते देखा है. इसलिए इस पत्र का उद्देद्गय आपको आगाह करना भी है.
इधर कुछ घटनाओं के संदर्भ में 'कानून अपना काम करेगा', 'कानून की नजर में कोई छोटा-बड़ा कोई नहीं है', 'कानून के मामले में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं होगा', इस तरह का डायलॉग रोज सुन रहा हूं. इस पर गुस्सा भी आ रहा है और चिढ़ भी हो रही है. आखिर कानून कोई जिंदा चीज नहीं है, जो बगैर भेद-भाव के समान नजर से स्वयं कार्रवाई करता है. यह किताबों में लिखी बेजान इबारत है. इसके इस्तेमाल के लिए तंत्र बनाया गया है, तरीके निर्धारित किये गये हैं. इसको इस्तेमाल करने वाला किस तरह इसका इस्तेमाल कर रहा है यही देखना तो आपका काम है. दुर्भाग्य से हमारे देश में आज भी वही तंत्र और वही कानून है जिसके सहारे अंग्रेजों ने हमारे देश पर राज किया और देश को लूटा. आजादी के लिए संघर्षरत हमारे पुरखों का इसी तंत्र और कानून के सहारे दमन किया जाता था. इसलिए हमारे प्रशासनिक तंत्र में दमन का मनोभाव है. इसका चरित्र जनाभिमुख नहीं, जन-विमुख है. इसी को नियंत्रित करना ही तो लोकतांत्रिक सरकार का काम है. अगर सरकार तंत्र को अपनी मर्जी से कानून के इस्तेमाल का अधिकार दे देगी तो लोकतांत्रिक शासन नामलेवा भर रह जायेगा और यह पुलिसिया तथा अफसरी शासन में बदल जायेगा.

उपरोक्त संदर्भ में इधर की घटनाओं का उल्लेख कर अपनी बातों को आपके समझ स्पष्ट करना चाहूंगा. पहली घटना का हलका सा जिक्र आपको इससे पहले लिखे पत्र में मैंने किया है. यह मामला एक वरीय पदाधिकारी और दो विधायकों के बीच उस पदाधिकारी के चेम्बर में हुए झंझट के संबंध में है. विधायकों पर मुकदमा हुआ. हप्ता भर बाद पुलिस ने अनुसूचित जाति पर अत्याचार की धारा जोड़ कर उस केस को गंभीर बना दिया ताकि उन विधायकों का जेल जाना पक्का हो जाए. इस पर कोई डायलॉग बोलता है, वह भी कोई मंत्री जो मंत्री बनने से पूर्व एक विधायक है, एक राजनैतिक कार्यकर्ता है कि कानून अपना काम करेगा तो थप्पड़ मारने की तबीयत होती है. एक राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में उनको यह अहसास नहीं हुआ कि हमारी पुलिस या हमारा प्रशासन जनता के प्रति कितना संवेदनशील है. अगर कोई राजनैतिक कार्यकर्ता या विधायक, चाहे वह किसी भी दल का हो, किसी पदाधिकारी के यहां कोई सवाल लेकर जाए. उस सवाल के प्रति असंवेदनशील उक्त पदाधिकारी से जोर देकर सवाल पूछे तो पदाधिकारी उस पर केस कर दे. हमारी बेइज्जती की गयी. इधर सरकार के लोग उस पदाधिकारी के पक्ष में खड़े हो जाएं. सरकार के लोग जो जनता के प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने जनता के सवालों को लेकर प्रशासन से जीवन भर जद्दोजहद किया है, वे भी कहने लगें कि कानून अपना काम करेगा तो आप ही बताएं कि इस पर गुस्सा नहीं आयेगा तो क्या होगा.

जिस पदाधिकारी से मिलने उक्त दोनों विधायक गये थे, वह कैसा है, यह आप नहीं जानते हैं क्या! अपने अफसरी जीवन में उसने कितनों को प्रताड़ित किया है, इसकी गिनती नहीं हो सकती है. वह तो इतना मजबूत है कि जब लालू यादव का जमाना था तो अपने चेम्बर में लोगों को बैठाकर कहता था कि यह अहीर नहीं गड़ेरिया है. यह कौन नहीं जानता है. छपरा में कमीश्नर था तो सोनपुर मेला में मंच पर मंत्री बैठे हुए हैं और वहां उनके सामने नेताओं और मंत्रियों को गलियाता था. मुक्षे स्वयं इसका तर्जुबा है. मैंने उसको डांट कर चुप कराया था. जहां तक मुक्षे स्मरण है कि सरकार ने उस समय उसके इस आचरण की जांच का आदेश दिया था. पता नहीं उस जांच का क्या हुआ. वैसे पदाधिकारी के लिए और इस सेवा के पदाधिकारियों की शान में कोई तेज आवाज में बोलने की गुस्ताखी भविष्य में नहीं कर पाये इसके लिए हप्ता भर बाद अनुसूचित जाति उत्पीड़न की धारा जोड़ दी जाए और मंत्री, मुख्यमंत्री बोलें कि कानून अपना  काम करेगा तो बताइए गुस्सा नहीं तो क्या प्रेम उमड़ेगा. नीतीश जी ऐसा करना पुलिस और अफसरशाही को निरंकुश बनाना होगा. मैं तो बिहार विधान सभा के सभी सदस्यों को सामूहिक रूप से कहूंगा कि वे मांग करें कि उक्त तथा उनके जैसे अन्य पदाधिकारियों के विरुद्ध निगरानी विभाग में कितने मामले हैं और उन पर क्या कार्रवाई हुई है. आखिर यह चुने हुए जन-प्रतिनिधियों के न्यूनतम अधिकार और प्रतिष्ठा का सवाल है. सरकार का काम या मंत्रीमंडल का काम क्या इतना भर रह गया है कि अफसर मनमाना करे और कोई विरोध करे तो सरकार और मंत्री अफसर के पक्ष में खड़े हो जाएं और उसे निरंकुश बनाने में मदद करे तो लोकतंत्र कैसे चलेगा और कैसे बचेगा.

मैं आनंद मोहन के मामले का भी आपको स्मरण कराना चाहूंगा. आप जानते हैं कि आनंद मोहन का मैं समर्थक नहीं हूं. समता पार्टी में एक से अधिक बार मैंने आनंद मोहन का विरोध किया है. उसके चलते मुक्षे क्या क्षेलना पड़ा है वह भी आपको याद होगा. लेकिन आनंद मोहन को एक राजनैतिक व्यक्ति के रूप में आप सहित सभी लोगों ने मान्यता दी है. वे लोकसभा के सदस्य रहे हैं. उनकी पत्नी लोकसभा, विधान सभा की सदस्य रही हैं. अलग-अलग समय पर आप सहित अन्य लोगों ने आनंद मोहन से राजनैतिक समझौता किया है. जब जरूरत हो तो राजनैतिक गठजोड़ और जरूरत पूरी हो जाए तो आनंद मोहन गुंडा, यह कैसी नीति है भाई! उनके साथ पुलिस को ऐसा करने की छूट कैसे दी जा सकती है. टीवी पर साफ दिखाई दे रहा है कि पुलिस अफसर पीछे आनंद मोहन पर हाथ चला रहा है. कानून की कौन सी धारा इसकी इजाजत देती है? आनंद मोहन न्यायिक हिरासत में थे. जेल प्रशासन के अनुरोध पर सहरसा एसपी के द्वारा दिये गये पुलिस बल के साथ वे देहरादून गये थे. देहरादून से सहरसा जाने के रास्ते में पटना आये थे. कहा जा रहा है कि हिरासत में प्रेस से बात कर रहे थे. इसलिए उनके विरूद्ध गृह-सचिव के लिखित आदेश पर पुलिसिया कार्रवाई की गयी. आनंद मोहन के विरुद्ध कार्रवाई क्यों? कार्रवाई तो गृह सचिव महोदय को अपनी पुलिस के विरुद्ध करनी चाहिए जिसकी हिरासत में आनंद मोहन थे और जिसने उन्हें ऐसा करने दिया. और इसमें कौन नयी बात है. इस देश में पुलिस हिरासत मे रहते हुए किसको मीडिया से बात करने से रोका जाता है. इस मंत्रीमंडल में जरूर कुछ सदस्य होंगे जो 74 आंदोलन में जेल में रहते हुए अखबार में बयान छपवाते रहे हैं. कम से कम सुशील मोदी ने तो ऐसा जरूर किया होगा. मैं तो जेल से अखबारों में लेख भिजवाता था.

इसलिए आनंद मोहन के साथ जो हुआ वह सरासर गलत था. वैसे आनंद मोहन के लिए तो गृह सचिव और पटना के पुलिस पदाधिकारी राजनैतिक मददगार साबित हुए हैं. मैंने अखबारों में पढ़ा कि पटना स्टेशन पर जो कुछ हुआ उसके लिए आनंद मोहन के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया गया है. कानून सबके लिए बराबर है, तो इस आधार पर उस पदाधिकारी पर भी मामला दर्ज होना चाहिए जिसने आनंद मोहन पर हाथ चलाया था. लेकिन ऐसा होगा, मुक्षे इसका यकीन नहीं है. जो लोग टेलीविजन में भाषण दे रहे हैं कि आनंद मोहन का मामला कानून और अदालत का मामला है, उनको मालूम होना चाहिए कि कानून अपने आप काम नहीं करता है. वह तो उसके इस्तेमाल करने वाले की मनसा और नीयत के अनुसार काम करता है. इसलिए सवाल कानून पर अंकुश लगाने का नहीं, इसको इस्तेमाल करने वाले पर अंकुश लगाने का है. ताकि वह कानून के इस्तेमाल में भेदभाव नहीं करे.
मुख्यमंत्री जी, लोक शिक्षकों के प्रदर्शन पर पुलिस की बर्बर कार्रवाई पर आपकी प्रतिक्रिया ने भी मुक्षे ठेस पहुंचायी है. इसके पहले बेली रोड पर शिक्षा मित्रों पर बर्बर लाठी चार्ज हुआ था. उस समय आपने घोषणा की थी कि सरकार इसकी जांच कराएगी और दोषी को दंड देगी. कुछ नहीं हुआ और दूसरी घटना हो गयी. हम-आप कई जुलूस में शामिल रहे हैं. ऐसे जुलूस में भी शामिल रहे हैं जिसमें जुलूस वाले पुलिस को भड़कार बल प्रयोग के लिए उकसाते हैं. प्रेस बिल के विरुद्ध जुलूस में भी ऐसा हुआ था, आपको स्मरण होगा. लेकिन किसी भी उकसावे के विरुद्ध पुलिस की प्रतिक्रिया संयमित होगी. परिस्थिति के अनुपात में होगी. भीड़ तो असंगठित होती है, उसमें अनुशासन नहीं होता है. लेकिन पुलिस तो संगठित और अनुशासित बल है. राज्य की संगठित और वैध हिंसा की ताकत का प्रतीक है. भीड़ की कार्रवाई और पुलिस की कार्रवाई में चारित्रिक फर्क होना चाहिए. पुलिस और भीड़ एक जैसा आचरण करने लगे तो क्या होगा! ढेला वाला और गोली वाला एक तरह का आचरण करने लगेगा तो क्या परिणाम निकलेगा! इसलिए बेली रोड और आर.ब्लॉक दोनों स्थानों पर पुलिस की प्रतिक्रिया न तो संगठित थी और न अनुशासित, दोनों मामले में पुलिस की प्रतिक्रिया बर्बर थी. पुलिस के चरित्र में बर्बरता का जो यह अंश है उसी को नियंत्रित करना सरकार का काम है, जनप्रतिनिधियों का काम है. अगर सरकार आंख मूंद कर इस प्रकार की पुलिसिया कार्रवाई का समर्थन करने लगेगी तो इसको नीतीश राज नहीं कहकर पुलिसिया राज कहा जायेगा.

उपरोक्त घटनाएं मुझे विचलित कर रही हैं. इसलिए अल्प समय में ही यह दूसरा पत्र आपको लिखना  पड़ रहा है. इस पत्र को आप किस रूप में लेते हैं यह आप पर निर्भर है. इसे आप एक विरोधी द्वारा आपको और आपकी सरकार को बदनाम करने के उद्देश्य से लिखा गया पत्र भी समझ सकते हैं. शायद इस पत्र की स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही होगी. लेकिन इस पत्र को आप अपने वरीय मित्र की चेतावनी के रूप में भी ले सकते हैं जो अपनी समझ के अनुसार उन कमजोरियों को आपको दिखाने का प्रयास कर रहा है जिन्हें दूर करना आपके हित में होगा. यह आप पर निर्भर है कि आप इसे किस प्रकार लेते हैं. इसकी चिंता मुझे नहीं है.
शुभकामनाओं के साथ!
आपका

(शिवानंद तिवारी)
पुस्तिका सुशासन का असली चेहरा से साभार 

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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