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बीच सफ़हे की लड़ाई

शांति को दोबारा परिभाषित करते ओबामा

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/25/2009 04:00:00 AM


महेश राठी
यदि क्रूरता और बर्बरता शांति और जनवाद की परिभाषा बन जाए, जंग शांति का घोषित औजार हो जाए, आसमान से बमों के साथ ब्रेड की बरसात ही नए विकास का मानवीय चेहरा हो, तो बराक ओबामा  को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जाना निश्चय ही न्यायोचित होगा, परंतु विडंबना यह है कि गांधी और मार्टिन लूथर किंग को तथाकथित रूप से अपना आदर्श मानने वाले और अमेरिकी जनता की युद्ध विरोधी भावना के साथ सहानुभूति पर दस माह पहले राष्ट्रपति बने बराक ओबामा  की कूटनीतिक बयानबाजी में विश्व शांति के प्रयास ढूंढने वाले लोग या तो अति कल्पनाशील हैं या किसी खास राजनीतिक एजेंडे पर काम करने वाले। अफगानिस्तान में तीस हजार सेना बढ़ाने, पाकिस्तान में अपनी सेना उतारने की चेतावनी और वॉशिंगटन से ही अफगानिस्तान की सत्ता बदलने की धमकी देने वाले जंगी राष्ट्रपति की कहानी जन्म से लेकर अब तक बहकने, संभलने सीनेटर और पहला अश्वेत राष्ट्रपति बनने की शानदार उपलब्धियों वाली तो है, परंतु उसके लिए नोबेल शांति पुरस्कार दिया जा सके, उसमें ऐसा कुछ भी नही। शांति के लिए युद्ध की जरूरत समझाने वाले ओबामा  निश्चय ही जोशीले भाषण करने वाले अच्छे वक्ता हैं, परंतु यह भी कड़वी सच्चाई है कि अभी तक उन्होंने कूटनीतिक भाषण करने के अलावा शांति के लिए किया भी कुछ नहीं है। 2012 तक अमेरिकी परमाणु हथियारों में कटौती का मसौदा जनवरी, 2008 में ही तैयार हो चुका था। यदि आज भी हथियारों की बात हो तो जनसंहार के सबसे अधिक हथियार आज भी अमेरिका के पास ही है। चाहे रासायनिक हथियार हों, जैविक हथियार या परमाणु हथियार अमेरिका के पास ही दुनिया में उन हथियारों का सबसे बड़ा जखीरा है और अभी तक दो बार इस्तेमाल होने वाले अणु बमों का श्रेय भी उसी के खाते में है। तब दुनिया की शांति को वास्तविक खतरा किससे है और वास्तविक शांति दूत कौन और खतरे के संचालक कौन? एक अनुमान के अनुसार, दुनिया का सैन्य खर्च बढ़कर 11,000 करोड़ डॉलर से भी अधिक हो चुका है, जो शीतकाल के कुल खर्च को भी पीछे छोड़ रहा है। इसमें अकेले अमेरिका की भागीदारी 5,000 करोड़ डॉलर से भी अधिक है। वर्तमान अन्तरराष्ट्रीय सहायता खचोंर्ं से लगभग 15 गुना अधिक सैन्य बजट में वृद्धि हथियार उघोग में आये उछाल के चलते है, जो शस्त्र निर्माण में संलग्न 100 शीर्ष निगमों द्वारा हथियारों की बिक्री बढ़ाने की कोशिशों व रणनीति का नतीजा है। 2000 में 1,570 करोड़ डॉलर का व्यवसाय करने वाली शीर्ष कंपनियों ने 2004 में 2,680 करोड़ डॉलर का व्यवसाय किया, यानी लगभग 60 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी केवल चार वषार्ें में हथियारों की यह बढ़ोत्तरी सामरिक संघर्षों को बढ़ा रही है, ऐसे में ओबामा  का कौन-सा प्रयास है, जिसे शांतिवाहक कहा जाए! अमेरिका के तथाकथित आतंकवाद के खिलाफ युद्ध अभियान से आज पूरी दुनिया को खतरा है, बावजूद इसके पूरी दुनिया जानती है कि अपने हितों को साधने के लिए अमेरिका ने ही आतंकवाद को जन्म दिया है। मध्य एशिया की शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा- इजराइल और फिलीस्तीन हैं। इनके बीच जारी संघर्ष अमेरिकी हित-पूर्ति के चलते आज तक नहीं सुलझ पाया है। जनसंहारक हथियारों की खोज में शुरू हुआ इराक पर हमला सात लाख से भी अधिक बेगुनाह लोगों की जानें ले चुका है। इसी आतंकवाद विरोध ने अफगानिस्तान को आदिम युग वाले कबायली दौर में धकेल दिया है। आज इसे सर्वविदित तथ्य के रूप में देखा जा रहा है कि दुनिया में आतंकवाद की उपजाऊ जमीन पाकिस्तान है, जो आज भी भारत और ईरान जैसे पड़ोसी देशों के खिलाफ चलने वाली आतंकवादी गतिविधियों को शह दे रहा है। इन सबके बावजूद बराक ओबामा  पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता राशि को बढ़ाने वाले बडे़ पैरोकार बनकर उभरे हैं! पाकिस्तान को दी जाने वाली इस सहायता का क्या इस्तेमाल हुआ है और भविष्य में क्या होना है, पिछले दिनों पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ इसे पूरी दुनिया को बता चुके हैं। ओबामा  की यह सहायता पाक में पल रहे आतंक और पाक सेना को मजबूती देकर दक्षिण एशिया में हथियारों की होड़ बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं करेगी। जिस देश की रणनीति के चलते आज पूरे मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और आधे से अधिक अफ्रीका की शांति दांव पर लगी है, उसी देश के राष्ट्रपति को शांति का नोबेल पुरस्कार इस पुरस्कार के निर्णायक मंडल की नीयत पर सवालिया निशान लगाता है, मगर कम से कम अमेरिकी राष्ट्रपति गांधी के इस्तेमाल की बचकाना कूटनीति से तो बाज आएं, क्योंकि गांधी की सोच में हिंसा की पैरोकारी के लिए कोई जगह नहीं है। उनकी सोच और उनका दर्शन शांति को सतत प्रोत्साहित करता है। इसी वजह से गांधी को आजादी के संदेशवाहक कहा जाता है। गांधी की अहिंसा से आजादी और शांति, दोनों हासिल हो जाती है।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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