हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

वैश्विक आर्थिक संकट : हालात और होंगे बदतर

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/24/2009 05:00:00 AM

जल्दी ही हम वैश्विक आर्थिक मंदी को विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे. अभी वर्तमान हालात के बारे में बता रहे हैं डॉ. भरत झुनझुनवाला



वर्तमान में विश्व अर्थव्यवस्था अनिश्चितता के दौर में है। कुछ विश्लेषकों का मत है कि अमरीकी अर्थव्यवस्था शीघ्र ही संकट से उबर जाएगी और साथ में विश्व अर्थव्यवस्था को खींच लेगी। प्रख्यात निवेशक और विश्व के अमीरतम व्यक्तियों में से एक वारेन बफेट ने कहा है- ''अमरीकी अर्थव्यवस्था पुन: चल निकलेगी। व्यापार बढ़ेगा।
हम अभी अस्पताल से बाहर नहीं आए हैं परन्तु आ जाएंगे। ऐसा 19वीं सदी में हुआ था और 20वीं सदी में कई बार हुआ है। हर बार हम ज्यादा उर्जा के साथ बाहर आए हैं।'' दूसरी तरफ तमाम निवेशकों को अमरीकी अर्थव्यवस्था के भविष्य पर भरोसा नहीं बन रहा है। वे सोना खरीद रहे हैं और डालर बेच रहे हैं। फलस्वरूप सोने का दाम तेजी से बढ़ रहा है। उन्हें शंका है कि अमरीकी अर्थव्यवस्था का संकट गहराएगा और डालर टूटेगा।
आशावादी विश्लेषकों के पक्ष में एशियाई संकट का उदाहरण है। 1997 में अमरीकी अर्थव्यवस्था द्रुत गति से बढ़ रही थी। अमरीकी कम्पनियां थाइलैण्ड आदि देशों में फैक्ट्रियां लगा रही थीं और वहां बने हुए माल का आयात कर रही थीं। जैसे जनरल मोटर्स द्वारा थाईलैण्ड में कार बनाने का कारखाना लगाया गया और कार का अमरीका को निर्यात किया गया। थाईलैण्ड को इस व्यवस्था का दोहरा लाभ मिला था। उसे निवेश के लिए विदेशी पूंजी मिल रही थी और माल बेचने के लिए अमरीकी बाजार मिला था। पूर्वी एशिया के देशों के विकास की यह प्रक्रिया अमरीकी अर्थव्यवस्था की गति पर टिकी थी। 1998 में अमरीका में मंदी ने दबाव बनाया था। अमरीका ने थाईलैण्ड में पूंजी निवेश करना और वहां बने माल का आयात करना कम कर दिया। फलस्वरूप थाइलैण्ड संकटग्रस्त हो गया था। परन्तु अमरीका की यह मन्दी ज्यादा दिन नहीं टिकी। उसी समय इंटरनेट की सूचना क्रान्ति शुरू हुई। माइक्रोसाफ्ट एवं सिस्को जैसी कम्पनियों के शेयर में उछाल आया। शीघ्र ही अमरीकी मन्दी टूट गई।
अमरीकी अर्थव्यवस्था पर दुनिया के निवेशकों का पुन: भरोसा बढ़ा, विश्व पूंजी का अमरीका की ओर बहाव स्थापित हुआ, अमरीकी मांग में उछाल आई और थाइलैण्ड, मलेशिया तथा चीन से आयात करने का सिलसिला चल निकला। इंटरनेट के तकनीकी विकास ने उस मंदी को तोड़ दिया था। इसी प्रकार पूर्व में भी परमाणु रिएक्टर, जेट हवाई जहाज आदि के आविष्कारों से मन्दी टूटी थी। इसी बात को आशावादी विश्लेषक कह रहे हैं। वर्ष 2002 में परिस्थिति बिल्कुल भिन्न रही। 1998 में सूचना प्राद्यौगिकी कम्पनियों में आया उछाल धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया और 2002 में अमरीकी अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती गई। उस समय अमरीकी केन्द्रीय बैंक के अध्यक्ष एलन ग्रीनस्पैन थे। वे भी आशावादी थे। इन्होंने सोचा कि पहले की तरह शीघ्र ही कोई नया तकनीकी आविष्कार उपस्थित हो जाएगा और अमरीकी अर्थव्यवस्था पुन: चल निकलेगी। योजना बनाया कि तब तक अमरीकी अर्थव्यवस्था को आक्सीजन पर चालू रखा जाए जब तक जमीनी सुधार नहीं हो जाता है जैसे जब तक दवाएं असर दिखाती हैं तब तक मरीज को आक्सीजन पर जीवित रखा जाता है। इस उद्देश्य से प्रापर्टी लोन को सस्ता बना दिया। अमरीकी नागरिकों को प्रेरित किया गया कि वे ऋण लेकर आवास खरीदें। इस कृत्रिम मांग से प्रापर्टी निर्माण के क्षेत्र में उछाल आया और अमरीकी अर्थव्यवस्था द्रुतगति से बढ़ती रही जैसे पैरासिटामोल के प्रभाव से बीमार आदमी चलता रहता है। किन्तु अपेक्षित तकनीकी आविष्कार सामने नहीं आया। अमरीका की जमीनी अर्थव्यवस्था लड़खड़ाती गई। भारत और चीन के सस्ते माल के सामने अमरीकी कम्पनियां पस्त हो गईं। अमरीकी श्रमिकों को बर्खास्त किया जाने लगा। जनता प्रापर्टी खरीदने के लिए लिए गए ऋण की अदायगी करने में असमर्थ हो गई।
अमरीकी बैंकों को भारी घाटा लगा और उनका दिवाला निकलने लगा। यही वर्तमान वैश्विक संकट की शुरुआत थी। नए तकनीकी आविष्कारों के अभाव में अमरीकी अर्थव्यवस्था घायल हो गई और अपने साथ शेष विश्व को भी संकट में डाल दी। एशियाई संकट की तरह अर्थव्यवस्था उछल कर वापस नहीं आई। 1998 एवं 2002 की मंदी की अलग-अलग गति रही। 1998 की मन्दी तोड़ने का श्रेय इंटरनेट के आविष्कार को जाता है जबकि 2002 की मन्दी नए आविष्कार के अभाव में वैश्विक संकट के विकराल रूप में सामने आई। दरअसल इस बात का पूर्वानुमान लगाना दुष्कर है कि निकट भविष्य में नए आविष्कार होंगे या नहीं और मंदी टूटेगी या नहीं। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो नए आविष्कारों का दौर कुछ अंतराल के बाद आता है। आज से 5000 वर्ष पूर्व कांसे का आविष्कार हुआ था। उससे पहले खेतों की जुताई के लिए लकड़ी से बने हल का प्रयोग होता था। पेड़ों को काटने के लिए पत्थर की कुल्हाड़ी का उपयोग होता था। लकड़ी और पत्थर के औजारों से उत्पादन कम होता था। कांसे के आविष्कार से उत्पादन में वृद्धि हुई। सिंधु घाटी, इराक और मिस्र में भव्य इमारतों का निर्माण हुआ। कई सदी तक आविष्कारों का सिलसिला जारी रहा। पालदार नाव, रथ, पक्की ईंट के मकान, पिरामिड आदि बनाए गए। परन्तु कुछ सदियों के बाद तकनीकी आविष्कारों में पठार आ गया। इन सभ्यताओं की विशेषता समाप्त हो गई और ये सामान्य राजाओं के आक्रमण को नहीं सह सके। मसलन हिस्कोस लोगों ने मिस्त्र की सभ्यता को ध्वस्त कर दिया। इराक और सिंधु घाटी की सभ्यताएं भी लगभग ईसा पूर्व 2000 में नष्ट हो गई। इसके बाद 1500 वर्षों तक कोई तकनीकी आविष्कार नहीं हुआ और वैश्विक अर्थव्यवस्था सुस्त बनी रही।
लगभग ईसा पूर्व 500 में लोहे का आविष्कार हुआ। कांसे के औजारों को बनाने के लिए तांबे की जरूरत होती है जो कम मात्रा में ही उपलब्ध था जबकी तुलना में लोहा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। लौहे के औजारों ने आर्थिक विकास का नया दौर शुरू किया। भारत में मौर्य साम्राय स्थापित हुआ। यूरोप के पहले यूनान में और उसके बाद रोम में विशाल नई सभ्यता का सृजन हुआ। तकनीकी आविष्कार का यह दौर लगभग 500 वर्ष तक चला। इसके बाद पुन: पठार सा आ गया। ईसा बाद 300 से 1400 तक सम्पूर्ण विश्व अर्थव्यवस्था मन्द पड़ी रही। लगभग ईसा बाद 1400 में चीन में बारूद का आविष्कार हुआ। चंगेज खां एशिया एवं यूरोप पर अपना साम्राय इस तकनीक के बल पर स्थापित किया। इसके बाद इंगलैण्ड में स्टीम इंजन का आविष्कार हुआ जिसके बल पर ब्रिटिश साम्राय की नींव पड़ी। इसके बाद से आज तक नित नूतन आविष्कारों का सिलसिला जारी रहा। स्पष्ट होता है कि तकनीकी आविष्कारों का दौर कुछ अंतराल के बाद आता है। तकनीकी आविष्कारों के वर्तमान दौर को लगभग 600 वर्ष पूरे हो चुके हैं।
सम्भव है कि हम पुन: पठार में प्रवेश कर रहे हों। यह भी सम्भव है कि नई तकनीकों का आविष्कार जारी रहे। अत: इस बात को कहने का कोई ठोस आधार नहीं है कि अमरीका में नए आविष्कार होंगे ही। आविष्कार होना और न होना दोनों ही सम्भव है। अतएव हमें इस भरोसे नहीं रहना चाहिए कि 18वीं और 19वीं सदी के संकटों की तरह अमरीका वर्तमान संकट से उबर ही जाएगा। हमें दोनों परिस्थितियों को आत्मसात करने के लिए तैयार रहना चाहिए। अमरीकी संकट गहराने की परिस्थिति में हमें अपने घरेलू बाजारों का विस्तार करना चाहिए और संकट टूटने पर हमें बहिर्मुखी हो जाना चाहिए। स्थिति पर पैनी नजर बनाए रखते हुए हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ वैश्विक आर्थिक संकट : हालात और होंगे बदतर ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें