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मिड डे मील में डिब्बाबंद : किसको होगा फायदा

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/23/2009 05:00:00 PM


सरकार स्कूलों में मध्याह्न भोजन की जगह डिब्बाबंद भोजन की आपूर्ति करने की सोच रही है. पिछले कुछ समय से मिड डे मील खाने से बच्चों के बीमार पड़ने की घटनाएँ हो रही हैं. सवाल ये उठता है कि मिड डे मील परियोजना को सरकार क्यों बदलना चाहती है? परियोजना बदलने के बजाए सरकार मिड डे मिल पकाने के काम को क्यों नहीं सुधारती है? आखिरकार ये सरकार की जिम्मेदारी है कि वो साफ और सुरक्षित खाना बच्चों को खिलाए। इस बात की क्या गारंटी की भविष्य में इन कंपनियों का खाना खराब नहीं होगा। क्या पके हुए चावल का मुकाबला चिप्स करेंगे?
विषाक्त भोजन ग्रहण करने से बच्चों के बीमार पड़ते ही दिल्ली सरकार  मिड डे मील योजना को बदल डालने पर आमादा है। मिड डे मिल खाकर 182 छात्राओं के बीमार होने को हथियार बनाकर दिल्ली सरकार अब मिड डे मिल की आपूर्ति का जिम्मा बड़ी कंपनियों को देने की तैयारी कर रही है। डिब्बाबंद भोजन योजना लागू करने से पहले उस कमेटी के रिपोर्ट का इंतजार है जो इस योजना पर विचार कर रही है। कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद दिल्ली सरकार सुप्रीम कोर्ट को 0 कोर्ट से मिड डे मील में डिब्बाबंद भोजन की आपूर्ति को हरी झंडी मिल जाए। जबकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक किसी भी कीमत पर बच्चों को डिब्बाबंद भोजन नहीं दिया जाना चाहिए। निर्देश के मुताबिक मिड डे मील के तहत बच्चों को ताजा पका हुआ खाना ही मिलना चाहिए। जबकि दिल्ली सरकार राजधानी के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को चिप्स और बिस्किट देने की तैयारी में जुटी है। भोजन योजना पर नियुक्त किए गए सुप्रीम कोर्ट के अधिकारियों की मानें तो मकसद सीधे तौर पर भ्रष्टाचार से है। मालूम हो कि ये पहला मौका नहीं है जब बच्चों को मिड डे मिल में ताजा खाना देने के बजाए डिब्बाबंद खिलाए जाने की सिफारिश की गई है। ये सीधे-सीधे भ्रष्टाचार को बढ़ाने की कोशिश है और कोर्ट ने कई बार अपने निर्देशों में कहा भी है कि ऐसी योजना कार्यान्वित नहीं होनी चाहिए। सवाल ये उठता है कि मिड डे मील परियोजना को सरकार क्यों बदलना चाहती है? परियोजना बदलने के बजाए सरकार मिड डे मिल पकाने के काम को क्यों नहीं सुधारती है? आखिरकार ये सरकार की जिम्मेदारी है कि वो साफ और सुरक्षित खाना बच्चों को खिलाए।
इस बात की क्या गारंटी की भविष्य में इन कंपनियों का खाना खराब नहीं होगा। क्या पके हुए चावल का मुकाबला चिप्स करेंगे? अगर दिल्ली सरकार बच्चों को डिब्बाबंद खिलाने लगे तो उसे करोड़ों रुपए के अतिरिक्त बोझ का निर्वहन करना पडेग़ा। इसका बोझ कौन उठाएगा? दिल्ली में एमसीडी और दिल्ली सरकार के करीब 2800 स्कूलों के 14 लाख बच्चे मिड डे मील योजना के अंतर्गत आते हैं। इनको खाना देने के लिए अनाज केन्द्र सरकार से आता है। अनाज से गर्म खाना बनाने के लिए सरकार हर बच्चे पर ढाई रुपए प्रति दिन खर्च करती है। यानि मिड डे मील का बजट करीब सवा दो सौ करोड़ रुपए सालाना बैठता है। इसमें से यादातर पैसा खाना बनाने वाले ठेकेदारों और एनजीओ को जाता है। कोई भी बड़ी कंपनी कम से कम 10 रुपए में डिब्बाबंद भोजन देगी। यानि सीधे सीधे मिड डे मील का बजट चार गुना बढ़ जाएगा। करीब एक हजार करोड़ रुपए का हो जाएगा दिल्ली का मिड डे मील। स्पष्ट है कि इससे डिब्बाबंद भोजन मुहैया कराने वाली कंपनियों को 1000 करोड क़े व्यापार का मौका मिलेगा। सवाल उठना स्वाभाविक है कि मिड डे मील को डिब्बाबंद भोजन में परिवर्तित करने का प्रयास आखिर किसके हित में है।

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ मिड डे मील में डिब्बाबंद : किसको होगा फायदा ”

  2. By लाल और बवाल (जुगलबन्दी) on December 23, 2009 at 5:45 PM

    फ़ायदा ! कम-अज़-कम बच्चों को तो नहीं होगा।

  3. By संगीता पुरी on December 23, 2009 at 5:56 PM

    बच्‍चों को तो पूरा फायदा न मिला है न मिलेगा .. छोटे छोटे शिक्षकों और अफसरों को भी लाभ से रोकना इसका मुख्‍य उद्देश्‍य होगा .. कॉरपोरेट जगत को लाभ होगा .. और उसका एक हिस्‍सा बडे नेता को मिल पाएगा !!

  4. By सोनू on December 23, 2009 at 8:25 PM

    इस लेख का ज़रा संपादन कीजिए। एकाध जगह निरा दोहराव है।

  5. By परमजीत बाली on December 23, 2009 at 9:01 PM

    बिना फायदे के कोई योजना बनाई है किसी ने.....:)

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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