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बीच सफ़हे की लड़ाई

हिंसा, युद्ध और जीवन : एक अध्ययन

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/21/2009 04:00:00 AM


मल्लिका साराभाई

बाबरी मस्जिद का ध्वंस और उसके बाद की भयावहता आज भी लोगों के दिमाग में जीवित है। छह तारीख को ही बाबरी मस्जिद गिराई गई थी। हममें से बहुतों के लिए उस घटना से और उस दिन से इतिहास के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई थी, जिसे हम आज तक भुला नहीं पाए हैं।

यह वही समय था, जब इन विषयों पर विमर्श के लिए दर्पण सेंटर फॉर नॉन वायलेंस थ्रू द आर्ट्स की शुरुआत हुई थी कि वे कौन से पूर्वाग्रह होते हैं, जो हिंसा की ओर लेकर जाते हैं और कैसे बहुत कम उम्र से ही हम इन पूर्वाग्रहों के शिकार हो जाते हैं। क्या किसी भी रूप में कला इस विमर्श को कुछ रोशनी प्रदान कर सकती है?

हमारे पहले रिसर्च प्रोजेक्ट में से एक चार-पांच साल के स्कूली बच्चों पर केंद्रित था। सभी बच्चों को काटरून बेहद पसंद होते हैं, भले उनकी भाषा उन्हें समझ में आती हो या न आती हो। लेकिन अभिभावक और वयस्क लोग जानते हैं कि काटरून बहुत क्रूर और हिंसक होते हैं।

इसलिए यह समझने के लिए कि छोटे बच्चों में कैसे हिंसा पैदा होती है और कैसे वे इसे मजे के रूप में लेते हैं, हमने काटरूनों से शुरुआत की। हमने सभी काटरून टॉम एंड जेरी, कैस्पर एंड घोस्ट, ट्वीटी एंड सिल्वेस्टर आदि के छह-सात मिनट के ऐसे हिस्से लिए, जिसमें वे एक-दूसरे को मार रहे थे, उछाल रहे थे, गिरा रहे थे, उनके ऊपर सामान फेंक रहे थे।

हमने छोटे बच्चों की कक्षा में ये काटरून दिखाए। पहली बार में वे बच्चे हंस-हंसकर दोहरे हो गए। फिर दूसरी-तीसरी बार भी ऐसा ही हुआ। फिर हमने कक्षा को दो हिस्सों में बांट दिया। एक से कहा कि पहले की तरह जहां उन्हें हंसी आए, वे हंसते रहें और दूसरे से कहा कि काटरून में जब भी कोई किसी को मारे या कोई हिंसा करे तो जोर से ‘आह’ की आवाज करो।

कुछ देर के बाद दोनों समूहों ने महसूस किया कि जब एक समूह हंसता तो दूसरा कराहता है। वे व्याकुल हो गए। हमने उनसे पूछा कि अगर उन्हें मारा जाए तो क्या यह मजेदार बात है तो उन सबका एक ही जवाब था - ना। तो जब किसी और को मार पड़ी तो उन्हें इसमें क्या मजेदार लगा? और क्या उन्हें अच्छा लगेगा कि जब उन्हें दर्द हो तो दूसरे लोग उन पर हंसें?

धीरे-धीरे बच्चों को समझ में आने लगा कि उनका हंसना गलत था। अपने आनंद के लिए किसी दूसरे को दुख देना बहुत अच्छी बात नहीं है। दूसरा प्रयोग हमने थोड़े ज्यादा बड़े बच्चों, बल्कि किशोरों पर किया। हमने उनसे अपनी रोज की एक डायरी बनाने के लिए कहा।

हमने कहा कि जब भी उन्हें लगे कि उन्होंने किसी के साथ हिंसक व्यवहार किया है या किसी ने उनके साथ ऐसा किया है तो वे उसे डायरी में नोट कर लें। हमने उन्हें समझाया कि किसी के सामने जोर के धमाके के साथ दरवाजा बंद करना भी एक किस्म की हिंसा है।

जल्द ही किशारों को अपनी और अपने आसपास के लोगों, अपने शिक्षकों और माता-पिता की बिलकुल अलग ही तस्वीर नजर आने लगी। साथ ही एक जबर्दस्त लैंगिक भेद भी दिखाई देने लगा। लड़कियां लगातार हिंसा का शिकार होने की बात कहती रहीं। जब वे लड़कों के किसी समूह के पास से गुजरतीं तो लड़के उन्हें देखकर सीटी बजाते, बुरी नजरों से देखते या उन पर टिप्पणियां करते। जब लड़कों को इस बात का पता चला तो वे बिलकुल अचंभित थे।

उन्हें लगता था कि ऐसा करना तो तारीफ और सराहना करना है। हम एक ऐसा समाज हैं, जहां हर तरह की हिंसा स्वीकार्य है। अमूमन जिसे हम सामान्य व्यवहार समझते हैं, दरअसल वह भी एक किस्म की हिंसा है। हिंसा की बुराइयों के प्रति अपने बच्चों को संवेदनशील बनाने के लिए हम बहुत कम प्रयास करते हैं।

शिक्षक का बच्चे को मारना सामान्य बात है। हाल ही में गुजरात में हुए एक अध्ययन में जब बच्चों से पूछा गया कि स्केल का क्या इस्तेमाल होता है तो सौ प्रतिशत बच्चों ने कहा कि स्केल के विभिन्न इस्तेमालों में से एक है पिटाई करना। किसी पिता का मां के ऊपर चिल्लाना या उसकी पिटाई करना बहुत सामान्य बात है।

कोई मामूली सी घटना बड़ी हिंसक भीड़ के हाथों हत्या की घटना में बदल जाए तो यह कोई असामान्य बात नहीं है। लेकिन इसके बावजूद घर या स्कूल में इस विषय पर कभी कोई बातचीत नहीं होती है। किन्हीं दूसरे मोर्चो पर भी इस विषय पर कोई बात नहीं होती।

हमें बहुत असंवेदनशील बना दिया गया है। हम अपने आसपास शब्दों और व्यवहार में हो रही हिंसा के प्रति बहुत कठोर हैं और उसके अभ्यस्त हो चुके हैं। क्या हम इस बात को जानते हैं? जब जैन और बौद्ध अहिंसा का पालन करते हैं तो क्या उन्हें पता है कि रोजमर्रा के जीवन में हमारे साथ होने वाली हिंसा के कई रूप हैं और वे उतने ही खतरनाक हैं और शायद उससे भी ज्यादा क्रूर, जितने कि युद्ध होते हैं।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ हिंसा, युद्ध और जीवन : एक अध्ययन ”

  2. By परमजीत बाली on December 21, 2009 at 3:44 PM

    बढ़िया पोस्ट लिखी है।धन्यवाद।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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