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बीच सफ़हे की लड़ाई

वेश्यावृत्ति की वैधानिक मान्यता का सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/20/2009 04:00:00 AM


प्रवीण कुमार
वेश्यावृति को कानूनी बनाने पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी ने एक नई सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है। कानूनी मान्यता को लेकर कुछ लोग सभ्यता और संस्कृति पर खतरे जैसी बात कर रहे हैं जबकि ऐसे भी लोग हैं जो यह मानते हैं कि ऐसा करना इंसानी सोच में आए खुलेपन का प्रतीक होगा। यह सच है कि यह दुनिया का सबसे पुराना पेशा है लेकिन इसके साथ ही इस पर दुनिया के सबसे बदनाम पेशे का लेबल भी चस्पा है। अधिकांश सामाज-सुधारक इसे सामाजिक बीमारी के तौर पर ही देखते आए हैं इसलिए इसके इलाज की व्यवस्था होनी चाहिए और अगर इसे लाइलाज भी मान लिया जाए तो भी इसे वैध करार दे स्वस्थ लोगों को बीमार बनने के लिए उत्साहित नहीं किया जा सकता।
दरअसल अपने देश में जितनी वेश्याएं हैं उनमें 90 फीसद से अधिक ने इस धंधे को या तो मजबूरी में अपनाया है या फिर उन्हें धोखे में रखकर धंधे में उतारा गया और बाद में वे यथास्थितिवाद की शिकार हो गईं। इसलिए यह कहा जाना कि कानूनी मान्यता देना इनकी समस्याओं का समाधान है सौ फीसद झूठ ही होगा। वैसे भी न्यायालय ने कानूनी मान्यता देने के पक्ष में राय नहीं दी है बल्कि उसने देह व्यापार पर लगाम न लगा पाने को लेकर सरकार की खिंचाई ही की है। न्यायालय ने इस मामले में सख्त टिप्पणी इसलिए की है क्योंकि सरकार ने अब तक इस धंधे पर निगरानी का कोई पुख्ता तंत्र स्थापित नहीं किया है। वेश्वाओं के लिए पुनर्वास और उनके बच्चों के लिए शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी जरूरी व्यवस्थाएं करना अभी तक संभव नहीं हो पाया है। एड्स जैसे रोग पर अरबों रूपए खर्च किये गए हैं किंतु जो वेश्याएं एचआईवी पॉजिटिव हैं उन्हें सरकार से न तो पर्याप्त सुविधाएं मिल पायी हैं और न ही किसी तरह का संरक्षण। उनके लिए जो काम किया भी गया है, उनमें गैर सरकारी संगठनों की भूमिका कहीं अधिक है। यहां तक कि देश में कितनी वेश्याएं हैं, इस बारे में भी सरकार के पास कोई पुख्ता जानकारी नहीं है और उसकी जो भी योजनाएं हैं वे गैर सरकारी संगठनों और सामाजिक संस्थाओं से पाई गई जानकारियों के भरोसे चल रही हैं। वेश्यावृति पर रोक को लेकर हमारे सारे प्रयास भोथरे रहे हैं। ज्यों-ज्यों पूंजीवादी व्यवस्था की जड़ें गहरी होती जा रही हैं त्यों-त्यों वेश्यावृति का न सिर्फ प्रभावक्षेत्र बढ़ा है बल्कि यह नए-नए रूप में भी सामने आ रही है। वैश्विक तौर पर यह रूझान देखने में आ रहा है कि सेक्स और पोर्न संबंधी कानून उदार बनाए जा रहे हैं। भारत में हालांकि अभी तक कानूनी तौर पर यह संरक्षणवादी स्थिति नहीं बनी है कि लेकिन ‘सेक्स पर्यटन’ और ‘समलैंगिकों के आंदोलन’ जैसे संकेतक दर्शा रहे हैं कि सरकार वेश्यावृति का विस्तार रोक नहीं पा रही है। नतीजन स्त्री और बच्चों का शारीरिक शोषण और बढ़ रहा है। वेश्याओं की तादाद भी बढ़ रही है और उनकी दुर्गति भी। देश के बड़े ही नहीं, बल्कि सैकड़ों मंझोले और छोटे दर्जे के शहरों में भी वेश्याओं का एक घोषित बसाव क्षेत्र है जहां वे बेहद उपेक्षापूर्ण जिंदगी जीती हैं। वेश्यावृति का सारा कारोबार पुलिस की छत्रछाया में चलता है। पुलिस उन्हें दलालों और कोठा मालिकों के चंगुल से छुड़ाने में दिलचस्पी नहीं लेती बल्कि हफ्ता वसूली आदि के जरिये उनकी परेशानियों में और इजाफा ही करती है। ऐसी परेशानियों से बचने के लिए वैधानिक मान्यता की बात कुछ हद तक सही है, लेकिन ऐसा होगा ही यह नहीं कहा जा सकता। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास का तो मानना है कि कानूनी मान्यता महिलाओं को प्रताड़ित किए जाने का एक और माध्यम ही बनेगी। सबसे अच्छी बात यही होगी कि मौजूदा वेश्याओं को दूसरे रोजगारों में शिफ्ट करने की व्यवस्था हो और उस मजबूरी को दूर किया जाए जो उन्हें वेश्यावृति की आ॓र धकेल देती है। न्यायालय ने विकास दर और गरीबी का विरोधाभासी चेहरा सामने परोक्षत: यह बताया है कि गरीबी इस समस्या की अहम वजह है। बेरोजगारी की मार झेल रही महिलाओं को इस धंधे में फांसना सबसे आसान होता है। दलालों द्वारा झांसे में रख इस धंधे में लाई जाने वाली महिलाओं की संख्या भी कम नहीं। कई बार तो कोठे पर आकर ही लड़की को पता चलता है कि उससे जिस नौकरी का वादा किया गया था वह ‘नौकरी’ वेश्यावृति ही है। इसी तरह ‘ह्यूमन ट्रेफकिंग’ पर रोक लगा इसे काफी हद तक रोका जा सकता है। यकीनन वेश्यावृति पर जबरन रोक लगाना बेवकूफी होगी किंतु इसे वैधानिक दर्जा देना भी होशियारी नहीं कहा जा सकता। वेश्याओं के अधिकारों के लिए कार्यरत भारतीय पतिता उद्धार समिति जैसी संस्थाओं का अध्ययन बताता है कि लगभग सभी वेश्याएं इसे जिल्लत की जिंदगी मानती हैं। सबकी मंशा यही होती है कि वे इस दलदल से निकलें और उनके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ें और सम्मानजनक नौकरी करें। सवाल है कि क्या उनकी मंशा को कानूनी मान्यता पूरी कर पाएगी।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ वेश्यावृत्ति की वैधानिक मान्यता का सवाल ”

  2. By समय on December 20, 2009 at 7:46 PM

    फिलहाल की कानूनी मान्यताएं उनकी मंशा के लिए नहीं, किन्हीं और समूहों की उच्छृंखलता को बनाए और बचाए रखने के लिए हैं।

    सधा हुआ सा विश्लेषण। शुक्रिया।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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