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बीच सफ़हे की लड़ाई

आपरेशन ग्रीन हंट : इस लड़ाई में सिर्फ हार

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/19/2009 04:00:00 AM

रामचंद्र गुहा

केंद्र सरकार जब माओवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह तैयार है, मुझे 2006 की गर्मियों में छत्तीसगढ़ में हुई तीन महत्वपूर्ण बातचीत को याद करने की अनुमति दीजिए।

पहली बातचीत छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर में प्रमुख कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा के घर पर हुई थी। कर्मा सलवा जुडूम के जनक थे। सलवा जुडूम, जिसका काम माओवादियों से निपटना था, लेकिन जिसने बड़े पैमाने पर हत्या, बलात्कार व लूटपाट फैलाई और हजारों आदिवासियों को शरणार्थी शिविरों में शरण लेने के लिए मजबूर कर दिया।

कुछ नागरिक समूहों के साथ एक साक्षात्कार में कर्मा ने कहा कि नक्सलवादी के रूप में पहचाने जाने वाले किसी भी शत्रु से निपटने का हर तरीका जायज है। मेरे सहकर्मी सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी ईएएस शर्मा, जो अपनी बौद्धिकता और निष्ठा के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने कर्मा को यह सुझाव दिया कि राजनीति को ऐसी बुद्धिमत्तापूर्ण योजना विकसित करनी चाहिए, जिसमें आदिवासी भी विकास की प्रक्रिया में भागीदार हो सकें।

राज्य सरकार ने उसी समय कुछ खदान परियोजनाओं को मंजूरी दी थी। सरकार ने उसका एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों के नाम क्यों नहीं किया? भारतीय संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची में इसकी अनुमति दी गई है, बल्कि उसे प्रोत्साहित भी किया गया है। तब सरकार के इरादों पर आदिवासियों को ज्यादा भरोसा होता और उन्होंने माओवादियों की ओर पीठ फेर ली होती।

कर्मा ने इस बात को बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार वालों का एक काल्पनिक विचार कहकर खारिज कर दिया। दूसरी बातचीत इंद्रावती नदी के तट पर शरणार्थी कैंप में हुई थी। यहां एक मुरिया स्कूल अध्यापिका ने मुझे हिंदी में बताया, ‘नक्सलियों में हिम्मत नहीं है कि वे हथियार गांव के बाहर छोड़कर हमारे बीच में आकर बहस करें।’

कर्मा के साथ हुई बातचीत ने भारतीय राज्य की षड्यंत्रकारी असफलताओं को रेखांकित कर दिया था। ढेर सारे अध्ययन यह बताते हैं कि राजनीतिक लोकतंत्र और आर्थिक विकास के पिछले छह दशकों में आदिवासियों ने बहुत ज्यादा गंवाया है और बहुत कम पाया है।

जहां तक सामान्य स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा का सवाल है, उनकी स्थिति दलितों से भी बदतर है। जहां तक राज्य में ऊंचे स्तर तक उनकी पहुंच और प्रतिनिधित्व का सवाल है तो उनकी हालत दलितों और मुसलमानों से भी खराब है। न सिर्फ उन्हें हाशिए पर ढकेला और दरकिनार किया गया है, बल्कि ज्यादा ताकत से उनके अधिकारों को छीना और उन्हें दबाया गया है।

1950 से 1980 तक विशालकाय बांध बनाने और वन योजनाओं के चलते आदिवासियों ने अपने घर और जमीनें खोईं और अब ग्लोबलाइजेशन के असर में खदान परियोजनाओं से भी उन्हें खदेड़ा जा रहा है।

नेता-दलाल-उद्योगपति की मिलीभगत के कारण असंख्य आदिवासियों को भयानक अपमान का सामना करना पड़ा है, उनकी दया पर पलना पड़ा है और इस स्थिति ने उन्हें माओवादियों के खेमे में पहुंचा दिया है।

इसलिए उड़ीसा में, जहां एक दशक पहले मुश्किल से ही कोई नक्सली होता था, वहां भारी मात्रा में आदिवासियों की जमीनें खदान कंपनियों को दिए जाने के कारण बहुत तनाव और लड़ाई की स्थिति पैदा हो गई है और इससे राज्य में अतिवादी गतिविधियों को बढ़ावा मिला है।

इसी के साथ-साथ उस मुरिया अध्यापिका के कथन ने माओवादी गतिविधियों की बर्बरता को भी रेखांकित कर दिया। वे गांव में आते हैं, सभा बुलाते हैं, राइफल थामे सावधान की मुद्रा में खड़े रहते हैं और आदिवासियों से पूछते हैं, ‘अब बताओ, क्या तुम लोग हमारे साथ हो।’

उन्हें जो समर्थन और सहयोग मिलता है, वह हमेशा एक सलाह-मशविरे और सहमति की प्रकिया से पाया हुआ नहीं होता, बल्कि बहुत बार दबाव और डर से हासिल किया गया होता है। माओवादी बेचारे मामूली सरकारी अधिकारियों को, जिन्हें कतई वर्ग-शत्रु नहीं कहा जा सकता, मारकर जबर्दस्ती की हिंसा भी करते हैं।

तीसरी बातचीत जो मुझे याद आती है, वह दंतेवाड़ा के गहन जंगलों में एक अनजान आदिवासी के साथ हुई थी। हमने जानबूझकर की गई बर्बरता और जान-माल की हानि के कुछ उदाहरणों के बारे में बात की, जिसमें एक घर को जला दिया गया था और एक औरत को मार डाला गया था।

फिर उसने इस सारी लड़ाई को बेहद ठंडे और कभी न भुलाए जा सकने वाले शब्दों में कुछ इस तरह मुझे बताया, ‘हम पर दोनों तरफ से दबाव है और हम बीच में पिस गए हैं।’अगर इतिहास पर एक नजर डालें तो गत एक सदी से भी ज्यादा समय से मध्य भारत तिगुनी त्रासदियों का शिकार हो रहा है।

एक बात इन सभी त्रासदियों में समान रही है कि हर बार आदिवासी ही इसका शिकार होते रहे हैं। पहली त्रासदी की शुरुआत अंग्रेजों द्वारा उनके जंगलों पर कब्जा किए जाने से हुई और जो आजादी के बाद से भी लगातार राज्य और बाजार के द्वारा उन्हें दबाए-कुचले जाने के रूप में जारी रही।

भारत में चुनावी लोकतंत्र के आगमन के साथ उनकी दूसरी त्रासदी की शुरुआत हुई, जहां एक बहुत छोटा, शक्तिहीन अल्पसंख्यक तबका होने के नाते सत्ता के गलियारों तक उनकी आवाज नहीं पहुंच सकी और भारतीय संविधान में उनके अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए जो भी अर्थपूर्ण प्रावधान किए गए थे, वे सफल नहीं हो सके।

आदिवासियों के जीवन की तीसरी त्रासदी माओवादियों के आगमन के साथ हुई, जिनके हथियारबंद संघर्ष और तात्कालिक हिंसा के रास्ते ने आदिवासियों की समस्या को सुलझाने की कोई उम्मीद नहीं छोड़ी। भारतीय लोकतंत्र का एक नागरिक होने के नाते मैं सरकार से कहता हूं कि वह संविधान में दिए गए उन प्रावधानों को लागू करे, जो आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करते हैं और आदिवासियों को राष्ट्र के राजनीतिक और आर्थिक विकास में पूर्ण भागीदार बनाए।

लेकिन इसी के साथ-साथ मैं माओवादियां से भी यह अपील करता हूं कि वे हथियार नीचे करके नेपाल में अपने हमविचार भाइयों की राह का अनुसरण करें (जैसाकि कॉमरेड प्रचंड ने कहा) कि इक्कीसवीं सदी की राजनीतिक व्यवस्था में बहुपार्टी लोकतंत्र ही सर्वाधिक उपयुक्त है।

लेकिन शायद इस और दूसरी बहुत सी अपीलों के लिए काफी देर हो चुकी है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कोई चौथी त्रासदी घटने वाली है। भ्रष्ट और बर्बर अर्धसैनिक बल अतिवादियों के खिलाफ हथियारबंद और बर्बर कार्रवाई करने के लिए तैयार हो गए हैं।

अब हिंसा और यातनाओं का और ज्यादा प्रसार होगा। जीत किसी की नहीं होगी, सिर्फ एक का नुकसान होगा। और एक बार फिर ये वही लोग होंगे, मध्य भारत के आदिवासी।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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