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तेलंगाना : विकेन्द्रीकरण के बदले अर्थों के बीच नये राज्य

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/16/2009 08:00:00 PM




तेलंगाना की मांग ने पिछले कुछ समय से भारतीय राजनीति में गरमाहट ला दिया है. लेकिन यह पहला मौका नहीं है, जब तेलंगाना ने पूरे देश का ध्यान खींचा है. 1947 में सत्ता हस्तांतरण के कुछ समय बाद ही तेलंगाना में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्वा में किसानों ने सामंती शासन से मुक्ति के लिए शानदार आन्दोलन संगठित किया. हालाँकि तब कम्युनिस्ट नेतृत्व की धोखेबाजी और नेहरू द्वारा सेना के ज़रिये भयानक दमन के कारण उसे कुचल दिया गया. लेकिन तब से एक मुक्त तेलंगाना स्थानीय लोगों का सपना रहा है. तभी से इसके लिए हुए आंदोलनों ने भी अनेक रास्ते अपनाये हैं और उनमें कई तरह के भटकाव भी आये हैं. इसके अलावा पृथक तेलंगाना राज्य का आन्दोलन भी शुरू हुआ और यह देश भर में इस तरह की समय-समय पर की जाने वाली मांगों से भी जुड़ा है. इस बहस के तहत अलग राज्य की मांग, विकेंद्रीकरण और सत्ता के जनवादी स्वरुप के विभिन्न आयामों के बारे में हमें बता रहे हैं जानेमाने पत्रकार अनिल चमड़िया.

उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ की तरह तेलंगाना के अलग राज्य बनाने की मांग के आंदोलन की एक ऐतहासिक पृष्ठभूमि रही हैं। छोटे राज्यों की अवधारणा के साथ सत्ता का विकेन्द्रीकरण जुड़ा हुआ हैं। जवाहर लाल नेहरू सत्ता के केन्द्रीकरण के पक्षधर रहे हैं। उनकी राजनीतिक समझ ये रही है कि भारतीय गणराज्य में केन्द्र की सत्ता ज्यादा से ज्यादा मजबूत हो और प्रदेशों की सरकार के पास सीमित अधिकार हो।इस तरह भारतीय राष्ट्र में मजबूत केन्द्र बनाम अपेक्षाकृत कमजोर प्रदेश एवं विकेन्द्रीकृत सत्ता की दो राजनीतिक धाराएं सक्रिय रही हैं।भारतीय गणराज्य जिस पृष्ठभूमि में खड़ा हुआ है वहां 1947 के तत्काल बाद नेहरू की राजनीतिक अवधारणा के अनुरूप शासन व्यवस्था का ढांचा खड़ा करना संभव नहीं था।इसीलिए विकेन्द्रीकृत सत्ता की राजनीतिक धारा विभिन्न आंदोलन में सशक्त रूप से मौजूद रही।छोटे प्रदेशों की मांगों के लंबे अर्से के बाद आखिरकार भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी तो तीन नये प्रदेशों पर सहमति बन गई। इसका अर्थ ये कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि भाजपा जिस तरह के सांस्कृतिक राष्ट्र की परिकल्पना करती है उसमें वो कोई नेहरू  की तरह की केन्द्रीकृत सत्ता से बुनियादी तौर पर भिन्न हैं। भाजपा जिन क्षेत्रीय यानी प्रादेशिक राजनीतिक ताकतों के बूते  अपने नेतृत्व में सरकार चला रही थी उसमें उसे अगल राज्यों की मांग को स्वीकार करने में अपने राजनीतिक विस्तार की संभावना दिखाई दे रही थी। लगभग यही स्थिति अभी है जब कांग्रेस ने तेलंगाना के बनाने के राजनीतिक फैसले का मन बना लिया है। तेलंगाना राष्ट्र समिति पहले कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल रही है और फिलहाल उसी संगठन के नेतृत्व में तेलंगाना राज्य की मांग को पूरा करने के लिए आंदोलन चल रहा था। पिछले कुछ वर्षों में तेरास के तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर ढीले पड़ने की स्थिति में उसका वोट बैंक कमजोर हुआ था।


अलग राज्यों की मांगों के आंदोलन के संदर्भ में एक खास पहलू पर गौर करना चाहिए।जिस दौर में ये आंदोलन शुरू हुए उसके नेतृत्व किस तरह की राजनीतिक शक्तियों के हाथों में थे? उसके सत्ता के विकेन्द्रीकरण की अवधारणा कितनी विस्तारित थी। मसलन झारखंड की मांग के शुरूआती दौर में जिन आदिवासी राजनीतिक शक्तियों के हाथों में वह नेतृत्व था अब झारखंड का नेतृत्व किन राजनीतिक शक्तियों के हाथों में हैंघ् छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा जैसी राजनीतिक ताकतों के पास सत्ता के विकेन्द्रीकरण की एक पूरी अवधारणा मौजूद थी। मौजूदा दौर में वह कहॉ है घ् उतराखंड के लिए आंदोलन का नेतृत्व करने वाली ताकतें खुद को ठगा महसूस कर रही है। झारखंडए छत्तीसगढ़ का आदिवासी पूर्व के अपेक्षाकृत बड़े शासन व्यवस्था के ढांचे में जिस बदत्तर स्थिति में था उससे भिन्न स्थिति में खुद को खड़ा नहीं देख पा रहा है। सत्ता के विकेन्द्रकरण का अर्थ एक तरह के शासन व्यवस्था के दो ढांचों में रूपांतरित नहीं हो जाना है। विकेन्द्रीकरण एक स्वतंत्र राजनीतिक अवधारणा है और उसमें शासन व्यवस्था के नये ढांचे का निर्माण होना भर निहित नहीं है बल्कि नई राजनीतिक शक्तियों के नेतृत्व में उसके अनुरूप शासन व्यवस्था के ढांचे का निर्माण है।

भारतीय राजनीति में बहुत सारे ऐसे मुद्दे रहे हैं जो इस गणराज्य के बनने के दौरान आंदोलन के आधार बनें। लेकिन गणराज्य के बनने की जो प्रक्रिया रही है उसमें काफी कुछ बदला। सत्ता को संचालित करने वाली शक्तियों ने उन तमाम तरह के आंदोलनों में अपना राजनीतिक और सांस्कृतिक विस्तार किया है। उसने आंदोलनों की राजनीतिक अवधारणा को ही परिवर्तित कर दिया।विकेन्द्रीकरण का अर्थ एक प्रदेश में दो मुख्यमंत्रियों और उसके मंत्रिमंडल के रूप में स्थापित हो गया।दरअसल ये  अब खुद सत्ता को नियंत्रित करने वाली राजनीतिक शक्तियों की जरूरत के रूप में सामने आ गई।इस बात को इस तरह से समझा जा सकता है कि आखिर पिछले दिनों आंध्र प्रदेश में फिर से विधान परिषद को बहाल करने की जरूरत क्यों महसूस की गई? क्या ये संसदीय व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से की गई? तेलंगाना के राज्य बनने के दूरगामी फैसले को ध्यान में रखकर ये फैसला किया गया? दरअसल सत्ता संचालित करने वाली राजनीतिक शक्तियों का विस्तार हुआ है।ये आंध्र में भी हुआ है और तेलंगाना में भी हो चुका है। वास्तव में सत्ता संचालित करने वाली राजनीतिक शक्तियों के बीच सत्ता के बंटवारे को ही लोकतंत्र के विस्तार के रूप में स्थापित किया जाता है। सत्ता संचालित करने वाली शक्तियों में सत्ता के बंटवारे की गुंजाईश बनाना लोकतंत्र का विस्तार नहीं है।लोकतंत्र का विस्तार विभिन्न राजनीतिक वर्गों की सत्ता की स्थापना है।राज्यों का गठन लगभग उसी रूप में सामने आया है जैसे एक जिले को बांटकर दो जिले में तब्दील कर देने की प्रक्रिया पूरी होती है।

देश के सामने अब कुछ ठोस अनुभव हैं। पहला तो अलग राज्यों के गठन के बाद से वहां की राजनीतिक शासन व्यवस्था के अनुभव पूर्व की तरह के ही है। बल्कि जैसे कई बार खीझ में पीड़ित और दमित समाज का सदस्य कहता है कि अंग्रेजों का ही जमाना ठीक थाए उसी तरह से नये प्रदेशों के ऐसे लोग कहते है कि शासन का पुराना विस्तृत ढांचा ही बेहतर था।सत्ता के विकेन्द्रीकरण की राजनीतिक अवधारणा नये राज्यों में किसी भी स्तर पर दिखाई नहीं देती है। बल्कि केन्द्रीकृत सत्ता की राजनीतिक और सांस्कृतिक अवधारणा का विस्तार करने में ये प्रदेश सहायक हुए हैं। दूसरी जो महत्वपूर्ण बात ये हुई है कि जिस दौर में नये राज्य बन रहे हैं या नये राज्यों की मांग तेजी से उठ रही है उस दौर में विकेन्द्रीकरण की तरह गणराज्य की अवधारणा ही कमजोर कर दी गई है।गणराज्य की अवधारणा में प्रदेशों की स्वायतता है।स्वायतता के बने रहने का आधार उसकी आर्थिक क्षमता है। इस बात का अध्ययन कई बार किया जा चुका है कि प्रदेशों की माली हालत लगातार बदत्तर होती जा रही है। केन्द्र पर उनकी निर्भरता बढ़ी है। गणराज्य बनाने की पूरी बहस से जो सार निकला उसमें  प्रदेशों के लिए कई विषय निश्चित किए गए। इसमें केन्द्र की दखलंदाजी को किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया गया। जैसे ये माना जाता रहा है कि केन्द्र के पास संचारए विदेश और रक्षा जैसे विषय ही होने चाहिए। लेकिन भूमंडलीकरण के दौर के बाद से प्रदेशों के विषयों में केन्द्र ने अच्छी खासी घुसपैठ कर ली है और लगातार कर रहा है। जो समवर्ती सूची में विषय थे उनमें कईयों में केन्द्र ने राज्यों को लगभग विस्थापित कर दिया है और वह निर्देशित करने की स्थिति में पहुंच गया है। कानून एवं व्यवस्था का विषय प्रदेशों का है लेकिन पहले इस रूप में केन्द्र ने राज्यों की परजीविता का विकास किया कि वे अपनी मशीनरी को दुरूस्त करने के लिए केन्द्र से सहायता ले सकते है। ये सहायता लेने की राशि क्रमश बढ़ती चली गई है। केन्द्र ने ये परजीविता इस तरह से विकसित की कि राज्यों ने अपनी आंखों पर काला चश्मा लगा लिया। राज्य जिस नक्सल समस्या को अपने नजरिये राजनीतिकए आर्थिक और सामाजिक समस्या के रूप में देखते थे प्रदेशों ने उसे कानून एवं व्यवस्था की समस्या में देखना शुरू कर दिया।इसका मतलब ये हुआ कि उन्हें इसके बदले ज्यादा से ज्यादा पैसे मिलने का रास्ता दिखाई देने लगा।स्थिति यहां तक पहुंची कि आतंकवाद की जांच के नाम पर एक राष्ट्रीय ऐजेंसी खड़ी करने का कानून बनाया गया और प्रदेशों ने उसे स्वीकार कर लिया। साम्प्रदायिकता विरोधी विधेयक में तो राज्यों में सीधे सीधे हस्तक्षेप की जगह बना ली गई है।शिक्षा और कृषि जैसे विषयों में केन्द्र का हस्तक्षेप बढ़ा है। ये साफ देखा जा सकता है कि जिस समय नये राज्यों का गठन किया जा रहा है उस समय तक राज्यों की संवैधानिक ताकत भी कमजोर कर दी गई है।राज्यसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व तो निर्धारित है लेकिन राज्यों के प्रतिनिधित्व का अर्थ बदल गया है। अब किसी भी राज्य से किसी भी राज्य का निवासी राज्यसभा का सदस्य हो सकता है। दूसरा विकेन्द्रीकरण के अर्थ के नये नये आयाम सामने आए हैं। विकेन्द्रीकरण का अर्थ केवल सरकार चलाने वाले तंत्र का प्रभार सौपने तक सीमित नही होता है। आज के मुख्यमंत्री या मंत्री तंत्र के प्रभारी की भूमिका में हो तो उससे राजनीतिक आकांक्षा का कौन सा पक्ष संतुष्ट होता है? आदिवासी को मधु कोड़ा या शिबू सोरेन चाहिए या अपनी जमीन पर बने रहने का हक चाहिए? उसने तो झारखंड आंदोलन में इसीलिए भरोसा किया था कि वह जिस जमीन पर रहता है उसपर उसका घर बन सकेगा और वहां उसके बेहतर जीवन की स्थितियां तैयार हो सकेगी। लेकिन आज तो उसे कथित अपने प्रतिनिधित्व के नेतृत्व में अपनी जमीन पर ही बने रहने का संकट खड़ा हो गया है। आदिवासी अपनी सत्ता को कैसे सुरक्षित रख सकता है? भूमंडलीकरण के दौर में विकेन्द्रीकरण भूमडंलीकरण की नीतियों को लागू करने वाली मशीनरी का रूप लेती दिखे तो उसके राजनीतिक आयामों के लिए कौन संघर्ष करेगा? किसी भी आंदोलन में सत्ता की राजनीति और संस्कृति अपनी पैठ कर लेती है तो बेहद भ्रामक स्थितियां खड़ी हो जाती है। सत्ता का विकेन्द्रीकरण के साथ भी यही हुआ है और छोटे प्रदेशों की मांगों के साथ भी यही हुआ है। केन्द्रीकृत सत्ता की राजनीति का विस्तार शासन व्यवस्था के ढांचे के बंटने से हुआ है और उसे सत्ता का विकेन्द्रीकरण मांन लिया गया है।नये दौर में आंदोलन के नये मुद्दे या पुराने मुद्दे या आकांक्षाएं नये स्तर पर परिभाषित नहीं हो रही है और ऐसे में आंदोलनों की मांगों को पूरा करने के लिए केन्द्रीकृत सत्ता की सरकारें आगे आ रही है तो इन विरोधाभासी स्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए। 

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


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“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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