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अफ्स्पा : देश में एक अंधा कानून

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/18/2009 04:00:00 AM


मणिपुर और पूर्वोत्तर भारत के अन्य राज्यों के साथ अफ्स्पा देश के अनेक जगहों में घोषित-अघोषित तौर पर लागू है. अभी आपरेशन ग्रीन हंट के नाम पर पञ्च और राज्यों में युद्ध और आपातकाल थोप दिया गया है. ऐसे हालात में जनता किसतरह जि रही है और इसका प्रतिरोध कर रही है, बता रहे हैं रामचंद्र गुहा

भारत के हर शहर में महात्मा गांधी के नाम पर सड़क है और हर सड़क अपने-अपने ढंग से गांधीजी की विरासत का उपहास उड़ाती है। मेरे अपने शहर बेंगलुरु की एमजी रोड पर उपभोक्तावाद का उत्सव मनाया जाता है, जहां झिलमिलाते शोरूम भारत में मिलने वाले महंगे उत्पादों का प्रचार करते नजर आते हैं। अन्य शहरों में एमजी रोड पर सरकारी कार्यालय स्थित हैं जहां प्राय: राजनेता व सरकारी बाबू सत्ता और भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं।

महात्मा गांधी अन्य कई चीजों के अलावा सदैव अपरिग्रह (धन संग्रह न करने की प्रवृत्ति), ईमानदारी और अहिंसा के पक्ष में खड़े रहे। इंफाल स्थित एमजी रोड भी गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत का उल्लंघन करती है। इस सड़क पर कुछ-कुछ फासलों पर हथियारों से लैस जवानों के पिकेट्स मिल जाएंगे जिनसे लोगों को गुजरना होता है। जब मैं पिछले साल मणिपुर गया तो एमजी रोड पर स्थित एक लॉज में ठहरा।

वहीं से मैंने देखा कि एक लड़का अपनी छोटी बहन के साथ स्कूल जाने के लिए उस सड़क से गुजर रहा था। वह दस साल से बड़ा नहीं होगा। जब वह किसी पिकेट से गुजरता तो अपनी बहन का हाथ कसकर पकड़ लेता। बैरिकेड्स से गुजरते हुए वह बहुत तनाव में नजर आ रहा था और यही तनाव काफी कुछ जाहिर कर रहा था। उधर बेंगलुरु में मेरा बेटा और उसकी छोटी बहन काफी आराम से और खुशी-खुशी स्कूल जाते हैं, जबकि हमारे ही एक अन्य राज्य में यह काफी भयावह अनुभव होता है।

आज से ठीक पांच साल पहले नवंबर 2004 में प्रधानमंत्री ने मणिपुर का दौरा किया था। वे वहां सेना की ज्यादतियों खासकर महिलाओं के साथ की गई बर्बरता के खिलाफ व्यापक प्रदर्शनों के मद्देनजर गए थे। समाज के विभिन्न वर्गो के साथ व्यापक चर्चा के बाद वे ऐतिहासिक कांगला किले से सशस्त्र बलों को हटाने पर राजी हो गए थे। साथ ही उन्होंने सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) को निरस्त करने पर ‘सहानुभूतिपूर्वक’ विचार करने का भी आश्वासन दिया था।

इस कानून के तहत सशस्त्र बलों को वारंट बगैर गिरफ्तारी करने और गोली चलाने सहित कई व्यापक अधिकार दिए गए हैं। मणिपुर में करीब-करीब सभी लोग एएफएसपीए के खिलाफ हैं। हालांकि एक महिला काफी लंबे अर्से से अपने विशेष तरीके से इसका विरोध करती आ रही हैं और यही बात उसे दूसरों से अलग बना देती है। यह युवा महिला इरोम शर्मिला हैं जो नवंबर 2001 से एएफएसपीए को निरस्त करने की मांग करते हुए आमरण अनशन पर बैठी हुई हैं (इसकी तात्कालिक वजह एक गांव के बस स्टॉप पर असम राइफल्स की गोलीबारी में दस लोगों की मौत थी)।

उन्हें ‘खुदकुशी की कोशिश’ करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। आज भी इरोम जेलनुमा अस्पताल के वार्ड में अनशन पर हैं, जहां वह योग करती हैं और धार्मिक किताबें, राजनीतिक संस्मरण व लोककथाएं पढ़ती हैं। उनकी जीवनी लेखिका दीप्ति प्रिया मेहरोत्रा कहती हैं कि कानून उन पर आमरण अनशन करने का आरोप लगाता है, जबकि वह ‘आजीवन अनशन’ पर नजर आती हंै, ताकि उस बर्बर कानून को हटवा सके जो निर्दोष लोगों की जान लेने की अनुमति देता है।

मणिपुर से नई दिल्ली लौटने के बाद प्रधानमंत्री ने एक समिति का गठन करके इस मसले पर रिपोर्ट देने को कहा कि क्या इस कानून को निरस्त किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के एक सम्मानित न्यायाधीश की अगुवाई में गठित इस समिति में कई स्टारों से लैस एक सैन्य अधिकारी और एक काफी ज्ञानवान पत्रकार को सदस्य बनाया गया। समिति की रिपोर्ट कई राज्यों के दौरों और वहां विभिन्न वर्गो के लोगों से हुई बातचीत पर आधारित है।

समिति का पूरा पाठ वैबसाइट पर उपलब्ध है, लेकिन यहां उसके कुछ मुख्य अंश देना मुनासिब होगा। समिति का निष्कर्ष है, ‘अधिकांश संगठनों और लोगों की राय में यह कानून अलोकतांत्रिक, कठोर और भेदभावपूर्ण है। यह केवल पूर्वोत्तर के राज्यों पर लागू होता है और इसलिए इसका इस्तेमाल इस क्षेत्र के लोगों के साथ भेदभाव करना है। कानून में सशस्त्र बलों को दिए गए संरक्षण की वजह से गैर कानूनी हत्याओं, प्रताड़नाओं, छेड़खानी, दुष्कर्म और उगाही की घटनाएं हुई हैं।

इस कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो सशस्त्र बलों/अर्ध सैन्य बलों द्वारा की गई ज्यादतियों के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करे ..इसलिए इस कानून को निरस्त कर दिया जाना चाहिए।’ समिति इस बात पर सहमत है कि एएफएसपीए को विधि की किताब से हटा दिया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि मौजूदा गैर कानूनी गतिविधि (निरोधक) कानून में कुछ उचित प्रावधान जोड़कर राज्य की सुरक्षा जरूरतों की पूर्ति नागरिकों के मानवाधिकारों का उल्लंघन किए बगैर की जा सकती है।

यह कानून जहां आतंकवाद से लड़ने के लिए सेना की शीघ्र तैनाती की अनुमति देता है, वहीं इसके तहत गिरफ्तार लोगों को पुलिस को सौंपा जा सकता है, जहां वे कानूनी मदद हासिल कर सकते हैं। अनुशंसा करते हुए समिति ने राज्य के लोगों के बीच फैले हुए असंतोष का भी आकलन पेश किया है। समिति के अनुसार, ‘मणिपुर और अन्य जगह हुए प्रदर्शन उस समस्या के केवल लक्षण भर हैं, जिसकी जड़ें काफी गहरी पैठ चुकी हैं।

विभिन्न मुद्दों पर एक के बाद एक होने वाले प्रदर्शन, लोगों के आसानी से उत्तेजित होने और टकराव व हिंसा की घटनाएं भी समस्या की गंभीरता की ओर इशारा करती हैं और बताती हैं कि इनका समाधान नहीं हो पाया है। जब तक मुख्य मुद्दे का समाधान नहीं होगा, तब तक किसी भी छोटे-मोटे मुद्दे या गैर मुद्दे पर प्रदर्शन होते रहेंगे।’ जब मैं इंफाल में था, उस समय अर्थशास्त्र के एक सम्मानित प्रोफैसर मुझे कांगला के किले में ले गए।

कई कब्रों व समाधियों से गुजरते हुए जब हम कांगला जा रहे थे, तो उस समय प्रोफैसर कह रहे थे कि जिस तरह से कांगला किले से असम राइफल्स को हटाया गया है, क्या प्रधानमंत्री वैसे ही एएफएसपीए को राज्य से हटा पाएंगे। उनका मानना था कि ऐसा करके ही भारत सरकार यह आभास करवा सकेगी कि वह मणिपुर के लोगों के साथ समान रूप से व्यवहार करती है। उनका कहना था, ‘आप किसी से प्यार करें तो पूरे दिल से करें।’

एएफएसपीए सबसे पहले मणिपुर के कुछ हिस्सों में 1960 में लागू किया गया था। अगर सुरक्षा के संकीर्ण नजरिए से देखें, तब भी इसका कोई फायदा नहीं हुआ है, क्यांेकि पिछले कुछ दशकों में असंतोष और हिंसा मंे लगातार इजाफा ही हुआ है। इसको निरस्त करने की एक उदार अंतिम समय सीमा इरोम के आमरण अनशन की दसवीं सालगिरह से पहले यानी नवंबर 2010 हो सकती है। मणिपुर में अभी जो स्थिति है, उसमें तो इरोम का यह अनशन ही एकमात्र गांधीवादी तत्व नजर आता है।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ अफ्स्पा : देश में एक अंधा कानून ”

  2. By परमजीत बाली on December 18, 2009 at 12:50 PM

    अच्छी पोस्ट लिखी है....पता नही सरकार क्यो इस ओर ध्यान नही दे रही...यदि ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन...मणीपु्र देश की मुख्य धारा से बहुत दूर हो ता जाएगा..

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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