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बीच सफ़हे की लड़ाई

भारतीय लोकतंत्र और नक्शे पर नया राज्य

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/17/2009 03:00:00 PM


रामचंद्र गुहा

पिछले दिनों मैं काफी निबंध पढ़ता रहा हूं, उनमें से एक के इन अंशों पर विचार करें : ‘तेलंगाना के लोग स्वयं को एक अवांछनीय राज्य में पाते हैं। आंध्रप्रदेश के बाहर के राज्यों में रह रहे उनके देशवासी न तो तेलंगाना में विद्रोह के महत्व को समझ रहे हैं और न ही उसकी सराहना कर रहे हैं।’

‘जिस पल तेलंगाना के निर्वाचित प्रतिनिधि आंध्रप्रदेश के राजनीतिक आकाओं के प्रलोभन और दबाव से बाहर निकल आएंगे और अपने लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप चलने लगेंगे, उसी समय आंदोलन बिल्कुल सहज ढंग से अपनी परिणति पर पहुंच जाएगा।’

ये शब्द चालीस साल पहले प्रकाशित एक किताब के हैं। 1969 के शुरुआती हफ्तों में तेलंगाना के कस्बों व गांवों में पृथक राज्य की मांग के समर्थन में बैठकें आयोजित की गई थीं। ‘तेलंगाना आंदोलन के लगातार बढ़ते असर’ के कारण पुलिस को ताकत दिखानी पड़ी और ‘लाठीचार्ज, गोलीबारी और इसके परिणामस्वरूप हिंसा तेलंगाना में स्वीकृत दिनचर्या बन गई।’

इस संकट के मद्देनजर 20 मई 1969 को कॉलेजों के तीन सौ शिक्षकों ने हैदराबाद में एक सम्मेलन आयोजित किया था। इस सम्मेलन की पूरी कार्यवाही एक किताब में प्रकाशित की गई थी। ‘द तेलंगाना मूवमेंट : एन इन्वेस्टिगेटिव फोकस’ शीर्षक से प्रकाशित किताब की एक प्रति मुझे कुछ साल पहले बेंगलुरू में एक फुटपाथ पर मिली थी। अब यह दुर्लभ हो गई है। चूंकि इसके अंश उस समय को प्रतिध्वनित करते हैं, इसलिए इसे अन्य लोगों के साथ भी साझा करना उचित होगा।

2009 की तरह ही 1969 में भी तेलंगाना के लिए अभियान में विश्वासघात केंद्रीय बिंदु था। 20 फरवरी 1956 को आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के कांग्रेसी नेताओं के बीच समझौता हुआ था। इसमें आंध्र व तेलंगाना को मिलाकर बने संयुक्त राज्य का उपमुख्यमंत्री पद तेलंगाना को देने, सरकारी नौकरियों में तेलंगाना क्षेत्र के लोगों के लिए कोटा रखने और तेलंगाना में आंध्र के लोगों के प्रवास को रोकने जैसे वायदे किए गए थे।

लेकिन तेलंगाना के लोगों की शिकायत है कि ये वायदे पूरे नहीं किए जा सके। शिकायतें यहीं खत्म नहीं होतीं। कुल कृषि भूमि का 42 फीसदी हिस्सा तेलंगाना में है, लेकिन कृषि खर्च का 30 फीसदी ही इस क्षेत्र के हिस्से आता है। उर्वरकों का आवंटन भी महज 27 फीसदी ही होता है, जबकि नहरी जल व पनबिजली भी इसके वाजिब हक से बहुत कम मिल पाती है।

इस सम्मेलन ने कई सकारात्मक संदर्भो में तेलंगाना राज्य का समर्थन किया था। यह पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों से बड़ा होने की वजह से आकार के मामले में सक्षम साबित होगा। अनाज का उत्पादन राष्ट्रीय औसत से ज्यादा और प्राकृतिक संसाधनों से भी समृद्ध होने की वजह से यह आर्थिक तौर पर भी समर्थ होगा।

इससे भी ज्यादा, यह भारतीय लोकतंत्र को और भी मजबूती प्रदान करेगा। उसका मानना था, ‘छोटे राज्य हमारी राजनीतिक प्रक्रिया के लोकतांत्रीकरण में मदद करेंगे, जिससे एक विशाल वर्ग विकास की प्रक्रिया में भाग लेने के लिए आकर्षित होगा।’ दरअसल, ‘छोटे राज्य देश के राजनीतिक और आर्थिक जीवन में एक नए और आशाजनक युग की शुरुआत कर सकते हैं।’

हैदराबाद सम्मेलन के प्रतिनिधियों ने अपनी मांग को लेकर तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री से भेंट की थी, लेकिन तब उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली थी। अब चालीस साल के बाद उनके अनुयायियों को सफलता मिलती दिख रही है। केंद्र ने तेलंगाना राज्य के लिए विधानसभा में प्रस्ताव लाने का वायदा किया है।

1950 के दशक में भारत के नक्शे पर फिर से रेखाएं खींची गई थीं, जब भाषाई आधार पर राज्यों का गठन किया गया था। इस प्रक्रिया का आगाज पोट्टी श्रीरामुलू के उपवास से हुआ था, जो पृथक आंध्रप्रदेश की मांग कर रहे थे। के. चंद्रशेखर राव की तरह ही श्रीरामुलू भी करोड़ों लोगों की भावनाओं को अभिव्यक्त कर रहे थे।

श्रीरामुलू की मृत्यु (58 दिनों के अनशन के पश्चात) के बाद सड़कों पर प्रदर्शन इतने तेज हो गए कि केंद्र को नए राज्य की मांग के आगे झुकना पड़ा। इसकी प्रतिक्रिया में कन्नड़, मराठी और मलयाली लोगों ने भी विरोध शुरू कर दिया। नतीजतन, राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ जिसने १९५६ में भाषाई आधार पर राज्यों के निर्माण के सिद्धांत की घोषणा की।

राज्यों के पुनर्गठन ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत ही किया है। यही वजह है कि भारत की स्थिति पाकिस्तान और श्रीलंका जैसी नहीं हुई जिन्हें इसलिए रक्तरंजित गृहयुद्धों का सामना करना पड़ा, क्योंकि वे भाषाई आधार पर स्वायत्तता देने को राजी नहीं हुए। हमारा देश अपेक्षाकृत युवा है।

अब यह दूसरी पीढ़ी की चुनौतियों से मुकाबिल है जो सामाजिक और आर्थिक विकास में क्षेत्रीय असंतुलन से संबंधित हैं। इसके लिए एक नए राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना करने की जरूरत है जो विदर्भ, गोरखालैंड, हरित प्रदेश, कोंगुनाडु और ऐसे ही पृथक राज्यों की मांगों पर विचार करे। पंचायतों और नगर पालिकाओं को वास्तविक वित्तीय व राजनीतिक स्वायत्तता प्रदान करना भी इसके दायरे में शामिल किया जाना चाहिए।

नया आयोग तटस्थता व ईमानदारी के साथ काम कर सके, इसके लिए इसके सदस्यों में राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के बजाय विधि व सामाजिक क्षेत्र के विद्वानों और अकादमिक लोगों को लेना चाहिए। पहले राज्य पुनर्गठन आयोग में न्यायविद फजल अली, लेखक व राजनयिक के एम पणिक्कर और सामाजिक कार्यकर्ता एच एन कुंजरू शामिल थे।

आज भारत के पास कई प्रतिष्ठित और स्वतंत्र रूप से सोचने-समझने वाली हस्तियां हैं। नए राज्य पुनर्गठन आयोग के सदस्यों के रूप में मैं न्यायविद फली नरीमन, अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज, समाज विज्ञानी आंद्रे बेटेली और सामाजिक कार्यकर्ता ईला भट्ट का नाम ले सकता हूं। इनके अलावा भी ऐसे कई नाम हो सकते हैं।

उम्मीद कर सकते हैं कि केंद्र सरकार अपने वायदे को पूरा करने का साहस दिखाएगी। इस बीच, जसवंत सिंह से उम्मीद की जाएगी कि वे कलम को किनारे रखकर पृथक गोरखालैंड निर्माण को ही अपना एकमात्र लक्ष्य बनाएं, जो उनके निर्वाचन क्षेत्र की मांग रही है। इसी तरह अजित सिंह भी अपनी तंद्रा को त्यागकर हरित प्रदेश के गठन के लिए आंदोलन की अगुवाई करने को कमर कस सकते हैं।

जहां तक चंद्रशेखर राव का सवाल है, वे निश्चित तौर पर जानते होंगे कि 1950 के दशक में पृथक आंध्रप्रदेश के गठन के लिए चलाए गए आंदोलन के साथ उनका आंदोलन कितना समानांतर है। श्रीरामुलू ने अपना अनशन मद्रास में किया था, क्योंकि वे मद्रास को आंधप्रदेश की राजधानी बनवाना चाहते थे।

श्रीरामुलू के समर्थकों को अलग राज्य तो मिल गया, लेकिन मद्रास नहीं मिला। राव को सबसे बड़ा भय यही सता रहा है कि कहीं इतिहास अपने आप को दोहरा न दे, यानी उन्हंे तेलंगाना तो मिल जाए, लेकिन हैदराबाद के बगैर।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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