हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भुखमरी के विश्वविजेता गणतंत्र में आपका स्वागत है

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/16/2009 05:00:00 AM


एक विश्वविजेता क्रिकेट टीम, 52 खरबपतियों, आसमान छूते सेंसेक्स और  60 वर्ष के गणतंत्र के बावजूद देश में भूखे सोने और मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है. यह दुनिया में सबसे अधिक हैं. नक्सलवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताये जाने के इस दौर में हम इस तथ्य को शायद इस तरह प्रस्तुत नहीं कर सकते कि क्या इसीलिए देश में भूखे रहने और मरने वालों की संख्या बढ़ रही है क्योंकि यह देश एक विश्वविजेता क्रिकेट टीम, 52 खरबपतियों, एक आसमान छूते सेंसेक्स और 60 वर्ष के गणतंत्र वाला देश है.  हम शायद नहीं जानते कि इस सवाल का जवाब क्या है. या कि शायद हम जानते हैं? आपकी मदद कर रहे हैं सचिन कुमार जैन. 



मौजूदा
भुखमरी यह सिध्द करती है कि 1947 में हम मात्र बाहरी उपनिवेशवाद से मुक्त हुए थे। आजादी के बाद हमारे राष्ट्र और समाज में अंदरूनी उपनिवेशवाद ने अपनी जड़ों को गहराया। इस उपनिवेश में खेती, किसानी और मजदूर देश की आर्थिक विकास की नीतियों के उपनिवेश बने। भारत के संदर्भ में यह कहना गैर-वाजिब नहीं है कि आदिवासियों जैसे वर्ग और किसानी जैसे जीवन तो स्वतंत्र ही नहीं हुए हैं।
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में भी पुर्तगालियों और अंग्रेजों ने खेती पर हमला करके अपने उपनिवेश स्थापित किए थे। इतिहास एक बार खुद को दोहरा रहा है। खेती को दोयम दर्जे का गैर-जरूरी संस्कार मानकर उसको खत्म किया जा रहा है। जिस किसानी से आज भी देश की 62 प्रतिशत जनता को रोजगार मिलता है वहीं देश की पूरी जनसंख्या को पेट भरने के लिए अनाज भी मिलता है, उसके बारे में सरकार चाहती है कि आर्थिक विकास में उस खेती का हिस्सा 12 प्रतिशत से ज्यादा नहीं रखना है।
खेती का योगदान उत्पादन में आज 17 प्रतिशत ही रह गया है। अब सरकार किसानों को ज्यादा रियायत नहीं देना चाहती है, सरकार का खजाना तो केवल पूंजीवादी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए खुला है, किसान को अब सरकार कर्ज देकर कर्जदार बना रही है। हर साल ढाई से तीन लाख करोड़ रुपए का कर्ज किसानों को दिया जा रहा है। वर्ष 2008 में पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत में भी हल्ला मचा कि बचो, मंदी आ गई!! सरकार ने संवेदनशीलता दिखाई और पचास हजार करोड़ का बेलआऊट पैकेज जारी कर दिया। सवाल यह है कि यह नकद रियायत किसे दी गई? खेती के लिए कोई बेलआऊट पैकेज जारी नहीं हुआ।
आज 65 प्रतिशत किसान (छोटे और मंझोले) खेती से डरने लगे हैं। वे देख रहे हैं कि उनकी जमीनों को छीनने के लिए ऐसी नीतियां-कानून बनाए जा रहे हैं जिनसे अत्याचार, जमीन से बेदखली, जबरिया विस्थापन सब कुछ कानूनी हो जाएगा। अदालतें तो कानून की वही किताब पढ़ती हैं जो अब ऐसी संसद बनाती है जिसमें दो तिहाई सांसद करोड़पति हैं। पिछले तीन सालों में मध्यप्रदेश में चार किसान इसलिए मार दिए गए क्योंकि वे अपनी जमीनें नहीं छोड़ना चाहते थे। मानव अधिकारों के संरक्षण में न्यायिक व्यवस्था की बेहद अहम् भूमिका है।
हमें यह मानना ही पड़ेगा कि मानव अधिकारों का रूप-स्वरूप हर संदर्भ में एक जैसा नहीं है। कुपोषित बच्चे के लिए पोषण और स्वास्थ्य का अधिकार सबसे मौलिक अधिकार है, जबकि आदिवासी के लिए प्राकृतिक संसाधन का अधिकार अहम् है। एक युवती के लिए हिंसा और छेड़छाड़ से मुक्ति एक बेहद अहम् अधिकार है। जो बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं उन्हें केवल ढांचा नहीं बल्कि गुणवत्तापूर्ण समान शिक्षा, समानता, सम्मान और सहज व्यवहार का अधिकार है। संकट यह भी है कि मौजूदा विकास की दृष्टिकोण अब भी ढांचागत और आर्थिक विकास को ही पूरा विकास मानता है।
संयुक्त राष्ट्र संघ में मानवाधिकारों पर दिए गए अपने शपथ पत्र में सरकार कहती है कि भारत में मानवाधिकारों के संरक्षण की एक परम्परा रही है। यहां हर व्यक्ति अपनी बात कह सकता है, सूचना के अधिकार के तहत सरकार से सवाल पूछ सकता है, रोजगार गारंटी कानून के तहत उन्हें रोजगार का कानूनी हक मिला हुआ है।
परंतु सरकार यह बताना भूल जाती है कि सूचना के अधिकार के कानून में संशोधन लाकर क्या वह अपनी उस गलती को सुधारना चाहती है जिनसे व्यवस्था के चरित्र में बदलाव आ सकता है? रोजगार गारंटी कानून में मध्यप्रदेश में 55 लाख लोगों को रोजगार देने में 9000 करोड़ रुपए खर्च करने का दावा किया जा रहा है। (परंतु भोजन का अधिकार अभियान के) ताजा अध्ययन से पता चलता है कि एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे रोजगार के अधिकार के कानून के मुताबिक 15 दिन में रोजगार मिला हो, मजदूरी करने के बाद 7 दिन में मजदूरी मिली हो या देरी से मजदूरी मिलने पर मुआवजा मिला हो। पिछले 8 सालों में से 6 साल तक सूखे की मार से कराहते, बुंदेलखण्ड में रोजगार, भोजन, स्वास्थ्य और यहां तक कि पानी तक को मानवाधिकार या नागरिक अधिकार नहीं माना गया। सरकार के लिए ये तात्कालिक चिंता के विषय हैं, संवैधानिक जवाबदेहिता के नहीं। बच्चों के पोषण के अधिकार का मतलब महिला और बाल विकास विभाग के लिए महज इतना सा है कि 150 ग्राम पंजीरी के लिए आबंटित धन खर्च हुआ या नहीं!!
मध्यप्रदेश के एक जिले के कलेक्टर ने तो यहां तक कह दिया कि पलायन तो फायदे का सौदा है, मैं भी तो आंध्रप्रदेश से यहां आया हूं और जहां तक रोजगार गारंटी कानून की बात है तो इसमें तो मांगने पर ही काम मिलता है। लोग मांगेंगे तो हम दे देंगे।
भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे और सबसे ज्यादा भूख के साथ सोने वाले लोग रहते हैं। यदि हम भुखमरी के एक चरम पर हैं तो वहीं दूसरी ओर भारत में ही 100 परिवार ऐसे हैं जो देश के 25 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद पर नियंत्रण रखते हैं। उनके पास 276 अरब डॉलर की सम्पत्ति है। हमें समझना होगा कि गरीबी धन की कमी से नहीं बल्कि संसाधनों पर सीमित और खत्म होते अधिकारों से बढ़ रही है। पिछले साल मंदी के बावजूद भारत में खरबपतियों की संख्या 27 से बढ़कर 52 हो गई पर जिनके अधिकार छिने, उनकी संख्या भी 66 करोड़ से बढ़कर 72 करोड़ हो गई। यह इस देश में असमानता और अधिकारों के हनन का सबसे बड़ा सबूत है।
जनसंघर्ष का अब मतलब हो गया है सरकार, सत्ता, व्यवस्था के खिलाफ होना। सत्ता अब पक्षपाती हो गई है और वह उस पूंजी का पक्ष ले रही है जिसके होठों पर अधिकारों के हनन का खून लग चुका है।
दो कारणों से यह मानवाधिकारों पर सबसे बड़े संकट का दौर है। पहला कारण तो यह है कि अब सरकारें नीतियां और कानून के मुखौटे ओढ़कर मानवाधिकार हनन की नैतिकता को सिध्द कर रही हैं तो वहीं दूसरी ओर अधिकारों के हनन की आवाज बुलंद करने वालों को राज्य विरोधी या अपराधी सिध्द करने की जद्दोजहद जारी है।
एक व्यापक प्रचार रणनीति के तहत इन दोनों रणनीतियों को एक साथ जोड़कर समाज के सामने लाया जाता है ताकि भ्रम पैदा हो। यही कारण है कि आज किसान और मजदूर दोनों संकट में हैं पर सत्ता ने उनमें ऐसी फूट डाली कि दोनों अपनी लड़ाई अलग-अलग लड़ रहे हैं। मध्यवर्ग महंगाई का रोना जरूर रोएगी। परंतु खेती-किसानी के संघर्ष में साथ खड़े होने में उसे शर्म आती है। वह शहर में बढ़ती भीड़ को देखकर उन्हें कोसता है जो गांव छोड़कर शहर में नई झुग्गियां पैदा कर रहे हैं। पर यही शहर उन नीतियों के खिलाफ गांव के पक्ष में खड़ा नहीं होता है जिनसे विस्थापन और पलायन हो रहा है। संघर्ष करने वाले संगठन अब संगठित अपराध करने वाले संगठन माने जाने लगे हैं। इतना ही नहीं इन संगठनों के साथ खड़े होने वाले गरीब और वंचित समुदायों को भी मानवाधिकारों के संघर्ष के साथ खड़े होने की बड़ी सजाएं भुगतना पड़ती है। उनके मुंह पर बंदूकों के बट मारे जाते हैं, औरतों के साथ बलात्कार होता है, बच्चों को विकलांग कर दिया जाता है, घर-खेत जला दिए जाते हैं और फिर झूठे कानूनी मामलों में फंसा दिया जाता है।
अब इन प्रताड़नाओं के खिलाफ मुख्यधारा का मीडिया भी खडा नहीं होता है, बल्कि जो कोई भी इस संघर्ष के सच को सामने लाने की संवेदनशील मंशा रखता है और जो आदिवासियों, कुपोषण या स्त्री अधिकार की पैरवी करता है उसे मुख्यधारा से बेदखल कर दिया जाता है या वैकल्पिक मीडिया मान लिया जाता है।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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