हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बदलते बिहार का वितंडा

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/29/2009 08:00:00 PM


अरविंद शेष

यह अनायास नहीं है कि परिवारवाद से बचे हुए एक और 'विकास पुरुष' नरेंद्र मोदी इस देद्गा के दूसरे 'विकास पुरुष' की पीठ थपथपाते हैं.

राजनीतिक सत्ता सामाजिक बदलाव का एक औजार जरूर है, लेकिन क्या यह व्यक्तियों को सत्ता में बदल देने का भी औजार है? इसे हमारे देश के तमाम राजनेताओं ने साबित किया है कि सत्तातंत्र की लगाम हाथ लगते ही उनकी दिशा अपने स्वार्थों और नफे-नुकसान के हिसाब से तय होने लगती है. बिहार में लालू प्रसाद के 'ध्वंस-युग' के बाद संपूर्ण क्रांति की ही जमीन पर उगे नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार के लगभग चार साल में सामाजिक विकास या शैक्षिक सुधार के सवाल पर बने तमाम आयोगों का जिस तरह इस्तेमाल हुआ या उनका जो हश्र हुआ, उसे देखते हुए भुमि सुधार आयोग की सिफारिशों के खारिज किये जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए. सत्ता में आते ही अमीरदास आयोग को भंग करने के बाद यह दूसरी बार है जब नीतीश कुमार ने खुले तौर पर यह बताने की कोशिष की है कि उनकी सामाजिक विकास दृष्टि और राजनीति असल में क्या है.
यों, बिहार में मीडिया का जो सामाजिक और वर्गीय चरित्र रहा है, उसमें पिछले तीन-चार साल में सत्ता द्वारा किया गया मीडिया प्रबंधन उसके लिए शायद बिन मांगी मुराद जैसा रहा है.
नीतीश कुमार ने 'बदल गया बिहार' के सुर वाले नारे को 'सूचना' के रूप में पेश किया और महज सूचक बनकर समूचे मीडिया जगत ने इसे देश-समाज के सामने परोस दिया. कुछ समय पहले राज्य में हुए विधानसभा के उपचुनाव भी इसी 'बदल गया बिहार' के शोर के बीच लड़े गये थे. लोकसभा चुनावों के नतीजों से अति उत्साह में आये नीतीश कुमार ने इन उपचुनावों को जिस तरह अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल घोषित कर दिया था, उसने स्वाभाविक रूप से इस बात के विश्लेषण का मौका दिया कि महज तीन महीने में मतदाता का मन-मिजाज क्यों बदला.
'विकास वोट के लिए कोई मुद्दा नहीं है' - यह वह शिगूफा है, जो शायद कभी लालू प्रसाद की जुबान से फिसला था. तो बिहार में मौजूदा विकास-राग के दौर में क्या लालू प्रसाद के उस जुमले को अपने असर के साथ लौटने में महज तीन महीने लगे? क्या कारण है कि 'शाइनिंग इंडिया' और 'फील गुड' की तर्ज पर 'बदल गया बिहार' का प्रचार उपचुनावों में कारगर नहीं रहा? कुछ विश्लेषकों की निगाह में भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट और उसे लागू करने की अफवाह से नीतीश सरकार ने मतदाताओं को डरा दिया कि वह जमीन पर जोतदारों को हक देने जा रही है! इस निष्कर्ष को सामने रखने वाले लोग दरअसल नीतीश कुमार को यह बताना चाहते थे कि अगर राज्य के भूपतियों यानी जमींदारों को छेड़ा गया तो उसके नतीजे ऐसे ही होंगे.
आजादी के बावजूद एक ढाचे के तौर पर सामाजिक सामंतवाद ने हमारे देश में लगातार अपना दबाव बनाए रखा है. बिहार में लालू-युग को हम उस ढाचे को तोड़ने, या फिर कुछ सामजिक वर्गों के उसमें घुसपैठ करने के रूप में देख सकते हैं. इसी दौर में देश में नवउदारवादी पूंजीवाद के उभार की पृष्ठभूमि में बिहार में पूंजीवादी सामंतवाद की स्थितियां पैदा हुईं. नीतीश कुमार के लिए यह एक मौका था. लेकिन उन्होंने सामाजिक सामंतवाद के घोड़े का सवार बनना ज्यादा पसंद किया.
अमीरदास आयोग या बंद्योपाध्याय समिति की सिफारिशों का हश्र तो महज कुछ नमूने हैं. भौतिक विकास के पर्याय के रूप में सड़क, अपराध-भ्रष्टाचार से मुक्ति, सामाजिक विकास के लिए अति पिछड़ों और महादलितों के लिए विशेष घोषणाएं और परिवारवाद से कथित 'लड़ाई' - ये ऐसे मुद्दे रहे हैं, जो पिछले तीन-चार साल से कुछ लोगों को रिक्षाते रहे हैं. मगर थोड़ा करीब जाते ही यह साफ हो जाता है कि इन कुछ प्रचार-सूत्रों को किस तरह हकीकत को ढकने या उसे दफन कर देने का औजार बनाया गया है! इसी दौर में एक और महत्वपूर्ण 'मिशन' जारी है, जिसमें सामाजिक यथास्थितिवाद पर हमला करने वाले किसी भी सोच को बड़े करीने से किनारे लगाया जा रहा है. करीब दो महीने पहले पटना में 'बिहार की ब्रांडिंग में मीडिया की भूमिका' विषय पर गोष्ठी हुई थी. यह प्रसंग दिलचस्प इसलिए है कि क्या मीडिया का काम किसी राज्य की 'ब्रांडिंग' करना है, या फिर उसकी प्राथमिकताओं में 'जनता' की जगह 'राज्य' आ गया है. यों बिहार में नीतीश कुमार के सत्ता संभालने और 'तीन महीने में सब कुछ ठीक कर देने' की मुनादी के कुछ ही समय बाद से मीडिया को सब कुछ 'गुडी-गुडी' दिखायी देने लगा था. तो क्या यह सचमुच सब कुछ ठीक हो जाने का संकेत था, या खुली आंखों पर एक ऐसा चश्मा चढ़ जाना था जिसके पार वही दिखायी देता है जो हम देखना चाहते हैं?
'अपराधियों के आतंक से मुक्त बिहार' के प्रचार में मशगूल मीडिया के लिए खुद बिहार सरकार की ओर से विधानसभा में पेश आंकड़े अगर कोई मायने नहीं रखते तो इसका कारण समझना बहुत मुश्किल नहीं है. इसी जुलाई में विपक्ष की ओर से घेरे जाने के बाद बाकायदा विधानसभा में अपराध के आंकड़े सामने रखते हुए सरकार ने कहा कि अकेले 2008 में केवल महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार के 4415 मामले दर्ज किये गये, जिसमें 1028 मामले बलात्कार और दुष्कर्म के और 902 मामले अपहरण के थे. इसके अलावा जनवरी से जून तक 1571 हत्याएं, 37 फिरौती वसूलने, 346 डकैती, राहजनी की 80, लूट की 395 और बैंक लूट की एक घटना थाने में दर्ज की गयी.
ये सरकारी आंकड़े हैं. सबको मालूम है कि अत्याचार के कौन-कौन से रूप हमारे बीच मौजूद हैं, और जितने होते हैं उनमें से कितने मामले पुलिस थानों में दर्ज करवाये जाते हैं. बहरहाल, एक विधायक का कहना था कि सरकार कहती है कि बैंक लूट की केवल एक घटना हुई, जबकि सच्चाई यह है कि इस दौरान बैंक लूट की चौरासी वारदातें हुईं. इसके सबूत हैं. अब बाकी आंकड़ों के साथ-साथ कुछ समय पहले खगड़िया जनसंहार इस तरह के प्रचार की सच्चाई का अंदाजा लगाने के लिए काफी है कि 'बिहार में आज अपराधी घबराता है कोई हरकत करने से.' जहां तक बड़े अपराधियों को काबू में करने का सवाल है मामला सिर्फ 'अपने' और 'दूसरों' के पक्ष का है.
इसके उलट यह जरूर हुआ है कि बिहार में अपनी मांगों को लेकर पिछले तीन-चार सालों में आंदोलन करने वाले किसी भी वर्ग या समूह की शामत आ गयी है. विरोध प्रदर्शनों को लाठियों, पानी के फव्वारों या गोली के सहारे कुचल देना नीतीश सरकार की खासियत बन चुकी है. पुलिस शिक्षकों से लेकर 'आशा' की महिला कार्यकर्ताओं तक पर पूरी ताकत से लाठियां बरसाती है. लेकिन यह सुशासनी लाठी 'विकास' की नयी ऊंचाइयों की ओर अग्रसर भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं चलती.
तमाम दावों के उलट व्यवहार में भ्रष्टाचार की कितनी नयी परतें तैयार हुईं हैं, इस सच का अंदाजा पंचायत से लेकर प्रखंड और जिला स्तरीय कार्यालयों और पुलिस थानों की गतिविधियों को देख कर ही लगाया जा सकता है. स्कूलों से लेकर आंगनवाड़ी केंद्रों तक का जिला अधिकारी या वरिष्ठ अधिकारियों के औचक निरीक्षण का मतलब कितना ड्यूटी सुनिश्चित करना है और कितना कमाई करना, इसे नजदीक से देखे बिना समझना मुद्गिकल है.
विकास के लिए बुनियादी ढांचे के रूप में अच्छी सड़कों का होना अनिवार्य है. लेकिन 'विकास दिखाई दे' - इसके लिए भी सड़कों का होना जरूरी होता है. और यह कोई छिपी बात नहीं है कि सड़क निर्माण उन कामों में अव्वल है, जिसमें सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार होता है. तो कुल बजट का 30 फीसदी सड़कों को समर्पित किये जाने का मतलब समझना कोई मुद्गिकल काम नहीं है.
यों भी, अगर सरकार सड़कें बनवाने पर खास जोर दे रही है तो यह राज्य के नागरिकों पर मेहरबानी किस तरह है? दूसरे, राज्य उच्च पथों जैसे राज्य के अधीन कुछ को छोड़ कर बाकी सड़कों के मामले में राज्य सरकार की भूमिका महज कार्य कराने तक सीमित है. जबकि राष्ट्रीय उच्च पथों और ग्रामीण इलाकों की सड़कों के निर्माण और विकास के लिए केंद्र सरकार सीधे तौर पर वित्तीय सहायता देती है. इसके अलावा घोषित और प्रचारित दावों के विपरीत राज्य में काफी कम सड़कें बनीं हैं, और जो बनी भी हैं वे काफी घटिया स्तर की हैं. ज्यादातर सड़कों पर कोलतार की परत चढ़ा कर उन्हें देखने में सुहाने लायक बना दिया गया, जिसकी उम्र दो से चार महीने से ज्यादा की नहीं होती. इस बार की बरसात गुजरने के बाद बहुत सारी सड़कों की दशा देखी जा सकती है.
परिवारवाद के 'सिंड्रोम' से नीतीश के बचे होने के वितंडे के बीच इस प्रहसन की खबर पर गौर करना रोचक होगा कि केंद्र सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत बिहार में लोगों को जो जॉब कार्ड बांटे जा रहे हैं उन पर नीतीश कुमार की फोटो छापी गयी है. परिवारवाद का समर्थन करना लोकतंत्र के रास्ते में बाधा खड़ी करना है. लेकिन यहीं यह देखना भी जरूरी है कि किसी व्यक्ति की राजनीति देश और समाज को किस दिशा में ले जा रही है. लोहिया और जेपी के सपनों की जमीन पर खड़े नीतीश कुमार को दिल्ली में मंत्री या बिहार में मुखयमंत्री बनने के लिए बाबरी मस्जिद ढहाने वाली भाजपा का हाथ थामने में कोई दिक्कत नहीं महसूस हुई. तब भी जब गुजरात दंगों का अध्याय उसके साथ जुड़ गया. यह अनायास नहीं है कि परिवारवाद से बचे हुए एक और 'विकास पुरुष' नरेंद्र मोदी इस देश के दूसरे 'विकास पुरुष' नीतीश कुमार की पीठ थपथपाते हैं.
इतिहास के कुछ पन्नों को शायद इसलिए नहीं भूला जा सकता क्योंकि न्याय सुनिश्चित होने तक उन्हें भूलना भी नहीं चाहिए. राजनीति की अपनी मजबूरियां हो सकती हैं. लेकिन सवाल है कि इसकी कीमत क्या हो. प्रचार की सड़क पर सरपट दौड़ते नीतीश कुमार ने 'सुशासन बाबू' का तमगा तो लटका लिया है, लेकिन आरएसएस और भाजपा के सहारे राजनीति की जमीन तलाशती उनकी सरकार ने समाज को बदल सकने वाले सोच को हर स्तर पर कुंठित किया है. यह ध्यान रखना चाहिए कि समाज को बदलने के लिए सड़कों के मुकाबले सोच की ज्यादा जरूरत होती है.
पुस्तिका सुशासन का असली चेहरा से साभार

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ बदलते बिहार का वितंडा ”

  2. By परमजीत बाली on December 30, 2009 at 9:04 PM

    बढ़िया प्रस्तुति।अच्छा आलेख है। आभार।

  3. By Satyajeetprakash on December 30, 2009 at 9:35 PM

    कुल मिलाकर आप लालू राज से खुश रहने वालों की श्रेणी में हैं.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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