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बीच सफ़हे की लड़ाई

आयातों के भरोसे मत छोड़िए खाद्य सुरक्षा

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/15/2009 05:00:00 AM

डॉ. भरत झुनझुनवाला


प्रतीत होता है कि सरकार ने महंगाई नियंत्रण के उद्देश्य से खाद्यान्न के आयातों का सहारा लेने का निर्णय लिया है। गन्ने के मूल्य को पूर्व में राय सरकारों द्वारा 160-180 रुपए प्रति क्विंटल पर निर्धारित किया जाता रहा है। इस व्यवस्था को समाप्त करके इस वर्ष केन्द्र सरकार ने 130 रुपए का मूल्य निर्धारित किया है। गेहूं के मूल्य में केवल 20 रुपए की सांकेतिक वृध्दि की गई है, जो कि पूर्व के 180-100 रुपए की तुलना में कम है।
महंगाई के प्रभाव की गणना की जाए तो 20 रुपए की वृध्दि वास्तव में मूल्य में कटौती को दर्शाती है। कृषि मंत्री शरद पवार ने मूल्य नियंत्रण के लिए खाद्य पदार्थों के आयात के संकेत दिए हैं। सरकार की सोच है कि जब विश्व बाजार में सस्ते खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं तो घरेलू किसानों को ऊंचे मूल्य देने का कोई औचित्य नहीं है। आयातों के दबाव में घरेलू किसानों को भी सस्ता उत्पादन करना होगा जो दीर्घकाल में देश के लिए हितकारी होगा- जैसे सस्ते खाद्य तेल के आयात के कारण आंध्र प्रदेश के किसानों ने पाम ऑयल की खेती शुरू कर दी है।
परन्तु विचारणीय प्रश्न यह है कि अमीर देश खाद्य पदार्थों के सस्ते आयात को प्रोत्साहन क्यों नहीं देते हैं? अमीर देशों द्वारा अपने किसानों को सब्सिडी दी जाती है। किसानों को प्रोत्साहन दिया जाता है कि वे गेहूं आदि का उत्पादन बनाए रखें।
अमरीका में गेहूं के उत्पादन की लागत लगभग 20 रुपए प्रति किलो पड़ती है, परन्तु सरकार द्वारा सब्सिडी दिए जाने के कारण बाजार भाव न्यून रहता है। विश्व बाजार में उपलब्ध सस्ते गेहूं का आयात करने के स्थान पर अमरीकी सरकार महंगे घरेलू उत्पादन पर सब्सिडी देकर निर्यात कर रही है। कारण यह है कि अमरीका अपनी खाद्य सुरक्षा को विश्व बाजार के हवाले छोड़ना नहीं चाहते हैं। खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए जरूरत से यादा उत्पादन किया जाता है और अधिक मात्रा को निर्यात कर दिया जाता है। वास्तव में अमरीका ने सस्ता खाद्यान्न सप्लाई करके दूसरे देशों को अमरीका पर निर्भर रहने की नीति बनाई है।
भारत और अमरीका की सरकार में विचित्र तालमेल दिखाई पड़ रहा है। भारत सस्ता गेहूं आयात करने और अमरीका सस्ता गेहूं निर्यात करने को उद्यत है। प्रश्न यह उठता है कि आस्ट्रेलिया जैसे दूसरे देशों से अमरीका सस्ता गेहूं क्यों नहीं आयात करना चाहता? कारण स्पष्ट है। अमरीका की दृष्टि में खाद्यान्न सुरक्षा यादा महत्वपूर्ण है और सस्ता गेहूं तुलना में गौण है। तब प्रश्न उठता है कि क्या भारत के लिए खाद्य सुरक्षा महत्वपूर्ण नहीं है? भारत सरकार द्वारा इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया जाता है। दबी जुबान से कहा जाता है कि विश्व बाजार के माध्यम से देश की खाद्य सुरक्षा स्थापित कर ली जाएगी। यदि भारत में गेहूं का उत्पादन कम होगा तो हम आस्ट्रेलिया अथवा अमरीका से आयात कर लेंगे। यानि हमारी सरकार अपने देश की जनता की जीविका को विश्व बाजार के हवाले कर रही है। यही कारण है कि गन्ने और गेहूं के दाम को न्यून रखा गया है। भारत की ब्रिटिश सरकार ने मेनचेस्टर के पावरलूम के सस्ते कपड़े आयात करके देश को इंग्लैण्ड पर आश्रित बनाया था। इसी प्रकार स्वतंत्र भारत की यूपीए सरकार देश को अमरीका पर खाद्यान्नों के लिए परावलम्बी बना रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वतंत्र भारत की सरकार का संचालन व्हाइट हाउस से हो रहा है, उसी प्रकार जैसे ब्रिटिश भारत का वेस्टमिन्सटर से होता था।
भारत सरकार का दावा है कि सस्ते आयातों से खाद्य पदार्थों के दाम न्यून रहेंगे और जनहित हासिल होगा। यह तर्क प्रभावी है, किन्तु महंगे दाम के समग्र प्रभाव को देखना होगा। गेहूं के मूल्य अधिक होने से सर्वाधिक लाभ बड़े किसानों को होता है। इस लाभ का एक अंश खेत मजदूर को भी मिलता है। जैसे पिछले वर्ष पंजाब में खेत मजदूरों को 200-300 रुपए की दिहाड़ी इसलिए दी जा सकी क्योंकि गेहूं के मूल्य ऊंचे थे। खाद्यान्न के ऊंचे मूल्य ग्रामीण गरीब के लिए मिश्रित सौदा है। एक ओर उसे महंगा अनाज खरीदना होता है, दूसरी तरफ उसके वेतन में वृध्दि होती है। कांटा बराबर रहता है।
शहरी गरीब पर महंगे खाद्यान्न का प्रभाव यादा पेचीदा है। इन्हें महंगा गेहूं खरीदना पड़ता है परन्तु साथ-साथ इनकी आय में भी वृध्दि होती है। ग्रामीण और शहरी वेतन में अंतरंग सम्बन्ध होता है। देश के तमाम क्षेत्रों से मजदूर दिल्ली, मुम्बई एवं कोलकाता जैसे महानगरों को रोजगार के लिए पलायन करते हैं। ये मजदूर गणना करते हैं कि अपने गांव में भूमिधर के पास काम करने से आय यादा होगी या दिल्ली पलायन करने से? गेहूं के मूल्य में वृध्दि से यदि बिहार में मजदूरी बढ़ती है तो दिल्ली को पलायन कम होगा, दिल्ली में मजदूरों की सप्लाई कम होगी और दिल्ली में भी मजदूरी बढ़ेगी। देश का ग्रामीण और शहरी श्रम बाजार आपस में जुड़ा हुआ है। यदि ग्रामीण इलाकों में मजदूरी बढ़ती है तो शहरों में भी बढ़ेगी। अत: महंगे खाद्यान्नों का शहरी गरीबों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। उन्हें महंगा अनाज खरीदना होगा किन्तु वेतन भी बढ़ेंगे। गांव से शहर को पलायन जारी रहना इस बात का प्रमाण है महंगाई के बावजूद शहरों में गरीब के लिए जीविकोर्पाजन करना सुगम है। अत: खाद्यान्न के ऊंचे मूल्य को लेकर गरीब के लिए चिन्तित नहीं होना चाहिए। यह भी याद रखें कि कृषि पदार्थों के ऊंचे मूल्य होने से कृषि उत्पादन में वृध्दि होती है और श्रम की मांग और दिहाड़ी दोनों बढ़ती है। इसके विपरीत कृषि पदार्थों के आयात से घरेलू उत्पादन कम होगा ओर मजदूरों को रोजगार कम मिलेगा। अत: खाद्यान्न के ऊंचे मूल्य गरीब के लिए समग्र रूप से हानिकारक नहीं हैं।
सच यह है कि कृषि पदार्थों की मूल्य वृध्दि से शहरी मध्यम वर्ग को नुकसान होता है। इन्हें महंगा खाद्यान्न खरीदना पड़ता है, परन्तु इनके वेतन में वृध्दि नहीं होती है। ऐसा लगता है कि देश की सरकार मात्र इस वर्ग के हित के लिए ही आर्थिक नीतियां बना रही है। पिछले दिनों सरकारी कर्मचारियों को डी.ए. के अतिरिक्त 40 प्रतिशत की वेतन वृध्दि प्रदान की गई थी। 8000 रुपए प्रतिमाह वेतन पाने वाले कर्मी को 3200 रुपए की वेतन वृध्दि दी गई थी।
8000 की आय में से एक सामान्य परिवार द्वारा खाद्य पदार्थों पर 3000 प्रतिमाह खर्च किया जाता होगा। इन खाद्य पदार्थों के मूल्य में 20 प्रतिशत वृध्दि से परिवार पर 600 रुपए का भार पड़ता है। इस भार से पांच गुना वेतन वृध्दि देने के बावजूद सरकार खाद्य पदार्थों के मूल्य न्यून बनाए रखना चाहती है जिससे सरकारी कर्मचारी नाराज न हो जाएं। मध्यम वर्ग को पोषित करने के लिए सरकार गरीब का उपयोग ढाल के रूप में कर रही है और देश की खाद्य सुरक्षा को दांव पर लगा रही है।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ आयातों के भरोसे मत छोड़िए खाद्य सुरक्षा ”

  2. By परमजीत बाली on December 15, 2009 at 1:07 PM

    अच्छी प्रस्तुति है।काफी जानकारी मिली।आभार।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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