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भूमंडलीकरण के बीस साल : हम एक ब्रेक फेल ट्रेन पर सवार हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/14/2009 05:00:00 AM

डॉ. गिरीश मिश्र


भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर ने बीस वर्ष पूरे कर लिए हैं। इसकी शुरुआत 1989 में हुई जब इसके वैचारिक आधार 'वाशिंटन आम राय' का प्रतिपादन जॉन विलियम्सन ने किया, वैसे उसकी पृष्ठभूमि थैचर और रीगन के सत्तारूढ होने, अर्शशास्त्रियों के शिकागो स्कूल का दबदबा बढने, सेवियत संघ एवं समाजवादी खेमे के अवसान के कारण अमेरिका के एकमात्र महाशक्ति बन जाने तथा गुटनिरपेक्ष आंदोलन के शक्तिहीन होने और आत्मनिर्भर स्वतंत्र अर्थव्यवस्था की बात नवस्वतंत्र देशों में भुलाने के साथ तैयार हो गई थी।
 वाशिंगटन आम राय पर आधारित भूमंडलीकरण में राज्य की आर्थिक भूमिका को न्यूनतम बनाने और निजीकरण पर विशेष जोर दिया था। इस धारणा को रेखांकित किया गया कि राज्य संरक्षणवाद, सब्सीडी और अपने स्वामित्व में उद्यमों की स्थापना द्वारा अर्थव्यवस्था की कार्य कुशलता पर बुरा प्रभाव डालता है। वाशिंगटन आम राय ने विदेशी प्रत्यक्ष एवं संस्थागत निवेश के बेरोक टोक आने-जाने, कम्पनियों को मजदूरों की भर्ती और सेवाशर्तों को बिना सरकारी हस्तक्षेप तय करने तथा मजदूर संगठनों पर अंकुश लगाने पर जोर दिया।
 न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तंभकार थॉमस एल. फ्रीडमैन ने घोषणा की कि भूमंडलीकरण के इस नए दौर में विश्व शासन मजबूत होगी क्योंकि कोक-पेप्सी और पिज्जा हट के पित्जा तथा मैकडोनल्ड के हैमबर्गर का उपभोग बढेग़ा और इनको पीने-खाने वाले आपस में नहीं लड़ेंगे। फ्रांसिस फुकुयामा के अनुसार लोकतंत्र और पूंजीवाद का दबदबा बढने से वर्ग संघर्ष समाप्त हो जाएगा और इस प्रकार कोई मूलभूत सामाजिक-आर्थिक संरचनात्मक बदलाव न होगा यानी इतिहास का अंत हो जाएगा। पूंजीवादी व्यवस्था शाश्वत बन जाएगी। फ्रीडमैन ने अपनी पुस्तक ''द लेक्सस एंड दी ओलिव ट्री'' और फुकुयामा ने अपनी कृति ''दी ऐंड ऑफ हिस्ट्री एंड द लास्ट मैन'' अपने दावों को विस्तार से रखा।  वाशिंगटन आम राय पर आधारित भूमंडलीकरण द्वारा अपनाई गई विश्व दृष्टि के अनुसार बाजार कुशल और स्वचालित होंगे। उनमें कोई भारी उतार-चढाव नहीं होंगे। दूसरे शब्दों में, मंदी और तेजी के लम्बे काल नहीं आएंगे।  अब जरा पीछे भुडक़र देखें कि क्या वास्तविकता रही है। जहां तक आर्थिक संवृध्दि की रफ्तार का प्रश्न है भूमंडलीकरण के वर्चस्व के पहले विश्व अर्थव्यवस्था की संवृध्दि दर 4.8 प्रतिशत थी जब कि उसके बाद 3.2 प्रतिशत रही है। इसके परिणामस्वरूप वाशिंगटन आम राय को अपनाए जाने के पहले प्रतिव्यक्ति आय की बढाेतरी की ओसत दर फ्रांस, जर्मनी और जापान में क्रमश: 4 प्रतिशत हो गई। ब्रिटेन क्रमश: 1.6 प्रतिशत, 1.8 प्रतिशत और 2 प्रतिशत से घट कर 2.1 प्रतिशत और अमेरिका में 2.2 प्रतिशत से गिरकर 1.9 प्रतिशत हो गई।  वाशिंगटन आम राय में रोजगार के अवसर बढाने पर प्रत्यक्षत: कोई जोर नहीं है जबकि उसके पहले उसको प्रमुखता दी गई थी। वाशिंगटन आम राय के अपनाए जाने के पहले केंसवादी आर्थिक चिंतन का काफी कुछ दबदबा था। इस कारण राज्य बेरोजगारी कम करने पर जोर देते हुए उपयुक्त नीतियां अपनाता और सक्रिय हस्तक्षेप करता था। याद रहे कि द्वितीय विश्व युध्द के समाप्त होने से वाशिंगटन आम राय अपनाए जाने के पहले ब्रिटेन में औसतन 1.6 प्रतिशत श्रमशक्ति बेरोजगार थी फ्रांस में बेरोजगारी की दर 1.2 प्रतिशत, जर्मनी में 3.1 प्रतिशत और अमेरिका में 4.8 प्रतिशत रही। वाशिंगटन आम राय पर आधारित भूमंडलीकरण के जमाने में इन सब देशों में बेरोजगारी बढी। बि्रटेन में 7.4 प्रतिशत, जर्मनी में 7.5 प्रतिशत और अमेरिका में 6.1 प्रतिशत पर पहुंच गई। तत्काल अमेरिका में वह 10 से लेकर 17 प्रतिशत के बीच विभिन्न परिकलन विधियों द्वारा अलग-अलग बतलाई गई है।  दो अमेरिकी अर्थशास्त्रियों ने विश्वबैंक के लिए एक शोध पत्र 1 नवम्बर 3184 वर्ष 2004 में तैयार किया जिसके अनुसार अर्थव्यवस्था में पहले की अपेक्षा कही अधिक अस्थिरता आई है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया है कि इस अस्थिरता का आर्थिक संवृध्दि पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है।
एक अन्य मार्के की बात यह है कि भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में समाज के अंतर्गत आर्थिक विषमता बढी है और भारत जैसे देश में क्षेत्रीय असमानताओं में भी भारी इजाफा हुआ है। याद रहे कि वाशिंगटन आमराय से अनुप्राणित आर्थिक नीतियों एवं सुधार कार्यक्रमों के पहले मिश्रित अर्थव्यवस्था के युग में सामाजिक-आर्थिक विषमताओं तथा क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने पर जोर रहता था। नेहरू-इंदिरा गांधी युग में योजनाएं रोजगार के अवसरों को बढाने तथा पिछडे ऌलाकों में उद्योग धंधे स्थापित करने पर जोर देती थी। आज स्थिति भिन्न है। बाजार की शक्तियों को सर्वोच्च मानकर चलने के कारण धनी-गरीब के बीच की खाई बढ रही है। फोर्ब्स पत्रिका द्वारा प्रकाशित अरबपतियों की सूची में भारतीयों की संख्या बढ रही है तो साथ ही अर्जुनसेन गुप्ता समिति के अनुसार दरिद्रों की जमात का भी विस्तार हो रहा है जहां 20 रुपए या उससे कम पर गुजर-बसर करने की मजबूरी है। भारत के पश्चिमी तथा दक्षिणी राज्यों के मुकाबले अन्य राज्य पिछडते जा रहे हैं। इधर विश्व बैंक और भारत सरकार ने समावेशी आर्थिक संवृध्दि का नारा दिया है। इससे तात्पर्य है कि ट्रिकल डाउन प्रभाव का दायरा बढाया जाए जिससे बढती हुई आय का कुछ हिस्सा टपक कर निम्नवर्गीय लोगों को झोली में जाए जिससे असंतोष न बढे। ऌसका यह कतई मतलब  नहीं है कि विषमता को मिटाना एजेंडे पर है। प्रख्यात अमेरिकी अर्थशास्त्री दिवंगत जॉन केन्नेथगाल के पुत्र जेम्स गालब्रेथ द्वारा प्रकाशित अध्ययन के अनुसार विकसित देशों में डेनमार्क को छोड सर्वत्र आर्थिक विषमता बढी है। विकासशील देशों में भी यही हाल है।
जहां तक पूरी दुनिया का प्रश्न है, वाशिंगटन आम राय के जमाने में दक्षिण अमेरिकी देशों को छोडक़र सभी जगह आर्थिक विषमता बढ रही है। जेम्स गालब्रेथ के अनुसार दक्षिणी अमेरिकी देश अपवाद हैं क्योंकि उन्होंने नवउदारवादी वाशिंगटन आमराय को अलविदा कहा है। चिली, वेनेजुएला, ब्राजील, अर्जेंटिना आदि ने अपना अलग रास्ता चुना है। उनका मानना है कि आर्थिक विषमता आपराधिक प्रवृत्तियों और राजनीतिक अस्थिरता को जन्म देती और बढाती है।
 वर्तमान भूमंडलीकरण के समर्थकों के इस दावे को वास्तविकता ने बडा गहरा झटका दिया है कि आर्थिक गतिविधियों में कोई विशेष उतार-चढाव नहीं आएगा और वे सुचारू रूप से चलती रहेंगी। अमेरिका के एक बडे अर्थशास्त्री रॉबर्ट लुकास ने अमेरिकन इकोनॉमिक एसोसिएशन के अध्यक्षपद से भाषण करते हुए 10 जून 2003 को दावा किया कि वे दिन लद गए जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था उतार-चढाव या मंदी-तेजी के संकट से त्रस्त होती थी। मंदी से उसने निजात पा लिया है और अब निरंतर ऊपर ही चढती जाएगी। उन्होंने रियल बिजनेस साइकिल थ्योरी वास्तविक व्यापार चक्र का सिध्दांत प्रतिपादित किया जिसमें मंदी से स्थायी मुक्ति को विस्तार से बतलाया गया था। इस दावे को वास्तविक घटनाओं ने जल्द  ही झुठला दिया। वाशिंगटन आम राय पर आधारित भूमंडलीकरण के दौर में एक नहीं, पांच बार मंदी आई है। तत्काल विश्व जिस मंदी की चपेट में है वह 1930 के दशक की महामंदी के बाद सबसे भयानक है और वह कब जाएगी, कहना मुश्किल है। तमाम कर्णप्रिय समाचारों के बाद भी जिम्मेदार अर्थशास्त्री निश्चित रूप से कुछ भी कहने को तैयार नहीं हैं। केंस के जीवन और चिंतन संबंधी आधिकारिकविद्वान प्रो. रॉबर्ट स्किडेलस्की ने अभी कुछ हप्तों पहले प्रकाशित अपनी पुस्तक केस-द रिटर्न ऑफ द मास्टर में वाशिंगटन आमराय को मंदी की बारम्बरता बढने तथा तत्कालीन मंदी के लंबा खींचने के लिए जिम्मेदार माना है।
 लॉर्ड स्किडेलस्की ने रेखांकित किया है कि अगर केंस जिंदा होते तो वे कभी वर्तमान भूमंडलीकरण को स्वीकार नहीं करते। केंस विदेशी पूंजी के निर्बाध प्रवाह के विरोधी थे। वे भारत जैसे देश में विदेशियों द्वारा हमारी राष्ट्रीय परिसपंत्तियों पर कब्जा जमाने को ठीक नहीं मानते थे। हमारे द्वारा देशी निवेश और बचत पर निर्भरता कहीं अधिक श्रेयस्कर होती क्याेंकि राजनीतिक दृष्टि से कम जोखिम भरी होती। विश्वास न हो तो उपर्युक्त पुस्तक के पृष्ठ 185 को देख सकते हैं। आज जरूरत नेहरूवादी नीतियों को गाली देने वाले केंस के विचारों के आइने में अपना चेहरा देखने की है।
 यह अनायास नहीं था कि विगत अप्रैल में लंदन में आयोजित जी-20 के देशों ने वाशिंगटन आम राय के चिंतन को ठुकरा दिया और राज्य की सक्रिय आर्थिक भूमिका पर जोर दिया (देखें देशबन्धु 10 अप्रैल)। जहां तक फ्रीडमैन के इस दावे का सवाल है कि कोक पेप्सी पित्जा और हैमबर्गर का सेवन करने वाले आपस में नहीं लडेग़े, वह कब को कूडादान में चला गया है। इराक, कुवैत युध्द, सर्विया और अमेरिका, बोसनिया की घटनाओं, कारगिल की लडाई, अमेरिका में 9-11 हमलों, इराक और अफगानिस्तान पर अमेरिकी आक्रमण, आतंकवादी घटनाओं की बारम्बारता में वृध्दि, हर जगह बढती असुरक्षा तथा ग्यारह महीने पूर्व मुम्बई पर आंतकवादी हमलों आदि  ने साबित कर दिया है कि वह विवेकहीन, अतिउत्साह में किया गया दावा है। फ्रिडमैन ने अपने गलत दावे के लिए माफी नहीं मांगी है मगर फ्रांसिस फुकुयामा ने अपने द्वारा रचित इतिहास के अंत के दावे को भूल मान लिया है। आज जरूरत है कि हम भूमंडलीकरण और उसके वैचारिक आधार की पुनर्समीक्षा करें और देखें कि क्या वे प्रासंगिक रह गए हैं। पश्चिमी देशों में गंभीर चिंतन हो रहा है मगर हमारे यहां सन्नाटा है। क्यों?

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


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“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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