हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

उग्र उथल-पुथल की तरफ बढ़ता बिहार

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/31/2009 10:33:00 PM

मित्रों, यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन सच है. मोहल्ला लाइव पर कुछ दिनों पहले एक पोस्ट आयी थी, जिसके लेखक के रूप में हेमंत कुमार का नाम दिया गया है. वास्तव में यह लेख हमारे साथी और प्रभात खबर में उप संपादक कुमार अनिल का है, जिनसे 'अपने ब्लॉग पर डालने' के नाम पर हेमंत कुमार ने यह लेख उनसे माँगा था. कल शाम को कुमार अनिल का यह आलेख मुझे मिला तो मुझे हैरत हुई. आज मैं उनसे लेखक का नाम कन्फर्म कर हाशिया पर पोस्ट कर रहा हूँ, इसे दोहराते हुए, कि यह आलेख हेमंत कुमार का नहीं-जो प्रभात खबर में काम करते हैं और समाचार संपादक हैं, बल्कि यह कुमार अनिल का है और जो प्रभात खबर में उप संपादक हैं. इसके साथ यह तथ्य जोड़ना भी ज़रूरी है कि इस लेख को बिहार के किसी हिंदी अख़बार ने छापने का साहस नहीं दिखाया है. हाँ, इसके एक अंश को टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ने छापा है.


राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट दे चुके भूमि सुधार आयोग के चेयरमैन डी बंद्योपाध्याय का मानना है कि बिहार एक उग्र सामाजिक उथल-पुथल की तरफ बढ़ रहा है। बिहार देश के सबसे पिछड़े प्रदेशों में से एक है। कृषि भूमि पर भूस्वामियों के अत्यधिक नियंत्रण के कारण प्रदेश का ग्रामीण हिस्सा घुटन में जी रहा है। बड़े भूस्वामियों की कृषि उत्पादन के विकास में रुचि नहीं है। जो खेती करते हैं, उन बटाईदार किसानों के पास अपनी ज़मीन बहुत कम है। ऐसे में भूमि सुधार की सिफारिशें नकार कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वैधानिक तरीके से उत्पादन संबंधों को व्यवस्थित करने का मौका खो दिया है। अब बिहार में बदलाव उग्र सामाजिक संघर्ष के जरिये ही आएगा।

मुख्यमंत्री के साहस की दाद

बंद्योपाध्याय ने रिपोर्ट को खारिज़ करने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री के साहस की दाद दी है। उन्होंने कहा कि कम-से-कम इसे ठंडे बस्ते में तो नहीं रखा गया। कमीशन ने बिहार की अर्धसामंती बेड़ियों को काटने के मक़सद से सुझाव दिये थे। अब यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह इसे स्वीकार करे या खारिज करे।

हृदय चीर देनेवाला चित्र

देश की प्रतिष्ठित पत्रिका इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में लिखे अपने लेख में बंद्योपाध्याय ने कहा है कि ग्रामीण बिहार की अर्थव्यवस्था हृदय को चीर देनेवाली है। 1991 में ग्रामीण मजदूरों का 89.3 फ़ीसदी हिस्सा कृषि क्षेत्र में कार्यरत था। 2001 में यह घट कर 81.1 फ़ीसदी रह गया। 1991 में इसमें 43.4 फ़ीसदी खेतिहर भी थे। 2001 में ये घट कर 34.9 फ़ीसदी रह गये। इस बड़े बदलाव के कारणों पर अध्ययन किया जाना बाक़ी है। इसके बावजूद इस श्रम शक्ति का जीडीपी (प्राइमरी सेंटर) में 33.4 फ़ीसदी हिस्सा है। 80 फ़ीसदी श्रम शक्ति के केवल एक तिहाई उत्पादन करने से पता चलता है कि यहां कितनी गरीबी है। दूसरी तरफ केवल 19 फ़ीसदी श्रमशक्ति जीडीपी का 66 फ़ीसदी उत्पादित करती है। यह आर्थिक विषमता को दिखाने के लिए काफी है।

औद्योगिकीकरण मुश्किल

पर कतर दिये गये बिहार में बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण की संभावना बहुत कम है। इस कारण प्रदेश के पास सरप्लस लेबर को खपाने का विकल्प नहीं है। प्राइमरी से सेकेंडरी सेंटर में श्रम शक्ति के ट्रांसफर होने में शिक्षा की कमी एक दूसरा महत्वपूर्ण कारण है। द बिहार इकोनॉमी सर्वे 2008-09 के अनुसार 2001 में जब देश की साक्षरता दर 65.7 फ़ीसदी थी, तब बिहार में यह चिंताजनक रूप से 47 फ़ीसदी पर अटकी थी। महिलाओं में यह 33.6 थी।

भूमि सुधार ही एकमात्र रास्ता

बिहार देश का दूसरा सबसे अधिक ग़रीब प्रदेश है। प्राथमिक क्षेत्र की ग़रीबी दूर करने के लिए राज्य का कोई भी हस्तक्षेप तभी सार्थक होगा, जब वह उत्पादन संबंधों में बदलाव के लिए किया गया हो।

रीढ़ हैं छोटे किसान

नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार कृषियोग्य भूमि रखनेवाले किसानों में छोटे व सीमांत किसान 96.5 फ़ीसदी हैं। इनके पास ज़मीन 66 फ़ीसदी ही है। मध्यम व बड़े किसान केवल 3.5 प्रतिशत हैं, पर वे 33 फ़ीसदी जमीन के मालिक हैं। बड़े किसान केवल 0.1 प्रतिशत हैं। पर ज़मीन उनके पास 4.63 फ़ीसदी (19.76 लाख एकड़) है। यह कृषि संबंध विकास के रास्ते में सबसे बड़ा बाधक है। भूमि सुधार आयोग की सिफारिशें इसी संबंध को बदलने के नेक इरादे से तैयार की गयी थी। बंद्योपाध्याय को पढ़ते हुए आप चर्चित माले नेता विनोद मिश्र को याद कर सकते हैं, जिन्होंने बहुत पहले बिहार के विकास को जटिल सवाल बताते हुए एक बड़े आपरेशन की ज़रूरत बतायी थी।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ उग्र उथल-पुथल की तरफ बढ़ता बिहार ”

  2. By राजेश on January 2, 2010 5:30 PM

    नितीश के पास वह ताकत और् साहस नहीं है कि वे भूमिहारों और राजपूतों के खिलाफ़ जायें. यह् तो खुद् सामंतों की सरकार है.

सुनिए : हम देखेंगे/इकबाल बानो

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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