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बीच सफ़हे की लड़ाई

मंदी जा रही है रोज़गार कहां है

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/12/2009 05:00:00 AM


आनंद प्रधान
क्या मंदी अब खत्म होने को है? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तक के बयान तो ऐसा ही कहते हैं और शेयर बाजार को इसका पैमाना मानने वाले बाजारी रौनक को मंदी की तपिश के ढीली पड़ने के सुबूत के रूप में पेश करते हैं। तो क्या वाकई यह मंदी इतनी आसान थी, या इसके कारण इतने सतही थे? सूरते हाल तो बयानों से मेल नहीं खाते। विशेषज्ञों की नजर में इस पर रोशनी डालता इस बार का हस्तक्षेप
वैश्विक मंदी के प्रभाव में सुस्त हो गई भारतीय अर्थव्यवस्था के एक बार फिर पटरी पर लौटने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। यू.पी.ए सरकार के अफसर तथा मंत्री और दूसरी आ॓र बाजार के जानकार जोर-शोर से दावे कर रहे हैं कि अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार हो रहा है। बतौर सबूत शेयर बाजार से लेकर औघोगिक विकास तक के आंकड़े पेश किए जा रहे हैं। गुलाबी अखबारों में कंपनियों के मुनाफे के आंकड़े भी बहुत आकर्षक हैं। यह नहीं दुनिया के अरबपतियों की सूची में भी भारतीय की उपस्थिति लगभग ज्यों की त्यों बनी हुई है।
लेकिन क्या अर्थव्यवस्था में जारी इस सुधार का कोई फायदा आम आदमी तक भी पहुंच रहा है? यह सवाल इसलिए भी जरूरी है कि मंदी से निपटने के लिए कारपोरेट जगत और कंपनियों को सरकार ने कई प्रोत्साहन पैकेज (स्टीमुलस पैकेज) भी दिए थे। इन पैकेज में टैक्स में छूट से लेकर अन्य कई प्रोत्साहन भी शािमल थे। सरकारी खजाने से दिए गए इन हजारों करोड़ रूपये के पैकेज का मुख्य उद्देश्य और तर्क यह था कि कंपनियां लोगों को इसका फायदा देंगी। इससे उत्पाद और सेवाओं की कीमत कम होगी। उम्मीद थी कि कंपनियां खासकर संगठित क्षेत्र में अपने कार्मिकों/वर्करों के रोजगार की सुरक्षा करेंगी और छंटनी-ले आफ-नई भर्तियों पर रोक आदि से बचेंगी।
लेकिन व्यवहार में ठीक इसका उल्टा हो रहा है। पिछले एक साल में जब से वैश्विक वित्तीय संकट और मंदी की शुरूआत हुई है, यह कंपनियों के लिए छंटनी और ले ऑफ आदि का एक बहाना बन गया है। आश्चर्य की बात यह है कि पिछले एक साल में अकेले संगठित क्षेत्र में लाखों कार्मिकों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है। खुद सरकार के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल सितम्बर से इस साल मार्च के बीच संगठित क्षेत्र में करीब 15 से 20 लाख कार्मिकों को मंदी के नाम पर अपनी रोजी-रोटी गंवानी पड़ी। उस समय कहा गया कि कंपनियों के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है। हालांकि मंदी के बावजूद उन कंपनियों के मुनाफे पर कोई खास असर नहीं पड़ा। सबसे अफसोस की बात यह है कि खुद वित्त मंत्री ने छंटनी को लेकर कोई कड़ा रूख दिखाने के बजाय कारपोरेट क्षेत्र को इस मामले में सहानुभूतिपूर्वक विचार करने को कहा था।
लेकिन अब जब फिर से अर्थव्यवस्था में बूम के दावे किए जा रहे हैं, रोजगार के मामले में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। कुछ क्षेत्रों को छोड़कर जहां मामूली भर्तियां होनी शुरू हुई हैं अधिकतर क्षेत्र में अब भी स्थिति ज्यों कि त्यों बनी हुई है। तथ्य यह है कि अर्थव्यवस्था में सुधार के बावजूद यह एक रोजगारविहीन विकास (जॉबलेस ग्रोथ) है जिसमें कंपनियों का मुनाफा तो तेजी से बढ़ रहा है लेकिन रोजगार में कोई खास वृद्धि नहीं हो रही है। खुद केंद्र सरकार के श्रम और रोजगार मंत्रालय के मुताबिक चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल से जून 09) में संगठित क्षेत्र में 1.71 लाख कार्मिकों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है। इसमें सबसे ज्यादा नौकरियां कपड़ा क्षेत्र में गईं हैं जहां 1.54 लाख कार्मिकों की नौकरी गई है। इसी तरह, आईटी क्षेत्र में भी करीब 34,000 लोगों की नौकरी चली गई है।
अभी दूसरी तिमाही के आंकड़े नहीं आए हैं लेकिन संकेत अच्छे नहीं हैं। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ई.पी.एफ.आ॓.) के मुताबिक इस साल अप्रैल से जून के बीच सिर्फ तीन महीने में भविष्य निधि से पैसा निकालने वाले कार्मिकों की संख्या 35.51 लाख तक पहुंच गई है जो इस बात का संकेत है कि छंटनी और ले ऑफ अभी न सिर्फ जारी है बल्कि बड़े पैमाने पर नौकरियां जा रही हैं। ये आंकड़े इसलिए भी हैरान करने वाले हैं क्योंकि 2006-07 में पूरे साल में इतने लोगों ने ई.पी.एफ. से पैसा निकाला था जब कि इस साल की पहली तिमाही में ही 35 लाख से अधिक कार्मिकों का पैसा निकालना यह बताता है कि रोजगार के मामले में स्थिति कितनी नाजुक है। याद रहे कि पिछले साल 2008-09 में कुल 98 लाख से अधिक कार्मिकों ने भविष्य निधि से पैसा निकाला था जो कि एक रिकॉर्ड है।
साफ है कि अर्थव्यवस्था में सुधार आदि की बात उन कार्मिकों के लिए बेकार और दिल को बहलाने वाली है जो अब भी छंटनी-ले ऑफ का सामना कर रहे हैं। लेकिन सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इसकी कोई चर्चा नहीं हो रही है। अर्थव्यवस्था में सुधार का मतलब सिर्फ कंपनियों को अधिक से अधिक मुनाफा हो गया है और इसका कोई फायदा कार्मिकों को नहीं मिल रहा है। ये कंपनियां सरकार पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं कि प्रोत्साहन पैकेज अभी जारी रखे जाएं लेकिन वे कार्मिकों के रोजगार की गारंटी करने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि यू.पी.ए. सरकार इस मामले में सभी कंपनियों को यह साफ निर्देश दे कि अगर उन्होंने अपने यहां छंटनी-ले ऑफ किया तो उन्हें प्रोत्साहन पैकेज का लाभ नहीं मिलेगा। यह सख्ती इसलिए भी जरूरी है कि बहुत सी कंपनियों ने मंदी को एक बहाने की तरह इस्तेमाल करने और उसे मनमाने तरीके से छंटनी और ले-ऑफ का लाइसेंस बना दिया है। ऐसा मानने की वजह यह है कि कई क्षेत्र में स्थायी कार्मिकों को निकालकर अस्थायी अनुबंध पर कर्मचारियों की भरती भी की जा रही है। उदाहरण के लिए इस साल की पहली तिमाही में अनुबंध पर करीब 40 हजार कार्मिकों की भरती हुई है जबकि उसी अवधि में 1.71 लाख स्थायी नौकरियां चली गई हैं। साफ है कि कारपोरेट क्षेत्र मंदी का बहाना बनाकर अपने स्थायी कार्मिकों से पीछा छुड़ा रहा है। असल में कारपोरेट क्षेत्र लंबे समय से श्रम कानून में बदलाव की मांग करता रहा है जो कि राजनीतिक कारणों से संभव नहीं हो पाया लेकिन अब मंदी के बहाने कंपनियां वह कर रही हैं जो वे श्रम कानून में सुधार के जरिये करना चाहती थीं।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ मंदी जा रही है रोज़गार कहां है ”

  2. By श्यामल सुमन on December 12, 2009 at 7:31 AM

    याद कीजिए कुछ महीना पहले आँकड़ों में मँहगाई सूचकांक शून्य और हकीकत में तो हम सब झेल ही रहे थे और झेल रहे हैं। भाई यह सब करिश्मा सिर्फ आँकड़ों का ही है।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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