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बीच सफ़हे की लड़ाई

त्रासदियों-बरसियों का वर्ग चरित्र

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/11/2009 05:00:00 AM



ऐसा क्यों है कि मुंबई हमले की बरसी एक राष्ट्रीय शोक दिवस में परिणत कर दी जाती है (और यह जायज भी है) लेकिन भोपाल जनसंहार कभी भी त्रासदी और शोक का प्रतीक नहीं बन पाया. इसके पीछे का गणित क्या है? बता रहे हैं प्रभाकर चौबे.

पच्चीस साल से भोपाल निवासी गैस त्रासदी की बरसी मना रहे हैं। 3 दिसंबर 1984 को भारत ही नहीं दुनिया का सबसे बड़ा औद्योगिक हादसा हुआ और यह मानव प्रदत्त था। इस हादसे ने तीसरी पीढ़ी तक को बीमार कर रखा है। पच्चीस साल हो गए इस हादसे को और इस पर काफी लिखा जा चुका है। मुआवजा के लिए भटकते लोगों की व्यथा से लेकर उनके पुनर्वास के प्रयासों पर मीडिया ने साथ दिया। लेकिन आज भी सवाल एक खड़ा है कि यूनियन कार्बाईड पर क्या हुआ। उसके बाद उसे खरीदने वाले डाऊ केमिकल्स भी अपनी जवाबदारी से बचने या उसे बचाने के लिए किए गए प्रयासों में सफल रहा है। ऐसा क्यों? 1984 के बाद कितनी सरकारें आई गईं लेकिन लगता है कि हर सरकार के आशीर्वाद का हाथ ऐसी हत्यारी कम्पनियों के सर पर रहा। यह इन सरकारों की जड़ असंवेदनहीनता ही नहीं रही वरन् राज सत्ता के केंद्र में बैठे लोगों की सोची-समझी नीति के कारण हत्या के दोषी संस्थान बचते रहे। सत्ता के ऐसे चरित्र को देखकर लोकतंत्र में पाखंड की बात उठे और लगे कि यह पाखंड पर्व चल रहा है तो यह स्वाभाविक है। जो लोग 26.11 को एक उत्सव की तरह मना सकते हैं उन्हें 3.12 की त्रासदी की याद करने का हक भी नहीं है। 26.11 की बरसी मनानेवाला वर्ग कौन सा वर्ग है। 26.11.2008 को ताज पर हुआ आतंकी हमला भयावह रहा और देश पर आतंकी हमले की आशंका से पूरा देश सहम गया। उस दिन पूरा देश स्तब्ध रह गया था और लगातार टीवी चैनल्स से आ रही खबरों से चिपका था। वे दु:ख भरे दिन थे। ऐसा आगे न हो, यह पूरा देश मनाता रहा। लेकिन 3.12.1984 के भोपाल हादसे की बरसी मनाने यह वर्ग आगे कभी नहीं आया। मीडिया वह भी प्रिंट मीडिया में कुछ बुध्दिजीवी, कुछ सामाजिक सरोकार के प्रति प्रतिबध्द सामाजिक संगठन, लेखक, रंगकर्मी एक-दो एनजीओ ही हर साल इस हादसे को याद करते हैं और साम्राज्यवादी आर्थिक प्रसारवाद के खतरों के प्रति सरकारों को आगाह करते हैं। भोपाल हादसा पूंजीवाद के क्रूरतम चेहरों में से एक है और बताता है कि पूंजीवाद अपने हित में ही संवेदनाएं-कू्ररताएं तय करता है। उसे मानवता व मानवीय रिश्तों से कोई लेना-देना नहीं होता। उसके लिए हर हाल में लाभ कमाना ही एकमात्र उद्देश्य है। दुनियाभर में जितने भी युध्द हुए हैं और आज जो आतंकवाद भयावह रूप में राक्षस बनकर खड़ा है वह सब साम्राज्यवादी प्रसारवादी नीतियों की उपज है। साम्राज्यवाद अपने हित में आतंकी पैदा करता है, उसे पनाह देता है, उसका पोषण करता है, उसका उपयोग करता है और काम निकलते ही उसकी हत्या करने, उसे खत्म करने में भिड़ भी जाता है। काम निकल जाने के बाद वह अन्य देशों को आतंकवाद के खिलाफ उसके बाजू खड़े होने का आह्वान करता है, अन्य देशों को ललकारता है कि वे साम्राज्यवाद का साथ दें। जो देश या जो विवेकशील, जनचेतना जागृत करने वाली ताकतें साम्राज्यवादी नीतियों, उसकी नीयत को उजागर करते हैं उन्हे साम्राज्यवाद मानवता के शत्रु तक कह देता है और यह भी घोषणा करता है कि  ''जो हमारे साथ नहीं हैं वे शत्रु (आतंकवाद) के साथ हैं।'' देश में और दुनियाभर में आज जो आतंकी हमले हो रहे हैं और आतंकवाद एक भयावह समस्या बनी है, वह सब साम्राज्यवाद की देन है। आतंकवाद साम्राज्यवाद का मानसपुत्र है जिसे वह भौतिक सहारा देकर पनपाता है। इसलिए 26.11 की बरसी मनाते समय साम्राज्यवादी नीतियों पर प्रहार करना जरूरी है। जरूरी है कि साम्राज्यवादी नीतियों को जनता के सामने उजागर किया जाए। जैसे राक्षस की जान तोते में बसती है, ऐसा कहा गया, उसी तरह आतंकवाद की जान साम्राज्यवाद में बसी है। लेकिन जो वर्ग 26.11 की बरसी मनाता है और भारत की जनता में आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता पैदा करने के लिए कार्यक्रम करता है, वह साम्राज्यवादी मंसूबों को छूता तक नहीं, उन्हें सामने लाने के लिए एक शब्द नहीं बोलता। ऐसा तो नहीं कहते कि यह वर्ग खाया मोटाया वर्ग है लेकिन यह वर्ग साम्राज्यवादी आर्थिक नीतियों की पैदावार है। इसीलिए वह 26.11 की बरसी पर संगीत सभाएं कर सकता है, मोमबत्तियां जला सकता है और जनता को साम्राज्यवादी नीयत को परखने से दूर रखता है। कौन देश भक्त चाहेगा (हर भारतीय देश भक्त है)। यह सत्य है कि देश में आतंकी हमले हों। कौन चाहेगा कि देश पर आक्रमण हो। लेकिन हर देशभक्त यह जानना चाहेगा कि आतंकी हमले का सही कारण क्या है। इसका उद्गम कहां है। और मीडिया में जब आता है कि आतंकी ताकतों का देश के किस या किन-किन व्यक्तियों अथवा संगठनों से सम्पर्क रहा अथवा है तो जो चेहरे सामने आते हैं वे किस वर्ग के होते हैं। किसी मेहनतकश के चेहरे नहीं होते। किसी मजदूर, किसान, परेशान मध्यम वर्ग, अपने काम में लगे परिवार चलाने की जांगरतोड़ मेहनत करने वाले वर्ग के नहीं होते। देशवासियों को देशभक्ति का पाठ वे पढ़ाएं जो अनाप-शनाप धन कमा रहे हैं, बटोर रहे हैं, जमाकर रख रहे हैं और बाहर बैंकों तक में जमा कर रहे हैं। करोड़ों को मुफलिशी में रखकर, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तरसने के लिए छोड़ें, युवकों को बेरोजगार रखकर जो उनका हिस्सा छीन रहे और अरबों समेट रहे, ऐसा वर्ग देशभक्तिका पाठ पढ़ाए। 26.11 की बरसी मनाकर देश के लिए एकजुट होने का उपदेश देने वाले तब चुप रहते हैं जब देश में सैंकड़ों किसान आत्महत्या करते होते हैं। यह वर्ग सरकार पर अपनी आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक सोच बदलने को दबाव नहीं डालता। यह किसानों की आत्महत्या पर एक शब्द नहीं बोलता या कोई कारखाना बंद किया जाता है तब यह वर्ग चुप रहता है। अंग्रेजी हुकूमत की कोशिश करने वाले आज देशभक्त हैं। बड़ा पाखंड है और इसीलिए देश की जनता इन के कथनों को केवल तमाशा मानती है।
3-12-1984 के भोपाल हादसे को यह वर्ग याद नहीं करता उसकी बरसी नहीं मनाता क्योंकि वह हादसा करनेवाली कंपनी अमरीकी थी और उसे खरीदनेवाली थी। किसान, मजदूर, मध्य वर्ग उनके सरोकारों से बाहर हैं। अनाज, तेल, सब्जियों, फलों की, शिक्षा की महंगाई उन्हें असर नहीं करती, वे कारों के सस्ता होने का जश्न मनाते हैं। ऐसा वर्ग 3.12 की बरसी नहीं मनाएगा। भोपाल गैस हादसा और उसकी त्रासदी 25 साल से भोग रहे लोग आगे भी भोगने वाले लोग, इस वर्ग की सोच से बाहर हैं। इस वर्ग की नीयत को समझना चाहिए।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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