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बिहार : एक कहानी, थोड़ी नयी थोड़ी पुरानी

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/10/2009 05:00:00 AM


नीतीश कुमार के शासनवाले बिहार के बारे में हमने कुछ पोस्टें पहले प्रकाशित की थीं और कोशिश की थी कि दलाल पत्रकारों के शोर के सामानांतर बिहार का सच सामने आये. इस क्रम में हम पटना से नवम्बर में प्रकाशित एक पुस्तिका सुशासन का असली चेहरा से कुछ सामग्री प्रकाशित कर रहे हैं. सुनने में आया है कि इस पुस्तिका के प्रकाशक-लेखक के बारे में बिहार सरकार बेसब्री से खोज-बीन कर रही है. खबर तो यह भी है कि अख़बारों के दफ्तरों में भी गुपचुप खोजबीन जारी है. बहरहाल, पत्रिका जिसने भी प्रकाशित की हो, इसमें कुछ तथ्य आंख खोलनेवाले है. वैसे यह पुस्तिका पिछले साल प्रकाशित तीन साल-तेरह सवाल जितनी दमदार नहीं बन पड़ी है.


रतींद्रनाथ

रंगा सियार की कहानी है यह. एक सियार रंग के बर्तन में गिरकर बिल्कुल ही रंगीन हो गया. जब जंगल में उसने तरीफ रखी तो सारे जानवर उसे देखकर प्रभावित हो गये. उन्होंने सोचा कि इस रंगे सियार में जरूर किसी न किसी प्रकार की चमत्कारिक क्ति होगी. लिहाजा, तमाम पशुओं ने मिलकर उस रंगे सियार को जंगल का राजा घोषित कर डाला. लेकिन सिंहासन पर बैठने के बाद, रंगे सियार ने भी अन्य सियारों की तरह ‘हुआं..हुआं’ करना शुरू कर दिया. इससे उसकी कलई उतर गयी और पोल खुल गयी. तब अन्य जानवरों ने उसे गद्दी से बेदखल कर ही चैन की सांस ली.
पता नहीं बिहार की भोलीभाली जनता को बार-बार इस रंगे सियार की कथा क्यों याद आ रही है. सूबे की नौ करोड़ जनता ने बड़ी हसरत के साथ नीती कुमार को मुख्यमंत्री के तख्त पर बिठाया था और उम्मीद की थी कि ‘विकास पुरुष’ नीती कुमार कुछ ही महीनों में नया बिहार बना देंगे.  लेकिन बिहार नहीं बदला. सच तो यह कि बिहार की जनता तब और अब की जमीनी हकीकत में कोई बड़ा फर्क नहीं देख रही है. तो क्या नये बिहार के निर्माण का सपना सचमुच सपना ही रह जाएगा? इस पर कुछ लोग यह जुमला सुनाते हैं-‘नीती कुमार का नया बिहार केवल कुरमी और भुमिहार’. 

सुशासन नहीं, भूशासन
(नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार पर भूमिहार जाति के वर्चस्व की एक छोटी बानगी से उपरोक्त कहानी का आषय समझा जा सकता है.)

ललन सिंह: जदयू के प्रदे अध्यक्ष. हाल में नीती के आदे पर पुनः निर्वाचित. ललन सिंह सियासी महकमे में डीफैक्टो सीएम कहलाते हैं. प्रतिपक्ष की नेता राबड़ी देवी ने भी कहा था- ‘ललन ही असली चीफ मिनिस्टर हैं..नीती तो सिर्फ दस्तखत करते हैं.’ ललन पर नीती फिदा क्यों? इसको लेकर राजनैतिक जगत में तरह-तरह की रसीली कहानियां हैं. रोज सुबह ललन सिंह के दरबार में भ्रष्ट अफसरों (विशेष भूमिहार अधिकारियों) का जमावड़ा लगता है और उनकी मनमाफिक पदस्थापना हो जाती है.

पीके शाही: एडवोकेट जनरल. प्रशांत कुमार शाही यानी पीके शाही नीती सरकार के खास हैं. नीती कुमार ने 24 नवंबर,2005 को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होते ही पहली नियुक्ति पीके शाही की ही की. राजद के बाहुबली पूर्व सांसद शहाबुद्दीन के साथ शाही की काफी छनती है.

किंग महेंद्र: जदयू के राज्यसभा नुमाईंदे किंग महेंद्र का असली नाम महेंद्र प्रसाद है. अरबों-खरबों के मालिक महेंद्र प्रसाद ‘किंग’ इसलिए कहलाते हैं कि वह नामवर दवा कंपनी ‘एरिस्टो’ के अधिपति हैं. पर्दे के पीछे रहकर सारा काम करते हैं. कांग्रेस और राजद के टिकट पर भी वह राज्य सभा के सदस्य रह चुके हैं. फिलवक्त अथाह संपत्ति की बदौलत उन्होंने नीती की जदयू को अपनी जेबी संस्था बना रखा है. (विधान सभा के गत चुनाव में घोसी विधान सभा क्षेत्र से उनके एक इषारे पर नीती कुमार ने उनके क्षेत्र के एक और भूमिहार नेता जगदी र्मा की पत्नी को टिकट नहीं दिया और कथित ‘परिवारवाद विरोध’ का नारा गढ़ लिया.)

रामाश्रय सिंह: प्रभावशाली मंत्री. रणवीर सेना के रणनीतिकारों में से एक. मुख्यमंत्री पर प्रभाव इतना कि इनके सामने उनकी बोलती बंद हो जाती है. रामाश्रय वर्ष 1995 में मरख में हुए दोहरा हत्याकांड के अभियुक्त थे. सजा तय मानी जा रही थी लेकिन पिछले साल मुकदमे के अंतिम दौर में सरकारी गवाह हाजिर नहीं हुए और वह आराम से बरी हो गये. राजनीतिक हलकों में इनकी पहचान सफेदपो सरगना की है.

अनंत सिंह: दुर्दांत अपराधी. मोकमा टाल के इस सरगना का दबदबा अन्य राज्यों के अपराधी भी मानते हैं. लालू प्रसाद के शासन काल में मंत्री रह चुके बाहुबली दिलीप सिंह का छोटा भाई. 1990 के बिहार विधान सभा चुनाव में नीती की पहल पर ही ‘नेनल सिक्यूरिटी एक्ट’ के आरोपी दिलीप सिंह को जनता दल का टिकट मिला और वह पहली बार विधायक बना.
अपराध जगत को नजदीक से जानने वाले बताते हैं कि दिलीप सिंह की असली ताकत अत्याधुनिक हथियारों से लैस लोगों से घिरा रहने वाला उनका छोटा भाई अनंत सिंह ही रहा है. दिलीप की मौत के बाद नीती ने अनंत सिंह को जदयू का टिकट देकर विधायक बनाया. कबीलाई चाल के इस अपराधी ने विधायक बनकर पटना पहुंचते के ही राजधानी पर कहर ढाना शुरू कर दिया. बहुचर्चित रेमा खातून हत्याकांड हो या पटना की मुख्य सड़क फ्रेजर रोड पर लगभग आधा दर्जन बड़े मकानों और भूखंडों पर जबरन कब्जा, या फिर सीधे बैंक से वसूली, उसे संरक्षण देने के लिए राज्य सरकार तत्पर रहती है. राजनीति में भी उसका जबरदस्त दखल है. उसकी कही बात को काटने की औकात न नीती कुमार के पास है न ही इन दिनों उनके अपराधियों का ‘प्रबंधन’ कर रहे ललन सिंह के पास.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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