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पर्यावरण, गरीबी और औरतें : एक बहस जो कोपेनहेगन में नहीं हो रही

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/08/2009 02:36:00 PM


पर्यावरण के मुद्दे को जनसंख्या से जोड़ कर देखने का चलन तो है, लेकिन इसके सम्बन्ध सामाजिक असमानता, वर्ग उत्पीडन और गरीबी में हैं-यह कभी नहीं देखा जाता. हम जानते हैं कि कोपेनहेगन इस पर कोइ बात नहीं करेगा. इन अंतर्संबंधों के बारे में बता रही हैं वीणा.


ठीक 99 साल पहले कोपनहैगेन में एक विश्वस्तरीय सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का फैसला लिया गया था। अब उसी कोपनहैगेन में एक और विश्वस्तरीय सम्मेलन होने जा रहा है। मुद्दा है प्रदूषण के कारण दुनिया का बदलता वातावरण और बढता तापमान।

लेकिन इस बार बदलते वातावरण का ठीकरा गरीब विकासशील देशों की महिलाओं के सिर फोड़ने की कोशिश हो रही है। उन्हें बढ़ती आबादी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कहा जा रहा है कि यदि बढ़ती आबादी पर अंकुश नहीं लगाया गया तो 2050 तक दुनिया प्रलय के दरवाजे पर खड़ी होगी। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के जीव शास्त्री पॉल हेरलरिक ने 1968 में एक किताब लिखी। नाम था ‘पॉपुलेशन बॉम्ब’।

किताब के मुताबिक गरीब मुल्कों की औरतों को अगर बच्चे पैदा करने से नहीं रोका गया तो दुनिया विनाश के कगार पर पहुंच जाएगी। इसी आधार पर यह कहा जा रहा है कि विकासशील देशों की औरतों को बच्चे पैदा करने से रोकना चाहिए, चाहे जोर-जबरदस्ती से या किसी और तरीके से।

वैसे ‘वर्ल्ड क्लाइमेट कॉंन्फ्रेंस’ का मूल एजेंडा कार्बन उत्सजर्न का कोटा तय करना है। सम्मेलन में भाग लेने वाले देश दो गुटों में बंटे है, विकसित और विकासशील। विकसित देशों की कोशिश है कि उन पर कम अंकुश लगे। पर विकासशील देशों का मानना है कि विकसित देश अपने पूर्ण विकास की देहरी पार कर चुके हैं। दुनिया के कार्बन प्रदूषण के चिन्ताजनक स्तर के लिए वे ही जिम्मेदार हैं।

विकासशील देशों में तो अभी विकास शुरू हुआ है। ऐसे में उन पर लगाया गया किसी भी प्रकार का अंकुश उनके समुचित विकास को कुंठित कर देगा। दरअसल हमारे सामने चुनौती यह है कि हम कैसे इन आने वाले 300 करोड़ लोगों के लिए दुनिया को बेहतर बनाएं और ऐसे कदम उठाएं की अधिक जनसंख्या के बावजूद पर्यावरण पर इसका नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

जैसे कि ऊर्जा के स्रोत- तेल, कोयला आदी से हटकर अक्षय उर्जा के स्रोतों पर निर्भर होना। निजी कारों की जगह बेहतर सार्वजनिक यातायात के साधन विकसित करना। उत्पादन को ज्यादा से ज्यादा प्रदूषण रहित करना। और सबसे अहम बात है गैरजरूरी उपभोग में कमी लाना। लेकिन ब्रिटेन की संस्था ‘ऑप्टिमम पॉपुलेशन ट्रस्ट’ के एक अध्ययन के मुताबिक वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों को अपनाने की जगह परिवार नियोजन पर पैसा लगाना ज्यादा कारगर होगा और सस्ता भी।

इसीलिए जनसंख्या की राजनीति हो रही है, जिसके निशाने पर हैं भारत और चीन। इन दोनों मुल्कों की आबादी दुनिया की आधी आबादी के करीब है। और दोनों मुल्कों के विकास की दरों में भी काफी तेजी आई है। जनसंख्या को मुद्दा बनाकर यदि इन दोनों देशों को कार्बन उत्सजर्न पर अंकुश लगाने को राजी कर लिया जाए तो विकसित देशों को उतनी पहल नहीं करनी होगी, जितनी उनसे आशा की जा रही है। यह कहना भी सही नहीं है कि विश्व जनसंख्या वृद्घि में कमी नहीं आई है।

आज विकासशील देशों में प्रति औरत बच्चों की संख्या घटकर 2.75 हो गई है। 2050 तक ये 2.05 रह जाएगी। अगले तीस-चालीस साल में विश्व ‘शून्य जनसंख्या वृद्धि’ की स्थिति में होगा। दुनिया की जनसंख्या 600 करोड़ से बढ़कर 900 करोड़ के करीब पहुंच कर स्थिर हो जाएगी।

बात यह नहीं है कि गर्भनिरोध और गर्भपात के आधुनिक तरीके इस्तेमाल में नहीं लाए जाने चाहिये। लेकिन हर औरत को अपने शरीर पर हक़ है कि वो जब चाहे बच्चा पैदा करे या न करे। पिछले तीस-चालीस साल में विकासशील मुल्कों पर परिवार नियोजन के कार्यक्रम थोपे तो गए पर इन्हें औरतों के समूचे स्वास्थ से जोड़ने की कोशिश नहीं की गई। यह भी देखा गया है कि परिवार नियोजन कार्यक्रमों के बावजूद जनसंख्या वृद्घि उन्हीं तबकों में कम हुई, जिनकी आर्थिक और सामाजिक हातल सुधरी है। गरीब तबकों में आज भी जनसंख्या वृद्धि उसी तरह जारी है, जैसे पहले थी।

इसमें कोई शक नहीं कि जनसंख्या वृद्घि में कमी लानी चाहिये। पर इसके लिए ज़रूरी है लोगों की जिन्दगी बेहतर बनाना और उन्हें शिक्षा-स्वास्थ की सुविधाएं मुहैया करवाना। और सबसे ज़रूरी है महिलाओं का सशक्तिकरण, ताकि उन्हें अपने शरीर पर पूरा अधिकार हो।

आज औरत को महज बच्चा पैदा करने की मशीन के तौर पर देखा जाता है। बच्चा पैदा करने का फैसला पति या घर के अन्य सदस्यों का होता है। और गरीब घरों में तो हर नया बच्चा मेहनत के दो हाथ ले कर आता है। अगर औरत की आर्थिक हालत बेहतर है, वो शिक्षित है और घर-समाज में उसे बराबरी का अधिकार मिलता है तो जनसंख्या अपने आप घटने लगती है। गरीबी, अशिक्षा में रह रहे लोगों से जनसंख्या घटाने की आशा नहीं की जा सकती।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


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“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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