हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कविता रचती स्त्री

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/01/2009 05:00:00 AM

साथी रणेंद्र की कुछ कविताएँ आपने पहले पढ़ी हैं. एक कविता और. 

आकाशगंगा संग
अन्तरिक्ष में
नाचते हैं शब्द

अपने आत्मा की उजास
और रक्त के ताप से
करती है उनका आह्वाहन

उसकी ही जटाओं में
अवतरित होती है
शब्द-भागीरथी

जिन्हे हौले से
पृथ्वी पर सजा देती है

विहँस उठती है प्रकृति
वनों में किलकारी
भरता है वसंत
ठंडक उतरती है
गरम थपेड़ों की नाभि में

अपने इन एकान्त पलों में
ब्रह्मा को बाँयी ओर खिसका
खुद स्रष्टा होती है स्त्री

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ कविता रचती स्त्री ”

  2. By Udan Tashtari on December 1, 2009 at 6:55 AM

    बहुत सुन्दर कविता..आभार प्रस्तुति का.

  3. By निर्मला कपिला on December 1, 2009 at 10:55 AM

    अपने इन एकान्त पलों में
    ब्रह्मा को बाँयी ओर खिसका
    खुद स्रष्टा होती है स्त्री
    बहुत सुन्दर गहरी संवेदना लिये रचना के लिये आभार शुभकामनायें

  4. By वाणी गीत on December 1, 2009 at 11:11 AM

    ब्रह्मा को बाँयी ओर खिसका
    खुद स्रष्टा होती है स्त्री...
    कविता रचती स्त्री ही तो ...बहुत खूब ...!!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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