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बीच सफ़हे की लड़ाई

40 साल पहले ऐसा था बस्तर का माड़िया

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/23/2009 04:00:00 AM

आपरेशन ग्रीन हंट देश के जिन इलाकों में पिछले एक महीने से अधिक समय से चल रहा है, उनमें बस्तर भी है. कैसा है यह बस्तर, इसके भीतर क्या चल रहा है? अबूझमाड़ जिसे कहते हैं-वहां क्या है, हम जानने की कोशिश करेंगे इस दौरान. पहली पोस्ट, बस्तर के बारे में. डॉ. हनुमंत यादव का आलेख.


पिछले दिनों मुझे वन अधिकार कानून एवं जनजातियों के संघर्ष विषय पर आयोजित एक दो दिवसीय सेमीनार में जाने का अवसर मिला। एक सत्र में एक वक्ता ने इंटरनेट की कुछ वेबसाइटों तथा पत्र-पत्रिकाओं का हवाला देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में एक लाख से अधिक आदिवासी अन्याय एवं अत्याचार के विरुध्द मजबूरी में हथियार उठाकर सरकार की पूंजीवादी नीतियों के विरुध्द लड़ाई लड़ रहे हैं जिसमें आदिवासी महिलाओं की भी महत्वपूर्ण भागीदारी है। कुछ अन्य वक्ताओं ने भी भूमिहीन आदिवासियों के सशस्त्र संघर्ष में सरकार द्वारा निर्दोष आदिवासियों को बनावटी भिडंत में हत्या किए जाने तथा बड़े पैमाने पर मानव अधिकारों के उल्लंघन की बात कही। एक अन्य वक्ता का कहना था कि छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आदिवासियों को उनके गांवों से खदेड़कर शरणार्थी कैम्पों में इसलिए बसाया गया है कि जिससे सरकार आदिवासियों की जमीन अपने कब्जे में लेने के बाद बड़े पैमाने पर कारखाने स्थापित करने के लिए बड़े उद्योगपतियों को भेंट कर सके।
उस सेमीनार में विद्वान वक्ताओं द्वारा कही गई बातें नई नहीं थीं। पिछले कुछ वर्षों से इस प्रकार के लेख व समाचार देश के अनेक समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। तीन वर्ष पहले मुझे अमरीका के एक विश्वविद्यालय में जाने का अवसर मिला था। वहां पर भी अर्थशास्त्र एवं राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक एवं छात्रगण मुझसे छत्तीसगढ़ में चल रहे आदिवासी युध्द की इसी प्रकार की चिंता जताया करते थे।
बस्तर तथा वहां की जनजातियों के विशेषज्ञ बुध्दिजीवियों, पत्रकारों, एनजीओ कार्यकर्ताओं तथा मानवाधिकार संगठनों एवं उनके कार्यकर्ताओं द्वारा माड़ क्षेत्र में आदिवासी युवाओं के सशस्त्र संघर्ष तथा माओवादियों द्वारा लाई गई जागृति के बारे में सेमीनार एवं सम्मेलनों, पत्र-पत्रिकाओं तथा इंटरनेट पर ब्लॉग में जो कुछ कहा जा रहा है या लिखा जा रहा है, मैं अपने अनुभव को उनकी बातों को चुनौती देने या विरोध करने की दृष्टि से नहीं लिख रहा हूं बल्कि मैं यह कहना चाहता हूं कि मैंने 35 वर्ष पूर्व माड़ क्षेत्र में रहने वाली जनजातियों एवं निवासियों को जैसा देखा, वह इतना भिन्न है कि मुझे कभी-कभी लगता है कि वह सपना था कि मेरी कल्पना थी या कहानी है। कुछ भी हो मैं अपनी जानकारी बांटना चाहता हूं। वैसे तो 1966 से 1978 तक के 12 वर्षों में बस्तर के सभी 32 विकासखण्डों के आदिवासी बहुल गांवों में दीन-दुनिया से कटकर महीनों प्रवास कर जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति एवं उनके व्यवहार के अनेक अवसर मिले जिनमें 1976 से 1978 तक का मेरी पीएचडी उपाधि हेतु अध्ययन भी शामिल है, किंतु 1966-67 में नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर तथा सुकमा के माड़ क्षेत्र में अध्ययन हेतु किए गए प्रवास को ही स्मरण कर रहा हूं। एक अमरीकी शोधकर्ता के लिए एक अन्वेषक के रूप में वह अध्ययन इस शर्त को स्वीकार करके किया था कि मैं 20 वर्ष तक उस तथ्यात्मक जानकारी का उपयोग न तो स्वयं करूंगा, न ही दूसरों के प्रकाश में लाऊंगा। मैंने 50 गांवों में लम्बा प्रवास कर अन्वेषण कार्य किया, जिसमें ओरछा विकासखण्ड के वे 10 गांव भी शामिल थे, जहां अबूझमाड़िया झूम खेती या शिफ्टिंग फार्मिंग करते थे। अध्ययन कार्य कठिन था किंतु जिला प्रशासन के निर्देश पर राजस्व निरीक्षकों एवं पटवारियों के सहयोग से संभव हुआ। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव स्वर्गीय नरोन्हा जिला के पहले ऐसे कलेक्टर थे जिन्होंने अबूझमाड़ का दौरा किया था। बुजुर्ग अबूझमाड़िया 1966 में भी श्री नरोन्हा के प्रवास को नहीं भूले थे। कहा जाता है कि जब नरोन्हा ने मुखिया लोगों से यह भी पूछा कि उन्हें सरकार से किस प्रकार की मदद चाहिए तो उन्हें सभी जगह एक ही उत्तर मिला कि अबूझमाड़िया अपनी झूम खेती से संतुष्ट हैं, उन्हें कोई मदद नहीं चाहिए, केवल उन्हें शिकार करने की स्वतंत्रता चाहिए। उस समय पटवारी के फार्म बी नाम के दस्तावेज में पूरे चलते-फिरते गांव की जमीन मुखिया के नाम से दर्ज रहती थी तथा मुखिया के नाम के नीचे अन्य ग्रामवासियों के नाम रहते थे। बोई गई भूमि से अधिक रकबा परती भूमि का होता था। केवल पटवारी द्वारा खसरा में दर्ज विवरण से ही बोए गए रकबा का पता चल पता था। उस समय वहां सामूहिक खेती की जाती थी। गांवों का एक भी व्यक्तिबेरोजगार नहीं था। आज कहा जाता है कि अबूझमाड़ में दंडकारण्य झोन की माओवादी 50 हजार युवकों की जनवाहिनी का मुख्यालय एवं प्रशिक्षण केंद्र स्थित है। यह अपने आप में आश्चर्य की बात है कि जहां जमीन की कोई कमी नहीं थी, बेरोजगारी नहीं थी, आजीविका का संकट नहीं था, वहां कोई बाहरी बंधन स्वीकार नहीं करने वाले अपनी मर्जी के बादशाह अबूझमाड़िया ने माओवाद की गुलामी कैसे स्वीकार करहिंसा में लिप्त हैं। मेरे लिए अबूझमाड़ का अध्ययन प्रवास जितना मुश्किल भरा था, दंतेवाड़ा तहसील के सिंगमाड़िया या डंडामी माड़िया के गांवों में प्रवास उतना ही सुविधाजनक होने के साथ ही सुखद अनुभव वाला रहा। कुंआकोंडा, कटेकल्याण, छिंदगढ़ तथा भैरमगढ़ विकासखण्ड के चयनित सभी 40 गांवोें में पटवारी व राजस्व निरीक्षकों के सहयोग से थानागुडी में ठहरने की सुविधा मिली। गांव के माड़िया जनजाति के मुखिया द्वारा मेरे भोजन हेतु खाद्य पदार्थ पहुंचा दिया जाता था, जिसे अठपहरिया राउत पकाकर मुझे दोनों समय का भोजन खिला दिया करते थे। मैंने अनेक गांवों में मुखिया को कुछ न कुछ भेंट देने की कोशिश की किंतु किसी ने स्वीकार नहीं किया। मैं जिन 40 ग्राम में गया, वहां के पटवारी के फार्म बी रजिस्टर में भी ग्राम के मुखिया एवं प्रमुख परिवारों के नाम से गांव की कृषि भूमि दर्ज रहती थी, गांव के अन्य निवासियों के नाम 'सिकमी' के रूप में दर्ज रहते थे, जिनके बारे में कहा जाता था कि जमीन 'चिकनी' पर दी गई है। इन राजस्व ग्रामों में दर्जनों बड़े-बड़े पेड़ रहते थे, जिनकी उस समय कीमत लाखों रुपए में होती थी। जिनकी जमीन पर मालिक मकबूजा के वृक्ष रहते थे, उनकी शिकायत रहती थी कि बिना कलेक्टर की अनुमति के न तो उन वृक्षों को बेचने की आजादी थी, न ही काटने की। मुझे एक भी ऐसा परिवार नहीं मिला जिसके पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि थी। कृषि भूमि पर अलग-अलग परिवारों का कब्जा होने के बावजूद सभी कृषि कार्य सामूहिक रूप से किए जाते थे, तथा निर्णय भी सामूहिक होते थे।
सिंगमाड़िया अपने वर्ष भर की खाद्यान्न की जरूरत का अनुमान लगाकर उतने ही भूमि पर कृषि करते थे, बाकी को पड़ती छोड़ देते थे। अपने सप्ताह भर की जरूरत की चीजों का अनुमान लगाकर उतनी ही पायली वनोपज बाजार में बिक्री के लिए लाते थे। छोटी जोतवाले किसान सप्ताह में उतने ही दिन मजदूरी का काम करते थे, जितने दिन की मजदूरी राशि से उनका घरेलू काम चल जाता है। उन ग्रामों के माड़िया परिवारों द्वारा न तो कभी अपनी जरूरतें बढ़ाने की आवश्यकता समझी गई, न ही बचत की चिंता, ग्राम में चोरी का भय नहीं, इसलिए झोपड़ी में या घर में ताला लगाने की कोई चिंता नहीं। अनेक माड़िया मुखिया लोगों के नाम से इतनी अधिक जमीन रहती थी कि वे अन्य आदिवासी या गैर आदिवासी ग्रामवासियों को जमीन दे दिया करते थे। माड़िया जनजाति में दहेज की बजाए वधु कीमत व्यवस्था है, वधु कीमत न दे पाने वाले परिवारों के युवकों को भावी वधु के पिता के यहां लमसेना की हैसियत से नियत अवधि तक बिना पारिश्रमिक के काम करना पड़ता था।
भूमि की कोई कमी नहीं थी। सरकार के निर्माण कार्य चलते ही रहते थे। काम की कोई कमी नहीं किंतु काम करने वाले नहीं मिलते थे। यह गरीबी अपनाई गई गरीबी थी न कि थोपी गई गरीबी। वनोपज की माप के बदले नमक की खरीदी में माड़िया को कोई नुकसान नजर नहीं आता था, उसको अविश्वास था व्यापारी की तराजू पर, न कि पायली पर।
माड़ क्षेत्र में माड़िया भूमि का स्वामी था, अन्य गैर-आदिवासी उसके सिकमी किराएदार व बटाईदार थे। माड़िया जनजाति में मैंने उस समय दीनता व हीनता नहीं पाई, न ही कोई आक्रोश कि वह माओवाद अपना कर दो दशक तक लम्बा संघर्ष चलाए। फिर भी माओवाद ने स्थायी रूप से पैर पसारे हैं, ऐसा क्यों हुआ, इस पर चर्चा फिर कभी।

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ 40 साल पहले ऐसा था बस्तर का माड़िया ”

  2. By संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari on December 23, 2009 at 8:18 AM

    चित्रों में इन्‍हें यहां भी जीवंत देखा जा सकता है http://bastarheritage.com.

  3. By Anil Pusadkar on December 23, 2009 at 10:00 AM

    40 सालों मे बहुत कुछ बदला अगर नही बदला तो बस्तर का अपने आप मे खुश भूखा-नंगा मूल निवासी जिन्हे आदिवासी भी कह सकते हैं।बस्तर जैसा ही है सरगुजा मगर उसे आदिवासी क्षेत्र नही माना जा रहा क्योंकि वंहा के आदिवासियों ने कपड़ा पहनना सीख लिया,तरक्की करना सीख लिया और शायद चर्च जाना भी।फ़िर जो कपड़े पहनने लगे,जो नंगा न रहे वो आदिवासी कंहा है?क्या संस्कृति को बचाने के नाम पर बस्तर को भूखे नंगे लोगो को म्यूज़ियम बना दिया जाना चाहिये?मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो क्षमा किजियेगा।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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