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बीच सफ़हे की लड़ाई

4 दिसंबर, राजेंद्र भवन, आइटीओ के नजदीक, दिल्ली : याद रखें आपको आना है

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/02/2009 02:00:00 PM

दांव पर हैं एक बेहतर समाज और जीवन की आकांक्षा 

आपरेशन ग्रीन हंट के नाम से जनता के खिलाफ युद्ध देश के अनेक इलाकों में शुरू हो चुका है. मीडिया में भले इसकी खबरें नहीं आ रही हों, उन इलाकों से आनेवाले अनेक लोग-जैसेकि फिल्मकार गोपाल मेनन-बताते हैं कि कैसे आदिवासियों के उत्पीडन और विस्थापन में किस तरह भयावह तीव्रता आई है. जनता के खिलाफ चल रहे इस युद्ध के विरोध में दिल्ली में फोरम अगेंस्ट वार ऑन पीपुल नाम का एक फोरम बना है, जिसमें अरुंधति राय, सरोज गिरी, गौतम नवलखा जैसे अनेक जाने-माने लोग और पीयूसीएल, पीयुडीआर, भाकपा माले (लिबरेशन), आरडीएफ़ जैसे अनेक संगठन शामिल हैं. फोरम ने एक अपील जारी की है. उसे हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं.


जनता पर युद्ध के खिलाफ अखिल भारतीय कन्वेंशन
सुबह 9 बजे-शाम 6 बजे तक, 4 दिसंबर 2009 (शुक्रवार)
राजेंद्र भवन, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आइटीओ के नजदीक, दिल्ली

जैसा कि आप आगे पढ़ेंगे, भारतीय राजसत्ता द्वारा एक नवंबर से शुरू हो चुके जनता के खिलाफ युद्ध के कई हफ्ते बीत चुके हैं. मारे जानेवाले आदिवासियों-जो भारत सरकार के इस शिकार के प्रमुख पीड़ित हैं-की संख्या बहुत बढ़ गयी है. युद्ध क्षेत्र से कभी कभार आ जानेवाली मीडिया खबरों के मुताबिक मृतकों की संख्या रोज-ब-रोज बढ़ रही है. उसी तरह जलाये गये गांवों, विस्थापितों, घायलों और गिरफ्तार लोगों की संख्या भी बढ़ रही है. हमने सुना है कि सीआरपीएफ, कोबरा, सी-60, ग्रेहाउंड्स, भारत तिब्बत सीमा पुलिस, नक्सल विरोधी टास्क फोर्स और अर्ध सैनिक बलों और पुलिस बलों के संयुक्त दल ने वायुसेना के हेलिकॉप्टरों और अमेरिकी खुफिया सैटेलाइटों की मदद से सेना के शीर्ष अधिकारियों के नेतृत्व में दंडकारण्य और इसके आसपास के इलाकों में ऑपरेशन शुरू कर दिया है. नवंबर के मध्य में 12 से अधिक गांव पूरी तरह मिटा दिये गये, उनके निवासियों को जंगल में और अधिक भीतर शरण लेने पर मजबूर किया गया. दंडकारण्य में दो अलग-अलग और उड़ीसा में एक जनसंहार की घटनाएं सामने आयीं, जिनमें 17 से अधिक आदिवासी सरकारी सैन्य बलों द्वारा मारे गये. लालगढ़ में ताजा हमले में सैकड़ों प्रतिरोधरत आदिवासियों के बेघर कर दिया है. यदि भारत सरकार इस सैन्य हमले को तुरंत नहीं रोकती है तो इसकी बहुत आशंका है कि मारे गये और घायल लोगों के साथ विस्थापित लोगों और नष्ट कर दिये गये गांवों की संख्या में आनेवाले हफ्तों में इजाफा ही होगा.

भारत सरकार महीनों से इस व्यापक सैन्य हमले की तैयारी करती रही है, जिसमें लगभग एक लाख सैनिकों की तैनाती, उन्हें अत्याधुनिक हथियारों से लैस करना, वायुसेना को हवाई हमलों की इजाजत देना और भारतीय सेना को न सिर्फ प्रशिक्षण और समन्वय के लिए बल्कि ऑपरेशन के नेतृत्व के लिए और अगर जरूरी हुआ तो सक्रिय हिस्सेदारी के लिए भी तैयार करना शामिल है. ऐसी खबरें भी हैं कि अमेरिकी खुफिया और सुरक्षा अधिकारियों ने भारत सरकार को यह युद्ध चलाने के लिए 'सलाह मशविरा' दिया है. मीडिया खबरों के मुताबिक मध्य और पूर्वी भारत के पूरे जंगली इलाके को सात ऑपरेटिंग एरिया में बांटा गया है, जिसे सरकार पांच सालों के भीतर माओवादियों सहित हर तरह के प्रतिरोध से 'साफ' करना चाहती है. इस युद्ध का खर्च पहले ही 7300 करोड़ रुपये आंका जा चुका है.

जनता के खिलाफ इस युद्ध के उद्देश्यों के बारे में कोई भ्रम नहीं है. यह युद्ध कॉरपोरेट्स की तरफ से उनके फायदे के लिए भारत सरकार द्वारा आदिवासियों के जीवन को निशाना बनाते हुए लड़ा जा रहा है. विश्वव्यापी साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था अभी 1929 के बाद से सबसे गंभीर संकट झेल रही है, अपनी सभी निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को मंदी के दलदल में और गहरे तक डुबोते हुए. सैन्य औद्योगिक तंत्र-जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों और भारत के बड़े व्यावसायिक हित हैं-युद्ध चाह रहा है, जिसके जरिये वह संकटग्रस्त बाजार में अपने उत्पादों के लिए एक कृत्रिम मांग पैदा कर सके. इससे भी अधिक घरेलू और विदेशी कॉरपोरेशन देश की खनिज संपदा को हथियाने के लिए बेताब हैं, जिसकी कीमत अरबों डॉलर है, जो कि मध्य और पूर्वी भारत के व्यापक जंगली इलाके में फैला हुआ है. एक बार हाथ लग जाने के बाद यह संपदा इन कॉरपोरेशनों के लिए अगले कई दशकों तक बेतहाशा मुनाफे की गारंटी कर देगी. माइनिंग कॉरपोरेशनों द्वारा राज्य सरकारों से इस इलाके की जनता की संपदा को पूरी आजादी से लूटने की इजाजत देनेवाले सैकड़ों समझौते और करार (एमओयू) पहले ही किये जा चुके हैं. कॉरपोरेशनों ने इस प्राकृतिक संपदा को हथियाने की राह में खड़ी सभी कानूनी बाधाएं आसानी से दूर कर ली हैं. एकमात्र बाधा जो उनके और इस अपार संपदा के बीच में खड़ी है, वह है जनता का हर तरह का प्रतिरोध, भले ही वह हथियारबंद हो या बिना हथियारों के. नंदीग्राम से लेकर नियमगिरी तक, लालगढ़ से दंडकारण्य तक, कोरापुट से कलिंगनगर तक जनता 'विकास' के नाम पर सरकार द्वारा थोपी जा रही नवउदारवादी नीतियों की महज शिकार होने से इनकार कर रही है. पुलिसिया दमन से लेकर सलवा जुडूम तक, हर तरह के बल प्रयोगों के बाद, जो जनता के आंदोलनों को रोक पाने में विफल रहे, भारत सरकार ने अब न सिर्फ माओवादी आंदोलन के खिलाफ-जो कि 'सबसे बड़ा आंतरिक खतरा' बताया जा रहा है-बल्कि सभी जनांदोलनों के खिलाफ, जो सरकार की नीतियों को चुनौती देते हैं, युद्ध छेड़ दिया है. ऐसा करके, वह न केवल हर तरह की असहमत आवाजों और जनवादी अधिकारों को ध्वस्त करने की कोशिश कर रही है, बल्कि एक बेहतर समाज और सम्मान के साथ एक बेहतर जीवन की शोषित-उत्पीड़ित जनता की आकांक्षाओं को भी नष्ट करना उसका उद्देश्य है.
Forum Against War on People
Contact: stopwaroncitizens@gmail.com

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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