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बीच सफ़हे की लड़ाई

लेवी स्ट्रास को समझने के बारे में

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/14/2009 05:41:00 AM

कुछ दिनों पहले लेवी स्ट्रास नहीं रहे. अगर आप साहित्य और मानविकी के पाठक-छात्र हैं तो उन्हें नज़र अंदाज करना मुश्किल है. हम उन्हें बाद में थोडा विस्तार से जानने की कोशिश करेंगे. अभी उनके बारे में संक्षेप में बता रहे हैं नीरज कुमार तिवारी.


प्रख्यात नृवंशशास्त्री और संरचनावाद के जनक क्लाड लेवी स्ट्रास नहीं रहे। 30 अक्टूबर को अपने 101वें जन्मदिन से 29 दिन पहले एकांत में रहने के आदि स्ट्रास अपने गहनतम एकांत में जाने से पहले चिंतन की गहरी सामग्री छोड़ गये हैं। वे सदी के उन विरले चिंतकों में थे जिनके विचार और सिद्धांतों ने समाजशास्त्रियों और दार्शनिकों की दुनिया पर गहरी छाप छोड़ी। ऐसी छाप जिसे मिटाना शायद कभी संभव नहीं होगा। वे पिछले 7-8 दशकों से हमारे सांस्कृतिक-सामाजिक चिंतन का न केवल सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा थे बल्कि उन्होंने आधुनिक समाज की चिंतन विधि को ही एक हद तक बदल दिया था। अंतिम दिनों में आवास के तौर पर उन्होंने पेरिस के करीब के एक गांव को चुना था। कई सालों से उन्हें सार्वजनिक मंचों पर नहीं देखा जा रहा था लेकिन किसी भी मंच पर यदि समाजशास्त्र और नृवंशविज्ञान की बात होती तो अशरीरी तौर पर उनकी मौजूदगी जरूर बनी रहती। फ्रेंच ज्यूस परिवार की संतान स्ट्रास का जन्म बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में हुआ था। उन्होंने जीविकोपार्जन के लिए एक सीनियर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया और फिर 1935 में फ्रांस के सांस्कृतिक मिशन की इकाई के रूप में ब्राजील चले गये। वहां जाकर उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। उन्होंने ब्राजील के घने जंगलों में अनेक रातें आदिम जनजातियों के साथ बितायीं। ग्वेकरू और बोरेरो इंडियन जनजाति पर अध्ययन करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। वे 1939 तक ब्राजील में रहे और इस दौरान जनजातियों पर व्यापक अध्ययन करने के साथ-साथ विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर साआ॓पालो विश्वविघालय में पढ़ाते भी रहे। ब्राजील से लौटने के बाद उन्होंने विश्वयुद्ध का घिनौना दौर देखा जिसमें नस्लीय श्रेष्ठता को एक बड़ा आधार बनाया जा रहा था। युद्ध के दौरान उन्होंने अपना ठिकाना न्यूयार्क को बनाया और वहां से 1948 में पेरिस लौटे। इसके बाद का उनका अधिकांश समय फ्रांस में ही बीता लेकिन दुनिया के दूर दराज के हिस्सों की उनकी यात्राएं जारी रहीं। दरअसल उनका दौर विश्वयुद्धों और शीत युद्ध का दौर था जिसमें मानव समुदायों को कई आधार देकर धड़ों में बांटा जा रहा था। ऐसे में उन्होंने महामिथक के इधर-उधर बिखरे ताने-बाने को जोड़ा और यह साबित करने का प्रयास किया कि विश्व में अंतत: एक ही परिवार के मानव रहते हैं। उन्होंने अप्रत्यक्षत: यहूदियों की रिश्तेदारी जर्मनों से बताई और उनकी नजरों में ब्रिटिश मूल और रेड इंडियन के बीच भी पारिवारिक संबंध थे। स्ट्रास मशहूर भाषाविज्ञानी सॉस्योर से प्रभावित थे। सॉस्योर मानते थे कि शब्दों के अर्थ का निर्धारण बाहरी दुनिया की चीजों के संदर्भ से नहीं बल्कि संकेतों के जरिये होता है। लेवी स्ट्रास का सबसे बड़ा योगदान नृवंशशास्त्र के क्षेत्र में है। उन्होंने आदिम जातियों पर जम कर काम किया और आधुनिक समाज के कई पूर्वाग्रहों को खत्म किया। उन्होंने यह स्थापना दी कि शहराती या आधुनिक मानवों से कहीं अधिक आदिवासियों की संस्कृति उन्नत है। स्ट्रास ने यह भी बताया कि आदिवासी समाज के चिंतन का आधार भी काफी उन्नत और परिष्कृत है। उनके समाज को जितना सरल समझा जाता है, वैसा नहीं है बल्कि उसमें भी जटिलताएं हैं। उन्होंने दक्षिण अमेरिका के आमेजन इलाके को छान मारा। उनसे पहले इन इलाकों के आदिवासी समाज के बारे में बहुत कम पता था और जो पता भी था, उसमें कई विरोधाभास और पूर्वाग्रह थे। उन्होंने लोककथाओं के क्षेत्र में भी अविस्मरणीय काम किया। उन्होंने आमेजन प्रदेश में विविध लोक कथाओं की छानबीन की और यह स्पष्ट किया कि वे कई तरह से एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और उनके फार्मेट में भी गजब की समानताएं हैं। उन्होंने यह व्याख्या दी कि समस्त समुदायों का व्यवहार लोककथा और लोक परंपरा की स्मृतियों के आधार पर निर्धारित होता है। स्ट्रास ने संरचनावाद के मूल सिद्धांत को भाषावाद से बाहर संस्कृतियों के अध्ययन में किया। वे भिन्न-भिन्न संस्कृति की संरचना में, मिथकों के अध्ययन में संरचनावाद लागू करते हैं और कहते हैं कि हर मिथक भी छोटे मिथकीय हिस्सों से निर्मित हैं। वे कहते थे कि ‘मैं यह नहीं दिखाना चाहता कि मनुष्य मिथकों में कैसे सोचते हैं बल्कि मैं यह बताना चाहता हूं कि मिथक कैसे मनुष्य मस्तिष्क और विचार प्रणाली का संचालन करते हैं।’ उनका मानना था कि मिथकों की संरचनाएं मनुष्य की मानसिक संरचना से मेल खाती है और साथ ही यह भी कि मनुष्य के दिमाग में मिथक बनने से पहले मिथकों की संरचना मौजूद रहती है। यह संरचना ही उस कर्ता की चेतना का निर्माण करती है जो इस गफलत में रहता है कि अपनी चेतना और अपनी इच्छाशक्ति का स्रोत वह खुद ही है। उनका कहना था कि मनुष्य मिथक नहीं गढ़ता बल्कि मिथक मनुष्यों को गढ़ते हैं। उनके विचारों की अपने दौर में जम कर आलोचना भी हुई। ज्यां पाल सार्त्र उनकी इस बात से सहमत नहीं थे कि मनुष्य का अपना कोई स्टेटस नहीं है। अस्तित्ववादी सार्त्र अक्सर उनसे टकराते रहे फिर भी उनके विचारों की पैठ दिन-ब-दिन गहरी होती गई। पचास-साठ के दशक में सार्त्र जब कमजोर हो रहे थे लेवी स्ट्रास के विचार सामाजिक  विज्ञान, समाज शास्त्र, साहित्य और दर्शनशास्त्र को प्रभावित करने लगे थे। जॉक देरिदा और मिशेल फूको जैसे विचारकों ने उनके विचारों को न केवल स्वीकारा बल्कि अपने सामाजिक विश्लेषणों में उसका प्रयोग भी किया। लेवी  स्ट्रास की महानता इस बात में भी छुपी हे कि उनके काम को कोरी बौद्धिकता के रूप में नहीं स्वीकारा जा सकता। उन्होंने जो थ्योरी गढ़ी, जो काम किया वह ठोस जमीनी शोध पर आधारित है। उन्हें बौद्धिक वर्ग जितना अपना मानता था उतना ही सर्वहारा वर्ग भी। कई लोग उन्हें मार्क्सवादी चिंतक के रूप में देखते हैं लेकिन उनके विचार को किसी खांचे में नहीं रखा जा सकता। वे नहीं किंतु उनकी कई प्रसिद्ध किताबें बची हैं। इन किताबों में ‘माइथोलाजीज’, ‘द सैवेज माइंड’, ‘द रा एंड द कुक्ड’ अहम हैं।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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