माओवादियों के नाम एक खुला ख़त
Posted by Reyaz-ul-haque on 11/09/2009 02:33:00 PMलालगढ़ में जारी आंदोलन ने कई चीज़ों को जन्म दिया है। इसने जनआंदोलन को एक ऐसे ऊंचे स्तर पर पहुंचाया है जहां विभिन्न रूपों में राज्य के दमन के ख़िलाफ़ चल रहा आंदोलन आदिवासी भाषा तथा लिपि के विकास, जनोन्मुखी विकास के एक नए मॉडल तथा ’औद्योगिकीकरण’ के नाम पर जारी स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट और उन्हें देशी-विदेशी बड़े पूंजीपतियों के हाथों सौंपे जाने के ख़िलाफ़, निर्णायक लड़ाई से जुड़ गया। यह ऐतिहासिक आंदोलन अपनी प्रकृति में कई तरह के विवादों को भी ग्रहण किए हुए है; इसमें माओवादियों के शामिल होने, पुलिसिया अत्याचार विरोधी जनसाधारण समिति और माओवादियों के बीच के रिश्ते तथा इस आंदोलन के विकास के विभिन्न चरणों में शामिल नागरिक समाज तथा जनता के विभिन्न हिस्सों द्वारा महसूस की जा रही समस्याओं की प्रकृति के बारे में काफ़ी विवाद है। इस बारे में कोलकाता से निकलने वाले दैनिक समाचार पत्रों में कई आलेख छपे हैं जो अन्य राज्यों में लोगों को उपलब्ध नहीं हैं। ये बहसें अपने विषयवस्तु में मज़बूत हैं अतः हमने सोचा कि तर्कों और प्रति-तर्कों को जितने लोगों तक संभव हो सके पहुंचाया जाए। लोकतंत्र की कार्यपणाली, ग़लत धारणाओं को ठीक करने तथा किसी दृष्टिकोण को निर्मित करने/बदलने/सुधारने/ठोस करने में ये बहसें बहुत अच्छी हैं। हमने तीन आलेखों को चुना है। ये सभी खुले पत्र तथा प्रतिक्रियाओं के रूप में आए हैं। पहला आलेख ’माओवादियों के नाम एक खुला ख़त’ शीर्षक से पश्चिम बंगाल के जाने-माने नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सुजातो भद्र का है। यह आलेख 26 सितंबर को छपा ’दैनिक स्टेट्समैन’ में छापा है। कल पढिए इसी अखबार में छपा किशन जी का जंगल महल से जवाब, जो माओवादियों के सबसे चर्चित नेता हैं। मूल बंगाली से अनूदित अंग्रेज़ी आलेखों का यह हिंदी अनुवाद है। अंग्रेज़ी के ये आलेख रैडिकलनोट्स नामक पोर्टल से साभार लिए गए हैं।
माओवादियों के नाम एक खुला ख़त
सुजातो भद्र
यह लेखक पश्चिम बंगाल में कुछ दशकों से नागरिक अधिकार/मानवाधिकार आंदोलन से जुड़ा भारत का नागरिक है। आप लोगों को मालूम ही होगा कि इस राज्य में आपकी सशस्त्र गतिविधियों तथा उसको आधार बनाकर राज्य द्वारा छेड़े गए भयंकर हिंसक तथा निर्दयी दमन ने एक बहस खड़ी की है।
जैसा कि आप जानते हैं, पिछले नवंबर (2008) में लालगढ़ सहित जंगल महल में जारी पुलिसिया दमन तथा आतंक के ख़िलाफ़ नागरिक समाज मुखर हुआ था। पुलिसिया दमन विरोधी जनसाधारण समिति द्वारा रखे गए मांग पत्र को नागरिक समाज तथा कई संगठनों को पूरा पूरा समर्थन मिला था। जून 18 के बाद जो कुछ घटित हो रहा था उसके बारे में नागरिक समाज सचेत था; संयुक्त बलों द्वारा किए जा रहे दमन के बारे में इसने हर समय अपनी आवाज़ उठाई; संयुक्त बलों की वापसी की मांग उठाई तथा सरकार से सभी दलों से बातचीत करने की मांग की। हमने (राज्य द्वारा) आपके संगठन पर ’आतंकवादी’ का ठप्पा लगाने का पुरज़ोर विरोध किया। नागरिक समाज का एक असहमत हिस्सा ग़ैर क़ानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम (UAPA) को भी हटाने की प्रबलता से मांग कर रहा था। संक्षेप में, नागरिक समाज राज्य-दमन तथा आतंक को एक क्षण के लिए भी बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है। हममें से अधिकतर ’विस्फ़ोटक स्थिति’ जैसे नमूने के कोई पक्षधर नहीं है।
हमारे प्रतिरोध का मूल आधार लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति हमारी निष्ठा, मानवतावाद तथा नैतिकता से उत्पन्न चेतना है। हम मानते हैं कि ऐसे तत्त्व वर्गीय दृष्टिकोण से निर्देशित राजनीति के भी अंग तथा मूल्य होने चाहिए। यही वे विचार हैं जिनके कारण मुझे लगता है कि आपकी कुछ गतिविधियों में तार्किक चिंतन की कमी है। कुछ घटनाएं यहां तक कि हमारी चेतना पर भी चोट करती हैं और हमें दर्द पहुंचाती हैं।
आपकी पार्टी पहले भी ऐसे सवालों का सामना करती रही है। आपने आंध्रप्रदेश के ’चिंतित नागरिकों’ (Concerned Citizens) को खुले पत्र द्वारा जवाब दिया था, मैंने कुछ प्रसिद्ध लोगों (जैसे रामचंद्र गुहा तथा अन्य) द्वारा उठाए गए (छत्तीसगढ़ केंद्रित) सवालों पर आपके जवाबों को भी देखा है। उस समय भी आप लोग भूमिगत पार्टी के रूप में काम कर रहे थे। हाल में, घोषित प्रतिबंधों तथा दमनकारी काले क़ानूनों की वजह से स्थितियां निस्संदेह, आप लोगों के लिए और कठिन हो गई हैं।
अब हमारे पास कोई क़ानूनी जगह नहीं है जहां से हम आपके विचारों को जान सकें और उन्हें अपनी तरफ़ से जवाब दे सकें। हम इस तथ्य की सराहना करते हैं कि ऐसे राज्य दमन तथा घुटन भरे वातावरण का सामना करते हुए भी आप लोग खड़े हैं। आपके आक्रोश को समझते हुए भी, आपकी कुछ गतिविधियों पर मुझे संदेह है। मैं उन चीज़ों को, आप लोग जिन कठिन स्थितियों में हैं उसका ख़याल रखते हुए, सामने रख रहा हूं। आप लोगों से विनम्र आग्रह है कि इनका (आलोचनात्मक और मुश्किल निरीक्षणों का) जवाब देंगे।
आपके ’माओवादी हिंसा’ नामक एक लीफ़लेट में कहा गया है:
“.... हिंसा का दृष्टिकोण वर्गीय होता है, यह कभी तटस्थ नहीं होती.... सिर्फ़ सशस्त्र संघर्ष और जन-युद्ध ही जनता के जनवादी संघर्षों का विकास तथा विस्तार करेगा..... हमारा काम हिंसक नहीं है, हिंसा को ख़त्म करने के लिए यह जनता की हिंसा है जो जन युद्ध का हिस्सा है।“ (दिनांक: 18-07-09)
मैं इस राजनीतिक नज़रिए का पक्षधर नहीं हूं। एक वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टिकोण के आधार पर मैं इसका विरोध भी नहीं कर रहा हूं। इसके प्रतिकूल, मैं अपने आप को आपकी तार्किक संरचना में रखकर सवाल उठाऊंगा: कोई हिंसा की धारणा पर बातचीत कर सकता है और इसे एक सैद्धांतिक धरातल पर लागू करेगा; क्रियान्वयन के वक़्त इसमें समस्याएं खड़ी हो सकती हैं और इससे निश्चित तौर पर एक सामाजिक प्रभाव जन्म लेता है। इसका संबंध लालगढ़ तथा अन्य लोकतांत्रिक आंदोलनों के समर्थकों के बीच उपजी गहन प्रतिक्रियाओं से है।
सिर्फ़ आप लोग ही क्यों, समूचे युग में ऐसे कई दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने स्पष्टतः कहा है कि न्याय की स्थापना सिर्फ़ हिंसा के सहारे ही की जा सकती है।(?) उदाहरण के लिए, सार्त्र ने लिखा है, “हिंसा स्वीकार्य है क्योंकि सभी महान बदलाव हिंसा पर आधारित रहे हैं।“ (द आफ़्टरमथ ऑफ़ वार, पृ. 35) वे यह जोड़ना भूल गए कि इतिहास ने ख़ुद साबित किया है कि हिंसक साधनों के द्वारा गढ़ा गया समाज ज़्यादा समय तक नहीं टिक पाया। हिंसा के द्वारा कुछ अच्छा भी हासिल किया जा सकता है इसमें भी भारी संदेह है। यह अवधारणा कि “साध्य साधन को न्यायनिर्णीत साबित करेगा” न्याय तथा नैतिकता की धारणा को ख़ारिज़ करती है; और परिणाम यह होता है कि “साधन साध्य पर भारी पड़ता है।“
आपने बड़ी ही तरल शब्दावली में घोषित किया है कि क्षेत्र (जंगल महल) की जुझारू जनता ने सीपीआई (माओवादी) के नेतृत्त्व में जन अदालत लगाई और उन लंपट तत्त्वों (सीपीएम के हरमद) को वो सज़ा दी जिसके, पुलिस मुखबिर होने के वे नाते पात्र थे। (प्रेस विज्ञप्ति, दिनांक, 16-08-09)
हमारा विरोध यहां इस मृत्यु दंड के सवाल पर है। पूरी दुनिया में भारत समेत कई लोगों तथा नागरिक अधिकार संस्थाओं ने मृत्यु दंड (क़ानूनी हत्या) के अंततः उन्मूलन के लिए एक जनमत तैयार किया। परिणामस्वरूप, दुनिया के अधिकतर देशों (224 देश) ने मृत्यु दंड को ख़त्म कर दिया गया। इसका कारण यह है कि यह प्रचलन बर्बर तथा क्रूर है। सर्वोपरि, यह किसी रोकथाम/निवारक के रूप में भी काम नहीं करता। सर कलम करना एक दोषी को अपने आप को सुधारने का मौक़ा नहीं देता। इतना ही नहीं, निर्णय में किसी चूक की भी संभावना हो सकती है। दंडित करने के बाद अगर यह पाया जाता है कि सज़ायाफ़्ता व्यक्ति निर्दोष था तो कोई भी उसका जीवन नहीं लौटा सकता। प्रतिकूलतः, ऐसी हिंसक सज़ाएं समाज को और अमानवीय तथा और हिंसक बनाती हैं। बहुत समय पहले, टॉम पेन ने कहा था, “आदमी अपनी प्रकृति से हिंसक नहीं होते, वे राज्य द्वारा इस्तेमाल किए गए क्रूर तरीक़ों को सिर्फ़ पुनः आजमाते हैं।“ हम राज्य द्वारा इस्तेमाल में किए जाने वाले इन क्रूर तरीक़ों का प्रबल विरोध करते हैं। साथ ही साथ, हम यह भी कहते हैं कि इस असमान तथा वंचित समाज में शोषित लोगों के बीच अगर ’आंख के बदले आंख’ या ’जीवन के बदले जीवन’ जैसी धारणाएं जड़ें जमा लीं तो जनता की ओर से हिंसक मानसिकता का भयंकर विस्फ़ोट होगा; अभी यही हो रहा है। आप लोग सामाजिक रूपांतरण के लिए संघर्ष करने वाले सर्वोच्च तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। नेतृत्त्वकारी दस्ते के रूप में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए? आप हिंसक भावनाओं को बढ़ावा देंगे, या सर्वोच्च लोकतांत्रिक भावनाओं का विस्तार करेंगे और उस रास्ते पर चल रहे अपने से प्रभावित लोगों को दिशा-निर्देश देंगे?
’जन’ अदालत का सांगठनिक ढांचा क्या है? क्या यही कि आरोप लगाने वाले ही न्यायाधीश हैं और कलम करने वाले भी वे ख़ुद ही है? यह याद करना ज़रूरी होगा कि राज्य द्वारा स्थापित किए गए न्यायिक व्यवस्था में कुछ निश्चित मान्य चरण होते हैं, न्यायिक प्रक्रियाएं होती हैं, नियमित और अलग से व्यवस्थित न्यायिक संरचना होती है, उच्च न्यायालयों में अपील करने का अधिकार होता है और राष्ट्रपति के हाथों क्षमादान का अधिकार होता है। इन सबके बावजूद, हम वैधानिक हत्या की व्यवस्था के उन्मूलन की मांग करते हैं। अतः हम कैसे और किन लोकतांत्रिक, मानवाधिकारों अथवा न्यायसंगत मुक़दमे के मूल्यों के अंतर्गत ऐसी ’जन अदालतों’ के मुक़दमों तथा सज़ा देने के फ़ैसले को स्वीकार कर लें?
जम्मू और कश्मीर तथा उत्तर-पूर्व में सशस्त्र बल सोचते हैं कि वहां रहने वाले सभी लोग ’संदेहास्पद’ हैं; वे ’सभी पर संदेह करो’ के नारे के साथ बड़ी होर्डिंग्स टांगते हैं। क्या आप भी उसी तरह नहीं कर रहे हैं। आपके निर्णय में प्रत्येक सीपीएम समर्थक या व्यक्ति हरमद गैंग का अंग है और छद्म रूप में पुलिस बल के लिए काम कर रहा है। जब तक वे जनता के सामने आत्म-समर्पण नहीं कर देते, तब तक उन्हें मौत की सज़ा दी जाएगी। ऐसे तरीक़े आपकी सत्ता के लिए ज़रूरी होंगे, लेकिन ये मूल्यों की भावना से रहित हैं। आप लोगों ने कई ’मुखबिरों’ को मृत्यु दंड दिए हैं; कोई नहीं जानता कि अभी और कितनों का ऐसा ही हश्र होगा जब तक कि बाक़ी लंपट लोग जनता के आगे आत्मसमर्पण नहीं कर देते। यह इसलिए क्योंकि सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि इस बारे में आप क्या सोचते हैं। आपने कहा है : “उन लंपटों को खुला छोड़ देने का मतलब संघर्षशील तथा क्रांतिकारी जनता को संयुक्त बलों के हाथों सौंपना होगा।“ (प्रेस विज्ञप्ति, 16-08-09) मनोवैज्ञानिक क्रिस्टोफ़र बोलास ने जो कहा है उसके प्रकाश में देखिए, “जब हत्यारा किसी को मारता है तो प्रत्येक समय यह उसकी ही मौत होती है जिसे वह टालता है।“ इसका मतलब है कि ऐसे आक्रमण भय तथा आशंका के चलते होते हैं। सवाल है कि: अगर उस क्षेत्र में आपका सामाजिक आधार है, तो मुखबिरों को सामाजिक तौर पर अलग-थलग कर देना संभव है। वहीं दूसरी तरफ़, अगर आपके राजनीतिक विरोधी विचारधारात्मक संघर्ष करते हैं, और ऐसे ठप्पा लगाकर उन्हें शारीरिक रूप से ख़त्म कर देते हैं, तो इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि आप लोगों की गतिविधियों में कहीं प्रचंड ’अतार्किकता’ का समावेश है। यथार्थ में, लालगढ़ मृत्यु की घाटी हो गया है, और वहां से मौत का संदेश चारो तरफ़ घूम रहा है। क्या जासूसों/गुप्तचरों से लड़ने के लिए उनको मारने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है? आप लोगों के नेतृत्त्व में उन मुखबिरों का पर्दाफ़ाश करने के लिए लोग क्या कोई तरीक़ा नहीं अपनाते? मार्क्स ने गुप्तचरों का पर्दाफ़ाश करने के लिए दास कैपिटल को लिखना छोड़, हेर वोग्ट नामक एक पूरी किताब ही लिख डाली थी। और माओ तो इनमें से कुछ ही को ख़त्म करने के पक्ष में थे।
ऐसे मामलों में, प्रचार और पर्दाफ़ाश करने की कोशिश जहां एक तरफ़, कोई नकारात्मक सामाजिक प्रतिक्रिया नहीं उत्पन्न करेगी, वहीं दूसरी ओर, राज्य आपको ख़त्म करने की न सिर्फ़ किसी ग़ैर-क़ानूनी कोशिश में बल्कि सामाजिक तौर पर भी सक्षम नहीं हो पाएगा। अगर यह नहीं किया जाता है, तो हम एक भयंकर स्थिति का सामना करेंगे: अचलायमान, उसी तरह के मानव जन होंगे। हिंसा, प्रति-हिंसा, दमन तथा प्रति-आक्रमण से ग्रस्त स्थितियों में लोकतांत्रिक लोगों को गोलबंद करना और प्रतिरोध की आवाज़ बुलंद करना संभव नहीं होगा। हम जो तीसरी शक्ति (जो न तो राज्य के साथ हैं और विचारधारात्मक आधारों पर न तो आपके साथ) से ताल्लुक़ रखते हैं अपने आप को असहाय स्थितियों में पाएंगे। एक विकल्प के रूप में, लालगढ़ में निर्मम राज्य दमन के ख़िलाफ़ लोकतांत्रिक आदोलनों को एकताबद्ध कर एक तूफ़ान खड़ा करने में हम सक्षम थे, तभी तो हमने यह पाया कि हम नागरिक समाज के लोग, जो लोकतांत्रिक भावनाओं से ओतप्रोत तथा सिंगूर तथा नंदीग्राम में मिले सबक़ से प्रेरित हैं, शक्तिशालियों पर कमज़ोरों की विजय सुनिश्चित कर सकेंगे। प्रारंभिक दौर (नवंबर ’08 से जून ’09) में यह विजय निश्चित तौर हासिल हुई थी।
आप लोगों ने कुछ प्रसिद्ध लोगों के बारे में अपना निर्णय करते हुए उन्हें मृत्यु दंड देने का फ़ैसला किया है। जैसा कि आपने कहा है, यह जनता की मांग थी। सालबनी विस्फ़ोट में मुख्यमंत्री को जान से मारने की कोशिश की गई। यह सच है कि मुख्यमंत्री जनसंहार का आरोपी है। यह भी सच है कि नंदीग्राम में 14 मार्च के संहार के बाद पोस्टर और तख़्तियों द्वारा “मुख्यमंत्री को फांसी दो” की मांग की गई थी। लेकिन हम सभी महसूस करते हैं कि ऐसा भयंकर ग़ुस्सा तात्कालिक व्यथित भावनाओं की उपज था। लेकिन अगर उसे मारने के लिए इसे जनता की गंभीर और तार्किक मांग के रूप में व्याख्यायित किया जाता है, तो, मैं कहने के लिए बाध्य हूं, कि यह पूरी तरह बचकाना है। किसी पर ’तानाशाह’ का ठप्पा लगाकर उसे मारने की कोशिश करना, बेतुका और अराजक दर्शन का प्रतीक है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि अराजकतावादी दर्शन को नकार कर मार्क्सवाद का दर्शन पूरी दुनिया में स्थापित हुआ है। मार्क्सवाद से लेकर माओवाद तक में दार्शनिक तथा सैद्धांतिक स्तर पर कभी ऐसे व्यक्ति केंद्रित आक्रमणों को स्थापित किया गया हो, मेरी जानकारी में ऐसा नहीं है।
माओ त्से-तुंग के पसंदीदा सैन्य रणनीतिकार कार्ल वॉन क्लॉजेवित्ज़ ने लिखा है, राजनीति की तरह, युद्ध का भी एक विशेष उद्देश्य होता है; लेकिन वहीं युद्ध उस समय राजनीति का निषेध करता है; संबंधित पार्टियां अपने सैन्य बलों को परेड कराने में व्यस्त हो जाती हैं। युद्ध और उन्मूलन विध्वंस को जन्म देते हैं, लेकिन ऐसा विध्वंस न सिर्फ़ दुश्मन का होगा, बल्कि यह आपके पक्ष को भी कुछ नुक़सान पहुंचाएगा। और इस युद्ध का कोई अंत भी नहीं है।
दोस्त और दुश्मन हमेशा एक दूसरे को ’दुष्ट शक्तियां’ ठहराते आए हैं। सवाल है कि; दुष्टों से छुटकारा पाने के लिए हम ख़ुद उसकी ताक़त से प्रभावित हो जाते हैं। हमें एक चेतावनी के महान संदेश को नहीं भूलना चाहिए: “ जो लोग राक्षसों से लड़ते हैं उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रक्रिया में कहीं वे ख़ुद राक्षस न बन जाएं“ (अच्छाई और बुराई से परे)। प्रति-हिंसा, प्रति-आक्रमण – यह सभी मानव जाति की स्वाभाविक प्रतिक्रियाएं हैं। इनके लिए किसी विशेष दर्शन की आवश्यकता नहीं होती। दर्शन, दूसरी ओर, तार्किक चिंतन के साथ ऐसी प्रतिक्रियाओं को रोक सकता है, नीतियां बनाते समय नैतिकता तथा मानवीय मूल्यों की धारणाओं को अविछिन्न तत्त्व बना सकता है। मुझे लगता है कि इन मामलों पर आप लोगों की गंभीर सीमाएं हैं।
अभी हाल ही में, पुलिस ने आपके दो प्रमुख सदस्यों को गिरफ़्तार किया, लेकिन उन्हें समय से न्यायालय में नहीं पेश किया। अपनी प्रेस विज्ञप्ति में आपने ठीक ही दावा किया था कि पुलिस ने 24 घंटों के भीतर उन्हें न्यायालय में पेश न करने क़ानून का उल्लंघन किया है और नागरिक अधिकार संगठनों से हस्तक्षेप करने की अपील की थी। आपने उन्हें फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मार दिए जाने की उचित आशंका ज़ाहिर की थी। लोगों के प्रतिरोध को देखते हुए पुलिस को उन्हें न्यायालय में पेश करने के लिए बाध्य होना पड़ा। उसके पहले, आपने बुद्धिजीवियों से अपील की थी कि वे लालगढ़ आकर स्वयं देखें कि संयुक्त बलों ने वहां किस तरह का बर्बर उत्पात मचाया है।
ऐसा करते हुए आपने साबित किया है कि, अगर इस संरचना में भी, ’क़ानून के शासन’ को सही तरीक़ों से लागू किया जाए और अगर इसके समर्थन में लोकतांत्रिक आवाज़ें बुलंद की जाएं तो तो राज्य की कुछ ग़ैर-क़ानूनी, मानवाधिकार विरोधी तथा बुरे उद्देश्यों से संचालित गतिविधियों का प्रतिरोध किया जा सकता है। हमारी ज़िम्मेदारी क्या ऐसे सभी मोर्चों को मज़बूत करने की नहीं है ताकि राज्य द्वारा जनता को नागरिक अधिकारों की रक्षा के वायदे के क्रियान्वयन को सुनिश्चित किया जा सके। ऐसे दायरे जैसे ही और बढ़ेंगे, वैसे ही फ़र्ज़ी मुठभेड़ों, संघर्षशील जनता की हत्याओं को रोका जा सकेगा और ’अपराध की संस्कृति’ को अलग थलग तथा परास्त किया जा सकेगा।
यह सब करने के बदले, हम किसी को अपहृत करें, उसे दमित करें और उसके बाद उसे मार कर उसकी लाश गलियों में फेंक दे तो हम ख़ुद राज्य की ही तरह शोषक हो जाएंगे। आपको उन बच्चों के सदमों की ज़िम्मेदारी लेनी ही चाहिए जो उन्हें अपनी ही आखों के सामने हत्या होते देखकर लगेगा। हत्याओं का यह तरीक़ा संवेदनशील लोगों को कभी भी स्वीकार्य नहीं होगा। हम कैसे राज्य के विकृत चेहरे के बदले मानवीय मूल्यों पर टिका समाज निर्मित करने में लोगों को ख़्वाब देखने में सक्षम बना पाएंगे? उसी तरह के निंदनीय तौर-तरीक़ों को अपनाकर हम कैसे इन सपनों को साकार कर सकेंगे?
आपने दावा किया है कि जंगल महल ने सभी लोगों के सामने यह सवाल उपस्थित किया है कि: “आप लालगढ़ में संयुक्त बलों के जारी दमन अभियान का समर्थन करेंगे या हरमद वाहिनी सहित संयुक्त सशस्त्र बलों द्वारा छेड़े गए अत्याचारों के ख़िलाफ़ पुलिसिया दमन विरोधी जनसाधारण समिति के नेतृत्त्व में लालगढ़ की जुझारू जनता के साहसी प्रदर्शन तथा प्रतिरोध आंदोलनों का समर्थन करेंगे? (वक्तव्य, दिनांक, 16-08-09) आपने सभी लोगों से लालगढ़ आंदोलन के पक्ष में खड़े होने की अपील की है।
हममें से कई लोग पुलिसिया अत्याचारों के ख़िलाफ़ आंदोलन को समर्थन और लालगढ़ की जनता की मांगों को निःशर्त पूरा करने की मांग करते रहे हैं। सवाल यह नहीं है। हममें से कई लालगढ़ आंदोलन में आपके समर्थन को भी ग़लत नहीं मानते रहे हैं।
आंदोलन के चरित्र में रूपांतरण के साथ ही समस्या खड़ी होने लगी। यह आपके हिंसा के अनुप्रयोग से जुड़ने लगा। कहने की ज़रूरत नहीं है कि, आप इसे अंतर्विरोधों को देखने के बनाये मार्क्सवादी ’दो-युग्मी’ मॉडल के खांचे का इस्तेमाल कर रहे हैं – या तो कोई इस तरफ़ है या उस तरफ़ यानी दुश्मन की तरफ़; आपमें से कोई इस तथ्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि कोई तीसरे, चौथे या पांचवी जगह पर भी खड़े होकर आंदोलन के पक्ष में खड़ा हो सकता है। इस ’देखने के इतिहास’ पर विद्वानों ने काफ़ी कुछ लिखा है।
हम लगातार जारी राज्य हिंसा तथा इस राज्य में मुख्य सत्ताधारी दल द्वारा किए जा रहे दमन की निंदा करते हैं। साथ ही, हम यह भी महसूस करते हैं कि आप लोगों की घोषित उपस्थिति ने जनसाधारण समिति के नेतृत्त्व में हुए जनउभार तथा आंदोलन की दिशा को पृष्ठभूमि में धकेल दिया। वहीं दूसरी तरफ़, आपके नेतृत्त्व में चल रहे सशस्त्र संघर्ष में कुछ ऐसे नकारात्मक तत्त्व हैं जो इससे राज्य हिंसा के विरुद्ध जनसमर्थन हासिल करने के पक्ष में खड़े हैं। आप इसे महसूस करते हैं या नहीं, हम नहीं जानते। इस इक्कीसवी सदी में – मानवाधिकारों की चेतना के युग में, किसी भी प्रतिरोध आंदोलन में, विशेषकर जो सशस्त्र हो, कुछ वैश्विक चुनौतीपूर्ण धारणाएं उभरी हैं, जिसे हम ’न्यूनतम अमूर्तन दृष्टि’ कहते हैं, जिन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए। सैद्धांतिक तौर पर सूत्रबद्ध करते समय इन्हें ’बुर्जुवाजी’ कहना सिर्फ़ आत्मघाती ही होगा।
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