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बीच सफ़हे की लड़ाई

अपराधियों को बचाने के लिए पुलिस ने जेएनयू छात्रों पर किया लाठी चार्ज

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/23/2009 02:10:00 PM

कल दोपहर से हम इस मामले जूझ रहे थे. जैसा की भाई चन्दन पाण्डेय की इस रिपोर्ट में आप देखेंगे, रसूखवाले अपराधियों को बचाने में पुलिस ने बेहद तत्परता दिखाई. दोपहर बाद साढ़े तीन बजे से पुलिस जेएनयू के गेट पर जमी रही और उसने पूरी कोशिश की कि अपराधी बचा लिए जाएँ. लेकिन जब छात्र अड़े रहे तो उसने निर्ममता से उन पर लाठी चार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े. इसमे बान, कुसुम समेत हमारे कई साथी घायल हुए. लेकिन दुर्भाग्य की बात है की देर रात हुए सभी छात्र संगठनों की मीटिंग में आइसा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे संगठनों के सदस्यों ने इस मामले में छात्रों की ही गलती को रेखांकित किया और माफीनामा जैसा कुछ लेकर आने की कोशिश की, जिस पर अनेक छात्रों और संगठनों ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया. यहाँ भी देखें.




कोई सुने तो शायद ही विश्वास करे कि भारत के सबसे अग्रणी विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ इतना अमानवीय सलूक किया गया। एक मामूली विवाद, जिसमें जेनयू के छात्रों का ज़रा-सा भी दोष नहीं था, पुलिस ने अपराधियों को बचाने के लिए निर्दोष छात्रों पर लाठीचार्ज किया। लाठीचार्ज में पचास से ऊपर छात्र घायल हुए हैं। पंद्रह छात्रों की हालत गंभीर है। सबसे पहले हम निर्दोष छात्रों के स्वस्थ होने की प्रार्थना करेंगे फिर आगे की बात।

घटना कुछ यूं घटी : चार बिगड़ैल रईसजादे जेनयू आये। 24×7 ढाबे पर उन्‍होंने शराब की महफिल जमायी। फिर नशे मे चूर होकर छात्रों से बदतमीजी की। छात्रों ने, जो आजकल सेमेस्टर परीक्षाओं की तैयारी मे लगे हैं, पहले तो इनकी “तमीजदार” हरकतों पर ध्यान नहीं दिया, पर जब एकजुट होकर विरोध करने लगे तो चारों गुंडे भाग निकले।

गुंडों के पास कार थी, इसलिए इनकी रफ्तार के नीचे आने से बाल-बाल बचे लोगों ने विश्‍वविद्यालय सुरक्षा को फोन मिलाया। जेएनयू मेन गेट पर जब सुरक्षाकर्मियों ने इन्‍हें रोका, तब इन चार गुंडों मे से एक ने पिस्टल दिखाया। पिस्टल देखते ही बड़ा दरवाजा बंद कर दिया गया। मेन गेट पर एक नहीं, दस-पंद्रह सुरक्षाकर्मी रहते हैं। जैसे ही मेन गेट बंद हुआ, कहानी शुरू हो गयी। चूंकि विश्वविद्यालय की सुरक्षा का ज़‍िम्‍मा निजी कंपनी के हाथों मे है, इसलिए उनके सारे अधिकार दिल्ली पुलिस के पास गिरवी हैं। उन्‍होंने तुरंत दिल्ली पुलिस को बुला लिया और “महान” दिल्ली पुलिस ने आते ही अपना काम शुरू कर दिया – उन चार गुंडों को बचाने का काम।

ख़बर है कि चारों बेहद शक्तिशाली घराने से हैं। दिल्ली पुलिस कितनी ताक़तवर है या दिल्ली पुलिस का एक हाईस्कूल पास सिपाही (साथ में अधिकारी भी थे) कितना ताक़तवर है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं कि छात्रों तथा सुरक्षाकर्मियों के लाख आग्रह के बावजूद दिल्ली पुलिस की महान सत्ता ने एफआईआर मे पिस्टल को पिस्टल नहीं लिखा। कभी उसे खिलौना बंदूक लिखा, तो कभी लाइटर लिखा, तो कभी कुछ लिखा।

छात्रों की मांग बस इतनी थी कि इन चार गुंडों की शिनाख्त हो। पता तो चले कि ये हैं कौन, जिनके अमीर खानदान की गुलामी दिल्ली पुलिस तक कर रही है, जो आराम से जेनयू मे बंदूकें लहराते दिखाई पड़ते हैं? पर दिल्ली पुलिस ने यह नहीं होने दिया। और अंतत: जो हुआ, वो यह कि सैकड़ों निर्दोष छात्र अपनी मामूली मांग के बदले पुलिस की बेरहम लाठियों से पीटे गये। आंसू गैस के गोले छोड़े गये। हवाई फायर हुआ। ख़बर यह भी है कि कुछ छात्र गोली का शिकार हुए हैं। मैं चाहूंगा कि ये ख़बर अफवाह बन जाए। नौजवानों की मृत्यु की ख़बर से वीभत्स कोई दूसरी ख़बर नहीं होती है।

उन चार गुंडों को बचाने में लगी पुलिस इस कदर मुस्तैद थी कि घटनास्थल पर तीन वैन लाठी-बंदूक से लैस पुलिस पहले ही बुला ली गयी। फिर दो वैन आरएएफ (rapid action force) भी बुला लिया गया। जहां पुलिस अपने सारे काम शातिरपने के साथ पूरी कर रही थी, वहीं छात्र अपनी बात किसी तक पहुंचा नहीं पा रहे थे। मसलन “ताकतवर” मीडिया भी घटनास्थल पर सात बजे के बाद पहुंची है, जबकि छात्र कुछ गुंडों की शिनाख्त की यह लड़ाई दिन के दो बजे से लड़ रहे थे।

विश्वविद्यालय के नख-दंतविहीन सुरक्षाकर्मियों के पास हथियार की जगह वॉकी-टॉकी है। ऐसे में छात्रों के पास बस एक ही हथियार था कि वो मेन गेट खुलने न दें। पुलिस का सारा ज़ोर इसी पर था कि मेन गेट खुले और दिल्ली पुलिस (एसीपी रैंक तक के अधिकारी घटनास्थल पर थे) अपने मालिकों के मुस्टंडे बच्चों को लेकर भाग निकले, कुछ रिश्वत पानी का इंतज़ाम हो, कोई प्रोन्नति मिले।

उन चारों को पुलिस की गाड़ी, जो मेन गेट के अंदर थी, में रखा गया था। आप छात्रों के अनुशासित और मानवोचित विरोध का अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं कि वो चारों मेन गेट के इस पार थे, जहां छात्रों की तादाद पांच सौ से ऊपर थी। फिर भी कोई शारीरिक क्षति उन गुंडों को छात्रों ने नहीं पहुंचायी।

पुलिस की मुस्तैदी का दूसरा नमूना यह निकला कि मीडियाकर्मियों तक को उन चार “बहादुरों” की तस्वीर उतारने की इजाज़त नहीं दी गयी। छात्रों के पास शाम के आठ बजे तक कोई नेता तक नहीं था। हालांकि जो ख़बरें अभी रात के दो बजे तक आयी है कि जिस नेता से उम्मीदें थीं, जब वो सामने आया तो छात्र अपनी लड़ाई और मनोबल दोनों हार गये। क्या आपको लगता है कि ऐसे लोगों का नाम लेना ज़रूरी है?

अभी निहत्थे छात्र अपनी मांग मनवाने की कोशिश कर ही रहे थे कि अचानक से मेन गेट खुल गया और लाठीचार्ज का आदेश हो गया। जो मौक़े पर थे, उनका कहना है कि एक-एक छात्र को पांच-पांच पुलिस वाले पीट रहे थे। छात्राओं तक को नहीं बख्शा गया है। ख़बरों के अनुसार पचास से ऊपर छात्र ज़ख्मी हुए हैं। उन चार गुंडों को पुलिस ने इसी बीच बाहर निकाल लिया। कल से उन गुंडों के पक्ष में दलीलें मिलनी शुरू हो जाएंगी। जो कुछ नहीं कहेगा, वो भी इतना तो कहेगा ही कि – जेनयू के लड़कों को ऐसा करने की क्या ज़रूरत थी? कुछ लोग देश के इन बेहतरीन विद्यार्थियों को पढ़ने और पढ़ते रहने की सलाह देंगे। विश्वविद्यालय के सुरक्षा नियम कुछ और कड़े हो जाएंगे, जो कि छात्रों को ही परेशान करेंगे।

अब जबकि उन चार अमीर गुंडों की पहचान नहीं हो पायी है, तो कायदे से सरकारी महकमा इस पूरी वारदात को झूठा भी करार दे सकता है। मीडिया को सरकारी विज्ञापन पाने का बेहतरीन मौक़ा छात्रों ने खुद लाठी खाकर दिया है। खुद के शरीर पर लाठी खा कर पुलिस वालों को प्रोन्नति पाने के क़ाबिल बनाने वाले छात्रों के प्रति आप क्या सोचते हैं? मैं घटनास्थल पर निहायत निजी कारणों से मौजूद था। अपने जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभिलाषा को असफल होते देख अब मेरे पास लौटने के अलावा कोई चारा नहीं था, पर जब जेनयू के मेन गेट का नज़ारा देखा तो निजी दुख को कुछ पल के लिए किनारे कर वहां मौजूद छात्रों से मिला, सुरक्षाकर्मियों से मिला, पुलिसवालों से बात की। पाया कि छात्रों की मांग बिल्कुल जायज़ थी।

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  1. 5 टिप्पणियां: Responses to “ अपराधियों को बचाने के लिए पुलिस ने जेएनयू छात्रों पर किया लाठी चार्ज ”

  2. By satyendra... on November 23, 2009 at 3:50 PM

    बेहद शर्मनाक घटना हुई। अफसोस... एक बार फिर हमारा वर्तमान तंत्र निकम्मा और लाचार साबित हुआ।

  3. By बी एस पाबला on November 23, 2009 at 7:45 PM

    शर्मनाक हादसा

    बी एस पाबला

  4. By gs on November 24, 2009 at 8:30 AM

    es bat ne 3 sal pahle ujjain me hua sabbarwal kand kee yaad dila di jaha gundo ka nam sabko pata hai fir bhi case aaj bhi chal raha hai.

  5. By Anonymous on November 24, 2009 at 12:22 PM

    सत्येन्द्र जी, तंत्र नाकाम नहीं रहा, बल्कि एक बार फिर कामयाब हुआ-अपराधियों को छुड़ा ले जाने में, जो की उसका काम है.

  6. By dhruv on November 24, 2009 at 3:02 PM

    court case kar do delhi police per....

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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