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बीच सफ़हे की लड़ाई

बिहार के लोग बिहार को बरबाद नहीं होने देंगे : सुशासन बाबू से बातचीत

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/23/2009 07:00:00 PM


साधो राह दुनो हम देखा

सबसे पहला सवाल आपके घोषणा पत्र से. पार्टियां नये-नये वायदे तो करती
रहती हैं और बराबरी व धर्मनिरपेक्षता जैसे नारे लगभग सभी पार्टियों के
होते हैं. लेकिन अक्टूबर,2005 के चुनाव में आपका दो नया नारा था, जो अन्य
पार्टियों से अलग था-वह था 'न्याय के साथ विकास' और जाति निरपेक्षता का
नारा. उनका क्या हुआ?

सुशासन बाबू : हमने इसमें थोड़ा संशोधन किया. हमें विकास करना था लेकिन
न्याय के साथ विकास संभव नहीं दिखता था इसलिए भ्रष्‍ट्राचार के साथ विकास
का इरादा बनाया. जाहिर है इसे नारा नहीं बनाया जा सकता था. क्योंकि बिहार
के लोग पिछड़ी मानसिकता के होते हैं और भ्रष्‍ट्राचार को पसंद नहीं करते.
यह सत्य-अहिंसा की भूमि रही है और यहां के लोगों को भ्रष्‍ट्राचार से
लड़ने में बड़ा मन लगता है. लेकिन एक महान अर्थशास्‍त्री, जिसे हमने
सांसद बनाया है, ने हमें बतलाया कि विकास के लिए भ्रष्‍ट्राचार जरूरी
होता है. तो इस तरह हमने भ्रष्‍ट्राचार के साथ विकास को आगे बढाया. न्याय
के चक्कर में हमेशा महाभारत हुए हैं और हमें शांतिपूर्ण वातावरण में
विकास को संभव बनाना है. यह भ्रष्‍ट्राचार के साथ ही संभव था. हमें पता
है कि हर स्तर पर घूसखोरी बढ़ी है. मंत्री से संतरी तक खुलेआम
भ्रष्‍ट्राचार कर रहे हैं. लेकिन विकास भी हो रहा है.

और जाति निरपेक्षता?
सुशासन बाबू : वह मेरा गढ़ा हुआ शब्‍द नहीं था. निरपेक्षता नकारात्मक
होती है. मैं सापेक्षता में विश्‍वास करता हूं. इंजीनियर हूं. आइंसटीन के
सापेक्षतावाद को जानता हूं. मैंने जाति निरपेक्षता को जाति सपेक्षता में
बदल दिया है. प्रधान सचिव, निजी सचिव से लेकर झाड़ू लगाने वाले तक को
अपनी विरादरी का रखा है. इसके बड़े फायदे हैं. लालू माई का हिज्जे करते
थे, तोड़ते थे-एम फॉर माइनॉरिटी और वाई फॉर यादव. मैंने माइ को मुकम्मल
रखा है. माई का मतलब-माई. मेरी जाति.

क्या यह सही है आपने कभी जाति से जमात की ओर जैसी बात कही थी? लेकिन
हकीकत यह है कि पहले से तय जमातों को आपने टुकड़ों में तोड़ दिया. ओबीसी
से अतिपिछड़ा और दलित से महादलित बना दिया. आपका इरादा क्या है?

सुशासन बाबू :
इरादा स्पष्‍ट है. बांटों और राज करो सत्ताधारियों का
पुराना नारा है. हमने इस पर वैज्ञानिक ढंग से अमल किया है. इसके फायदे आ
रहे हैं.

किसे हो रहा है फायदा? आपको या समाज को?
सुशासन बाबू :
मेरे समाज को. मतलब मेरी जाति को. मैं मुश्किल से डेढ़
परसेंट वाला हूं. समाज को इस तरह तोड़े बगैर मेरा काम नहीं चलेगा. अंगरेज
कम थे. उन्हें भी राज करने के लिए भारतीय समाज को तोड़ना पड़ा था.

आपकी जाति के बारे में भी सवाल उठते हैं? कुछ आपको कुरमी कहते हैं लेकिन
कुछ का कहना है कि आप कुरमी नहीं अवधिया हैं. कुरमी तो जानता हूं, यह
अवधिया क्या होता है?

सुशासन बाबू : हम लोग अवध से आये हैं इसलिए अवधिया हैं. जैसे नेहरू
कश्‍मीर से आये हुए कश्‍मीरी थे. या सोनिया इटली से आयी हुई इटालियन हैं.
बौद्धों को जड़ मूल से साफ करने के लिए पुश्‍यमित्र मत्र शुंग ने हमारे
पुरखों को अवध से लाकर इधर बसाया था. हमने यहां आकर बौद्धों को ही नहीं,
मुसलमानों को भी जड़ मूल से साफ कर दिया. नगरनौसा का इतिहास उठा कर देख
लीजिए. हमलोग बहादुर कौम के लोग हैं. बेलछी-पिपरा का मेडल भी हमारी
बिरादरी के पास है. जब हमलोग यहां बस गये तो प्रभाव जमाने के लिए अपने को
कुरमी में समाहित कर लिया और उसके माथा बन गये. कुछ साल लव-कुश का नारा
देकर कुशवाहों को भी अपने जाति साम्राज्य में शामिल किया था, लेकिन वे
छिटक कर अलग हो गये.

कहा जाता है कि कुशवाहों का आपने शोषण किया? क्या यह सच है?
सुशासन बाबू : शोषण नहीं किया. उल्लू जरूर बनाया. न बनाता तो सीएम कैसे
बनता. उनके कई उल्लुओं को कैबिनेट में रखा है.

सुना जाता है कि आपके कैबिनेट में जाहिल मंत्रियों की भरमार है. क्या बात है?
सुशासन बाबू :
मैं ज्ञानमार्गी नहीं भक्तिमार्गी हूं. मुझे ज्ञानी नहीं
भक्त चाहिए. आजकल भक्तों को चापलूस कहा जाने लगा है, यह अच्छी बात नहीं
है. प्रबंधन का पहला मंत्र है कि जाहिल नौकर रखो. काबिल नौकर रखकर लोग
फेर में पड़ते हैं. नौकर ही मालिक बन जाता है. यह काम मैं नहीं कर सकता.
मैं जीरो वॉट के बल्व पसंद करता हूं. सुरक्षित होते हैं. सौ-हजार वाट के
बल्व हमें नहीं चाहिए.

अब विकास की बात करें. चुनाव के दौरान आप अपने भाषणों में शेरशाह को
उद्धृत करते थे. बतलाते थे कि शेरशाह की तरह ही मैं कम समय में प्रभावी
काम करुंगा. शेरशाह केवल साढ़े चार साल हिंदुस्तान का बादशाह रहा. उसने
कलकत्ता से पेशावर तक सड़क बनवायी. जिसे आज जीटी रोड कहा जाता है. आपके
राज का तीन साल-मतलब दो तिहाई खत्म हो रहा है लेकिन अभी तक पटना से
शेरशाह के शहर सासाराम तक भी साबूत सड़क नहीं बनी.
सुशासन बाबू :
सड़क बनवाकर मैं सड़क पर नहीं होना चाहता. सुना है न
मुहावरा सड़क छाप. नहीं बनना मुझे सड़क छाप.

यह मजाक की बात नहीं है. बिहार की तमाम सड़कें पहले से भी बरबाद हो गयी
हैं. आप आंख मिलाकर बात तो कीजिए.
सुशासन बाबू :
विकास होगा. सड़कें बनेंगीं. यह निर्माण के पहले का
विध्वंस आप देख रहे हैं. दो कदम आगे बढ़ने के लिए एक कदम पीछे भी हटना
पड़ता है.

लेकिन आप तो पांच कदम पीछे दो कदम आगे का कदम ताल कर रहे हैं. बिहार
जरूरत से ज्यादा पीछे चला गया है.
सुशासन बाबू :
अखबार देखिए. अखबार मेरी तारीफ के पुल बांधते हैं.

जी नहीं, चापलूसी करते हैं. वे जब सही छापते हैं तो आप उनका विज्ञापन बंद
करते हैं. आपने तो गोयवेल्सों की टीम खड़ी कर दी है.
सुशासन बाबू :
तो क्या आप हमें हिटलर कहना चाहते हैं?

नहीं हिटलर कहना नहीं चाहता, अपनी बात रखना चाहता हूं.
सुशासन बाबू :
लेकिन आपको जानना चाहिए कि हिटलर इतना बुरा आदमी नहीं था.
उसे जर्मनी के विकास की चिंता थी. हमें भी बिहार के विकास की चिंता है.

लेकिन हिटलर के कारण जर्मनी बरबाद हो गया था. 
सुशासन बाबू : बिहार के लोग बिहार को बरबाद होने नहीं देंगे. आप विशवास मानिए.

मन थोडा हल्का हुआ? यहाँ हमने सुशासन बाबू का एक काल्पनिक इंटरव्यू पेश किया. इस का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है (और अगर कोई साम्यता हुई तो यह महज इत्तेफाक होगा). यह इंटरव्यू हाशिया पर इधर कुछ समय से चल रही बेहद गंभीर पोस्टों से उबरने के लिए पेश किया जा रहा है. आगे इसी तरह की एक और बातचीत भी प्रस्तुत की जाएगी. कहने की ज़रुरत नहीं, (या है?) की यह पोस्ट बिहार पर ही हमारी शृंखला की अगली कड़ी है और तीन साल तेरह सवाल से साभार ली गयी है.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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