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बिहार : जिस-जिस ने मांगा हक, सबको मिली लाठी

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/23/2009 05:00:00 PM

बढ़ते अपराध के कारण जिस बिहार को जंगल राज का नाम दिया गया था, वहां आज अपराध की क्या हालत है, और पुलिस महकमे की आतंरिक राजनीति क्या है, और क्यों बिहार में पिछले कुछ सालों में लगभग हर जनांदोलन पर पुलिसिया लाठी-गोली बरसी है, इसे जानते हैं निरंजन के इस आलेख में. यह बिहार पर हमारी पोस्टों की शृंखला की ताज़ा कड़ी है.  

जरा याद कीजिये. वर्ष 2005 का बिहार विधान सभा चुनाव. एक ओर लालू प्रसाद थे, तो दूसरी ओर नीतीश कुमार. जनता कोई विकल्प ढूंढ रही थी. एक बेहतर विकल्प के रूप में नीतीश कुमार जनता के खांचे में फिट बैठ रहे थे. लोक-लुभावन वादे किये जा रहे थे. प्रदेश की जर्जर सड़क, खराब बिजली व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था को ठीक करने का आश्‍वासन तो था ही, साथ ही यह भी कहा जा रहा था की नीतीश कुमार की सरकार बनी तो तीन माह में कानून का राज स्थापित होगा. वह बिहार की जनता को 'जंगल राज' से मुक्ति दिलायेंगे. यह वह दौर था, जब समाचार पत्रों में रोजाना अपहरण, हत्या, लूट की खबरें देखने को मिल रहीं थी. शहरों का मध्यवर्ग इससे उब चुका था. ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार का यह कहना कि मेरी सरकार बनी तो तीन माह में कानून का राज स्थापित होगा. जात-पात से उपर उठकर बिहार का विकास होगा. मध्यवर्ग के लिए डूबते को तिनका के सहारे के समान था. चुनाव हुआ और जनता ने जोरदार समर्थन देकर नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान किया. बिहार में जदयू-भाजपा की सरकार बनी. पिछले सालों में अन्य वादों की ही तरह इस सरकार का 'कानून का राज' स्थापित करने का वादा भी धराशायी हो गया है. इन सालों में छोटे अपराधों पर तो कुछ सख्ती बरती गयी है लेकिन बड़े अपराधियों को खुली छूट मिली है. बड़े आपराधिक धंधों को जहां बड़ी सफाई से संस्थागत रूप दे दिया गया है वहीं गरीबों पर पुलिसिया जुल्म में काफी बढ़ोत्‍तरी हुई है.आइये अब जानें कि कानून का राज स्थापित करने वाली सुशासन सरकार का पुलिसिया ढांचा क्या है. नीतीश सरकार गठन के पहले से पुलिस महानिदेशक के पद पर कुरमी जाति से आने वाले आशीष रंजन सिन्हा काबिज थे. नीतीश सरकार ने उन्हें तो पद पर बरकरार रखा लेकिन सरकार बनने के एक माह बाद ही दिसंबर, 2005 में भूमिहार जाति से आने वाले अभ्यानंद को अपर पुलिस महानिदेशक के पद पर बिठा कर पूरा पुलिस महकमा उनके हाथों में सौंप दिया. अभ्यानंद की छवि पैसा के मामले में ईमानदार लेकिन जाति के मामले में बेईमान अधिकारी की रही है. एडीजी रहते हुए भी उनपर जात-पात करने के आरोप लगे.यहीं से शुरू हुआ 'कुर्मी को ताज, भूमिहार का राज' तथा 'नीतीश कुमार-नया बिहार, थोड़ा कुरमी-ज्यादा भुमिहार' का जुमला. जब तक आशीष रंजन सिन्हा और अभ्यानंद अपने पदों पर रहे, उनके बीच छत्‍तीस का आंकड़ा बना रहा है. दोनों अधिकारी अपना-अपना 'राज' समझ कर एक-दूसरे के आदेश को ठेंगा दिखाते रहे। डीजी अपने आदमियों को मलाईदार पोस्टिंग दिलाने में दिलचस्पी दिखाते, तो अभ्यानंद अपने पसंदीदा पदाधिकारी को रूतबे वाली कुर्सी पर विराजमान करने की फिराक में रहते। लिहाजा पुलिस मुख्यालय में गुटबाजी चरम सीमा पर रही। आशीष रंजन सिन्हा की सेवानिवृनि का समय आया तो इन दो अधिकारियों के माध्यम से कुर्मी-भूमिहार के बीच सना संतुलन बना रहे मुख्यमंत्री ने अभ्यानंद को भी चलता कर दिया. 8 अप्रैल, 2008 को अभ्यानंद को भी आशीष रंजन सिन्हा के साथ ही बीएमपी का डीजी बनाकर पुलिस मुख्यालय से विदा कर दिया गया.जब तक ये दोनों अधिकारी मुख्यालय पर काबिज रहे पुलिस महकमे के अन्य अधिकारियों के लिए पुलिस हेडक्वार्टर के लिए 'हेडकक्वार्टर' बना रहा.

दरोगा बहाली

सरकार बनने के साथ ही पुरानी दारोगा बहाली को रदद करते हुए नयी दारोगा बहाली की घोषणा हुई थी तथा बहाली को पूरी तरह निष्‍पक्ष कराने का सपना अभ्यार्थियों को दिखाया गया था. बिहार में 1994 के बाद से दारोगा की बहाली नहीं हुई है. बेरोजगारी से जूझ रहे छात्रों को सुशासन में भरोसा तो हुआ, लेकिन बहाली प्रक्रिया 'बीरबल की खिचड़ी' साबित हुई है.

अमीर दास आयोग

अपराध समाप्त करने का दावा करने वाले सुशासन बाबू ने सरकार बनते ही अमीर दास आयोग को भंग कर दिया। यह आयोग रणवीर सेना के राजनीतिक संबंधों की जांच कर रहा था. आयोग की रिपोर्ट से राज्य सरकार में काबिज किन-किन दिग्गजों पर गाज गिरने वाली थी, यह अब किसी से छुपा नहीं है. स्पीडी ट्रायल 'कट्टा पकड़ने पर स्पीडी ट्रायल, एके-47 से मुख्यालय घायल'. स्पीडी ट्रायल का जिक्र आते ही एक वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारी यह जुमला सुना डालते हैं. वास्तव में 'स्पीडी ट्रायल' पूरी तरह हास्यास्पद साबित हुआ है. इसकी शुरूआत कथित तौर पर सभी दलों के बड़े अपराधियों पर लगाम कसने के लिए की गयी थी. लेकिन हुआ उल्टा है. इस बड़े जाल में छोटी मछलियां तो फंस जा रही हैं लेकिन मगरमच्छ जाल फाड़ कर निकलवा दिया जा रहा है. इसके प्रमाण हैं अनंत सिंह और प्रभुनाथ सिंह जैसे लोग. महाराजगंज से जदयू सांसद प्रभुनाथ सिंह वर्ष 95 में मशरख में हुए दोहरा हत्याकांड के अभियुक्त थे, लेकिन सरकारी गवाह हाजिर नहीं हुए और पिछले दिनों वे आराम से बरी हो गये.

जिस-जिस ने मांगा हक, सबको मिली लाठी

पिछले तीन सालों में पटना के लोगों के 'अमन-चैन' के नाम पर प्रजातांत्रिक विरोधों को लगभग प्रतिबंधित कर दिया है. जयप्रकाश नारायण द्वारा छात्र आंदोलन के दौरान बैरिकेटिंग तोड़ने की घटना का फक्र से जिक्र करने वाले-सत्ता में बैठे उनके चेलों को इतना भी बर्दाश्‍त नहीं है कि आंदोलनकारियों का कोई जत्था विधान सभा की ओर जाने वाले रास्ते में आर ब्लॉक चौराहे पर बने बैरिकेटिंग को छुए भी. नीतीश सरकार ने अपने शासन की शुरूआत से ही यह साफ कर दिया था. किसी को भी सरकार के विरोध में आवाज उठाने की इजाजत नहीं दी जाएगी. आम लोगों का संगठन हो अथवा शिक्षकों, डॉक्टरों, छात्रों, कर्मचारियों का-जिसने भी प्रभावशाली विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से अपनी बात रखनी चाहिए, उसे पुलिस का बर्बर लाठी चार्ज झेलना पड़ा. सबसे अधिक मार उन संगठनों के लोगों को खानी पड़ी जिसके लोगों ने बड़ी संख्या में पटना पहुंच राज्य सरकार को अपनी बात सुनानी चाही. महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्‍शा गया. शिक्षा मित्र, वाम छात्र संगठनों, आशा कार्यकर्ताओं, दारोगा भर्ती के उम्मीदवारों, पीएमसीएच के जूनियर डॉक्टरों, वित्त रहित शिक्षकों समेत लगभग डेढ़ दर्जन संगठनों को विरोध प्रदर्शनों के दौरान बर्बर लाठी चार्ज झेलना पड़ा है. वास्तव में स्थिति यह हो गयी है कि लाठी चार्ज के भय से कोई भी संगठन अब पटना में प्रदर्शन करने से पहले दस बार सोचता है. अतिक्रमण हटाने के नाम पर राजधानी के गरीबों पर तो लगभग हर दो-तीन महीने पर लाठियां बरसायी ही जा रही हैं. पटना के अलावा अन्य जिलों के प्रशासन को भी विरोध प्रदर्शनोंसे सख्ती से निपटने के आदेश दिये गये हैं. कहलगांव में तो बिजली की मांग पर विरोध कर रहे स्थानीय लोगों पर सिर्फ लाठियां ही नहीं भांजी गयीं, गोली तक चलायी गयी।


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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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