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राजनीति, चीनी मिल मालिक और गन्ने की कड़वाहट

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/21/2009 06:07:00 PM

दो दिन पहले गन्ना किसानों ने जब दिल्ली में आन्दोलन किया तो अख़बारों के संपादकों को लगा कि देश अचानक मध्ययुग में धकेल दिया गया है. अराजकता, गन्दगी, हुड़दंग और जाने कैसे-कैसे शब्दों की इस आन्दोलन के सन्दर्भ में झड़ी लगा दी गई और इस सनकीपन में गन्ना किसानों के आन्दोलन का मुद्दा ही गायब हो गया (कर दिया गया). आइये देखते हैं, कि यह मामला क्या. हालाँकि शुरू में ही यह आलेख सरकारी नीतियों को कोसने की मनाही करता है, लेकिन हम जानते हैं कि ये सरकारी नीतियां ही हैं, जो समस्याओं को जन्म दे रही हैं. पढ़ते हैं देवेन्दर सिंह का आलेख.


राजनीति, चीनी मिल मालिक और गन्ने की कड़वाहट


गगन्ने की कीमत को लेकर हमें सरकारी नीतियों को कोसना छोड़ देना चाहिए, क्योंकि गन्ने के खेल से कई चीजें निकलती हैं। हाल में छिड़ा गन्ना किसानों का जबर्दस्त आंदोलन तीन बड़े संदेश छोड़ता है- पहला, गन्ना किसान इस बात के खिलाफ हैं कि चीनी मिलों को प्राइवेट हाथों में सौंपा जाए, क्योंकि गन्ना किसान जानते हैं कि निजी क्षेत्र को दिये जाने से मिलें किसानों पर हावी होंगी। दूसरा सरकार को ठीक-ठीक समझ लेना होगा कि निजी क्षेत्र के हावी होने से इनका समूचा ध्यान उघोग और व्यापार के बीच संतुलन बनाने का होगा और तीसरा, आज समूचे कृषि परिदृश्य को देखें, तो संकेत मिलता है कि किसानों का आंदोलन गन्ना और गेहूं तक ही सिमट कर रह गया है- इस वक्त यही सबसे बड़ी चिंता की वजह है। दूसरी फसलें गौण हो चुकी हैं।

अगर गौर करें, तो गन्ना महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की राजनीति को खासतौर से प्रभावित करता है। केंद्र सरकार में महाराष्ट्र के कई मंत्री शामिल हैं, ये विशुद्ध रूप से चीनी मिल मालिकों का पक्ष लेंगे। इस समय भारतीय जनता पार्टी के नये अध्यक्ष के रूप में नितिन गडकरी का नाम आ रहा है, वे भी चीनी मिलों के साथ खड़े दिखेंगे। यानी गन्ने की कीमत तय करने के रास्ते में राजनीति आ गयी है, वहीं दूसरी आ॓र गन्ना राजनीति पर असर डाल रहा है। बीते वर्षों में हमने गन्ना कानून को बदला है। इस संबंध में एक सरकारी निकाय है- सीएसीपी (कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेज)। कमीशन गन्ने की कीमत तय करने में अहम रोल निभाता है। इसे समझने के लिए हम यहां एसएमपी (स्टैच्युटरी मिनिमम प्राइस) का जिक्र कर रहे हैं। अब देखें कि मौजूदा साल के दौरान गन्ने की कीमत 107 रूपये प्रति क्विंटल तय की गई है। इसमें 9.5 फीसद रिकवरी है यानी एक क्विंटल में से 9.5 किलोग्राम चीनी बननी चाहिए। इतने पर ही बात खत्म नहीं हो जाती। राज्य सरकारें भी अपना अलग से गन्ना-मूल्य घोषित करती हैं। इस मूल्य-निर्धारण में गन्ने की उत्पादन संबंधी लागत को भी ध्यान में रखा जाता है। महाराष्ट्र में 12 से 14 फीसद शुगर रिकवरी है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 8 से 10.5 फीसद है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में 210 रूपये क्विंटल कीमत पर गन्ना खरीदा जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश इसी के लिए 165 रूपये देने को तैयार दिखता है। इसके विपरीत उघोगों का दबाव रहता है, क्योंकि जब गन्ने की कीमत ज्यादा देनी पड़ेगी, तो चीनी महंगी होगी।

 मिलों की कोशिश राज्यों के मूल्य खत्म करने की है। 1996 में मिलों ने इस समस्या को हल करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, लेकिन न्यायालय ने उनकी बात नहीं मानी। अब मिलों ने सरकार के जरिये एफआरपी (फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस) की बात छेड़ दी। इसी अक्टूबर से सरकार ने एक अध्यादेश के जरिये इन मिल मालिकों के मनमाफिक काम दिया। अध्यादेश में कहा गया है कि मिलें 129.84 रूपये में गन्ना खरीदेंगी। इस पर सरकार कोई मूल्य तय करेंगी और इसके ऊपर राज्य सरकारें गौर करेंगी। इसका अर्थ है कि गन्ने की लागत के मामले में सरकारें अपनी मनमर्जी चलाएंगी और इसी की आड़ में अपना मुनाफा कमाने को लेकर मिल मालिक एकतरफा कदम उठाएंगे। इसी वजह से इस समय उपभोक्ताओं को दो बार कीमतें देनी पड़ रही हैं। अब गन्ने की कीमत तय करने के मामले में कम पैसा दिया जाना आ गया, जबकि चीनी की कीमत बढ़ा दी गयी। हम पहले टैक्स देते हैं, फिर महंगी चीनी खरीदते हैं, इस तरह दोहरा भुगतान करते हैं।

 दस्तूर यह हो गया है कि सरकार नहीं, बल्कि निजी मिल मालिक गन्ने की कीमत तय कर रहे हैं। लेकिन इसकी आड़ में कुछ बड़े नेता गन्ने की कीमत को प्रभावित करते हैं और ऐसा वे काफी पहले से करते आये हैं। अगर एफआरपी गन्ने के मामले में सफल हो जाते, तो बाकी मामलों में भी मिलें यानी घुमा-फिराकर कुछ बड़े नेताओं को फायदा होता। आखिर हम यह क्यों नहीं सोचते कि गन्ना और गेहूं के मूल्य बाकी फसलों को खत्म करने पर क्यों तुले हैं? गन्ना किसानों का ताजा आंदोलन देश के व्यापक हित में है। चीनी मिलें 165 रूपये प्रति क्विंटल की दर से गन्ना खरीद रही हैं, जबकि चीनी चार हजार रूपये प्रति क्विंटल में बेची जा रही है। यहां चीनी के उत्पादन-मूल्य में मनमर्जी की जा रही है। वह ज्यादा महंगी है, लेकिन किसानों की मेहनत का मूल्य कम आंका जा रहा है। चीनी के अतिरिक्त मिलें दूसरे कई फायदे उठाती हैं, जैसे इथनॉल (बॉयो-फ्यूल), शीरा और ईंधन जैसी चीजें उनके उप-उत्पाद (बाइ-प्रोडक्ट्स) हैं। इन्हें बेचकर मिलें जबरदस्त मुनाफा कमा रही हैं। इस तरह पता चलता है कि चीनी का लागत-मूल्य जीरो है, तो फिर गन्ने की अच्छी कीमत देने में इन मिल मालिकों को संकोच क्यों हो रहा है? उधर, चीनी मिल मालिकों का कहना है कि उन्हें अपने उत्पादन का 10 फीसद लेवी के रूप में देना पड़ता है और यह बहुत कम कीमत (एसएमपी) पर लेते हैं, पहले यह 10 फीसद था, लेकिन अब 20 फीसद देना होगा। मिलों की शिकायत यह भी है कि मुक्त बाजार में चीनी की लागत सरकार तय करती है, तो उन्हें फायदा कहां है? यहां यक्ष प्रश्न यह है कि अगर खांडसारी इकाइयां गन्ने की कीमत 200 रूपये दे सकती हैं, तो चीनी मिलें ऐसा क्यों नहीं कर सकतीं? सरकार ने मिलों को कई तरह की राहत दी हुई है, जबकि खांडसारी को राहत देने की बात पर वह चुप है। अब चर्चा गन्ना किसान की। बेशक, किसान आंदोलन बहुत बरसों बाद देखने को मिला, लेकिन इससे पता चल गया कि किसान देश की राजनीति को बदल ही नहीं सकते, बल्कि उसकी चूलें हिला भी सकते हैं।

हकीकत यह है कि कृषि का मौजूदा संकट गन्ने और गेहूं तक ही नहीं रह गया है। पिछले 15 साल में दो लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं, 40 फीसद किसान तो ऐसे हैं, जिन्हें कोई ठोस विकल्प उपलब्ध करा दिया जाए, तो वे खेती से तौबा कर लेंगे! किसानों को एक सुझाव देने की जरूरत है- उन्हें चाहिए कि वे छोटे-छोटे गुटों में बंटकर न रहें, बल्कि एक महागुट बना डालें। अगर एक महागुट मुंबई की सड़कों पर अवरोधक का काम करने लगे, तो किसानों का भविष्य वैसा नहीं रहेगा, जैसा दिख रहा है। बल्कि, कृषि नीतियों के निर्माण तक को वे प्रभावित कर सकते हैं। हमारे किसान इस बात को भलीभांति समझ लें कि जब कृषि से जुड़ी आमदनी का ढांचा पटरी पर आएगा, तो उनकी खेती भी मुनाफा उगलेगी। वैसे भी सरकार को अपने अध्यादेश को वापस ले लेना चाहिए।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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