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बीच सफ़हे की लड़ाई

बच्चों के अधिकारों का ढोंग और अमेरिकी जेलें

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/27/2009 05:00:00 AM


कुछ समय पहले मंथली रिव्यू में छपे एक लम्बे लेख में बताया गया था कि दुनिया में जितने कैदी हैं, उनमें से चौथाई अमेरिकी जेलों में हैं. उनमें भी बहुसंख्या अश्वेत लोगों की है. आर्थिक संकट के बढ़ने के साथ ही जेलों में बढ़नेवाले कैदियों की संख्या में भी भरी इजाफा हुआ है, और यहाँ मार्क्स याद आते हैं. सुभाष गाताडे बता रहे हैं अमेरिकी जेलों में बंद बच्चों की स्थिति और आमतौर पर अमेरिकी जेलों की स्थिति के बारे में. हम कोशिश करेंगे मंथली रिव्यू के उक्त आलेख को हिंदी में प्रस्तुत करने की. साथ ही भारत में भी ऐसे एक अध्ययन की सख्त ज़रुरत है.

अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय में पिछले दिनों बच्चों और किशोरों के एक हिस्से के भविष्य से जुड़ी चन्द अहम याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हुई। बाल्यावस्था या किशोरावस्था (जुवेनाइल) में किये गये अपराध के लिए ताउम्र बिना किसी पैरोल के जेल में सजा काटने के लिए अभिशप्त इन बन्दियों के माता-पिताओं और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के संयुक्त प्रयासों से अदालत के सामने आयी इन याचिकाओं के बहाने अमेरिकी आला अदालत इस मसले पर विचार करेगी कि ऐसा कदम कहीं असंवैधानिक और सख्त तो नहीं है। फिलवक्त अमेरिकी जेलों में 1,700 से ज्यादा ऐसे बंदी सजा भुगत रहे हैं जो अपनी बाकी उम्र उस अपराध के लिए जेल में ही बिता देंगे जो उन्होंने बाल्यावस्था या किशोरावस्था में किया था। इस दौरान उन्हें पैरोल पर भी रिहा नहीं किया जाएगा। इनमें से कुछ बंदी तो ऐसे हैं, जिन्हें उस वक्त गिरफ्तार किया गया जब वे मात्र तेरह साल के थे। गौरतलब है कि अपने आप को जनतंत्र का प्रहरी बताने वाले अमेरिका के अलावा दुनिया के बाकी किसी देश में बच्चों और किशोरों को इस कदर दंडित करने का कानून सम्मत नहीं है। दरअसल बालपन या किशोरावस्था में किये गये अपराधों के बारे में अधिकतर मुल्कों की न्याय प्रणालियां ज्यादा सहानुभूतिपूर्वक ढंग से सोचती हैं। यहां तक कि तमाम मुल्कों में- जिनमें भारत भी शामिल है- बाल अपराधी का वास्तविक नाम उजागर करने पर पाबन्दी है। यह समझा जाता है कि आवेश में, गुस्से में उसके द्वारा किये गये अपराध की सजा उसे बाकी उम्र भुगतनी न पड़े, इसलिए उसे बाल सुधार गृह में रखा जाता है। यह अलग बात है कि प्रशासनिक लापरवाही या समाज की बेरूखी के चलते ऐसे बाल सुधार गृहों का ठीक से संचालन नहीं होता। उन्नीस साल की निकोल डुपुरे, जो इन दिनों अमेरिका के मिशिगन कारागार की राबर्ट स्कॉट करेक्शनल फैसिलिटी में- रिश्ते में दादी लगनेवाली एक महिला की हत्या के आरोप में बन्द है, उसके बारे में उसके मां-बाप और अन्य सभी आत्मीय जन एक बात जानते हैं कि वह कभी भी रिहा नहीं होगी। यहां तक कि इस लम्बे अन्तराल में उसे पैरोल पर भी रिहा नहीं किया जाएगा। किशोरावस्था में अनजाने उससे जो अपराध हुआ है, उसके बारे में प्रायश्चित करने का मौका भी उसे कभी नहीं मिलेगा।

दो साल पहले ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार ‘गार्डियन’ (4 अगस्त, 2007) ने एक सर्वेक्षण में बताया था कि निकोल जैसे 2270 लोग संयुक्त राज्य अमेरिका की विभिन्न जेलों में पैरोल के बिना उम्र कैद की सजा काट रहे हैं। ये सभी लोग जिन्होंने जब यह अपराध किया तो 18 साल से कम उम्र के थे और छह तो महज 13 साल के थे। सभी जानते हैं कि यह एक ऐसी उम्र है जब अमेरिकी कानून उनके कार चलाने पर या सेना में भर्ती पर पाबन्दी लगाता है यहां तक कि घर से दूर रहने पर रोक लगाता है। उस उम्र में इन सभी पर वयस्कों की अदालत में मुकदमा चला और इन्हें सजा सुनायी गयी। निकोल की ही तरह जेल में उम्र भर के लिए बन्द बेनेटन नामक युवा के बारे में रिपोर्ट में इस बात का विशेष उल्लेख था कि जिस वक्त 16 साल के उपरोक्त किशोर को सजा सुनायी जा रही थी, तब जूरी में बैठी कई महिलाओं के आंखें नम हो उठी थीं। सच यह है कि समूची दुनिया को मानवाधिकार और जनतंत्र का सबक सिखाने का दावा करनेवाला अमेरिका उन गिने-चुने मुल्कों में शुमार किया जाता है (जिसमें सोमालिया का नाम भी आता है), जिन्होंने बाल अधिकार सम्बन्धी संयुक्त राष्ट्रसंघ के कन्वेन्शन पर दस्तखत करने से इनकार किया है और जो स्पष्ट तौर पर बाल या किशोर अपराधियों को इस तरह दंडित करने पर पाबन्दी लगाता है।

एमनेस्टी इंटरनेशल तथा ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि दुनिया में महज तीन अन्य मुल्क हैं- इस्राइल, दक्षिण अफ्रीका और तांजानिया- जिनके कानून में ऐसी सजा का प्रावधान है। यह अलग बात है कि तीनों मुल्कों में मिला कर ऐसे महज 12 कैदी हैं। वैसे बच्चों को जेल में ठूंसनेवाले अमेरिका के बारे में यह तथ्य भी जानने योग्य है कि अमेरिकी जेलों की आबादी में 1970 के बाद आठ गुना बढ़ोतरी हुई है। समूची दुनिया में यह एक रिकार्ड है। दुनिया का अन्य कोई मुल्क ऐसा नहीं है, जहां इस छोटे से अन्तराल में जेलों में इतने कैदी बढ़े हों। जेएफए इंस्टीट्यूट द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक इन दिनों अमेरिकी जेलों में 22 लाख कैदी बंद हैं। यहां इस हकीकत को भी रेखांकित करना जरूरी है कि अमेरिकी जेल-आबादी में अल्पसंख्यकों की मात्रा कुल आबादी में उनके अनुपात से काफी ज्यादा है। आंकड़ों के मुताबिक एक चौथाई अश्वेत पुरूषों को अपनी जिन्दगी में कभी न कभी जेल के अनुभव से गुजरना ही पड़ता है, जबकि 70 श्वेत पुरूषों में से महज एक पर ऐसी नौबत आती है। इस सन्दर्भ में यह तथ्य भी बेहद महत्वपूर्ण है कि बन्दियों की संख्या एवम कुल आबादी के अनुपात के मामले में रूस के बाद अमेरिका का नम्बर आता है। रूस में अगर एक लाख लोगों में से 685 लोग जेल में हैं तो अमेरिका में यह आंकड़ा 670 तक पहुंचता है। अगर हम यूरोप के साथ इन आंकड़ों की तुलना करें तो वहां यह आंकड़ा महज 100 है। अमेरिकी जेलों में बन्द लोगों के यह आंकड़े एक तरह से प्रचंड हिमशिलाखंड का सिरा ही मालूम पड़ते हैं, जब हकीकत का दूसरा पहलू उजागर होता है। जेलों में बन्द इस विशाल आबादी के अलावा लाखों लोग ऐसे हैं जो ‘सुधारात्मक’ नियंत्रण में है। सुधारवादी नियंत्रण में बन्द लोगों की जनसंख्या 66 लाख है। यह विचारणीय सवाल है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर लोगों को जेल में ठूंस देने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं।

आज से लगभग 25 साल पहले मानवाधिकार कार्यकर्ता रिचर्ड वोगेल ने ‘मंथली रिव्यू’ नामक चर्चित प्रगतिशील पत्रिका में इसको समझने की कोशिश की थी। उनके मुताबिक, ‘आर्थिक स्थितियों और कारावास के बीच के आपसी सम्बन्ध एवम समग्र सामाजिक प्रवृत्तियों की पड़ताल इस तथ्य को साफ तौर पर स्थापित करती है कि पूंजीवाद और कारावास में साफ सम्बन्ध है।

मार्क्स ने इस बात की आ॓र पहले ही इशारा किया है कि पूंजीवाद के अन्तर्गत, जेलें दरअसल मेहनतकशों की अतिरिक्त आबादी को सड़ने के लिए छोड़ देने का स्थान होती हैं। पूंजीवाद के तहत लोगों की बेरोजगारी और अर्द्ध बेरोजगारी के सामाजिक प्रभावों का आकलन जेलों की आबादी के उतार चढ़ाव से किया जा सकता है।’ अपनी आबादी के अच्छे खासे हिस्से को तरह-तरह के मामलों में उलझा कर जेलों में या ‘सुधारगृहों’ में डालने में अमेरिकी शासकों का जहां कोई सानी नहीं दिखता वहीं यह बात उतनी ही महत्वपूर्ण है कि अमेरिकी नागरिक समाज में ऐसी आवाजें लगातार बुलन्द रही हैं, जिन्होंने अपने शासकों की लगातार मुखालफत की है।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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