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बीच सफ़हे की लड़ाई

क्या आप छत्तीसगढ को नागालैंड बनाना चाहते है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/26/2009 05:00:00 AM

हालाँकि शुभ्रांशु चौधरी की यह रिपोर्ट कुछ समय पहले की है, लेकिन यह हमें बताती है कि नक्सलवाद को सैनिक ताकत से ख़त्म करने की कोशिशों के नतीजे क्या होते होते हैं. 

नक्सली हिंसा की वारदातों की कुल संख्या के मामले में पिछले साल पहली बार छत्तीसगढ का आंकडा अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों को पार कर गया । हाल ही में प्रकाशित गृह मंत्रालय के आंकडों के अनुसार अब छत्तीसगढ पिछले वर्ष से नक्सली हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित राज्य बन गया है।

कुछदिन पहले नक्सलियों ने छत्तीसगढ में बिरला समूह के हिण्डालको कंपनी की एक खदान पर हमला बोला । कंपनी के अधिकारियों को बंधक बनाया ।कंपनी के बुल्डोजर चलाकर सब कुछ तहसनहस किया और जो भी मिला लूटकर ले गए ।

कॉरपोरेट इंडिया पर नक्सलियों का यह अब तक का संभवत: सबसे बडा हमला था । और इसके बाद से ही विशेषज्ञ अब आंध्रप्रदेश के बाद छत्तीसगढ को नक्सली गतिविधियों का नया केंद्रस्थल मान रहे हैं ।

पर क्या नक्सलवाद सिर्फ कानून और व्यवस्था की ही समस्या है जैसा कि प्रदेश की भाजपा सरकार बार-बार घोषित कर रही है ?

वैसे तो नक्सली प्रदेश में पिछले 3 दशक से मौजूद हैं पर हाल में उनकी गतिविधियों में अचानक तेजी आई है । यह राज्य की भाजपा सरकार की नक्सलियों से बलपूर्वक निपट लेने की रणनीति का परिणाम हो सकता है ।

उत्तर और दक्षिण छत्तीसगढ में जहां नक्सलियों का दबदबा है अब आए दिन पुलिस थानों पर हमले हो रहे हैं ।  और रिपोर्टों के अनुसार अगर हमला थाने के करीब भी हो अक्सर रात में पुलिस थाने के बाहर ही नहीं निकलती ।

हाल ही में राज्य शासन ने नक्सल प्रभावित बस्तर के आई जी का यह कहकर तबादला कर दिया कि वे कभी भी मौका ए वारदात का दौरा नहीं करते ।

राज्य सरकार इस बात की जानकारी देने को तैयार नहीं है कि कितने पुलिस कर्मियों ने नक्सल प्रभावित इलाकों से बदली के लिए अरजी दी हुई है ।

यद्यपि अब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी एक विशेष आदेश से सिपाहियों को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बगैर वर्दी और प्राइवेट वाहनों में गश्त लगाने की अनुमति दे दी है । पर इस बीच ही नक्सलियों की बारुदी सुरंगों से दर्जनों से ज्यादा सी आर पी एफ के जवान मारे जा चुके हैं ।

छत्तीसगढ के गृह मंत्री का लगभग रोजाना अखबारों में बयान आ रहा है कि सामाजिक आर्थिक समस्या की आड में नक्सलवाद एक कानून व्यवस्था की समस्या है और उससे उसी तरह निपटा जाएगा ।

“समस्या' के समाधान के लिए प्रदेश १५ लैंड माइन प्रतिरोधी गाडियां मंगा रहा है । रात में भी दिखाई देने वाले विशेष नाईट विजन गॉगल्स खरीदे जा रहे हैं। और इस अभियान की एक प्रमुख रणनीति के तहत सी आर पी एफ और गुजरात पुलिस के बाद अब नागालैंड पुलिस को प्रदेश में बुलाया गया है ।

नागा पुलिस अधिकारी आए दिन राज्य का दौरा कर रहे हैं ।

नागा पुलिस और सेना के हेलीकॉप्टर की मदद से “एक गुप्त स्थान पर' कोई विशेष अभियान चलाने की खबर मीडिया को पिछले काफी हफ्तों से दी जा रही है । पर उस अभियान के बाद से ४२ ग्रामवासियों की गिरफ्तारी के अलावा और कुछ सुनने में नहीं आया ।

गिरफ्तार ४२ आदिवासियों में से ३५ एक ही गांव के थे और पुलिस के अनुसार उनके पास से भारी मात्रा में नक्सली साहित्य बरामद हुआ है ।

उत्तर छत्तीसगढ में जहां नक्सलियों ने पिछले दिनों भरे बाजार के पास एक थाने को लूट लिया था विशेष अभियान के बाद पुलिस ने एक दर्जी को गिरफ्तार किया है जो पुलिस के अनुसार नक्सलियों के लिए वर्दी सिलता हुआ पकडा गया था ।

अब यह बात अलग है कि अगर स्थानीय अखबारों में छप रही खबरों पर विश्वास किया जाए तो उनके अनुसार आजकल छत्तीसगढ के कुछ नक्सल प्रभावित जिलों में ठेकेदार और सरकारी कर्मचारियों की तर्ज पर पुलिस कर्मियों ने भी नक्सलियों को हफ्ता देना शुरु कर दिया है ।

अब छत्तीसगढ के गृह मंत्री नागालैंड की तर्ज पर “समस्या' से निपटना चाहते हैं । उन्होने पिछले दिनों में कई बार यह बात कही है कि नागा पुलिस को इसलिए बुलाया गया है क्योंकि उसे आतंकवादियों से लड़ने का लम्बा अनुभव प्राप्त है ।

पता नहीं छत्तीसगढ के गृह मंत्री को यह पता है कि नहीं कि छत्तीसगढ में तो सिर्फ नक्सल प्रभावित इलाके में ही पुलिस वाले नक्सलियों को हफ्ता देते हैं पर नागालैंड में तो संभवतय गृह मंत्री भी दशकों से नागा विद्रोहियों को हफ्ता देते आ रहे हैं ।

छत्तीसगढ के गृह मंत्री के लिए मैं नागालैंड से एक वाकया उनके लिए सुनाना चाहूंगा

घटना ४-५ साल पहले की है जब नागालैंड में आज की तरह युद्वविराम नहीं हुआ था । हम बी बी सी की एक फिल्म के लिए नागा विद्रोहियों के साथ कुछ समय बिताना चाहते थे । फोन पर तय यह हुआ कि हम नागालैंड में बर्मा की सीमा से लगे मोन शहर में  आ जाएं उसके बाद विद्रोही हमें अपने अड्डे पर ले जाएंगे ।

पर मोन में पहुंचकर किससे मिलना है ?

 “अरे आप मोन आ तो जाइए बाकी हम पर छोड दीजिए' फोन पर दूसरी ओर से आवाज आई । मुझे आश्चर्य तो हुआ पर और कोई चारा नहीं था । सो नियत दिनपर मैं मोन पहुंचा । खाली बैठे कुछ सूझ नहीं रहा था तो मैंने सोचा कि मोन के जिलाधीश से एक बार मिल लेना सुरक्षा की नज़र से उचित होगा ।

नागा आदिवासी नृत्य पर डॉक्यूमेंटरी बनाने की जो कहानी मैंने इनर लाइन परमिट लेने के लिए लिख रखी थी कलेक्टर के पास जाने के पहले मैंने एक बार उसे और पढ लिया । ताकि कहीं हडबडी में मै यह ही न भूल जाउं कि हम वहां क्या करने आए हुए हैं ।

पर्चा अंदर भेजते ही आश्चर्यजनक रुप से कलेक्टर स्वयं मुझे लेने के लिए बाहर आ गए । “मैं आपका ही इंतजार कर रहा था । आपसे मिलने के लिए कोई अंदर बैठा हुआ है ।' छोटे से कद के कलेक्टर ने कहा ।

मुझसे मिलने यहां कौन बैठा हो सकता है मुझे कुछ समझ में नहीं आया ।

चाय पर दूसरी कुर्सी पर बैठे एन एस सी एन के एरिया कमांडर से मेरा परिचय कराया गया । आश्चर्य की कोई बात नहीं थी सिर्फ नागालैंड की सच्चाइयों से मेरा पहला परिचय था ।

चाय नाश्ते के बाद सिविल ड्रेस में बैठे हट्टे कट्टे से कमांडर साहब से मैंने कहा अब हम कलेक्टर साहब को भी कुछ काम करने देते है ताकि हम बाहर जाकर कुछ काम की बात कर सकें । पर मुझे फिर से अचरज में डालते हुए कमांडर साहब ने कहा “अरे कलेक्टर साहब को भी तो पता रहना चाहिए आप उनके जिले में क्या क्या कर रहे हैं '।

ये तो सिर्फ शुरूआत थी ।

इसके बाद एन एस सी एन के साथ काम कर रहे एक ब्रिटिश ने न सिर्फ तत्कालीन मुख्यमंत्री एस सी जमीर के साथ मेरा साक्षात्कार तय कर दिया वरन साक्षात्कार के समय मेरे साथ कोहिमा भी आए ।

मैं छत्तीसगढ के गृहमंत्री को एक और कहानी बताना चाहता हूं जो नागालैंड से नहीं बल्कि उन्ही के छत्तीसगढ से है ।

कुछ दिनों पहले मैंने छत्तीसगढ में नक्सलियों के साथ एक और फिल्म के लिए कुछ समय बिताया । वहां वरिष्ठ नक्सली नेताओं के सामने एक बूढे आदिवासी से मैंने पूछा - ये नक्सली दादा लोग बेहतर हैं या सरकार ?

उसने बगैर लागलपट के कहा – “मुझे लगता है कि सरकार अच्छी है क्योंकि सरकार हमें कुछ दे सकती है । पर सरकार को तो मैंने देखा ही नही, पुलिस के सिवाय . इसलिए मुझे लगता है कि नक्सली दादा लोग ही बेहतर हैं ' ।

विशेष अभियान में नागा पुलिस के साथ मिलकर छत्तीसगढ पुलिस ने ऐसे ही आदिवासियों को पकडा है ।

अब छत्तीसगढ के गृहमंत्री से मैं यह पूछना चाहता हू कि क्या यह संभव नहीं है कि यही आदिवासी आपकी सरकार के लिए नाइट विजन गॉगल्स का काम करें और पुलिस को यह आकर बतला दे कि लैंड माइन कहां लगे हैं

नागालैंड में हमारी सेना ने पिछले ५० सालों में क्या हासिल किया हे ? क्या आप छत्तीसगढ को नागालैंड बनाना चाहते हैं ?

और जैसा सभी पूछ रहे हैं मेरा भी यही प्रश्न है कि छत्तीसगढ की सरकार नक्सलियों से बातचीत क्यों नहीं करना चाहती ?

यदि  छत्तीसगढ का गैर आदिवासी नक्सली नेतृत्व सच में आदिवासियों का भला चाहता हैं तो वे इस प्रस्तावित बातचीत से उनके लिए कुछ हासिल करना चाहेंगे जो उनके साथ लड रहे है ।

नक्सलियों ने आंध्रप्रदेश में ऐसा नहीं किया और इस बात की पूरी आशंका है कि छत्तीसगढ का मूलत: तेलुगु भाषी नक्सली नेतृत्व वही करेगा जो उन्होने आंध्र में किया ।

हमें डर है कि जो छत्तीसगढ के आदिवासी पिछले ५० सालों में इस देश की वर्तमान राजनीति से पीडित रहे हैं अगले काफी वर्ष तक नक्सलवादियों के लाल किले में लाल झंडा फहराने के दिवास्वप्न से पीडित रहेंगे ।

पर हो सकता है हमें गलत साबित करते हुए आदिवासियों के लिए कुछ हासिल करने के लिए छत्तीसगढ का नक्सली नेतृत्व सामने आए और यह साबित करे कि वह छत्तीसगढ के आदिवासियों को सिर्फ अपनी राजनीति के एक मोहरे की तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं ।

सरकार के लिए नक्सलियों के मकसद का पर्दाफाश करने के लिए बातचीत का न्यौता एक अच्छा मौका हो सकता है ।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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