हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

देश की कौन सी तस्वीर है जो नक्सलवाद के इस चेहरे पर दिखाई देती है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/25/2009 12:53:00 PM

नक्सल आन्दोलन के जनाधार, उसकी वजहों और उस पर विभिन्न पक्षों के नज़रियों के बारे में बता रहे हैं रुचिर गर्ग. छत्तीसगढ़ की जन वेबसाईट से साभार.

देश के राजनैतिक नक्शे पर नक्सलवाद आज एक बड़ी ताकत के रुप में दर्ज है । इतनी बड़ी ताकत कि शासक वर्ग यह आशंका व्यक्त करने लगा है कि नक्सली नेपाल की सीमा से लेकर केरल तक काम्पेक्ट रिवाल्य्शूनरी ज़ोन बनाने में या देश को दो हिस्सों में बांटने की साजिश में लगे हैं । सत्ताधारियों को ये भी आशंका है कि हिन्दुस्तान के नक्सली संगठनों की नेपाल के माओवादियों से लेकर श्रीलंका, बंग्लादेश और भूटान के क्रांतिकारी दलों से नजदीकियां इसी कथित रणनीति का हिस्सा हैं .

ऐसी ही आशंकाओं से लिपटी हुई राज्यसभा में प्रस्तुत Department related parliamentary Standing Committee On Home affairs  की 88 वीं रिपोर्ट कहती है Left Wing extremism has been posing one of the biggest challenges on the internal security front .

सशस्त्र संघर्ष के जरिए राजसत्ता पर कब्जे के नारे के साथ 1967 में नक्सलबाड़ी मे फूटी चिंगारी ने आज देश की राजनीति को झकझोर कर रख दिया है । देश के 9 राज्यों के सामने तो नक्सलवाद सीधी चुनौती है । कुछ अन्य राज्यों में इसकी जड़े फैल रही है, नक्सलियों के अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भी बढे हैं । दक्षिण एशिया के एक दर्जन सशस्त्र क्रांतिकारी संगठनों ने मिलकर 2001 में एक समन्वय समिति काम्पोसा बनाई . इसमें नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल (माओवादी) की मुख्य भूमिका है ।

देश के दो ताकतवर नक्सली संगठन पीपुल्स वार और एमसीसी के 2004 में हुए एकीकरण में  भी नेपाली माओवादियों की भूमिका उल्लेखनीय मानी जाती है। ये दक्षिण एशिया के माओवादियों के इस समन्वय का भारत में दिखने वाला सीधा प्रभाव है । तत्कालीन पीपुल्स वार की पोलित ब्यूरो के एक सदस्य रामजी के मुताबिक ‘काम्पोसा का पहला लक्ष्य है दक्षिण एशिया में भारतीय विस्तारवाद के विरुद्ध लड़ना’ । पीपुल्स वार और एमसीसी (आज की भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी माओवादी) को पिछले दिनों अमेरिका ने आतंकवादी संगठनों की अपनी सूची में शामिल कर लिया । इस नई एकीकृत पार्टी की सदस्य संख्या 12000 से अधिक है इसमें आधे से ज्यादा सशस्त्र सदस्य हैं .

एक तरफ नक्सली ताकत की यह तस्वीर है दूसरी तरफ सरकार, संसदीय जनतंत्र में आस्था रखने वाले राजनैतिक दल, मीडिया और बुद्धिजीवियो का एक बडा हिस्सा इसे एक समस्या ही मानकर बहसों में उलझा है । और यह कथित समस्या राजसत्ता पर कब्जे के अपने नारे के साथ न केवल सीधे सत्ता प्रतिष्ठानों पर हमले कर रही है बल्कि दिल्ली की सडको पर अपने जनाधार के प्रदर्शन को उत्सुक है । समस्या इसलिए क्योंकि किसी सच्चे लोकतंत्र में हिंसा की वकालत नहीं की जा सकती, लेकिन देश के संसदीय लोकतंत्र को नक्सलवाद की चुनौती का अस्तित्व, आज राजनीति की एक महत्वपूर्ण धारा के रुप में दर्ज है  ।

देश की कौन सी तस्वीर है जो नक्सलवाद के इस चेहरे पर दिखाई देती है ?


इस तस्वीर में देश के वे इलाके शामिल हैं जहां भूख है, जानलेवा कर्ज है , गरीबी-बेरोजगारी है, बेईलाज मौत है, अशिक्षा है, पीने के साफ पानी का अभाव है, जल, जंगल, जमीन और दूसरे प्राकृतिक संसाधनो का असली मालिक न केवल अपने हक से वंचित है बल्कि अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक पहचान के लिए अपने बेइँतहा शोषण के खिलाफ सम्मानजनक जीवन के लिए छटपटा रहा है । ये वंचितों का वो इलाका है जहां आजादी के बाद से सुशासन के कदम अब तक नही पड़े। अब इन इलाकों में खून बरस रहा है ।

एक समय था जब इन इलाकों में लोकतंत्र को कोई चुनौती नहीं थी  जल जंगल ,जमीन पर लोकतंत्र का पहरा था । लोकतंत्र के प्रतिनिधि केवल सांसद और विधायक ही नहीं थे, पुलिस भी इसी भूमिका में थी और जंगल के कानून भी आदिवासियों को जंगल पर अपना हक जताने से रोकने के लिए मुस्तैद थे । इन आदिवासियों के हाथों में वोट का उछलता पत्थर तो था, पर इससे वे अपनी जिंदगी की रक्षा नहीं कर पाए. आजादी के बाद का हर चुनाव इस बात का गवाह था ।

और विषमता केवल आर्थिक मोर्चे पर नहीं थी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के अवसरों की बात हो या अपनी संस्कृति, अपनी पहचान, अपनी अस्मिता का सवाल हो – तस्वीर हमेशा विषम थी. इन्हीं परिस्थितियों में संसदीय लोकतंत्र को चुनौती देता हुआ नक्सलवाद देश के अलग अलग इलाकों में अलग अलग समय में अपनी सांगठनिक और रणनीतिक क्षमताओँ के साथ पैर जमाता गया. यहां प्रकाश सिंह की ‘ द नक्सलाइट मूवमेंट इन इँडिया ’ को उद्धृत करना उपयुक्त होगा.

इस किताब के सातवें अध्याय में उन्होंने जयति घोष और कृष्णा भारद्वाज से लेकर पी साईँनाथ और जवाहर रोजगार योजना के अध्ययन तक का जिक्र करते हुए कहा है कि ये संयोग नहीं है कि नक्सली देश के उन इलाकों में सक्रिय है जहां गरीबी रेखा के नीचे गुजर करने वाले देश के ग्रामीण गरीबों का 90 प्रतिशत हिस्सा बसता है । जवाहर रोजगार योजना पर योजना आयोग के इस अध्ययन ( 1992) के मुताबिक

‘The Analysis of third round of NSSO survey (1987-88) revealed that a little over 90 % of thre rural poor below Poverty Line live in the 10 major states of Andhra Pradesh, Bihar, Karnataka, Madhya Pradesh, Maharashtra, Orissa , Rajasthan, Tamilnadu, Uttar Pradesh And West Bengal ’

यह वास्तव में संयोग नहीं है कि हिन्दुस्तान में नवजनवादी क्रांति के सपने के साथ नक्सलवाद ने देश के जिन इलाकों में अपनी जड़ें मजबूत की है वे मानवीय गरिमा के हर पैमाने पर सबसे निचले दर्जे पर हैं . इसके असंख्य उदाहरण है, एक उदाहरण भूख गरीबी और बदहाली के लिए कुख्यात उड़ीसा के काशीपुर का है. सितंबर 2000में  जब इस इलाके में भूख से मौत की खबरें आईँ तो उस इलाके का जायजा लेने पहुंचे पत्रकारों और स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं ने जो देखा वो रौंगटे खड़े कर देने वाला था ।

अनाज को मोहताज लोग सड़ी गली आम की गुठलियों को उबालकर पी रहे थे । लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में ऐसी अमानुषिक तस्वीर को देखने पहुंची भीड़ में मैं भी था. हमने देखा कि गरीबी रेखा के नीचे गुजर करने वाले लोगों के राशनकार्ड्स पर अनाज दर्ज था लेकिन ये अनाज उनकी झोपड़ियों तक नहीं पहुंचा था । लोगों के पास काम  नहीं था । जेबे खाली थी , इसी दौरान उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को तब लोगों के भारी गुस्से का सामना करना पडा –जब उनकी ये टिप्पणी अखबारों में छपी कि आम की गुठलियों का घोल इन ग्रामीणों का पारंपरिक भोजन है । नवीन पटनायक जब इस इलाके दौरे पर गए तो गुस्साए लोगों ने उनके काफिले पर आम की गुठलियां फेंकी थी . मुख्यमंत्री के काफिले पर आम की सड़ी गली गुठलियां फेंकने वाले वो गुस्साए आदिवासी नक्सलवादी नहीं थे । मुख्यमंत्री की उस कथित टिप्पणी से उन गरीब आदिवासियों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंच थी । उनकी कार्रवाई उस प्रशासन, उस सरकार और उस व्यवस्था के खिलाफ गुस्से का स्वतस्फूर्त प्रदर्शन थी ।

क्या इसे संयोग कहा जाए कि इसी कोरापुट जिले में छह फरवरी 2004 को पीपुलस् वार ने जिला मुख्यालय पर जबर्दस्त हमला कर एक तरह से पूरे शहर की प्रशासनिक मशीनरी को बंधक बना लिया था .

क्या बिना जनाधार के ऐसा हमला संभव था जिसमें नक्सलियों ने एस पी दफ्तर से लेकर ट्रेजरी और जेल तक लूट ली । 500 से ज्यादा अलग अलग तरह के हथियार और 25000 से ज्यादा कारतूस ले गए इस हमले को पीपुल्स वार ने ‘ भारत में जारी माओवादी जनयुद्ध के इतिहास में महत्वपूर्ण दिन ’  कहा है ।

कुलदीप नैय्यर ने भी आदिवासियों की दुर्दशा को इस तरह व्यक्त किया है

 “Orissa is another state where corruption may be less in comparison but where government is using force to dispossess the adivasi of their land in order to hand it over to multinationals. Kashipur in Orissa is currently experiencing the onslaught because the tribals who live around the mines are sought to be moved out. If the oustees were naxalites it would only strengthen the argument that the system did not give them any real option”

इस व्यवस्था ने आदिवासियों की उपेक्षा में संविधान के प्रावधानों की खुली धज्जियां उड़ाई हैं पांचवी अनुसूची के क्लाज 3 और संविधान के आर्टिकल 244 के मुताबिक जिन राज्यों में अनुसूचित क्षेत्र हैं उन राज्यों के राज्यपालों के लिए कानूनन ये आवश्यक है कि वे इलाकों के प्रशासन के बारे में भारत के राष्ट्रपति को वार्षिक या जब भी राष्ट्रपति चाहें रिपोर्ट भेंजे. केन्द्र ने इसके लिए वित्तीय वर्ष की समाप्ति के छह महीने बाद यानि 30 सितंबर तक यह रिपोर्ट भेजने के निर्देश जारी किए थे । लेकिन हाल क्या है?   ? नक्सलवाद से जूझ रहे अविभाजित मध्यप्रदेश की स्थिति का जब संसदीय समिति ने अध्ययन करना चाहा तो पता चला कि वर्ष 1992 के रिपोर्ट मध्यप्रदेश के राज्यपाल के सचिवालय से 9 जुलाई 1996 को भेजी गई और ये रिपोर्ट वर्ष 2000 तक आदिवासी मामलों के मंत्रालय में परीक्षण के लिए पडी हुई थी. मामला संयुक्त संसदीय समिति का था तो राज्य सरकार सक्रिय हुई और किसी तरह 1996-97 तक की रिपोर्ट भेज दी गई ,लेकिन तब तक समिति अपना अध्ययन पूरा कर चुकी थी । संयुक्त ससंदीय समिति ने बाद में अपना उल्लेख किया कि

“ It is more painful to note that this report highlights only the achievements of the state government in tribal development. The indepth analysis of the solutions to the problems of scheduled areas is not included in the reports”

नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र का ब़ड़ा हिस्सा आदिवासी बाहुल्य है । ये ऐसे जंगलवासी हैं जो सदियो से शोषण का शिकार हैं । इस शोषण के खिलाफ आदिवासियों के ऐतिहासिक विद्रोह भी दर्ज है .बस्तर में 1825 में तत्कालीन मराठा शासकों के अत्याचारं के खिलाफ, उनके द्वारा थोपे गए नए नए करों के खिलाफ शहीद गेंदसिंह के नेतृत्व में हुआ परलकोट विद्रोह हो या अंग्रेजों द्वारा बस्तर के वनों की लूट की कोशिशों के खिलाफ 1859 का कोया विद्रोह या 1910 का भूमकाल विद्रोह हो , सभी संसाधनों की लूट और औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ आदिवासियों के बागी तेवर के प्रतीक बन गए । इनमें भूमकाल विद्रोह का खास तौर पर जिक्र करना चाहिए । बस्तर 1854 के बाद अंग्रेजों की सत्ता के अधीन था । 1876 के बाद अंग्रेजों ने बस्तर में सुधार और जनकल्याण के नाम पर बहुत से काम किए । इस इलाके की प्रमुख सडकें अंग्रेजों की देन हैं ।सबसे महत्वपूर्ण रायपुर, जगदलपुर सड़क 1898 में बन गई थी । आदिवासियों को जंगल से खदेड़ने के लिए वन संपदा के संरक्षण के नाम पर वन कानूनो की रुप रेखा तैयार की गई पर इन सब का निशाना बस्तर की अनमोल वनसंपदा ही थी । इसके अलावा वस्तर में स्कूल और अस्पताल खोले गए । अपनी जरूरतों के अनुकूल न्याय पालिका और पुलिस तंत्र का विकास किया गया। इन सबसे वहां अंग्रेज और उनके एजेंटों की संख्या बढ गई , उनके अत्याचार बढ़ गए । इन्हीं अत्याचारों के खिलाफ बगावत थी – भूमकाल विद्रोह .

एक अंग्रेज अधिकारी ने लिखा था कि – आदिवासियों ने नए वन कानूनों, पुलिस के हस्तक्षेप, स्कूलों एवं बेगारी को पसंद नहीं किया था। समूचे बस्तर में लोग अपने जीवन के ढांचे में लाए जा रहे बदलाव के बारे में बोलते रहे । जंगल के पुत्रों आदिवासियों ने माना था कि जंगलों पर उनका अलग नहीं किया जाने वाला अधिकार है तथा कोई भी हस्तक्षेप उनके लिए तंग करने वाला है । उन्होंने माना था कि वे जंगलों से जो चाहे कर सकते हैं  तथा हस्तक्षेप करने का अधिकार किसी को नहीं है ।

आजादी की आधी सदी बाद क्या स्थिति है ?

21 जुलाई 2004 को केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर कर स्वीकार किया कि –

· वन प्रशासन ने जन जातीय समुदायों के साथ ऐतिहासिक रुप से अन्याय किया है

· क्योंकि सरकारी तंत्र आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता प्रदान नहीँ कर रहा है इसलिए आदिवासियों का – अपराधीकरण – हो रहा है

· क्योंकि आदिवासियों के पास मालिकाने के दस्तावेज नहीं थे इसलिए ब्रिटिश शासन मे जंगलों के सीमांकन के समय भी उनके अधिकारों का निर्धारण नहीं किया गया

· 1947 के बाद बहुत सारे जंगलों को आरक्षित वन घोषित कर दिया गया परंतु उस समय भी आदिवासियों के अधिकारों का निर्धारण नहीं किया गया ।

अधिकारों से वंचित आदिवासी, रोज अपनी जमीन से बेदखल हो रहे आदिवासी, जिस अपराधीकरण की ओर उन्मुख हुए शायद वो ही नक्सल वाद था ।

नक्सलियों ने क्या किया

नक्सली केवल कुछ हजार सशस्त्र गुरिल्लाओँ या पेडो  और पहाड़ियों की ओट के दम पर नहीं टिके हैं । इन सब का महत्व है लेकिन जनाधार के बिना यह सब महत्वहीन है । इस पर चर्चा के लिए दंडकारण्य का उदाहरण उपयुक्त होगा . आज देश के सबसे बड़ी माओवादी पार्टी भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी माओवादी ने इसे अपने आधारक्षेत्र के रुप में विकसित करने का लक्ष्य रखा है । नक्सलियों के मुताबिक, दीर्घ कालीन युद्ध में रणनीति दृष्टिसे दंडकारण्य बडा महत्वपूर्ण है ।

दंडकारण्य में छत्तीसगढ राज्य के बस्तर, दंतेवाडा और कांकेर जिले तथा महाराष्ट्र का गढचिरौली जिला शामिल है। इस पूरे इलाके का क्षेत्रफल 53000 किलोमीटर से ज्यादा है। यह इलाका वन और खनिज संपदा से भरपूर है लेकिन आजादी के बाद से विकास का एक अधकचरा ढांचा ढो रहा है , बल्कि ये कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि विकास ऐसा जो बाजार के अनुकूल हो । यहां आदिवासियों की आबादी 60 प्रतिशत से ज्यादा है  और इनमें अधिकांश गौंडी हैं , बच्चों को साक्षर बनाना भी यहां लोगों के लिए जंग जीतने जैसा है , और बारी इलाज की आती है तो लोग जंग हार जाते हैं । उदार आर्थिक नितियों के हर तरह के दुष्प्रभाव यहाँ देखे जा सकते हैं और औसत जीवन राष्ट्रीय औसत से काफी कम है और बाल मृत्यु दर काफी ज्यादा । अच्छी बारिश के बावजूद हर साल सूखा पड़ता है । जंगलों की खुली लूट का उदाहरण है ये इलाका ।

छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री डा रमन सिंह कहते हैं कि नक्सलवाद का विकल्प विकास है लेकिन किसी सरकार को ये बात आजतक समझ आ रही है जब एक बड़े हिस्से में नक्सलियों की एक तरह से समानांतर सरकार चल रही है,  और विकास भी कैसा ? सरकार चाहती है कि बस्तर में सडकों का जाल बिछे, रेल लाइनें बिछ जाएं , बडे बांध और बड़े उद्दोग लग जाएं । बस्तर में भयानक कुपोषण, मलेरिया से मौंते, गर्भवती महिलाओं की चिकित्सकीय देखभाल के खराब इंतजाम, सिंचाई और खेती की आधुनिक सुविधाओं का अभाव यह सब है. एड्स जैसी बीमारी भी इस इलाके में पहुंच गई है लेकिन ,सरकार की चिंता रही है बस्तर का औद्योगिकीकरण , बस्तर में पर्यटन को बढावा देने की नीतियां लागू करना. उद्योगपतियों और पर्यटकों की जरूरतों के ही अनुकूल सुविधाओँ को ढांचा खड़ा करने के लिए सरकार लालायित रहती है . एक तरफ बस्तर के चित्रकोट में स्थित एशिया के सबसे बड़े जलप्रपात की ओर पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए वहां रंगीन रोशनी का इंतजाम किया गया है औरक राज्य की राजधानी रायपुर में आकर्षक होर्डिंग्स लगाए गए हैं . दूसरी तरफ बस्तर की जनता की मर्जी के खिलाफ एक उद्योग (एस्सार) को नदी जल के जरिए लौह अयस्क की विशाखापट्टनम तक ढुलाई की अनुमति दी गई है ।

जो पानी बस्तर का जीवन है वह आदिवासी के खेतों में न जाकर बड़े उद्दोगों को मिलेगा । इन उद्योगों की वजह से बडे पैमाने पर पेड़ भी कटेंगे । नदियां भयानक प्रदूषण का शिकार भी होंगी । बल्कि कहा ये जा रहा है कि शंकिनी नदी का जल यदि लौह चूर्ण के परिवहन के लिए उपयोग में लाया गया तो 600गांव मरूस्थल में तब्दील हो जाएंगें । एस्सार ग्रुप को रिजर्व फोरेस्ट का 14 हैक्टेयर जंगल पाइपलाइन बिछाने के लिए दिया गया है ।उन्हें ये जंगल काटने की अनुमति दी गई है । दूसरी ओर क्षेत्र के आदिवासी ग्रामीण जंगल में प्रवेश करने से जेलजाते हैं  वे सूखा पत्ता नहीं बटोर सकते और जंगल में आदिवासी जलाऊ लकड़ी के लिए तरसते हैं । सच ये है कि रिकार्ड में चाहे केवल 14 हेक्टेयर रिजर्व फोरेस्ट पाइप लाइन बिछाने के लिए दिया गया हो लेकिन इस व्यापार के कारण हजारों हेक्टेयर का रिजर्व फोरेस्ट जोखिम में पड़ गया है । क्षेत्र के विधायक कवासी लखमा ने चुनाव के वक्त कहा था कि एस्सार पाइपलाइन लगाने के लिए उनकी लाश पर से गुजरना होगा और इस नारे पर ही वे पुन कांग्रेस के विधायक बने हैं लेकिन इसके बाद वे पाइप लाइन बिछाने के काम के संदर्भ में मौन हो गए ।

संसदीयलोकतंत्र के खिलाफ नक्सलवाद की जडों के मजबूत होने के आर्थिक सामाजिक कारणों का ये शायद उपयुक्त उदाहरण है ।

एक दिलचस्प मामला एनएमडीसी के प्रस्तावित स्टील प्लांट का है । पहले ये स्टील प्लांट बस्तर में हीरानार नामक स्थान पर लगने वाला था । बताते हैं कि नक्सली विरोध के कारण इस प्रोजेक्ट को हीरानार के बजाय जगदलपुर के समीप नगरनार में लगाने का फैसला हुआ था। स्थानीयलोंगों ने इस प्लांट का कड़ा विरोध किया । धरना प्रदर्शन हुए। विरोध करने वालों का कहना था कि इस प्लांट से उनकी हजारों एकड उपजाउ जमीन चली जाएगी, बस्तर की जीवनरेखा  मानी जाने वाली इंद्रावती नदी प्रदूषित हो चाएगी और इतनी कीमत चुकाने के बाद लोगों को नौकरिया भी नहीं मिलेगी क्योंकि इस प्लांट में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होना है । दिलचस्प यह है कि नगरनार प्लांट एक ऐसा मामला था जिसपर कांग्रेस की तत्कालीन जोगी सरकार और तब के विपक्षी दल बीजेपी का स्टैंड एक ही था – प्लांट लगना चाहिए। इसके लिए लोगों के आंदोलन को कुचला गया , आंदोलन के समर्थन में बस्तर आने की कोशिश कर रहे डाक्टर ब्ह्मदेव शर्मा और वंदना शिवा जैसे लोगों को वहां घुसने नही दिया गाय और अंततः तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने इसका शिलान्यास किया .

लोग सवाल कर रहे हैं कि बस्तर में पहले ही एनएमडीसी का एक संयंत्र बैलाडीला में स्थापित है । उस संयंत्र ने बस्तर का क्या भला किया ? रोजगार के नाम पर ड्राइवर, खलासी, रसोइये जैसी नौकरियां ही स्थानीय लोगों के हिस्से आई और प्रदूषण से लेकर अपनी जमीन से बेदखवली तक के दंश भी उन्होंने झेले । लोहे और बाक्साइट की खदानों के कारण हजारों किसानों के खेत बरबाद हुए । मशीनीकरण ने रोजगार छीने ।

नक्सलियों के विरोध के कारण आज बस्तर में कई खदाने बंद हैं । उनकी मांग है कि आदिवासियों  के अधिकार बरकरार रखते हुए खनन ऐसा हो जिसमें मशीनीकरण के कारण लोगों के रोजगार कम नहों । ऐसा खनन आज किसी उद्दोग पति के लिए मुनाफे का सौदा नहीं होगा । नतीजा खनन बंद, खेती जारी और आदिवासी किसान मशीनीकरण के खिलाफ नक्सली आंदोलन में भी शामिल हुआ । इस मुद्दे पर बस्तर के चार गांव या कुव्वेमारी, खदान क्षेत्रों में जिस राजनैतिक शक्ति ने संघर्ष किया होता शायद वहां का किसान उसके साथ होता ।नक्सली ये मांग भी कर रहे हैं कि आजादी के बाद से बस्तर के विकास पर एक श्वेत पत्र जारी किया जाए ताकि यह पता चले कि बस्तर से कितना लोहा जापान गया , कितनी लकडी और कितना बाक्साइट कितना टिन, कितना डोलोमाइट , और कितना ग्रेनाइट बेचा गया । और बदले में बस्तर को क्या मिला ।

साम्राज्यवाद विरोधी जनसंघर्ष मंच के एक अनुमान के मुताबिक दंडकारण्य क्षेत्र से छत्तीसगढ़  सरकार को सालाना 500 करोड़ और महाराष्ट्र सरकार को सालाना 150 करोड रुपए की आमदनी हो रही है। ये कहानी बस्तर में ही खत्म नहीं होती । बस्तर क्षेत्र से लगी हुई दल्ली राजहरा की खदानों में एक समय बीस हजार श्रमिकों को रोजगार हासिल था । आज प्रोडक्शन बढ़ गया है लेकिन रोजगार सिर्फ 2000 श्रमिकों को हासिल है । भिलाई स्टील प्लांट में बीस साल पहले जब उत्पादन एक मिलियन टन था तब यहां 96000 श्रमिक थे । आज उत्पादन 5.2 मिलियन टन हैं और श्रमिकों की संख्या 37000 है

क्या बस्तर के जंगलों में सक्रिय नक्सलियों की नजर पडोस के दल्लीराजहरा और भिलाई में श्रमिक असंतोष पर नहीं होगी ? उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण की नीतियों का असर बस्तर से लेकर भिलाई तक समान रुप से दिखता है । और ऐसे साम्राज्यवादी हितों का विरोध नक्सली एजेंडा का अहम हिस्सा है . आज के नक्सल आंदोलन के सामाजिक आर्थिक कारणों की चर्चा तेलंगाना के सशस्त्र जनसंघर्ष के जिक्र के बिना पूरी नही होगी। नक्सलबाड़ी में फूटी चिंगारी आज तेलंगाना क्षेत्र में शोला बनकर आसापास के राज्यों में भी फैलती है तो लोग इसकी जडे तेलंगाना के उस सशस्त्र किसान संघर्ष ( 1946-51 ) में भी देखते हैं जिसमें 4000 कम्यूनिस्ट और लड़ाकू किसान मारे गए थे । 10000 से अधिक कम्यूनिस्ट कार्यकर्ता और जनसैनिक तीन-चार साल तक नजरबंद कैंपों और जेलों में रहे .कम से कम 50000 ऐसे लोग थे जिन्हें समय समय पर घसीट कर पुलिस और फौज के कैंपों में ले जाया गया और वहां उन्हें हफ्तों तथा महीनों तक पिटाई, यातनाओँ  और आतंक का शिकार बनाया गया । इस संघर्ष के दौर में 3000 गांवों की किसान जनता ने जिनकी संख्या मोटे तौर पर 30 लाख के करीब होगी। 16 हजार वर्ग मील के क्षेत्र में लड़ाकू ग्रामपंचायतों के आधार पर ग्रामराज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की ।

हैदराबाद राज्य के शासकों द्वारा जनता के बडे हिस्से की संस्कृति और भाषा को दबाने की कोशिशों के विरोध से लेकर

“जमीन जोतने वाले की”

जैसे क्रांतिकारी नारों पर अमल उस सशस्त्र विद्रोह की सामाजिक- राजनैतिक पृष्ठभूमि का महत्वपूर्ण हिस्सा थे ।आज नक्सली संघर्ष की सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक पृष्ठभूमि में भी ये मुद्दे मौजूद हैं।

दंडकारण्य को आधार क्षेत्र बल्कि एक मुक्त क्षेत्र में बदलने की अपनी लड़ाई के क्रम में नक्सली यहां ग्राम राज्य कमेटियां या जनताना सरकार का गठन कर रहे हैं। वर्ष 2003 तक दंडकारण्य में ही 500 गांवों में इनका गठन हो चुका है । करीब 2000 गांव इन कमेटियों के प्रभाव में बताए जाते हैं तत्कालीन पीपुल्स वार के पोलित ब्यूरो सदस्य रामजी के मुताबिक – “हम अब सिर्फ उन्हीं इलाकों में कमेटियों का गठन कर रहे है जहां भौगोलिक परिस्थितियां गुरिल्ला लड़ाई के अनुकूल हो, जनता सक्रिय हो, वर्ग संघर्ष तेज हो. RPC यानी जनताकीबीज रूपी सत्ता. जब गांव में जनता की यह बीजरुपी सत्ता रहती है तब वहां संसदीय व्यवस्था के किसी भी अंग को काम करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि दो शक्तियों का संघर्ष होता है तो कोई एक ही शक्ति टिक सकती है, दो नहीं । वो चाहे हमारी सत्ता हो या दुश्मन की”।

अपने संघर्ष की इस अवस्था तक नक्सली पहुंचे कैसे?

प्रतीक के तौर पर दंडकारण्य का ही उदाहरण लेना चाहिए । जनवरी 1934 में मजदूर किसान प्रतिनिधियों की दूसरी राष्ट्रीय कांग्रेस के समापन भाषण में माओत्से तुंग ने कहा था – “अगर हम जीतना चाहते हैं तो हमें और भी बहुत सा काम (जनता  को गोलबंद करने के अलावा ) करना होगा । हमें भूमि संबंधी संघर्षों में किसानों का नेतृत्व करना होगा और उनमें जमीन बांटनी होगी , उनके श्रम के उत्साह को बढ़ाना होगा तथा कृषि उत्पादन बढ़ाना होगा, मजदूरों के हितों की रक्षा करनी होगी, सहकारी समितियों की स्थापना करनी होगी । आम जनता के सामने जो समस्याएं हैं , कपड़े,लत्ते, खुराक , मकान ईंधन, चावल,खाद्य,तेल व नमक, बीमारी व स्वास्थ्य रक्षा तथा शादी ब्याह की जो समस्याएं हैं उन्हें हल करना होगा” ।

नक्सली ये कर रहे हैं । दंडकारण्य में उन्होंने 80 के दशक की शुरुआत में प्रवेश किया था । शोषण के अर्धसामंती अवशेष, जीवन की आदिम युगीन परिस्थितियां, सांस्कृतिक पहचान का संकट , भाषा को दबाने की कोशिशें , आदिवासियों के बुनियादी अधिकारों को नकारती उन्हें उनके परिवेश से खदेडती सत्ता , उनके संसाधनों के दोहन में लगा देशी विदेशी उद्योंगपति , पुलिस से लेकर वन विभाग तक सरकारी अमले के रोज बरोज के अंतहीन अत्याचार , उनकी उपज पर मुनाफा बटोरता स्थानीय गैर आदिवासी सेठ साहूकार , उन्हें निरक्षर रखने की कोशिश , उन्हें बेईलाज मारता स्वास्थ्य विभाग, उन्हें कुपोषित रखती सार्वजनिक वितरण प्रणाली , उनके वोट से संसदीय जनतंत्र की मलाई चाटते नेता, संघर्ष का विकल्प बनने की कोशिश करते एनजीओ आदिवासियों का ईसाई धर्म और हिन्दू धर्म में धर्मातंरण सबकुछ था उस दंडकारण्य में (और आज भी है )

नक्सलियों ने तेंदुपत्ता तोड़ाई की मजदूरी से लेकर इन तमाम छोटे बडे मुद्दों पर आदिवासियों को संगठित करने का काम किया । जो संसदीय व्यवस्था इन आदिवासियों को बेहतर जीवन का विकल्प नहीं सुझाती थी, उनके विकल्प के रुप में नकस्लियों ने अपने को प्रस्तुत करने की कोशिश की । तेंदुपत्ता तोड़ाई की मजदूरी बढ़वाना या आदिवासी की मुर्गी और बेटी को सरकारी कारिंदों से बचाना उनकी लड़ाई की तात्कालिक मुद्दे थे । उन्होंने आदिवासियों के पराईकरण के मुद्दे को अपनी लड़ाई का महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया । नक्सलियों का आरोप है कि -हिन्दु धर्म के प्रसार से आदिवासियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है । आदिवासियों को वनवासियों का नाम देकर उसे हिन्दू धर्म की एक शाखा बताया जा रहा है , जो एक सोची समझी साजिश है। संघ परिवार के लोग जो कि भारत के सांमती और दलाल पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं आदिवासियों में छुआछूत जैसे घिनौनी प्रथा की बीज बोने की कोशिश कर रहे हैं । आदिवासियों के नाम , रस्मों रिवाज, संस्कृति, देवी देवताओँ में विकृत ढंग से बदलाव करते हुए सभी का हिन्दूकरण कर रहे हैं उनकी भाषा गोन्डी (1991 की जनगणना के मुताबिक गोंडी बोलने वालों की संख्या 2,124,852 थी ) के हिन्दी करण और उनके जीवन के तमाम दूसरे पहलुओं का हिन्दूकरण किया जा रहा है । कुल मिलाकर यहां पर आदिवासियों के पराईकरण (aliention) की प्रक्रिया बड़े षडयंत्र के तहत जारी है।

तेंदुपत्ता आंदोलन तो दंडकारण्य में 1982 में ही शुरु हो गया था। इसके बाद नक्सलियों के नेतृत्व में आदिवासी किसानों ने हजारों एकड़ वन्यभूमि पर कब्जा कर लिया। मजदूरी वृद्धि आंदोलन चलाया गया । वन उत्पादों के उचित मूल्यों के लिए आंदोलन हुए। तत्कालीन पीपुल्स वार ने यह नोट किया कि इन आंदोलनों के विस्तार के परिणाम स्वरुप 1984 तक दंडकारण्य के क्षेत्र में दलोँ की संख्या में वृद्धि हुई, दलों का निर्माण बढ़ गया , वर्ग संघर्ष भी तीव्र हुआ और साथ साथ दमन भी बढ़ गया ।

1987-88 के भीषण सूखे के दौरान नक्सलियों ने आदिवासियों को संगठित कर साहूकारों से लेकर सरकारी गोदामों तक में हमले करके धान कपडा, बर्तन, आदि लूटा और किसानों में बांट दिया। पीपुल्स वार ने अपनी एक सांगठनिक रिपोर्ट में सूखा हमलों की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा – “इस किस्म का आंदोलन हमारी पार्टी के लिए एक नया अनुभव था । संघर्ष के अनेक रुपों को समन्वयित कर आंदोलन को जारी रखना इसकी विशेषता है । इस आंदोलन से जनता के बीच सांगठनिक विकास के साथ साथ उनमें जुझारु पन बढ गया । कुल मिलाकर पूरे दंडकारण्य क्षेत्र में सूखा संघर्ष का अच्छा प्रभाव पड़ा है। हमारे आंदोलन को मजबूत आधार मिला” ।

नक्सलियों ने शराबबंदी से लेकर सामाजिक कुरीतियों तक के खिलाफ आंदोलन छेड़कर महिलाओँ को संगठित किया । उन्होंने कुछ हिस्सों में किसानों को खेती के आधुनिक तरीके सिखाए, उनमें बीजों का वितरण किया , छोटे तालाब और बांध बनवाए, नंगे पांव डाक्टर की तर्ज पर ग्रामीण डाक्टर तैयार किए , स्कूल भी खुलवाए। नक्सलियों ने भूमिकब्जा आंदोलन को अत्यंत महत्व दिया । इसके तहत खेती के लिए न केवल जंगल काटकर जमीन को खेती योग्य बनाया गया बलकि बड़े किसान भूमिपतियों की जमीन , विवाद ग्रस्त जमीन आदि पर भी कब्जा कर उन्हें गरीब किसानों में बांटा गया. इस दौरान इस बात का भी ध्यान रखने की कोशिश की गई कि आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच टकराव न हो ।

तस्वीर साफ है दंडकारण्य एक बड़ा उदाहरण है उन परिस्थितियों का जो नक्सलवाद जैसे किसी भी जुझारु, क्रांतिकारी आंदोलन के लिए अनुकूल हैं ।

आदिवासी जन आंकाक्षाओं की उस अभिव्यक्ति का जो अपने अंतहीन शोषण के खिलाफ अपनी नैसर्गिक संपदा पर अपने हक के लिए उठी है उस रणनीति और सांगठनिक क्षमता का जिसका प्रदर्शन पीपुल्स वार (अब कम्यूनिस्ट पार्टी माओवादी) ने किया उस हिंसा का जिसके छींटे लोकतंत्र के दामन को खून से रंग रहे हैं और उस बाजार परस्त शासन व्यवस्था का जिसमें सुधार के लक्षण दूर दूर तक नहीं दिख रहे हैं. शायद देश के बाकी नक्सल प्रभावित इलाकों की तस्वीर भी ऐसी ही है ।

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ देश की कौन सी तस्वीर है जो नक्सलवाद के इस चेहरे पर दिखाई देती है ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें