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बीच सफ़हे की लड़ाई

अब हमहुं सीरियस बानी : लालू प्रसाद

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/24/2009 05:00:00 AM


लालू जी बिहार में राज्य सरकार के तीन साल पूरे हुए हैं. आपकी प्रतिक्रिया?

लालू प्रसाद : तीन साल हो गये! 60 फीसदी समय समाप्त? हम का बतावें. आप ही
लोग बताइए का हुआ तीन साल में?


आप पर आरोप है कि आपने बिहार को रसातल में डुबा दिया था.
लालू प्रसाद : रसातल क्या प्रलय से भी बुरा होता है. हमने जानबूझ कर ऐसी
बाढ़ तो नहीं ही लायी थी, जिससे एकबारगी लाखों लोग बेहाल हो गये. हमने
सामाजिक न्याय का बैनर लगाकर राज किया था और सामाजिक न्याय के झंडे को
झुकने नहीं दिया. ये विकास का बैनर लगाकर राज कर रहे हैं क्या हुआ विकास
आप ही बताइए. इनके देखा-देखी मैंने भी रेल में विकास का बैनर लगाया और
दुनिया देख रही है कि रेल में विकास हो रहा है.



लेकिन जदयू के लोग कहते हैं कि रेल का भविष्‍य बरबाद कर रहे हैं आप?
लालू प्रसाद : विकास से भविष्‍य बरबाद ही होता है. मार्क्स, गांधी, कबीर
से लेकर सभी साधु संतों ने यही बतलाया है कि धन-दौलत, सुविधा आदमी को
बरबाद करते हैं, सभ्यता को चौपट करते हैं. लेकिन जब बहुत विकास, विकास
सुना तो हमने कहा कि ई भी करके दिखलाते हैं और दिखला दिया. बिहार में
सामाजिक न्याय का बैनर लगाया था, रेल में विकास का बैनर लगाया. हमने
दोनों जगह औसत से बेहतर किया. जनता से पूछकर देखिए मेरे बारे में.



जनता तो आपको चारा घोटाला से जोड़कर देखती है.
लालू प्रसाद : पांव फिसल गया था और उसकी सजा भी भुगत ली. जेल गया, फजीहत
झेली. लेकिन यह अब पुरानी बात हो गयी. लेकिन नीतीश का तो सारा घोटाला है.
सारे अफसर और मंत्री भ्रष्‍टाचार में डूबे हैं. पग-पग पर घोटाला. अफसर पर
मंत्री का और मंत्री पर मुख्यमंत्री का भरोसा नहीं है. मंत्रियों के
ट्रांस्‍फर लिस्ट को मुख्यमंत्री रद्द करते हैं. लूट की संस्कृति बन रही
है.



लेकिन नीतीश कुमार को तो जनता ईमानदार मानती है.
लालू प्रसाद : हम 1974 में जेपी के नेतृत्व में आंदोलन कर रहे थे. तब
बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफुर थे. जिसे लोग चचा गफूर कहते थे.
ईमानदार थे. जेपी भी उन्हें ईमानदार मानते थे. लेकिन ईमानदार चचा गफूर के
चारों ओर भ्रष्‍ट लोग बैठे थे. उससे भी बुरा हाल आज है.



आप पर परिवारवाद का भी आरोप है. आपने पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया, जो
एक दिन पहले तक रसोईघर संभालती थीं. उन्हें राजनीति का कोई ज्ञान नहीं
था.
लालू प्रसाद : मंडन मिश्र का सुग्गा भी संस्कृत बोलता था. पॉलिटिकल
परिवार का नौकर-चाकर भी राजनीति जान जाता है. वो तो मेरी पत्नी हैं. आज
नीतीश भी तो महिलाओं के विकास की बात करते हैं. एतना को मुखिया बनाया
एतना को सरपंच. तो जानते हैं न सौ चोट सोनार का एक चोट लोहार का. हमने
एके बार सीएम बना दिया एक महिला को. कहा जाता है क्रांति घर से की जाती
है. हमने घर से क्रांति की. इस कलियुग में लोग तरह-तरह से औरतों को तबाह
करते हैं. आग लगाते हैं, जहर-माहुर खाने के लिए मजबूर करते हैं. हमने
अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाया. अगर यह गलती है तो मैं गलत हूं.



लालू जी आप रेल के विकास की बात करते हैं लेकिन विकास के नाम पर आप जनता
का सरेआम पॉकेट काट रहे हैं. साइड शायिका आपने दो से बढ़ाकर तीन कर दिया.
तत्काल योजना, टिकट लौटाना सब महंगा हो गया.
लालू प्रसाद : विकास का मतलब ही है आंख बंद डिब्बा गायब. यही सब विकास का
जादू-टोना है. आप तो सब भेदे खोल दे रहे हैं.



ठीक है नहीं खोलेंगे भेद. लेकिन जमीन लेकर रेलवे में नौकरी देने का आप पर
आरोप है, उस पर आपका क्या कहना है?
लालू प्रसाद : हम भुमिहीन परिवार से आते हैं और गरीब-गुरबा की राजनीति
करते हैं. विनोबा जी को लोग जैसे भूदान करते थे, वैसे ही हमको भी दान
करते हैं लोग. गरीबों को यह मंजूर नहीं कि गरीबों का नेता भी गरीब रहे.
अब जहां लेन-देन की बात है तो यह तो राजनीति में जमाने से चलता है. सुभाष
बाबू ने कहा था तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा. जो लोग कुछ
पढ़ते, समझते नहीं, वहीं लोग हम पर आरोप लगाते हैं. नीतीश के दो ठो कुकुर
हैं, वही दोनों भौंकते हैं. लेकिन वो लोग क्या कहेगा. एक तो बन डमरू है,
हिस्टीटर है, उसकी बात को कोई सीरियसली नहीं लेता. और रहे दूसरे. तो
बेचारे डालडा के डिब्बे की तरह चिकने-चुपड़े आदमी हैं. कर्पूरी जी के
दुलरूआ थे. लेकिन उन्होंने भी कुछ देकर ही पद-प्रतिष्‍ठा हासिल की है.
सारा बिहार जानता है. गीत सुना है न. बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी.



अब महाराष्‍ट्र मसले पर आइए लालू जी. आपने महाराष्‍ट्र सरकार की आलोचना
की. राज ठाकरे पर निशाना साधा. लेकिन जिस रोज कैबिनेट की बैठक हो रही थी
आप भागकर पटना राहुल राज के घर पहुंच गये. क्यों?
लालू प्रसाद : अरे भाई, लोग रगेदा-रगेदी किये था. लेट होता तो कामे
गड़बड़ा जाता. राहुल राज संभ्रांत भुमिहार परिवार से था. भुमिहार बहुत
वोकल हैं बिहार में. नीतीश अपना वोट पक्का कर रहा था. हम तो केवल उसको
डायलूट कर रहे थे. भूमिहार हमको वोट कहां देता है. जादे बकबक न करे मेरे
खिलाफ, मैं तो बस एतना ही चाहता हूं. देर करने से काम गड़बड़ाता.



तो यह सब वोट की राजनीति हो रही थी. हमने समझा आप तीनों नेता बड़े मसले
पर एकजुट हुए हैं.

लालू प्रसाद : जरूर हुए हैं एकजुट हम सब ने इक्ट्ठे प्राइम मिनिस्टर साहब
से बात की. लेकिन जो सच है सो सच है. ई राहुल राज तो खैर नाजुक बच्चा था
नहीं मारना चाहिए था बेचारे को. लेकिन नीतीश जितने तत्पर हुए तो क्या ऐसे
ही. गरीब का बेटा मारा जाता तो नीतीश ऐसे तत्पर होते क्या? एतना एनकाउंटर
हुआ और गरीबों के एक से एक होनहार नेताओं को मारा गया. कोई कुछ नहीं
बोला. लेकिन आज राहुल राज पर सब बोल रहा है. सब बोल रहा है तो हम भी
बोलेंगे. नहीं बोलेंगे तो लोग बोलेगा कि नहीं बोले. असली बात भी बोलेंगे
और काम की बात भी बोलेंगे.



लालू जी, जदयू सांसदों के इस्तीफे पर क्या कहना है आपका?
लालू प्रसाद : नौटंकी है और क्या. चुनाव से दो महीना पहले इस्तीफा दे रहे
हैं. एक कहावत है बांझ गाय बाभन के दान. ऐसी नौटंकी उन्हीं को मुबारक हो.
पब्लिक सबकुछ जानती है. हिम्मत है तो राज्य सभा से भी इस्तीफा करें. और
उससे भी बढ़कर नीतीश स्वयं अपने पद से इस्तीफा करें.

आप इस्तीफा क्यों नहीं करते?
लालू प्रसाद : पहले नीतीश इस्तीफा करे हम भी कर देंगे. लेकिन हम जानते
हैं कि वह नहीं करेगा. वो नौटंकी कर रहा है.


लेकिन आपकी अब तक की राजनीति नौटंकी शैली की ही तो रही है.
लालू प्रसाद : थी, अब नहीं है. अब हमहुं सीरियस बानी.

पिछले  इंटरव्यू की तरह यह भी काल्पनिक है, एक साल पुराना है और इसलिए कुछ सवाल-जवाबों को समझाने के लिए के लिए आपको जेहन  पर जोर डालना पड़ेगा.  तीन साल-तेरह सवाल पुस्तिका से साभार है.  यह पूरी शृंखला आप यहाँ पढ़ सकते हैं.




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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ अब हमहुं सीरियस बानी : लालू प्रसाद ”

  2. By Anonymous on November 24, 2009 at 5:01 PM

    vah! mazedar hai !! dhol ki pol kholta hua......

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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