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बीच सफ़हे की लड़ाई

महामारी से ग्रस्त बिहार का मीडिया

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/23/2009 12:31:00 PM

नीतीश कुमार के शासनकाल में बिहार के राज-समाज कि एक मुकम्मल पड़ताल जारी है. आईये, बिहार में पिछले साल आयी बाढ़ के दौरान बिहार के मीडिया के रवैये पर दिवाकर के साथ एक नज़र डालें. यह आलेख भी तीन साल-तेरह सवाल पुस्तिका से साभार है.  यह पूरी शृंखला आप यहाँ पढ़ सकते हैं.


अगर आप अमेरिकी मीडिया के इजरायल-प्रेम को समझना चाहते हैं तो मीडिया के
शीर्ष पदों पर बैठे यहूदियों की बहुतायत को नजरअंदाज नहीं कर सकते.
-योगेंद्र यादव

यह बात बिहार के संदर्भ में भी लागू होती है. अगर आपको बिहारी मीडिया के राग-द्वेष को समझना है, तो यह भी जानना होगा कि स्थानीय समाचार पत्रों, टीवी चैनलों के शीर्ष पदों पर कौन लोग हैं.योगेंद्र यादव ने मीडिया के चरित्र को समझने के लिए वर्ष 2006 में दिल्ली के प्रमुख हिंदी व अंग्रेजी मीडिया हाउसों में शीर्ष पदों पर काम करने वाले लोगों की सामाजिक पृष्‍ठभूमि का सर्वेक्षण किया था. सर्वेक्षण में यह तथ्य आया था कि दिल्ली के मीडिया हाउसों में 90 प्रतिशत शीर्ष पदों पर हिंदुओं का कब्जा है. इसमें से 49 प्रतिशत (भूमिहार व त्यागी के साथ) ब्राहमण हैं. कायस्थ 14 प्रतिशत. राजपूत 7 प्रतिशत. वैश्‍य 7 प्रतिशत. गैर द्विज उच्च जाति 2 प्रतिशत तथा अन्य पिछड़ी जाति के लोग 4 प्रतिशत हैं. सर्वेक्षण में इन नतीजों के आने के बाद काफी हंगामा मचा था. सारा देश इस बात से चकित था कि राष्‍ट्रीय मीडिया में फैसला लेने वाले पदों पर दलित और आदिवासी एक भी नहीं है और लगभग 45-60 फीसदी आबादी वाले अन्य पिछड़ा वर्ग का हिस्सेदारी महज चार प्रतिशत है. इस सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आयी थी कि देश की आबादी में 13.5 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले मुसलमानों की संख्या मीडिया में फैसला लेने वाले पदों पर महज तीन प्रतिशत है.

अगर ऐसा ही एक सर्वेक्षण बिहार में किया जाए तो? बिहार से इस समय मुख्य रूप से 6 हिंदी दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं. इनमें से पांच के संपादक ब्राह्‌मण हैं. इन छह समाचार पत्रों में ब्यूरो प्रमुख के पदों पर काबिज लोगों में 4 ब्राह्‌मण 1 भुमिहार व एक राजपूत हैं. यही हाल टीवी चैनलों का भी है. बिहार में हिंदी, अंग्रेजी समाचार पत्रों, टीवी चैनलों में शीर्ष पदों पर 100 फीसदी हिंदुओं का कब्जा है. इनमें 99 प्रतिशत द्विज हैं. पिछड़ी जाति का कोई भी पत्रकार फैसला लेने वाले पद पर नहीं है. इन पदों पर दलित, मुसलमान व महिलाओं की उपस्थिति शून्‍य है. अब सवाल यह उठता है कि बिहार की इस द्विज पत्रकारिता ने किसका हित साधा है? किसने इसका उपयोग किया है? इसके अपने राग-द्वेष क्या हैं? लालू प्रसाद के 15 साल व नीतीश कुमार के तीन साल के दौरान मीडिया के रूख के तुलनात्मक अध्ययन से इन सवालों के जबाव मिलते हैं. पिछले तीन सालों से अखबार के पन्नों पर विकास की धारा बह रही है. छोटी से छोटी खबर में यह देखा जाता है कि कहीं यह नीतीश कुमार के खिलाफ तो नहीं जा रही है. लालू प्रसाद के शासनकाल में सिर्फ सुशील कुमार मोदी के बयानों को आधार बनाकर सप्ताह में चार विशेष खबर (स्टोरी) छापने वाले अखबारों को अब ध्यान से देखें. आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि पिछले तीन सालों में इन समाचार पत्रों में एक भी ऐसी खबर नहीं छपी है, जिससे नीतीश कुमार को राजनैतिक रूप से नुकसान पहुंचने की आशंका हो. विपक्षी दलों के नेताओं के बयान तक सेंसर किये जा रहे हैं. वास्तव में राजद शासनकाल के अंतिम दिनों में जिस मिशनरी सक्रियता से खबरें 'गढ़ी' जा रही थीं, उससे कहीं अधिक तत्परता से नीतीश कुमार के इन तीन सालों में खबरें 'दबायी' जा रही हैं.

कोसी में 18 अगस्त, 2008 को प्रलयंकारी बाढ़ आयी. हजारों लोग मारे गये. लोगों ने इसे बिहार में विगत एक सदी में आयी सबसे बड़ी आपदा कहा. मुख्यमंत्री तक ने इसे प्रलय कहा. यह भी साफ था कि कोसी तटबंध राज्य सरकार की लापरवाही के कारण टूटा था. लेकिन मीडिया ने चुप्पी साधे रखी. बिहार के अखबारों में इस पर एक भी खोजपरक रिपोर्ट नहीं छपी. इतना ही नहीं, बाढ़ की त्रासदी को कम से कम करके दिखाया गया. सरकारी दावे पहले पन्ने की खबर बनते रहे.

खबरों के न छपने के कारण दोतरफा हैं. एक ओर द्विज मीडिया का अपना 'लालू फोबिया' तथा जातिगत हित है तो दूसरी ओर नीतीश कुमार की प्रच्छन्न तानाशाही. नीतीश कुमार व उनके सलाहकारों ने सुनियोजित तरीके से पत्रकारों को पालतू और भ्रष्‍ट बनाया है. खोजपरक रिपोर्ट की तो बात ही छोड़िए, अखबार को भेजे गये विपक्षी दलों के बयान तक छपने से पहले मुख्यमंत्री के टेबल पर पहुंच जा रहे हैं. सरकारी विज्ञापनों का इस्तेमाल तुरुप के पत्तों की तरह किया जा रहा है. नतीजा यह है कि बिहार से समाचार पत्र राज्य सरकार की योजनाओं, घोषणाओं की सूचना देने वाले बुलेटिन की भूमिका में पहुंच गये हैं.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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