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लोकतंत्र में सैन्य शक्ति : जनवाद और हिंसा का सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/22/2009 05:00:00 AM

भ्रम जीतनी जल्दी टूट जाये उतना अच्चा रहता है. संसदीय लोकतंत्र को अंतिम और सबसे बेहतरीन व्यवस्था मानाने वालों को यह दिखाई नहीं देता की लोकतंत्र का यह रूप अप्निजनता के खिलाफ कितना हिंसक और सैन्य शक्ति से लैस होता जा रहा है. वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया बता रहे हैं की कैसे अब तक बदनाम रहीं लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था के लिए संघर्ष करनेवाली  शक्तियों ने ही वास्तविक जनवाद के लिए भी कुरबानी दी है. सत्ता और उससे जुड़े बुद्धिजीवी चाहते हैं की हिंसा पर बात की जाये, लेकिन वे अपनी हिंसा को बहस के केंद्र में नहीं रखते. साथ ही वे लोकतंत्र को भी बहस का विषय नहीं बनाते. अब लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि आंदोलन की हिंसक वारदातों पर अपने दृष्टिकोण से बहस खड़ी की जाए.

भारत के पड़ोसी देशों में जिस तरह के राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल रहे हैं, उसने एक बहस लोगों के बीच खड़ी कर दी है। संसद के लिए चुनाव तो होंगे लेकिन क्या उसका नेतृत्व सेना के हाथों में होगा? श्रीलंका में लिट्टे का सफाया करने वाली सेना के प्रमुख सारथ फोन्सेका ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और वे अप्रैल में राष्ट्रपति के लिए होने वाले चुनाव में अपनी उम्मीदवारी सुनिश्चित करने में लगे हैं। महिन्द्रा राजपक्षे ने सोचा था कि लिट्टे पर जीत दर्ज करने का दावा कर वे अगले चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित कर चुके हैं। अब भले ही चुनाव में जिसे कामयाबी मिले लेकिन श्रीलंका में सेना एक राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित हो चुकी है। पाकिस्तान में जब चुनाव होते हैं तो सत्ता अप्रत्यक्षत: सेना के नियंत्रण में होती है। बांग्लादेश में भी सेना का सत्ता पर नियंत्रण साफ दिखता है। इस तरह की स्थितियों के कारण साफ हैं। लोकतंत्र के बने रहने की अनिवार्य शर्त है कि लोगों की सुनी जाए, उनकी भागेदारी और हिस्सेदारी तय की जाए। इसे ही लोकतंत्र का विस्तार कहा जाता है। उल्टी स्थिति तब पैदा होती है जब समाज का कोई वर्ग लोकतंत्र पर अपने कब्जे का दावा पेश करने लगता है। तब वह वर्ग अपनी जमीन बचाए रखने की लड़ाई में जोर जबरदस्ती और अपनी सेना के इस्तेमाल पर जोर देने लगता है जबकि लोकतंत्र का स्वभाव है कि लोगों के बीच उसके निरंतर विस्तार की स्थितियां मौजूद हों। इसी पृष्ठभूमि में भारत की स्थिति का भी अध्ययन किया जाना चाहिए लेकिन यहां पहले एक बात साफ कर लेनी चाहिए कि न तो लोकतंत्र की जमीन अचानक तैयार होती है और न सैन्य शासन के अनुकूल स्थितियां खड़ी हो जाती हैं। उनका क्रमश: विकास होता है।

हम इस बात को याद कर सकते हैं कि आजादी के संघर्षों की परंपरा के नेता दावा करते रहे हैं कि भारत इतना विशाल देश है कि वहां कभी भी सैन्य शासन नहीं हो सकता है लेकिन इस तरह के भाववादी दावे के बजाए हमें ठोस तर्कों के आधार पर इसकी पड़ताल करनी चाहिए। भारत में आज ऐसे राज्यों की संख्या कितनी हो गई है जहां के संवैधानिक प्रमुख यानी राज्यपाल पुलिस या सेना की पृष्ठभूमि के हैं? इसके जवाब के लिए राज्यसभा में एक प्रश्न महीनों से इंतजार कर रहा है लेकिन जो दिखाई दे रहा है उसमें एक बात बहुत साफ है कि ऐसे राज्यों की संख्या आज भी अच्छी खासी है और पिछले कुछ वर्षों में इस संख्या के विकासक्रम को देखें तो कहा जा सकता है कि इस तरह के राज्यों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। जिस भी इलाके में कथित अशांति का दावा किया जाता रहा है, वहां सैन्य शक्ति द्वारा शांति तो वापस नहीं आई लेकिन संवैधानिक प्रमुख के रूप में सैन्य पृष्ठभूमि स्थायी रूप से काबिज हो गई। इसके कारण साफ हैं। सैन्य शक्ति भी अपने आप में एक विचारधारा है और दूसरी किसी भी विचारधारा की तरह अपनी सत्ता बनाए रखने की योजना बनाती रहती है। अशांति बने रहने से ही वह अपने बने रहने के तर्क दे सकती है। अब इसके साथ यह भी देखा जा सकता है कि भारत जैसे देश में लगातार कथित अशांति के इलाकों का विस्तार हो रहा है और जहां-जहां सत्ता ऐसे इलाकों को चिह्नित करती है, उसे सैनिकों के हवाले करने की योजना में लग जाती है। देश के कई ऐसे इलाकों में सैन्य अड्डे स्थापित किये भी जा चुके हैं। सत्ता का सांस्कृतिक आधार लोक के बजाए सैन्य हो चुका है। दूसरी तरफ लोकतंत्र की स्थिति के लिए यह भी देखा जा सकता है कि चुनाव को ही लोकतंत्र मान लिया गया है और चुनाव में लोगों की हिस्सेदारी लगातार कम होती जा रही है। महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव के दौरान गढ़चिरौली में सैन्यकर्मियों द्वारा लोगों को मतदान के लिए मतदान केन्द्रों तक ले जाने की तस्वीर काफी चर्चित हुई थी।

जाहिर है जब लोक राजनीति की जगह नहीं बनेगी तो लोकसत्ता नहीं बनी रह सकती है। ऐसी स्थिति में भारत के संदर्भ में इतना ही कहा जा सकता है कि जो स्थितियां श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे छोटे देशों में जितनी जल्दी विकसित हुई हैं, उसकी तुलना में बड़ा देश होने के कारण यहां वैसी स्थिति स्थापित होने में कुछ देर हो सकती है। लेकिन अभी दावा किया जा सकता है कि आम जनजीवन में सैन्य हस्तेक्षप का तेजी से विस्तार हो चुका है। इसके कई उदाहरण देखे जा सकते हैं लेकिन यहां एक ही उदाहरण काफी है। आज जब भी लोकतांत्रिक चेतना की बची-खुची ताकत के बूते कोई लोकतंत्र विरोधी कार्रवाइयों के लिए आवाज उठाता है तो उसे हिसंक कार्रवाइयों के समर्थक के रूप में पेश किया जाता है। जिस देश के बौद्धिक समाज को लोकतंत्र के लिए खतरा बने सवालों को उठाने पर कह दिया जाता है कि ये आतंकवाद की हिंसा का समर्थन है तो सत्ता कितनी सैन्य संस्कृति में डूब चुकी है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। अमेरिका ने जब इराक पर हमला किया तो बुश ने यही तो कहा था कि जो हमारे साथ नहीं हैं, वह आतंकवाद के साथ हैं। दरअसल पूरी दुनिया में जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियां बन रही हैं, उसमें लोकतंत्र के सवाल भी भूमंडलीकृत हुए हैं। लोकतंत्र का संकट किसी देश के अकेले संकट के रूप में नहीं रह गया है। किसी ताकतवर वर्ग के वर्चस्व वाले देश की चिंता यह नहीं है कि दुनिया में लोकतंत्र का विस्तार हो। हर ताकतवर देश अपने ऊपर किसी भी स्तर पर निर्भर अपेक्षाकृत कमजोर देश में वैसी ही सत्ता चाहता है ताकि उसके हित पूरे हो सकें। ऐसी स्थिति में वैसे देशों के लिए सैन्य रणनीतियों का इस्तेमाल करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं रह जाता है। इसीलिए अपेक्षाकृत कमजोर देशों में लगातार सैन्य सत्ता की स्थितियां बनती जा रही हैं।

इस परिपेक्ष्य में एक अलग उदाहरण हमारे सामने आता है वह है नेपाल। नेपाल में जिन माआ॓वादियों को हिंसक आंदोलन का समर्थक कहा जाता था वे ही लोकतंत्र के लिए वहां संघर्ष कर रहे हैं। वहां वे एक ऐसी सेना के गठन की मांग पर अड़े हुए हैं जिससे देश में लोकतंत्र स्थायित्व ग्रहण कर सके। ऐसी सेना का निर्माण सर्वथा लोकतंत्र के हित में नहीं है जिसका लोकतंत्र की आवाज कुचलने के लिए इस्तेमाल किया जाए। जहां तक हिंसा की बात है, उसमें तो सत्ता व उसकी कार्रवाइयों का विरोध करने वाली शक्तियां दोनों ही काम करती है। हिंसा की परिस्थितियों और उन परिस्थितियों में की गई हिंसा का आखिरकार क्या उद्देश्य उभरकर सामने आता है, ये सवाल आज सबसे ज्यादा मौजूं है। लिट्टे ने हिंसा की तो श्रीलंका की सेना ने भी हिंसा की लेकिन श्रीलंका की सेना की कार्रवाइयों के बाद से सत्ता लोगों के हाथों से निकलकर कहां जा रही है? आंदोलन के दौरान की हिंसक वारदातें और सत्ता की संगठित हिंसा दो अलग अलग तरह की सत्ता का स्वरूप निर्धारित करती है। सत्ता की हिंसा और आंदोलन के दौरान की हिंसक वारदातें दो अलग तरह की बहसों की मांग करती है।सत्ता हमेशा चाहती है कि हिंसा की बहस का दृष्टिकोण वह विकसित करें। चूंकि वह संगठित होती है इसीलिए उसका दृष्टिकोण बहस के केन्द्र में रहता है जबकि लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि आंदोलन की हिंसक वारदातों पर अपने दृष्टिकोण से बहस खड़ी की जाए।

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“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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