हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

नक्सलवाद को समस्या और आंदोलन के रूप में देखने का नजरिया

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/19/2009 02:00:00 PM

अनिल चमड़िया

मनमोहन सिंह जब से देश के प्रधानमंत्री बनें है तब से वे इस बात को कई बार दोहरा चुके हैं कि नक्सलवाद देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है। साठ के दशक के अर्थशास्त्री मनमोहन सिह भी शिक्षण संस्थानों में डिग्री लेने वाले देश के दूसरे बुद्धिजीवियों की तरह पहले नक्सलवाद के प्रति सहानुभूति रखने वालों में रहे हैं। पंजाब के मशहूर नक्सलवादी नेता हाकाम सिंह की माने तो उन्होने यदि मनमोहन सिंह को बचाने की कोशिश न की होती तो वे उस समय नक्सलवादियों के समर्थक होने के आरोप में जेल में होते। पंजाब के नक्सलवादी नेता हाकाम सिंह के बारे में देश के कई बड़े संसदीय नेताओं ने जैसा वर्णन किया है उससे उनकी बातों पर भरोसा नहीं करने का कोई कारण नहीं समझ में आता है। तमिलनाडु के राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव रह चुके स्वर्गीय हरकिशन सिंह सुरजीत का कहना है कि हाकाम सिंह समाऊ देश के महान क्रांतिकारी थे।

मनमोहन सिंह ने दिल्ली में उच्चाधिकारियों के साथ एक बैठक में कहा था कि नक्सलवाद अब बुद्दिजीवियों का आकर्षण नहीं रहा।लेकिन उन्होने नक्सलवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हुए इस तथ्य का उल्लेख किया था कि देश के 180 से ज्यादा जिलों में नक्सलवाद फैल चुका हैं। मनमोहन  सिंह जब बार बार नक्सलवाद के प्रभाव में आने वाले जिलों की बढ़ती तादाद का उल्लेख करते हैं तो हाकाम सिंह समाऊ की बताई कहानी याद आने लगती है। हाकाम सिंह ने पंजाब की मशहूर लेखिका जसबीर कौर को चंडीगढ़ में एक बैंक लूटने के प्रयास की घटना का उल्लेख किया था।हाकाम सिंह के अनुसार तब पुलिस ने उनपर मनमोहन सिंह को इस मामले में शामिल होने की बात को कबूल करने के लिए  दबाव बनाया था। लेकिन उन्होने इस दबाव में आने से इंकार कर दिया था। मनमोहन सिंह उस समय पंजाब विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक थे। पंजाब के नक्सलवादी आंदोलन के नायक शीर्षक पुस्तक में पंजाबी के मशहूर लेखक सुदर्शन नट ने कई कहानियों को शामिल किया है।इसमें सुरजीत सिंह बरनाला , हरकिशन सिंह सुरजीत के अलावा पूर्व प्रधानमत्री चन्द्रशेखर और साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक  अजमेर सिंह औलख,सीपीआई के पूर्व सासंद जगजीत सिंह आनंद( आनंद पंजाबी दैनिक नवां जमाना के संपादक भी रह चुके हैं ),पूर्व न्यायाधीश आर के त्यागी, सीपीआई एम एल लिबरेशन के पोलित ब्यूरों के सदस्य स्वपन मुखर्जी और पंजाबी विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग के पूर्व अध्यक्ष गुरूभगत सिंह आदि के संस्मरण हैं।पुस्तक के पेज नंबर 204 और 205 में हाकाम सिंह की 1991 में सुनाए गए इस किस्से को भी शामिल किया गया है। मनमोहन सिंह उस समय देश के वित्त मंत्री थे।हाकाम सिंह ने आपातकाल के दिनों को याद करते हुए बताया है कि चंडीगढ़ में एक बैंक के लूटने के प्रयास की घटना में नक्सलवादियों के होने की आशंका पुलिस वालों को थी।पुलिस उस समय तो किसी को इस घटना के आरोप में गिरफ्तार नहीं कर सकी लेकिन पुलिस के यहां यह मामला फाइलों में पड़ा रहा। जब हाकाम सिंह को गिरफ्तार किया गया तो पुलिस ने उनसे कई मामलों में पूछताछ की। इसमें बैंक कांड भी शामिल था। हाकाम सिंह ने एक रणनीति ये बनाई कि पुलिस को वे केवल उन्हीं नामों के बारे में  बताएंगे जो या तो भूमिगत हो गए है या फिर शहीद हो गए हैं। वे संपर्क और सहानुभूति रखने वालों को किसी भी तरह बचाने की सोच रहे थे। पुलिस बैंक मामले में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर ( मनमोहन सिंह) के नाम पर जोर देकर ये कहने की कोशिश कर रही थी कि उन्होने उसकी डुप्लीकेट चाबी बनाई है जिस चाबी से बैंक को लूटने का प्रयास किया गया।लेकिन हाकाम सिंह ने साफतौर पर कहा कि वे किसी ऐसे व्यक्ति को न तो जानते हैं और ना ही उनसे उनकी मुलाकात हुई है। पुलिस ने उन्हें   तस्वीर भी दिखाई। तर्कशील प्रकाशन अंबाला द्वारा 2004 में प्रकाशित इस पुस्तक में कई दिलचस्प कहानियों के बीच हाकाम सिंह बताते है कि उन्होने तस्वीर देखकर सोचा कि दूसरे बुद्दिजीवियों और अर्थशास्त्र के शिक्षकों की तरह ये जरूर नक्सलवाद का समर्थक होगा।बहुत दबावों के बाद हाकाम सिंह ने पुलिस के सामने एक ऐसा दांव फेंका कि वह काम आ गया। उन्होने पुलिस वालों से पूछा कि आपलोगों को इस मामले की जांच का भार कैसे दे दिया गया जबकि आपको कुछ बुनियादी बातों की ही जानकारी नहीं है। पुलिस वाले आश्चर्यचकित होकर हाकाम सिंह को देखने लगे। पुलिस ने पूछा कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं। तब हाकाम सिंह ने कहा कि वे कम से कम उन नक्सलवादियों की सामाजिक पृष्ठभूमि का अध्धयन क्यों नहीं करते है जिन्हें या तो मारा गया है या फिर पुलिस ने जिन्हें गिरफ्तार किया है। हाकाम सिंह ने पुलिस को बताया कि नक्सलवादी आंदोलन के साथ सिखों में व्यवसायी समुदाय जिन्हें बापा सिख कहा जाता है के किसी भी सदस्य को जब नहीं पाते हैं तो भला ये शख्स कैसे हो सकता हैं। मजे कि बात कि मनमोहन सिंह के व्यवसायी जाति से होने की बात को हाकाम सिंह पक्के तौर पर नहीं जानते थे लेकिन उन्होने अनुमान लगाया था।

दरअसल ये कहानी और लंबी है। लेकिन जिस संदर्भ में इसका उल्लेख किया गया है उसके लिए पर्याप्त है। संदर्भ नक्सलवादी आंदोलन और उसे आज सबसे बड़ा खतरा बताने के विषय से जुड़ा है। मनमोहन सिंह इसके बाद 7 अप्रैल 1980 से 14 सितंबर 82 तक योजना आयोग के सदस्य सचिव थे तब उन्होने बिहार के ग्रामीण अंचलों में उभर रहे असंतोष का अनुभव करने के लिए एक अध्ययन टीम के साथ उन इलाकों का दौरा किया था। उनकी उस रिपोर्ट के हवाले से नक्सलवाद के विस्तार के कारणों पर प्रकाश डाला गया था। इस तरह दो स्तरों पर मनमोहन सिंह की नजरों में नक्सलवाद को खतरे के रूप में नहीं देखा जा रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें सबसे ज्यादा खतरा नक्सलवाद में ही दिखाई दे रहा है।

किसी भी आंदोलन को आप कहां से देख रहे हैं। ये सवाल सबसे महत्वपूर्ण होता है। संसदीय राजनीति में ये अक्सर देखा जाता है कि जो पार्टी या नेता सत्ता से बाहर होता है उसके लिए विरोध के जो मुद्दे होते है वे मुद्दे सरकार में जाने के बाद उसके मुद्दे नहीं रह जाते हैं। वे भी सरकार चलाने वाली पार्टी की तरह का ही व्यवहार करने लगते हैं।पी वी नरसिम्हा राव ने तो साफतौर पर कहा था कि भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करने पर विपक्ष की पार्टियां विपक्ष में रहते हुए चाहें जो करें लेकिन सत्ता में आकर वे उसका विरोध नहीं कर सकती है। आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव , चन्द्रबाबू नायडू से लेकर पिछले दिनों हवाई दुर्घटना में मारे गए मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर रेड्डी के विपक्ष से सत्ता तक की यात्रा के दौरान नक्सलवाद के प्रति बदलते रूख को भी यहां देखा जा सकता है। लेकिन पहला सवाल है कि  नक्सलवाद को सबसे बड़ा खतरा बताने के बावजूद उसका प्रभाव क्षेत्र कैसे बढ़ता चला गया है। तमाम तरह की दमनात्मक कार्रवाईयों के बावजूद और सैकड़ों कार्यकर्ताओं को मुठभेड़ के नाम पर मारने के वाबजूद उसके प्रभाव के विस्तार को रोका नहीं जा सका है। लेकिन यहां एक दूसरे सवाल को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। जब नक्सलवाद के प्रभाव के विस्तार की बात की जाती है तो यह दावा कौन किस नजरिये से कर रहा है इसे समझना जरूरी होता है। सरकार देश में जिलों की तादाद बताकर नक्सलवाद के प्रभाव के जिलों की संख्या बताती है। लेकिन जब देश के कुल जिलों में नक्सलवाद के प्रभाव वाले जिलों की तादाद बताई जाएगी तो वह भारत के नक्शे पर बहुत बड़ा दिखेगा। उससे ज्यादा नक्सलवाद के बढ़ते प्रभावों को राज्यवार बताया जाएगा तो वह और ज्यादा दिखेगा। क्योंकि कम संख्या में जो प्रतिशत निकलता है वह ज्यादा दिखाई देता है। लेकिन नक्सलवाद के प्रभावों का आकलन देश में कुल गावों की संख्या के आधार पर निकाला जाएगा तो उसका प्रभाव दो से तीन प्रतिशत गावों में ही दिखाई देगा। प्रचार की भाषा अपनी योजनाओं और रणनीतियों के अनुसार तय की जाती है। देश के लोगों के सामने जब तस्वीर इस तरह प्रस्तुत की जाएगी कि अस्सी प्रतिशत से ज्यादा राज्यों में ये समस्या है तो उसका संदेश भिन्न होगा। इसीलिए सरकारें जिस तरह से नक्सलवाद के प्रभाव के विस्तार का वर्णन करती है उसके पीछे उसके इरादे कुछ और होते हैं।इसीलिए वह इसे एक समस्या के रूप में प्रस्तुत करती है। समस्या के प्रभाव का विस्तार हो रहा है तो ये किसकी जिम्मेदारी है। रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद की समस्या को तो आंदोलन कहा जा सकता है लेकिन नक्सलवाद को आंदोलन के रूप में स्वीकार करने में राजनीतिक परेशानी खड़ी हो जाती है। लेकिन नक्सलवाद समाज को बदलने वाली एक राजनीतिक विचारधारा पर आधारित है । चाहें उसे गलत और सही कहा जा सकता है।

नक्सलवाद के प्रभाव के विस्तार को रोकने के लिए सरकार पहले इसे आर्थिक , सामाजिक और राजनीतिक समस्या के रूप में देखती थी। ये मानकर चलती थी कि जिन इलाकों में पिछड़ापन है और समाज का जो हिस्सा बेहद पिछड़ा है उसके बीच में इनका प्रभाव होता है। तब सरकार इनके लिए कई तरह के विकास के कार्यक्रम चलाने की योजना बनाती थी। लेकिन देश के कई हिस्सों में ये देखा जा चुका है कि तमाम तरह की योजनाओं को लागू करने का दावा करने के बाद भी नक्सलवाद के प्रभाव को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सका है। नक्सलवादी आंदोलन का नेतृत्व करने वाली पार्टियों के नाम जरूर बदलते रहे हैं। तब सरकार भूमि सुघार कानून को लागू करने पर भी जोर देती थी। लेकिन जब से अमेरिकी परस्त भूमंडलीकरण की आर्थिक नीतियों को लागू किया गया है तब से भूमि सुधार के कार्यक्रमों को लागू करने की औपचारिकता तक खत्म कर दी गई है। संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषणों में उसकी चर्चा तक नहीं होती है। पिछले चुनाव के दौरान तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भूमि रखने की अधिकतम सीमा बढ़ाने का भी वादा किया था। स्थितियां इस कदर की हो गई है कि 76 प्रतिशत लोग रोजाना बीस रूपये से कम पर गुजारा कर रहे हैं। जिन इलाकों में सरकार नई नीतियों के तहत नये नये उद्योग विकसित करना चाहती है वहां तो भूखमरी की खबरें आई हैं।

इस तरह ये साफतौर पर देखा जा सकता है कि सरकार नक्सलवाद को केवल कानून एवं व्यवस्था की समस्या के रूप में पेश करने में लगी है। केन्द्र में जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में सरकार थी तब ये कोशिश शुरू की गई थी कि सरकारी दस्तावेजों से नक्सलवाद को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक समस्या भले माना जाए लेकिन व्यवहार में इसे केवल कानून एवं व्यवस्था की समस्या के रूप में पेश किया जाए। भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा विकेन्द्रीकरण की नहीं है। केन्द्रीयकृत सत्ता में यकीन करती है और पुलिसिया रौब दांव को जरूरी मानती है। वह आर एस एस जैसे फांसीवादी संगठनों का चुनावी मुखौटा है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के बाद जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार बनी तब भी पुरानी नीतियों को ही लागू किया गया।कांग्रेस की राजनीति उसके सामने खड़ी राजनीतिक पार्टी को देखकर तय होती है। कांग्रेस का जहां भी सामना भारतीय जनता पार्टी से होता है वह भारतीय जनता पार्टी की नीतियों के करीब खड़ी दिखाई देती है। दरअसल सोचने का तरीका अब तक ये रहा है कि सत्ता में जो पार्टी जा रही है वह अपने कार्यक्रमों को लागू करने पर जोर देगी। लेकिन स्थितियां अब बदल चुकी है। पार्टियां सत्ता चलाने जरूर जाती है लेकिन सत्ता उन्हें चलाती है। किसी भी पार्टी में अब इतनी ताकत नहीं बची है कि वह अपनी उन घोषित नीतियों को लागू कर सकें जो सत्ता की नीतियों के विपरीत हो। सत्ता पर जिस वर्ग का वर्चस्व है वह सत्ता को अपने तरीके से चलाता है।पार्टियां उसका अनुसरण करती है। इसकी सबसे अच्छी मिसाल छत्तीस गढ़ में देखने को मिल सकती है जब कांग्रेस विधायक के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के सहयोग से सल्वा जुडुम  चलाया गया। वह अब भी जारी है। पहले बिहार के गावों में निजी सेना का जो स्वरूप था वह बदल गया है ।पहले निजी सेनाओं में पुलिस बल , सरकारी अधिकारियों और विभिन्न पार्टियों के नेताओं की भूमिका बतायी जाती थी। लेकिन अब पार्टियों के नेता नहीं पूरी पार्टी और उनकी सरकारें उसके समर्थन में खड़ी दिखाई देने लगी है। पहले निजी सेनाओं के लिए हाथियार मुहैया कराए जाते थे लेकिन अब नक्सलवादियों के खिलाफ लड़ने के लिए सेना तैयार की जा रही है। सेना में नक्सलवाद के प्रभाव वाले इलाकों के युवाओं को खासतौर से शामिल करने का अभियान चलाया जाता है। महाराष्ट्र में तो सरकार ने आदिवासियों की बटालियन खड़ी करने का फैसला किया है। पहले सरकार की काउंटर इंसर्जेसी में सरकार की रणनीति ये होती थी कि गैरजातीय सेना को लगाया जाए। जैसे पंजाब में गैर सिख पृष्ठभूमि के सैनिकों को भेजा जाता था तो उत्तर पूर्व में सिख और दूसरी पृष्ठभूमि के सैनिकों की बटालियनें लगायी जाती थी। अब ये रणनीति बदल गई हैं। नक्सलवादियों से निपटने के मामले में नक्सलवादी प्रभाव वाले इलाके और खासतौर से आदिवासियों की ही बटालियन लगाए जाने की योजना है। सल्वा जुड़ुम में आदिवासी बनाम आदिवासी लड़ाई खड़ी करने की कोशिश की गई।

एक बदलाव  और आया है कि कानून एवं व्यवस्था विषय को केन्द्र ने ज्यादा से ज्यादा अपने हाथों में ले लिया है। केन्द्र सरकार ने पहले कानून एवं व्यवस्था के रूप में नक्सलवादियों से लड़ने के लिए एक पृष्ठभूमि तैयार की। वह इस तरह से तैयार की गई कि केन्द्र ने पुलिस बलों को ज्यादा से ज्यादा हथियारों से लैश करने के लिए करोड़ों की हर वर्ष राशि दी। राज्यों यानी प्रदेशों को लगा कि ये उनके वित्तीय समस्या का समाधान है। वे इस तरह मिलने वाली राशि की तरफ मुंह बांए खड़े रहने लगे। नतीजा ये निकला कि गणतंत्र में प्रदेश की नक्सलवादियों के बारे में जो समझ हो लेकिन उन्हें केन्द्र की योजनाओं को लागू करना पड़ता है। कानून एवं व्यवस्था का विषय राज्यों के हाथों से निकल सा गया है। राजनीतिक स्थितियां ऐसी हो गई है कि किसी भी राज्य स्तरीय राजनीतिक नेतृत्व की ताकत स्वायतता के पक्ष में बात करने की नहीं रही।

पूरी दुनिया में देखा गया कि किस तरह से भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करने के लिए सरकारों ने विकास और सुरक्षा के नारे को एक साथ जोड दिया। विकास का जहां नारा रोटी कपड़ा और मकान था वहां वह बिजली सड़क और पानी में परिवर्तित कर दिया गया।यह एक बुनियादी बदलाव रहा है। रोटी कपड़ा और मकान की जरूरत हर किसी के लिए जमीन मुहैया कराने के सवाल से जुड़ा था। बिजली , सड़क और पानी वाला विकास का नारा नई नीतियों को स्वीकार करने की स्थितियां तैयार करने के लिए दिया गया। एक ऐसा वातावरण बनाया गया कि लोग सरकार की नीतियों का समर्थन करने के पक्ष में खड़े हो जाए। सरकार के विकास के नारे के साथ ही विकास के लिए सुरक्षा के नारे का भी समर्थन करने लगे। देश के कुल राज्यों में से पचहत्तर प्रतिशत राज्यो में  नक्सलवाद का प्रभाव गिनाने के पीछे यही योजना रही है। जबकि जहानाबाद में रह चुके एक अधिकारी ने बताया कि जिस समय नक्सलवादी गतिविधियां चरम पर थी उस समय भी उन्हें सरकारी विकास की योजनाओं को लागू करने में नक्सलवादियों की तरफ से कोई रूकावट नहीं दिखी। सुरक्षा के नाम पर सरकार ने मनमाने विकास को रोकने वाले तमाम तरह के आंदोलनों को कुचलने के लिए एक वातावरण तैयार किया । आज सरकार इस मायने में सफल साबित हुई है कि नक्सलवाद के नाम पर किसी को मुठभेड़ में मार दिया जाता है तो लोग उससे जुड़े कानूनी सवाल भी उठाने से कतरा जाते हैं। सैकड़ों की तादाद में नक्सली के नाम पर लोग मार दिए जाते हैं। किसी भी जागरूक और लड़ाकू राजनीतिक कार्यकर्ता को नक्सलवादी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है। डा. विनायक सेन को छत्तीसगढ़ में दो वर्षों तक बेवजह जेल में रखा गया। सुप्रीम कोर्ट की जमानत पर छुटे। सरकार की नीति ये है कि किसी को भी जेल में डाला जाता है तो उसे वर्ष दो वर्ष के लिए कानूनी पेचिदगियों में फंसाकर रखा जा सकता है। यदि बाद में न्यायालय से वह बरी भी होता है तो सरकार को उसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। लिहाजा राजनीतिक कार्यकर्ताओं में सरकार की नीतियों का विरोध करने का एक डर बैठ गया है।
यदि देखा जाए तो नक्सलादियों को जिन इलाकों में सरकार सबसे ज्यादा सक्रिय बताती  है वे कौन से इलाके हैं। क्या वे वैसे इलाके नहीं है जहां कि देश की आखिरी पंक्ति में खड़ी जमात रहती है। जहां वह रहती है उसके घर के नीचे खनिज सम्पदा है। प्राकृतिक संसाधनों से वह भरपूर हैं। जंगल है। पानी है।लोगों को जीने के अधिकार से वंचित करके रखा गया है। सरकार उन्हें बंदूकधारी बता रही है। पूरे देश में ऐसी क्यों स्थिति है कि सबसे कमजोर समझी जाने वाले आदिवासी समुदायों की जमीन और दूसरे संसाधनों पर सभी तरह की विचारधारा की रंग वाली पार्टियों की सरकारें टूट पड़ी है। ये उनके खिलाफ युद्ध नहीं तो क्या है। अमेरिका के राष्ट्रपति बुश ने इराक और अफगानिस्तान पर हमला करते वक्त कहा कि जो उसके साथ नहीं है वह आतंकवादियों के साथ है। दरअसल यही नारा छत्तीसगढ़ जैसे राज्यो में भी दोहराया गया और अब पूरे देश में दोहराया जा रहा है। नक्सलवादी राजनीति से किसी का विरोध हो सकता है लेकिन वे आतंकवादी तो नहीं कहें जा सकते हैं।जिन संगठनों का एक राजनीतिक आधार  होता है यदि वे बंदूक से भी लड़ते है तो उन्हें आतंकवादी संगठन नहीं कहा जा सकता है।हमास के बारे में भी एक अमेरिकी विश्लेषक की यही राय रही है। नक्सलवादी गतिविधियों को अब माओवादी के रूप में ही प्रचारित किया जाता है। माओवादी विचारधारा के बूते ही चीन की मौजूदा सत्ता बनी है। वह दुनिया के ताकतवर देशों में एक है। भारत में यदि तमाम लड़ने वालों को माओवादी कहकर सरकार ये समझती है कि वह अपनी मनचाही नीतियों को लागू करना चाहेगी तो माओवाद का विस्तार ही होगा।माओवादी या नक्सलवादी गतिविधियों को एक राजनीतिक नजरिये से देखा जाना चाहिए। जिन लोगों के हक हकूक छिने गए हैं या जो अपने अधिकारों से वंचित है उन्हें वंचित बनाए रखने की ये कोशिश ठीक नहीं है।मनमोहन सिंह की सरकार भले ही उन्हें सबसे बड़े खतरे के रूप में चित्रित करें लेकिन उनके यह चित्रित करने में माओवाद का विस्तार हुआ है। उसे सैनिक बल बूते रोकने की कोशिश का अर्थ ये तो नहीं हो जाएगा कि जो मौजूदा स्थितियां है वह खत्म हो जाएगी। मकसद लड़ने से रोकना है या फिर लड़ाईयों के जो कारण है उन्हें खत्म करना है।  

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ नक्सलवाद को समस्या और आंदोलन के रूप में देखने का नजरिया ”

  2. By Anand on November 22, 2009 at 12:03 PM

    Anil, Excellent piece. Enjoyed reading. Hope it induces rethink in our rulers. Keep it up!
    Anand

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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