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बीच सफ़हे की लड़ाई

प्रधानमंत्री आदिवासियों से माफ़ी मांगें

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/15/2009 11:59:00 AM

यह हमारे समय का एक विकट यथार्थ है कि एक तरफ प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य और (खुद अपने ही शब्दों में) देश के मोस्ट वांटेड नंबर दो किशन जी और दूसरी तरफ दंतेवाडा में गाँधीवादी संस्था 'वनवासी चेतना आश्रम' से जुड़े प्रख्यात गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार दोनों देश की सरकार से एक ही मांग रखते हैं-प्रधानमंत्री आदिवासियों से माफ़ी मांगें. यह हमारे समय का वह जटिल दिखता यथार्थ है, जिसे समझे बिना न तो हम देश में चल रहे हिंसक-अहिंसक आंदोलनों को समझ सकते हैं और न ही देश कि उत्पीडित जनता के मानस को. आइये, एक कोशिश कर के देखते हैं. बता रहे हैं खुद हिमांशु कुमार
 
छत्तीसगढ़ में मजदूर आंदोलन के प्रमुख नेता रहे शंकर गुहा नियोगी कहा करते थे छत्तीसगढ़ के बाद कोमा लगाकर बस्तर के बारे में सोचा करो। मैं भी मानता हूं कि छत्तीसगढ़ और बस्तर दोनों अलग-अलग हैं। यह अंतर मैं व्यक्तिगत तौर पर इसलिए भी मानता हूं कि बस्तर के लोगों ने मुझपर उस समय भरोसा किया है जब सलवा जुडूम की वजह से भाई-भाई दुश्मन बने हुए हैं। एक भाई सलवा जुडूम के कैंप में है तो दूसरा गांव में रह रहा है। सलवा जुडूम वाला यह सोचने के लिए अभिषप्त है कि गांव में रह रहा भाई माओवादियों के साथ मिलकर उसकी हत्या करा देगा तो,गांव वाला इस भय से त्रस्त है कि पता नहीं कब उसका भाई सुरक्षा बलों के साथ आकर गांव में तांडव कर जाये।

मैं बस्तर में 17 साल से रह रहा हूं और इस भूमि पर मेरा अनुभव आत्मीय रहा है। उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर से सर्वोदयी आंदोलन की सोच को लेकर मैं बस्तर उस समय आया जब मेरी शादी के महीने दिन भी ठीक से पूरे नहीं हुए थे। तबसे मैं बस्तर के उसी पवलनार गांव में रह रहा था जिसे छत्तीसगढ़ सरकार ने हाल के महीनों में उजाड़ दिया है। मुझे अच्छी तरह याद है कि जंगलों के बीच मेरी अकेली झोपड़ी थी। कई बार ऐसा होता था कि मैं पांच-छह दिनों के लिए गावों में निकल जाया करता था और पत्नी अकेली उस बियाबान में होती थी। लेकिन हमने जंगलों के बीच जितना खुद को सुरक्षित और आत्मीयता में पाया उतना हमारे समाज ने कभी अनुभव नहीं होने दिया। आज आदिवासियों के बीच इतने साल गुजारने के बाद मैं सहज ही कह सकता हूं कि शहरी और सभ्य कहे जाने वाले नागरिक इनकी बराबरी नहीं कर सकते।

याद है कि हमने पत्नी के सजने-संवरने के डिब्बे को खाली कर थोड़ी दवा के साथ गांवों में जाने की शुरूआत की थी। डाक्टरों से साथ चलने के लिए कहने पर वह इनकार कर जाते थे। हां डॉक्टर हमसे इतना जरूर कहा करते थे कि आपलोग ही हमलोगों से कुछ ईलाज की विधियां सीख लिजिए। आज भी हालात इससे बेहतर नहीं है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद गांवों में सरकारी मशीनरी की सुविधाएं पहुंचाने के बजाए लूट की योजनाएं बनायीं। जो चौराहे के नेता थे वे राज्य के हो गये, छोटे व्यापारी खदानों के बड़े ठेकेदार-व्यापारी बन गये और लूट के अर्थशास्त्र को विकासवाद कहने लगे। छोटा सा उदाहरण भिलाई स्टील प्लांट का है जिसके लिए हमारे देश में कोयला नहीं बचा है, सरकार आस्ट्रेलिया से कोयला आयात कर रही है। जाहिर है लूट पहले से थी लेकिन राज्य के बनने के बाद कू्रर लूट की शुरूआत हुई जिसके पहले पैरोकार राज्य के ही लोग बने जो आज सलवा जुडूम जैसे नरसंहार अभियान को जनअभियान कहते हैं।

छत्तीसगढ़ में जो लूट चल रही है उसने क्रूर रूप ले लिया है। क्रुर इसलिए कि आदिवासी अगर जमीन नहीं दे रहे हैं तो बकायदा फौजें तैनात कर उन्हें खदेडा जा रहा है, कैंपों में रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है। सरकार अपने ही बनाये कानूनों को ठेंगे पर रख ओएमयू कर रही है। बंदरबाट के इतिहास में जायें तो भारत सरकार जापान को 400 रूपये प्रति क्विंटल  के भाव से लोहा बेचती है तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के छोटे व्यापारियों को 6000 हजार रूपये प्रति क्विंटल। अब जब आदिवासी राज्य प्रायोजित लूट का सरेआम विरोध कर रहा है तो भारतीय सैनिक उसका घर, फसलें जला रहे हैं, हत्या बलात्कार कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में अशांति नहीं होगी तो क्या होगा।

सरकार बार-बार एक शगुफा छोड़ती है कि माओवादी विकास नहीं होने दे रहे हैं, वह विकास विरोधी हैं। मैंने राज्य सरकार से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी कि वह बताये कि पिछले वर्षों में स्वास्थ कर्मियों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, शिक्षकों और हैंडपंप लगाने वाले कितनों लोगों की माओवादियों ने हत्याएं की हैं, सरकार का जवाब आया एक भी नहीं। वनवासी चेतना आश्रम बीजापुर और दंतेवाड़ा के जिन गांवों में काम करता है उनमें से गांवों के लोगों ने बार-बार शिकायत किया कि फौजें और एसपीओ उनकी फसलें इसलिए जला रहे हैं कि लोग भूख से तड़प कर कैंपों में आयें। जबकि इसके उलट माओवादियों की ओर से संदेश आया कि 'हिमांशु कुमार 'वनवासी चेतना आश्रम' की ओर से जो अभियान चला रहे हैं हम उसका स्वागत करते हैं।' देश जानता है कि वनवासी चेतना आश्रम सरकार और माओवादी हिंसा दोनों का विरोध करता है क्योंकि इस प्रक्रिया में जनता का सर्वाधिक नुकसान होता है। लेकिन एक सवाल तो है कि सरकार अपने ही बनाये कानूनों को ताक पर रख कर देशी-विदेशी  कंपनियों के साथ मिलकर लूट का विकासवाद कायम करना चाहेगी तो जनता, अंतिम दम तक लड़ेगी।

हमें सरकार इसलिए दुश्मन मानती है कि हमने समाज के व्यापक दायरे में बताया कि सलवा जुडूम नरसंहार है और कैंप आदिवासियों को उजाड़ने वाले यातनागृह। फिलहाल कुल 23 कैंपों में दस से बारह हजार लोग रह रहे हैं। पंद्रह हजार लोगों को हमने कैंपों से निकालकर उनको गांवों में पहुंचा दिया है। इस दौरान राज्य के एक कलेक्टर द्वारा धान के बीज देने के सिवा, सरकार ने कोई और मदद नहीं की है।

अगर सरकार सलवा जुडूम के अनुभवों से कुछ नहीं सिखती है तो मध्य भारत का यह भूभाग कश्मीर और नागालैंड के बाद यह भारत के मानचित्र का तीसरा हिस्सा होगा जहां कई दशकों तक खून-खराबा जारी रहेगा। सरकारी अनुमान है कि सलवा जुडूम शुरू होने के बाद माओवादियों की ताकत और संख्या में 22 गुना की बढ़ोतरी हुई है। अब ऑपरेशन ग्रीन हंट की कार्यवाही उनकी ताकत और समर्थन को और बढ़ायेगी। सरकार के मुताबिक फौजें माओवादियों का सफाया करते हुए पुलिस चौकी स्थापित करते हुए आगे बढ़ेगीं। जाहिर है लाखों की संख्या में लोग वनों में भागेंगे। उनमें से कुछ की हत्या कर तो कुछ को बंदी बनाकर फौजें पुलिस चौकियों के कवच के तौर पर इस्तेमाल करेंगी। हत्या, आगजनी, बलात्कार की अनगिनत वारदातों के बाद थोड़े समय के लिए सरकार अपना पीठ भी थपथपा लेगी। लेकिन उसके बाद अपनी जगह-जमीन और स्वाभिमान से बेदखल हुए लोग फिर एकजुट होंगें, चाहे इस बार उन्हें संगठित करने वाले माओवादी भले न हों।

मैं सिर्फ सरकार को यह बताना चाहता हूं कि अगर वह अपने नरसंहार अभियान ऑपरेशन ग्रीन हंट को लागू करने से बाज नहीं आयी तो हत्याओं-प्रतिहत्याओं का जो सिलसिला शुरू होगा मुल्क की कई पीढ़ियां झेलने के लिए अभिषप्त होंगी। यह सब कुछ रूक सकता है अगर सरकार गलतियां मानने के लिए तैयार हो। सरकार माने और आदिवासियों से माफी मांगे कि उसने बलात्कार किया है, फसलें जलायीं है, हत्याएं की हैं। आदिवासियों की जिंदगी को तहस-नहस किया है। सरकार तत्काल ओएमयू रद्द करे, बाहरी हस्तक्षेप रोके और दोषियों को सजा दे। जबकि इसके उलट सरकार पचास-सौ गुनहगारों को बचाने के लिए लोकतंत्र दाव पर लगा रही है.


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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ प्रधानमंत्री आदिवासियों से माफ़ी मांगें ”

  2. By मिहिरभोज on November 15, 2009 at 1:35 PM

    आपका लेख तो पढकर लगता है कि इन गांवों के विकास के लिए नक्सलवादियों से ज्यादा अच्छी सरकार किसी की नहीं हो सकती है...पर यो पुल हास्पीटल आदी उङा देना क्या ये भी विकास योजनाओं का हिस्सा है

  3. By राजीव रंजन प्रसाद on November 15, 2009 at 1:58 PM

    माओ वादियों के लिये किया जा रहा आपका प्रचार अच्छा तो है पर अब सच्चाई सब जानते हैं कि माओवादी आतंकवादी हैं, एसी बडी बडी बाते माओ वादियों की बी-टीम के प्रचार का हिस्सा है। देश को तोडने की साहिश का हिस्सा।

  4. By Alok Nandan on November 15, 2009 at 3:18 PM

    इस आलेख को पढ़कर तो यही लग रहा है कि सरकारी तंत्र का जंगलों में गलत इस्तेमाल हो रहा है...अभी कुछ दिन पहले अरुनदती ने भी आदिवासियो की हालत के बारे में बहुत कुछ लिखा था...आलोक मेहता भी सरकार के पक्ष में कसरत करते हुये नजर आ रहे थे...आसुतोष भी रूसी क्रांति को इतिहास का घृणित अध्याय बताते हुये माओवादियों को मुड़ी कटवा बोल रहे थे...क्या माओवादियों की हिंसा का बवेला खड़ा करते हुये राज्य को असमित हिंसा का अधिकार देना उचित है.???

  5. By Anonymous on November 15, 2009 at 7:11 PM

    मिहिरभोज और राजीव रंजन प्रसाद जी के लिए, रविवार डाट काम पर प्रकाशित वरवर राव से आलोक पुतुल की बातचीत का यह अंश. साथ ही तहलका पर प्रकाशित किशनजी का इंटरव्यू भी पढिये. सच हमेशा सरकारी के साथ हो यह ज़रूरी नहीं होता. वह जनता के साथ होता है, यह समझने की ज़रूरत है.
    आलोक प्रकाश पुतुल : कहते हैं कि नक्सलवादी लोग विकास के विरोध में है. विकास के विरोध में हैं ये बताने के लिए उदाहरण देते हैं कि रोड नहीं बनने दिए हैं.

    वरवर राव : अगर नक्सली लोग विकास के विरोध में है तो देश में जो पाँच बड़े IDPL कंपनियां थीं उनको बंद करने का निर्णय तो सरकार ने लिया है. बंद नहीं करने का संघर्ष चलाया है वो नक्सलवादियों ने. हैदराबाद में IDPL बंद नहीं करने के लिए दो-तीन साल संघर्ष किए हैं नक्सलवादी लोग. नक्सली लोग और उसका समर्थन करने वाले जो लोग हैं, democrat लोग. क्योंकि IDPL ने हज़ारों लोगों को employment दिया है, एक तरफ IDPL की जो दवा है, वो सस्ती भी मिलता था. सिरदर्द की हो या पेट दर्द की हो बहुत सस्ता भी मिलता था. आज जो Multinational Pharmaceutical Companies की दवाएं जो मिल रही हैं बहुत महंगी हैं.

    रेणुका चौधरी जब Health Minister था, आप देखिएगा (आप ये जो विकास के बारे में ये तो misinformation दे रहा है) जब IDPL देश भर में पाँच जगह पर आए थे, उस समय की सरकार का ये मुद्दा था कि IDPL में बहुत सस्ती सी दवा बनना है और जितने भी सरकारी Hospital हैं, Health Department हैं, Medical Department हैं वहां की medical supply IDPL से होगी. बाहर से नहीं लेना है. यानी primary health center से लेकर एक रायपुर के hospital तक अगर कोई बीमारी से गए तो उसकी जो दवा मिलता था वो IDPL की दवा मिलता था.

    रेणुका चौधरी Health Minister बनने के बाद, यानी 1991 के बाद का सरकार आने के बाद, उसने कहा – नहीं-नहीं हम दवा किसी से भी ले सकता है. यानी in interest of multinationals you have signed the MOU’s. इसीलिए आप दवा भी देना बंद कर दिया है और इस बीच में जो IDPL जहां -जहां है वो शहर के बीच में आ गए हैं. उसकी Real Estate का बहुत मांग है. आज की पूरा जितनी भी ये Industries close करने का और SEZ लाने के पीछे जो उद्देश्य है, वो है Real Estate करना. सरकार Real Estate कर रहा है आज. आंध्र में भी कर रहा है, देश भर में भी कर रहा है.
    अमित

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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