हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

हम सभी शांति चाहते हैं, कोई भी हिंसा और हत्या नहीं चाहता

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/14/2009 09:31:00 PM

आपने  मानवाधिकार कार्यकर्ता सुजातो भद्र द्वारा की गयी माओवादियों से अपील पढ़ी और उनको दिया गया भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो मेंबर किशन जी का जवाब भी पढ़ा. अब पढिये, जादवपुर विश्वविद्यालय के इतिहास के प्राध्यापक अमित भट्टाचार्य का इस मामले में हस्तक्षेप. यह कोलकाता के  दैनिक स्टेट्समैन में 10 अक्टूबर को छपा था. 




हिंसा तथा अ-हिंसा
अमित भट्टाचार्य 

26 सितम्बर (2009) को द्वारा ’माओवादियों के नाम खुला ख़त’ शीर्षक से लिखे पत्र में लेखक, मानवाधिकार कार्यकर्ता सुजातो भद्र, लालगढ़ आंदोलन के कारण और परिणाम को पूरी तरह पचा गए हैं। लालगढ़ या जंगल महल में राज्य का दमन, माओवादियों के ’सशस्त्र संघर्ष’ का परिणाम नहीं है; बल्कि, इस राज्य दमन ने, वंचना और अपमान ने, सालों से चले आ रहे शोषण ने लोगों को ’जंगल पार्टी’ का समर्थन करने तथा प्रतिरोध और अपनी मांगों को मंगवाने के लिए ’सशस्त्र संघर्ष’ अपना कर माओवादी होने के लिए मज़बूर किया। लेखक के वक्तव्य से वास्तव में जो निकल कर आता है वह यह कि सशस्त्र संघर्ष या प्रति-आक्रमण के प्रारंभ ने राज्य दमन को बुलावा दिया, कभी सशस्त्र न होना ही अच्छा है।

आगे लेखक ने हिंसा तथा जन अदालतों के मुक़दमे के द्वारा मृत्यु दंड के अनुप्रयोग की पड़ताल की है। यहां उन्होंने कुछ मुद्‍दों पर रटन्त लगाई है।

उनके वक्तव्य से जो ध्वनित होता है, वह यह कि – और मेरा नज़रिया भी कई अन्य लोगों जैसा यही है – ’लोकतांत्रिक’ संघर्षों को शांतिपूर्ण होना चाहिए, और अगर, यह ’हिंसक’ मोड़ ले लेता है और ’सशस्त्र’ हो जाता है, तब यह अपने ’लोकतांत्रिक’ चरित्र को खो देगा और अलोकतांत्रिक हो जाएगा। सवाल है: क्या यह वास्तविकता कि सिर्फ़ शांतिपूर्ण संघर्ष ही ’लोकतांत्रिक’ हो सकता है? और अगर यह ’सशस्त्र’ और ’हिंसक’ है तो ’अलोकतांत्रिक’ हो जाएगा? इतिहास और व्यवहारिक अनुभव हमें क्या बताते हैं? सामान्यतः हरेक आदमी (सत्ताधारी गिरोहों तथा उनके आज्ञाकारी चाकरों के अपवादों को छोड़कर) शांति चाहता है, भोजन और कपड़े चाहता है और जीवन में गरिमा चाहता है; कोई भी हिंसा या ख़ून ख़राबा नहीं चाहता। यह दमनकारी राज्य होता है जो उन्हें सशस्त्र होने के लिए बाध्य करता है।

लालगढ़ आंदोलन की मुख्य विशेषता राज्य द्वारा छेड़े गए हिंसक आक्रमण को देखते हुए इसका सशस्त्र (तीर धनुष तथा परंपरागत हथियारों से) होना है। वहां राज्य ने जनता के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ रखा है और जनता अपनी तरफ़ से सारा सामर्थ्य लगाकर प्रतिरोध कर रही है। कुछ सीपीएम कार्यकर्ता तथा हरमद वाहिनी के लोग मारे गए हैं। माओवादियों ने ऐलान किया किया है कि उनमें से सभी पुलिस ’मुखबिर’ थे, कि उन्हें पहले चेताया गया था, लेकिन उन्होंने अनसुना किया, तो उन्हें जन अदालत में मृत्यु दंड दिया गया। वे पुलिस ’मुखबिर’ थे या नहीं, यह इस लेखक को नहीं पता है। फिर भी, यह बहुत साफ़ है कि पिछले 32 वर्षों में सत्ताधारी सीपीएम तथा पुलिस प्रशासन के बीच का अंतर हवा में झूल गया है। दो साल पहले, जब नारी मुक्ति संघ की महिला सदस्यों ने बाघा जतिन रेल्वे स्टेशन में पोस्टर चिपकाया, तो उन्हें सीटू/सीपीएम कार्यकर्ताओं द्वारा पकड़ लिया गया, पार्टी ऑफ़िस ले जाकर उन्हें पुलिस को सौंप दिया गया। उसी दौरान, कुछ सीपीएम कार्यकर्ताओं तथा उसकी महिला शाखा की सदस्यों ने मातंगिनी महिला समिति की जादवपुर, कोलकाता के इलाक़े में रहने वाली कुछ सदस्यों को पुलिस को सौंपने की कोशिश की थी। ऐसी कोशिशें प्रमाणित करती हैं कि सीपीएम के कार्यकर्ता पुलिस मुखबिर की भूमिका निभाते हैं।

लेखक मृत्यु दंड के ख़िलाफ़ हैं। मैं मानता हूं, सिर्फ़ वही क्यों, कई सारे लोग सामान्यतः मृत्यु दंड के ख़िलाफ़ हैं। उनका सवाल है: जबकि 224 देशों ने मृत्यु दंड की सज़ा का उन्मूलन कर दिया है, माओवादी क्यों इसे अभी भी दंड के एक तरीक़े के रूप में बरकरार रखे हुए हैं? यहां लेखक ने एक बड़ी भूल की है। यह सवाल देश तथा उसकी स्थापित सरकार के लिए उपयुक्त है; लेकिन यह उनके लिए विचारणीय कैसे है जिनके पास न तो कोई देश है और न ही एक स्थापित सरकार है? यह लेखक सुजातो के साथ एक बिंदु पर पूरी तरह सहमत है: किसी तरह की आगे की कारवाई के पहले पर्याप्त जाच पड़ताल ज़रूरी है; निर्दोष लोगों की जान का किसी भी तरह का कोई नुक़सान पूरी तरह अवांछनीय है।

लेखक की राय में, ’हिंसक साधनों के सहारे बना समाज अल्पकालिक होता है।’ उनसे मेरा सवाल है: सभी तरह के मूलभूत सामाजिक रूपांतरण कहां हुए हैं और वे दीर्घकालीन कहां हुए है? रूस तथा चीन जैसे समाज में, जहां हिंसक साधनों के सहारे परिवर्तन साकार हुए थे, वहां अभी कई तरह के बदलाव आए हैं। फिर, इन समाजों के अल्पकालिक होने के लिए क्या हिंसक साधनों के अनुप्रयोग ज़िम्मेदार हैं? या नए समाज में गहराई से व्याप्त अंतर्विरोधों की वजह से ऐसा घटित हुआ? इतिहास हमें सिखाता है कि समाज का मूलभूत रूपांतरण कभी भी युद्ध और सशस्त्र उभार के बिना आकार नहीं लेता।

लेखक ने हिंसा के सामाजिक प्रभाव का सवाल उठाया है। वे यहां कुछ शहरी बौद्धिकों के बारे में ही क्यों बात कर रहे है? जंगल महल के लोगों पर, उन आदिवासी विद्यार्थियों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है जो प्रतिदिन राज्य हिंसा का शिकार हो रहे हैं? क्या वे लोगों के प्रतिरोध आंदोलन के बारे में, उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के, जो नंदीग्राम के लोगों जैसे ही सारी रात जाग जाग कर गुज़ारते हैं, और हरमद तथा संयुक्त बलों के अत्याचारों के ख़िलाफ़ खड़े रहते हैं, के बारे में बात नहीं करेंगे?

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ समस्या यह है कि वे कभी राज्य के आस्तित्त्व को चुनौती नहीं देते; इसके प्रतिकूल, वे इसकी वैधानिकता को स्वीकार करते हैं और मांग करते हैं कि राज्य अपनी ’घोषित प्रतिबद्धताओं का निर्वहन करे।’ उत्तर-आधुनिकतावादी चिंतन से प्रभावित, वे सिर्फ़ पेड़ देखते हैं, लेकिन जंगल को देखने में असफल होते हैं; उनके लिए, लालगढ़ आंदोलन सिर्फ़ राज्य दमन और ’सशस्त्र विरोधी समूहों’ द्वारा किए जा रहे प्रति-आक्रमण के बीच एक तनाव है। लेकिन, साथ ही साथ लालगढ़ आंदोलन देश में विदेशी पूंजी तथा घरेलू दलाल पूंजी द्वारा जारी प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट के ख़िलाफ़, जन-समर्थक विकास (जन पहलक़दमी तथा स्वैच्छिक श्रम के द्वारा स्वास्थ्य केंद्रों, सड़क, बांध तथा जल संरक्षण के स्रोतों के निर्माण, निचले लोगों तक भूमि के बंटवारे के क्रियान्वयन आदि के कार्यक्रमों द्वारा) को हासिल करने के लिए एक संघर्ष है।

16 सितंबर 2009 को कोलकाता से निकलने वाले दैनिक ’द स्टेटसमैन’ ने ’निश्चित तौर पर हममें से कोई माओवादी नहीं’ शीर्षक से एक गोष्ठी का आयोजन किया। प्रोफ़ेसर जी. हरगोपाल ने वहां अपने व्याख्यान में कहा: “एक ग्रामीण की पत्नी को जब ज़मींदार उठा ले जाता है, अपने घर ले जाकर उस पर यौन अत्याचार करता है और वह ग्रामीण जब अपने दो बच्चों के साथ अपनी पत्नी को वापस करने की प्रार्थना करने ज़मींदार के घर जाता है तो वह उसे भाग जाने का आदेश देता है, तो उस ग्रामीण को क्या करना चाहिए? अहिंसा और शांति का जाप करना चाहिए? या उसे उनका विरोध करने और दुखों के सागर का अंत करने के लिए हथियार उठा लेना चाहिए? ऐसे ही एक मामले में, आंध्र प्रदेश का एक नौजवान सीधे जंगल जाता है, 25000 हज़ार लोगों के समूह को संगठित करता है, ज़मींदार को मार देता है और अंत में उसे माओवादी बना दिया जाता है।“ (The Statesman 17-09-09)

इतिहास हमें सिखाता है कि हिंसा, हत्या – यह सभी अतीत में मौजूद रहे हैं और वर्तमान में भी निरंतर मौजूद हैं। व्यक्तिगत तौर पर हम सभी शांति चाहते हैं; कोई भी हिंसा और हत्या नहीं चाहता। बावजूद इसके, ये हमारी इच्छाओं से स्वतंत्र होते हुए, लगातार जारी रहेंगी, और इतिहास की दिशा को प्रभावित करेंगी और रास्ते में अपना नकारात्मक तथा सकारात्मक असर पीछे छोड़ती जाएंगी।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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