हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सुजातो भद्र को जंगल महल से किशन जी का जवाब

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/13/2009 11:04:00 PM

आपने लालगढ़ आन्दोलन और हिंसा के मुद्दे पर मानवाधिकार कार्यकर्ता सुजातो भद्र का माओवादियों के नाम एक खुला पत्र पढ़ा. अब पढिये जंगलमहल से किशनजी का जवाब, जो कोलकाता के  दैनिक स्टेट्समैन में 10 अक्टूबर को छपा था. किशनजी भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो मेंबर हैं. किशन जी का एक ताजा इंटरव्यू तहलका में भी देखा जा सकता है, पी चिदंबरम के इंटरव्यू के साथ. आगे आप पढेंगे इस मुद्दे पर जादवपुर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक अमित भट्टाचार्य का आलेख. 


जंगल महल से जवाब
किशनजी
बंगाल में मानवाधिकार आंदोलन की शुरुआत 1970 के दशक के प्रारंभ में नक्सलबाड़ी आंदोलन के कमज़ोर पड़ने के बाद हुई। अगला कुछ दशक क्रांतिकारी आंदोलन में रिक्तता का दौर था; मानवाधिकार आंदोलन इस संदर्भ में विकसित हुआ।
मानवाधिकार आंदोलन ने पिछले चार दशकों में, शोषित जनता के पक्ष में खड़े होकर एक स्वर्णिम भूमिका निभाई है। सुजातोबाबू उन्हीं दिनों से संघर्ष की अगली पंक्ति में रहे हैं। उन दशकों में नागरिक अधिकार आंदोलन ने भी कुछ ठोस आकार गृहण किया। यह मॉडल शोषित जनता के पक्ष में खड़े होने का मॉडल था। जब, 1980 के दशक में आंध्रप्रदेश तथा भूतपूर्व बिहार में क्रांतिकारी आंदोलन फिर से उठ खड़ा हुआ, नागरिक अधिकार आंदोलन अपनी सीमाओं में एक संकट से जूझने लगा। यह वह समय था जब जनता ’शोषित जनता’ की छवि से निकलने के लिए उठ खड़ी हुई और उसने ”प्रतिरोधी बहादुर जनता” के रूप में अपनी पहचान क़ायम की। अतः नई स्थितियों में नागरिक अधिकार आंदोलन का पुराना मॉडल उपयुक्त नहीं बैठ पा रहा था। राज्य ने आंदोलन को निर्धारित सीमाओं में बांधने के लिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। इसने मानवाधिकार अंदोलन के भीतर बहसों तथा अंतर्विरोधों को जन्म दिया। रामनाथन आर पुरुषोत्तम उस दौर में आंध्र प्रदेश में मानवाधिकार आंदोलन के बेहतरीन प्रतिनिधि थे।

पश्चिम बंगाल का मानवाधिकार आंदोलन इन संकटों से अभी भी अछूता था। ऐसा इसलिए कि बंगाल का क्रांतिकारी आंदोलन, अभी भीराजनीतिक परिदृष्य में अपनी प्रासंगिकता हासिल नहीं कर पाया था।

आज लालगढ़-जंगल महल के आंदोलन ने मानवाधिकार आंदोलन के सामने एक सवाल उपस्थित किया है। क्या नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, जो ’शोषित जन’ के पक्ष में अपने आप को खड़ा पाते थे, उसी तरह अपने आप को ’प्रतिरोधी बहादुर जनता’ के पक्ष में खड़ा करने में सफल होंगे? लालगढ़-जंगल महल आंदोलन ने दो प्रमुख सवालों को ज्वलंत बनाया है:

1) अंतिम विश्लेषण में, क्या जनांदोलन को मुख्यधारा के नेताओं\नेत्रियों को अपना शोषण करने देने का मौक़ा देना चाहिए? या जनता को इसे श्रेणीबद्ध करने में सक्षम होना होगा कि वे ख़ुद अपना उत्थान कर सकें?
2) क्या फ़ासीवादी क़ानूनों के ख़िलाफ़ लड़ने वाली जनता को इन नेताओं/ नेत्रियों का हाथ थामते हुए संवैधानिक रास्तों से अपनी चमड़ी बचाकर संतुष्ट हो जाना चाहिए? या फ़ासीवादी दुर्गों को बास्तील जैसे ध्वस्त कर जनता को ख़ुद अपनी रक्षा करनी चाहिए?

हिंसा या प्रति-हिंसा? यह भारतीय राजनीति में कभी ’मुद्‍दा’ ही नहीं रहा। जिसे ’लोकतांत्रिक राजनीति’ कहा जाता है – उस मुख्यधारा की संवैधानिक राजनीति में हिंसा का प्रयोग क्रांतिकारी राजनीति में हिंसा के अनुप्रयोग से कहीं ज़्यादा होता है। अतः क़ानून की भाषा में, यह एक ’ग़ैर-मामला’ (नॉन इश्यू) है। यह राज्य के नीति निर्माताओं द्वारा लालगढ़ आंदोलन से पैदा हुए दो प्रमुख मुद्‍दों को दफ़नाने के लिए आगे किया हुआ एक ’ग़ैर-मामला’ (नॉन इश्यू) है।

यहां तक कि बुर्जुवाजी क़ानून में भी आत्म-रक्षा के अधिकार को मान्यता मिली है। आत्म-रक्षा के लिए आक्रमणकारी को मार देने के अधिकार को स्वीकार किया गया है, तथापि राज्य द्वारा इस अधिकार का इस्तेमाल क्रांतिकारी जनता तथा क्रांतिकारियों को मारने के बहाने के रूप में किया जाता है। लेकिन जब शोषित जन प्रतिरोधी बहादुर जनता के रूप में तब्दील होकर इस अधिकार का इस्तेमाल करते हैं, पूरा संदर्भ बदल जाता है।

फ़ासीवादी शासन से क्या तात्पर्य है? यह रसूख वाले मुट्ठी भर राजनीतिक नेताओं तथा नौकरशाहों का शासन होता है। ज़मीनी स्तर पर, यह राज्य बलों तथा किसी पार्टी के गेस्टापो बलों द्वारा छेड़े गए संयुक्त आतंक के रूप में होता है।

हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि फ़ासीवाद एक अच्छी तरह से संगठित केंद्रीकृत तंत्र होता है। अगर कहीं कोई खामी होती है तो फ़ासीवाद उन कमज़ोरियों के माध्यम से गांवों में हत्याओं, बलात्कार तथा घरों की आगजनी करते हुए घुसता है। जनता के आत्म-रक्षा के अधिकार की मांग है कि कि गांवों में हरमद की परछाई नहीं दिखनी चाहिए, किसी क़िस्म की कमज़ोरियों को पैदा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी जिसके माध्यम से वे किसी भी समय घुस सकें। आज हम छत्तीसगढ़ में ’सल्वा जुडुम’, झारखंड में ’नागरिक सुरक्षा समिति’, तथा बंगाल के जंगल महल क्षेत्र में ’संत्रास प्रतिरोध समिति’, ’घोस्कर वाहिनी’ और हरमद बलों के रूप में जनसंहार, आतंक, बलात्कार तथा घरों को जलाने वाले हिटलर की गेस्टापो शक्तियों को बल-गुच्छों की तरह उगते हुए देख रहे हैं। यह सब रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा हो गया है -- संयुक्त बलों द्वारा जंगल महल पर क़ब्ज़ा करने के लिए 80 से 90 बंकरों की स्थापना, एलएमजी जैसे अत्याधुनिक हथियार तथा केशपुर तथा गोरबेटा की ओर से पुलिस सुरक्षा के साथ हरमद के बड़े शिविर स्थापित किए गए हैं। मीडिया को यह सब भलीभांति मालूम है। वहीं दूसरी ओर, राज्य मुखबिर तथा गुप्त नेटवर्क बनाने के लिए पैसों भरे थैले लेकर एक गांव से दूसरे गांव में घूम रहा है, पुलिस बल भेद किए बिना लोगों को पीट पीट कर दहशत पैदा कर रहे हैं, सभी विद्यालयों को पुलिस कैंप में तब्दील कर दिया गया है और फलस्वरूप युद्ध जैसी स्थितियां उत्पन्न कर दी गईं हैं। ऐसी युद्ध स्थिति में, न्यायिक सिद्धांत के क्या वही डंडे बनें रहेंगे? फ़ासीवादी शासन की स्थितियों तथा सामान्य स्थितियों दोनों में क्या एक ही तरह के डंडे होंगे? गृह युद्ध तथा फ़ासीवाद मानव जीवन में परिवर्तन ला देते हैं। अतः न्यायसंगत सिद्धांतो के डंडे तथा उसकी धारणाओं में भी उसी तरह तात्कालिक तौर पर बदलाव आ जाता है।

मुख़बिरों से छुटकारा पाने के लिए, लोग कई तरह के तरीक़े आजमा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, उनके लालच का दोहन करने के लिए राज्य भी अपनी यथा-शक्ति के हर-संभव सब कुछ करने की कोशिश कर रहा है। अतः मारे गए मुखबिरों की संख्याएं भी बढ़ी हैं। जंगल महल में एक बेहतर व्यवस्था होने के कारण मारे गए मुख़बिरों की संख्या बहुत कम है। दंडकारण्य के विभिन्न हिस्सों में मुख़बिरों को जनता के क़ैद में गिरफ़्तार कर लिया जाता है।

जब तक इस क्षेत्र में संयुक्त बल नही घुसे थे, जासूसों को इतने बड़े पैमाने पर ख़त्म करने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती थी। संयुक्त बलों की तैनाती के बाद स्थितियां बदल गईं हैं। जैसे आत्म-रक्षा की धारणा बदल गई है।

हम भी मृत्यु दंड के विरोधी हैं। हालांकि, युद्ध के समय न्यायिक सिद्धांतों की धारणा सामान्य स्थितियों की धारणा से अलग हो जाती है। युद्ध की स्थितियों में, चिंतन, चेतना, पहलक़दमी तथा अविष्कार की आज़ादी का दायरा बहुत सीमित हो जाता है।

सुजातोबाबू ने कहा है: “आप की घोषित तथा सशस्त्र उपस्थिति ने जनसाधारण समिति के नेतृत्त्व में हुए जनउभार की गति तथा आंदोलन के केंद्रीय ध्यान (फ़ोकस) को पृष्ठभूमि में धकेल दिया।”

सुजातो बाबू! जंगल महल में आपके खुले तौर पर जाने के हक़ को राज्य ने सिर्फ़ एक उद्‍देश्य से छीन लिया है। वह भ्रमित करने वाले सूचना अभियानों (डिसइनफ़ॉर्मेशन कैंपेन) में लिप्त रहने का उद्‍देश्य है। अन्यथा, आप इसे देखने में ज़रूर सक्षम होते कि जंगल महल के हरेक कूचे और कोने से प्रत्येक दिन हज़ारों लोग जुलूस, रैली, घेराव, प्रदर्शन में भागीदारी कर रहे हैं। संयुक्त बलों के भयंकर दमन के बावजूद, जनसाधारण समिति द्वारा प्रारंभ की गई व्यवस्था लोगों को प्रेरित कर रही है। छत्रधर महतो की गिरफ़्तारी के बाद भी जनता की रचनात्मकता क़ायम है। जनांदोलन कितना प्रतिरोधी हो गया है, आपने देखा होगा। जनांदोलन का निरंतर सशक्त होना, जनता की पहलक़दमियां, उनकी गहन चेतना, सच में संघर्ष की एक गाथा लिख रही हैं। अगर आप चाहते हैं, तो हम जंगल महल में आपके आगमन की सारी व्यवस्था करने तथा सुरक्षा प्रदान करने को तैयार हैं। आइये, ख़ुद अपनी आंखों से देखिए, उनकी जांच-पड़ताल कीजिए, अपना नज़रिया बदलिए। और मानवाधिकार आंदोलन की हदबंदी को तोड़कर आगे निकलिए।

माओवादी आंदोलन को कुचलने के लिए तथा इसके 100 नेताओं को ख़ामोश करने के लिए जब केंद्रीय संयोजन के गठन का निर्णय लिया जाता है और जब सीमा सुरक्षा बल के अवकाश प्राप्त महानिदेशक प्रकाश सिंह इस बारे में खुले तौर पर अपनी नाखुशी ज़ाहिर करते हैं, तो यह दिखाता है कि राज्य ने युद्ध छेड़ दिया है, और युद्ध कुछ ख़ास तरीक़ों से लड़ा जाएगा। राज्य द्वारा 100 क्रांतिकारी नेताओं को ख़ामोश (पुलिसिया कोश में किसी को ’ख़ामोश’ करने का क्या मतलब होता है, प्रकाश सिंह ने ख़ुद बताया है।) करने के निर्णय के प्रतिकार के लिए राज्य के बड़े नेताओं के ख़िलाफ़ सैन्य कारवाई करने की ज़रूरत पड़ी।

सुजातोबाबू ने कहा है कि हिंसक तरीक़ों से हासिल किए गए परिवर्तन कभी दीर्घकालिक नहीं होते। हम उनके इस वक्तव्य को ज़्यादा महत्त्व नहीं दे रहे हैं। हम नहीं मानते कि वे ख़ुद इसमें गंभीरता से यक़ीन करते हैं। इतिहास में अधिकतर युगीन बदलाव हिंसा के बग़ैर संपन्न नहीं हुए हैं। यह हिंसा के माध्यम से ही हुआ कि मध्य युग के सत्ताधारी रजवाड़ों का ख़ात्मा हुआ। एक उदाहरण का ज़िक़्र करते हुए मैं अपनी बात को समेटना चाहूंगा – यह अमरीकन दासता के ख़िलाफ़ ग़ुलाम ड्रेड स्कॉट का है जिसकी पराजय ने गृहयुद्ध को अपरिहार्य बना दिया। यह सत्ता तथा संपति की वासना (चाहना) है जिसने सभी युगों में हिंसा को अपरिहार्य बनाया है।

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ सुजातो भद्र को जंगल महल से किशन जी का जवाब ”

  2. By Anonymous on November 14, 2009 at 7:58 AM

    बहुत अच्‍छा लेख।
    -मदन सक्‍सेना, भोपाल

  3. By राजीव रंजन प्रसाद on November 14, 2009 at 1:12 PM

    असल बात है - "सुजातोबाबू ने कहा है कि हिंसक तरीक़ों से हासिल किए गए परिवर्तन कभी दीर्घकालिक नहीं होते। हम उनके इस वक्तव्य को ज़्यादा महत्त्व नहीं दे रहे हैं। हम नहीं मानते कि वे ख़ुद इसमें गंभीरता से यक़ीन करते हैं।"

    लेकिन साहब माओ के अंधों को लाल लाल ही सूझता है। कातिल और क्रांति?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें