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बीच सफ़हे की लड़ाई

बिहार को जरा गौर से देखिए, और इस तसवीर को भी

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/11/2009 03:07:00 PM

नीतिश कुमार के सत्ता में आने के बाद पूरे देश में यह हवा बनाई गई है की बिहार अब जातिवाद, परिवारवाद, गुंडाराज से मुक्त हो रहा है, क्रमशः इन प्रचारक पत्रकारों ने बिहार में सामाजिक न्याय और विकास के झंडे गडे जाने के बारे में कितना कुछ लिखा है आईये, देखते हैं की बिहार इस मामले में कितना आगे बढ़ा है शुरुआत एक तसवीर से



















इसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अनंत सिंह को नमन कर रहे हैं। यह एक्सक्लूसिव तस्वीर है। अभी तक कहीं छपी नहीं है। (‍‍‍‍बिहार में छापेगा भी कौन?) अनंत सिंह दिलीप सिंह का छोटा भाई है। दिलीप नीतीश का शागिर्द था इस तरह यह तस्वीर नीतीश के परिवारवाद से भी जुडती है। अनत सिंह के बारे में जानने के लिए यह पोस्ट पढिये।

क्या बिहार की जनता ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ठुकरा दिया है? क्या अगले साल होने वाले विधान सभा चुनाव में एक बार फिर लालू प्रसाद बिहार की सत्ता पर काबिज होंगे? पिछले दिनों हुए बिहार विधानसभा की 18 सीटों के उप चुनाव में 9 सीट पर राजद-लोजपा गठबंधन के प्रत्याशी विजयी रहे. राजग गठबंधन को 5 सीटें आयी. कांग्रेस को 2 सीट मिली जबकि बसपा ने 1 और जदयू के बागी सांसद जगदी शर्मा की पत्नी ने 1 सीट पर निर्दलीय जीत हासिल की.
उप चुनाव के इस नतीजे की प्रायः दो प्रकार की व्याख्या पिछले दो महीने से की जा रही है. पहली व्याख्या के अनुसार बिहार में राजग की हार सत्तालोलुप नेताओं के कारण हुई है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी के नवनिर्वाचित सांसदों के परिजनों को टिकट नहीं दिया. इसलिए परिवारवादी नेताओं ने भीतरघात कर राजग उम्मीदवारों को हरवा दिया. दूसरी व्याख्या में हार का कारण नीतीश कुमार द्वारा भूमि सुधार के मसले को उठाया जाना बताया गया. इन अखबारी विश्लेषणों में मुख्यमंत्री को सुझाव दिया गया कि इस तरह के मामले में हाथ डालना ‘होम करते हाथ जलाने’ जैसा है. सामंती जातियों से पंगा न लें, नहीं तो सत्ता से हाथ धो बैठेंगे. इन व्याख्याओं के बरअक्स बिहार के राजनीतिक और अखबारी गलियारों में एक तीसरी व्याख्या भी तैर रही है. इस व्याख्या के अनुसार राजद-लोजपा गठबंधन की अप्रत्याशित बढ़त ने साबित कर दिया है कि लालू प्रसाद एक बार फिर लोकप्रियता के शीर्ष पर हैं.
वास्तव में, बिहार विधानसभा उपचुनाव की यह व्याख्याएं तथ्यों से मेल नहीं खातीं. पहली दो व्याख्याएं तो सीधे तौर पर व्यक्ति पूजा और सामंती जातियों के पक्ष में महौल बनाये रखने के लिए की जा रही हैं. तीसरे प्रकार के व्याख्याकारों की खुशफहमी के पैर भी ठोस जमीन पर टिके नहीं हैं.
पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के परिवारवाद विरोध को देखें. क्या वास्तव में नीतीश कुमार राजनीति में परिवारवाद के विरोधी हैं? जदयू के टिकट पर चुनाव जीते कुछ राजकुमारों और राजमाताओं की बानगियों से इसे समझा जा सकता है. उन्होंने जदयू सांसद अजीत सिंह की सड़क दुर्धटना में मौत के बाद उनकी ‘वैध’ पत्नी मीना सिंह को टिकट दिया. मंत्री नरेंद्र सिंह के पुत्र अभय सिंह, खगड़िया जिलाध्यक्ष विजय सिंह की पत्नी रेणु देवी, पूर्व मुख्यमंत्री व जदयू नेता जगन्नाथ मिश्र के पुत्र नीतीश मिश्र, जदयू नेता नागमणि की पत्नी सुचित्रा देवी आदि को विधान सभा में पहुंचाने से लेकर मंत्री पद से नवाजने की जिम्मेवारी नीतीश बखूबी निभाते रहे हैं. गत लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने नेताओं के परिजनों को संसद में भेजा है. बाहुबलियों की रिश्तेदारों को राजनीति में आगे बढ़ाने में भी वह पीछे नहीं रहे हैं. प्रदीप महतो की हत्या के बाद उनकी पत्नी अश्वमेध देवी को पहले कल्याणपुर से विधायक बनाया और इस वर्ष उजियारपुर से लोकसभा का टिकट देकर संसद भेज दिया. बूटन सिंह की हत्या के बाद उनकी पत्नी लेसी सिंह को पहले विधायक बनाया गया और अब वे नीतीश कुमार की विशेष पसंद के तौर पर बिहार महिला आयोग के अध्यक्ष पद पर विराजमान हैं. उपरोक्त सभी, वे लोग हैं जिनकी राजनीति में न कोई पहचान थी, न ही सामाजिक काम का कोई अनुभव.
नीतीश कुमार का राजनीतिक इतिहास बताता है कि उन्होंने हमेशा परिवारवाद को प्रश्रय दिया है. कर्पूरी ठाकुर के पुत्र रामनाथ ठाकुर हों या फिर समाजवादी नेता श्रीकृष्ण सिंह के पुत्र नरेंद्र सिंह या फिर संसोपा नेता जगदेव प्रसाद के पुत्र नागमणि-सभी नीतीश कुमार की सोहबत और प्रश्रय में राजनीति में फले-फूले हैं. रामनाथ ठाकुर और नरेंद्र सिंह इन दिनों बिहार सरकार के मंत्री भी हैं.
नीतीश कुमार को विधानसभा के गत उपचुनाव में परिवारवाद के विरोध का नारा मजबूरी में गढ़ना पड़ा था. एक खास सामंती जाति के वोटों पर अच्छी पकड़ रखने वाले नवनिर्वाचित जदयू सांसद जगदीष शर्मा अपनी पत्नी के लिए घोसी विधानसभा से टिकट चाहते थे. जबकि पार्टी का ‘आर्थिक आधार’ कहे जाने वाले राज्य सभा सदस्य किंग महेंद्र इसके लिए कतई राजी नहीं थे. ‘किंग’ के दबाब के आगे नीतीश कुमार को झुकना पड़ा.
परिवारवाद का ही वृहत्तर रूप जातिवाद है जो आगे क्षेत्रवाद तक जाता है. इन तीनों किस्म की संकीर्णता से नीतीश कुमार का गहरा नाता रहा है. स्वजातीय (कुरमी) आइएस अधिकारियों को देश भर से ढ़ूढ़-ढ़ूढ कर बिहार लाने के आंकड़ों सहित आरोप उनपर विपक्षी पार्टियां लगातार लगाती रही हैं. उनके जाति (वाद) और क्षेत्र (वाद) प्रेम को एक छोटी सी सूची के सहारे भी साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है. जदयू प्रदेष अध्यक्ष, युवा जदयू अध्यक्ष, महिला जदयू अध्यक्ष, मुख्य सचेतक विधानसभा, मुख्य सचेतक विधान परिशद्, मानव संसाधन विभाग मंत्री, उपाध्यक्ष नागरिक परिशद, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव, मुख्यमंत्री के निजी सचिव, लोकायुक्त, अध्यक्ष संस्कृत शिक्षा बोर्ड, अध्यक्ष राष्ट्रभाषा परिषद, जिलाधिकारी राजधानी पटना, ग्रामीण एसपी पटना, सुप्रिटेंडेंट पटना मेडिकल कालेज हास्पीटल आदि अनेक प्रमुख पदों पर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने गृह जिला नालंदा के लोगों ले आए हैं. इतना ही नहीं, इनमें से एक, जदयू के प्रदेश अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ‘ललन सिंह’ को छोड़कर बाकी सभी मुख्यमंत्री की अपनी ही जाति (कुरमी) के भी हैं. यानी मंत्री से संतरी तक उन्होंने अपने कुनबे से चुना है. यह सूची दिनों-दिन लंबी ही होती गयी है.
उपचुनाव में नीतीश कुमार को मिली हार को समझने के लिए वस्तुतः हमें उस प्रक्रिया को समझना होगा जिसके तहत बिहार की जनता ने राजग को सत्ता सौंपी थी. अगर नीतीश कुमार का नाम न होता तो राजग को पिछड़ों, अति पिछडों, पसमांदा मुसलमानों का समर्थन नहीं मिलता. मार्च, 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में माना जा रहा था कि राजग सत्ता में आया तो नीतीश मुख्यमंत्री बन सकते हैं लेकिन गठबंधन के स्तर पर इसकी साफ तौर पर घोषणा नहीं की गयी थी. उस चुनाव में अपेक्षा से कम वोट मिलने के बाद राजग (भाजपा) को महसूस हुआ कि किसी पिछड़े नेता के नाम के बिना बिहार की सत्ता नहीं हासिल की जा सकती. इसलिए राष्ट्रपति शासन के बाद चुनाव हुआ तो भाजपा ने नीतीश कुमार को बतौर मुख्यमंत्री घोषित करते हुए - ‘नया बिहार, नीतीश कुमार’ का नारा बनाया गया. इस नारे के अपेक्षित परिणाम आये. नीतीश कुमार को फेन्स पर खड़े पिछड़े तबके ने दिल खोलकर वोट दिया. वे लालू को किसी ऊंची जाति के नेता से पदच्युत कराना नहीं चाहते थे. इस तरह नीतीश कुमार ने बाजी जीती. लेकिन उन्हें हमेशा यही विश्वास रहा कि उनकी जीत ऊंची जातियों के सहयोग के कारण हुई है. पिछड़ी जातियों के सहयोग को उन्होंने नजरअंदाज किया. दरअसल नीतीश कुमार को दो तरह के वोट मिले थे. एक तो सामंतों का वोट था दूसरा पिछड़ों का. सामंतों का वोट बहुप्रचारित ‘पिछड़ा राज’ हटाने के लिए था. पिछड़ों का वोट विकास के लिए था. लेकिन सत्ता में आने के साथ ही सामंती ताकतों ने उन्हें अपने घेरे में लेना शुरू कर दिया. सत्ता के शुरुआती दिनों में नीतीश ने इसका प्रतिरोध किया लेकिन पांच-छह महीने में ही वह इन्हीं ताकतों की गोद में जा बैठे. उनके इस आत्मसमर्पण के साथ ही बिहार में सामाजिक प्रतिक्रांति के दौर की शुरुआत हो गयी है. जिसे द्विज वर्चस्व वाले बिहार के अखबार विकास और सुशासन की मनगढंत खबरों से ढंकने की लगभग सफल कोशिश करते रहे हैं. यह कारण है कि बिहार की पिछड़ी आबादी में नीतीश शासन काल के लिए ‘कुरमी को ताज, भूमिहार का राज’ जैसे जुमले लोकप्रिय हुए हैं.
यह सच है कि बंटाईदारी कानून की बात करने तथा पैक्स चुनावों में पंचायत चुनावों की तर्ज पर अति पिछडों के लिए आरक्षण लागू करने से सामंती जतियों, बिहार में जिनकी आबादी 1931 की जनगणना के आधार पर 13 फीसदी बनती है, में भी अब नीतीश कुमार के प्रति नाराजगी है. इन जातियों के एक बड़े हिस्से ने विधानसभा उप चुनाव में राजग का साथ छोड़कर कांग्रेस को वोट किया. लेकिन यह नीतीश कुमार की हार का एकमात्र कारण नहीं है. वस्तुतः पत्रकारिता में रहकर सामंती ताकतों की मुंशीगिरी कर रहे लोग इसे हार की एकमात्र वजह के रूप में प्रचारित कर नीतीश कुमार को भूमि सुधार, समान स्कूल प्रणाली जैसे कदमों से बचने की सलाह दे रहे हैं ताकि सत्ता जाने के भय वह कोई भी परिवर्तनकारी कदम न उठा पाएं. ये चापलूस पत्रकार अपने लेखों में नीतीश कुमार को इतिहास पुरुष बताते हैं, उनकी तुलना नेहरू से करते हैं लेकिन वास्तव में वे उन्हें कल्याण सिंह और रामसुंदर दास की भूमिका में देखना चाहते हैं.
उपचुनाव में नीतीश कुमार की हार का बड़ा कारण दलितों, जिनकी आबादी 14 फीसदी से ज्यादा है, का राजग से छिटकना तथा पिछड़ों की राजद-लोजपा गठबंधन के पक्ष में आंशिक गोलबंदी है. द्विज वोटों के अलावा मुसलमानों के वोटों का एक बड़ा हिस्सा इस बार कांग्रेस ने नीतीश और लालू प्रसाद से छीन लिया है.
पिछले दिनों नीतीश कुमार ने महादलित आयोग का गठन किया था. बसपा और लोजपा का वोट वैंक होने के कारण उन्होंने मोची (चमार) तथा दुसाध जातियों को महादलित की श्रेणी से बाहर रखा जबकि अन्य सभी दलित जातियों को ‘महादलित’ का नाम देकर कुछ छोटी-मोटी कल्याणकारी योजनाएं चलायीं. लोकसभा चुनाव में तो दलितों ने राजग को वोट किया लेकिन विधान सभा के उपचुनाव तक उन्हें खेल समझ में आने लगा. दरअसल, वोट के लोभ में अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित और संपन्न धोबी और पासी जाति को नीतीश कुमार ने महादलित की श्रेणी में डलवा दिया, जिससे अन्य ‘महादलित’ जातियां, विषेशकर बड़ी आबादी वाले भुईयां और मुसहर बिदक गये. नीतीश का यह फैसला सिर्फ वोट वैंक की राजनीति ही नहीं था बल्कि न्याय के सर्वमान्य सिद्धांत के भी विपरीत था. धोबी की साक्षरता दर 2001 की जनगणना के अनुसार 34.83 फीसदी तथा पासी की 31.54 फीसदी है. इन्हें ‘महादलित’ की श्रेणी दी गयी जबकि 25.62 फीसदी साक्षरता वाले दुसाध तथा 24.99 प्रतिशत साक्षरतावाली मोची जाति को इससे बाहर रखा गया. नीतीश कुमार के सलाहकारों ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया कि भले ही ये दोनों जातियां क्रमषः रामविलास पासवान और मायावती की समर्थक मानी जाती हैं लेकिन इनकी आबादी बिहार की कुल दलित आबादी की 62 फीसदी से ज्यादा है. इन हवाई फामूर्लों के कारण नीतीश को इस उपचुनाव में लगभग सभी दलित वोटों से हाथ धोना पड़ा है.
अब जरा उपचुनाव में विभिन्न दलों के मतों की ओर देख लें, जिनकी चर्चा से राजग और राजद-लोजपा दोनों बचना चाहते हैं. चुनावी विश्लेषकों ने भी इनकी ओर से आंख फेर रखी है, जबकि ये आंख खोल देने वाले आंकड़े हैं. लालू प्रसाद के एक बार फिर लोकप्रियता के शिखर पर होने की खुशफहमी पालनेवालों को भी इन्हें गौर से देखना चाहिए. विधान सभा उपचुनाव में कुल मत पड़े 17 लाख 20 हजार 494. इनमें से जदयू को मिले 3 लाख 74 हजार 180 वोट (21.7 फीसदी). भाजपा को 1 लाख 76 हजार 813 वोट (10.2 फीसदी). यानी राजग गठबंधन के हिस्से में आए कुल 5 लाख 50 हजार 993 वोट (32.02 फीसदी). राजद के खाते में गये 3 लाख 74 हजार, 834 लोगों के मत (21.7 फीसदी) और लोजपा के पक्ष में मतदान करने वालों की संख्या रही 1 लाख 70 हजार 484 (9.9 फीसदी). यानी राजद-लोजपा गठबंधन को 5 लाख 45 हजार 318 वोट (31.69 फीसदी) मिले. जबकि कांग्रेस को 2 लाख 65 हजार 369 वोट (15.4 प्रतिशत) मिले हैं. मतों के आंकड़े बताते हैं कि भले ही राजद-लोजपा गठबंधन को 18 में से 9 सीटें मिल गयी हों और राजग पांच सीटों पर सिमट गयी हो लेकिन वोटों के मामले राजद-लोजपा गठबंधन राजग से कुछ पीछे ही है. जदयू और राजद को मिले मतों का प्रतिशत बिल्कुल समान रहा है. जबकि नीतीश कुमार के चार वर्शों के शासनकाल में कांग्रेस के वोटों में तिगुनी बढोत्तरी हुई है. 2005 के विधान सभा चुनाव में उसे लगभग 5 फीसदी मत मिले थे, 2009 के लोकसभा चुनाव में वह 11 फीसदी पर पहुंची जबकि इन चुनावों में उसने 15 प्रतिषत से अधिक मतदाताओं को आकर्षित कर लिया.
गत लोकसभा चुनाव और इस उपचुनाव में मतदान का प्रतिशत काफी नीचा रहा है, जो बताता है कि बिहार के दलित-पिछड़े मतदाता असमंजस की स्थिति में हैं. 2005 में आश्चर्यजनक बहुमत से सत्ता में आए नीतीश कुमार अपनी लोकप्रियता बरकार नहीं रख सके हैं तो दूसरी ओर लालू प्रसाद भी अपने पुराने रूतबे से अभी बहुत दूर हैं.

वस्तुतः इस उपचुनाव ने बिहार में 70 के दशक से ही फल-फूल रही कांग्रेस विरोध की पिछड़ा राजनीति को गहरा झटका दिया है. नीतीश कुमार ने अपनी राजनीति में पिछड़ों और दलितों को हाशिये पर रखा और द्विजों को राज्य वास्तविक कमान सौंपी. इसका परिणाम सामने है, बिहार में एक बार फिर कांग्रेस की द्विज राजनीति के लिए जमीन तैयार हो गयी है. पिछड़ा राजनीति की कमान संभालने वाले नीतीश, लालू और रामविलास पासवान का आधार खिसकता गया है. बिहार का राजनीतिक, सामाजिक माहौल निरंतर प्रतिक्रयावादियों और यथास्थितिवादियों के पक्ष में बनता जा रहा है. साफ है, विकास और अच्छे शासन को सामाजिक परिवर्तन के पैमाने पर मापने वालों के लिए यह शुभ संकेत नहीं है.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ बिहार को जरा गौर से देखिए, और इस तसवीर को भी ”

  2. By Alok Nandan on November 11, 2009 at 4:39 PM

    आपने ब्लाग का फान्ट साइज थोड़ा बड़ा किजीये...बहुत ही छोटा है...बेहतर विश्ललेषण है...

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

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