हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

प्रतिरोध की संस्कृति के दमन का नाम है नक्सलवाद विरोधी अभियान

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/09/2009 01:55:00 PM

कोई अर्थशास्त्री, कोई गणितज्ञ, कोई समाजशास्त्री क्या हमें यह अबूझ-सी लगती पहेली सुलझाने में मदद करेगा कि जिस देश के खेतिहर घरों में औसतन 503 रुपये मासिक खर्च किया जाता है, जिसमें से 55 प्रतिशत या उससे अधिक भोजन पर, 18 प्रतिशत जलावन पर, कपडों और जूते-चप्पलों पर खर्च होता है और शिक्षा पर प्रतिदिन 50 पैसे जो लोग खर्च कर पाते हैं, उस देश में इन खेतिहरों से भी अधिक दयनीय अवस्था में जीवन जी रहे आदिवासी हथियारों पर कितना खर्च करते होंगे, जो अपने बजट का 15 प्रतिशत सेना पर खर्च करनेवाले देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं? इस खतरे की शब्दावली का राजनीतिक अर्थशास्त्र क्या है? देश के वित्त मंत्री से लेकर अखबारों के संपादकीय तक में झलकती यह अश्लील और हिंसक भाषा अपने में कौन-से निहितार्थ लिए हुए है? बता रहे हैं जाने-माने पत्रकार अनिल चमड़िया

आंकड़ों को पेश करने की बाजीगिरी होती है।देश में नक्सली गतिविधियों के विस्तार को तीन तरह के आंकड़ों के साथ पेश किया जा सकता है। यदि नक्सली गतिविधियों के बारे में आंकड़े इस तरह पेश किए जाए कि कितने राज्यों में नक्सलवाद का प्रभाव है तो वह देश के पचहत्तर प्रतिशत हिस्से में दिखाई देगा। यदि नक्सली गतिविधियों को जिलों की संख्या के आधार पर देखे तो वह पहले के आंकड़ों के मुकाबले आधा दिखाई देने लगेगा। लेकिन यदि गांवों की संख्या के आधार पर देखें तो देश के कुल महज दो या तीन प्रतिशत हिस्से में नक्सलवाद का प्रभाव दिखाई देता है।क्या सचमुच देश के दो तीन प्रतिशत हिस्सों में अपना प्रभाव रखने वाली कोई राजनैतिक विचारधारा देश के आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हो सकती है ?इस सवाल को दूसरे तरीके से भी उठाया जा सकता है कि देश के लगभग हिस्सों में सरकार और राजनीतिक पार्टियों पर से लोगों का विश्वास लगातार खत्म होता जा रहा है, आतंरिक सुरक्षा के लिए राजनैतिक चिंता का सबसे प्रमुख पहलू यह होना चाहिए या फिर कोई अन्य ।क्या ऐसा संभव हो सकता है कि सरकार और राजनीतिक पार्टियों के प्रति लोगों के प्रति भरोसा मजबूत हो और कोई उसकी विरोधी राजनीतिक विचारधारा या सांगठनिक गतिविधियॉ अपने पांव जमा लें?देश के गृहमंत्री पी. चिदंबरम का कहना है कि सरकार नक्सलियों के खिलाफ जो अभियान चलाने जा रही है वह नक्सलियों के नहीं बल्कि नक्सलवाद के खिलाफ अभियान हैं। नक्सलवाद यदि केवल कुछेक हथियारबंद कार्रवाई का नाम नहीं है तो क्या किसी भी विचारधारा के खिलाफ कोई अभियान सैन्य अभियान हो सकता है? विचारधारा के प्रभाव को क्या सैन्य अभियानों के जरिये खत्म किया जा सकता है? ये आरोप तो लगाया जा सकता है कि नक्सली बंदूक के बूते अपने प्रभाव वाले इलाके में लोगों को नियंत्रण में रखते हैं लेकिन क्या इसे इस तरह से नहीं देखा जा सकता है कि देश के बहुत सारे पढ़े लिखे लोग भी नक्सलवादी विचारधारा से प्रभावित रहते हैं जबकि उनतक किसी किस्म के बंदूक का साया भी नहीं पहुंचता है.।खुद पी चिदंबरम और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कई बार कह चुके हैं कि देश में एक पढ़ी लिखी और समझदार जमात नक्सलवादियों की समर्थक है। देश में संसदीय वामपंथी पार्टियों से गहरी नाजरागी के बाद बुनियादी परिवर्तन की जो राजनैतिक धारा विकसित हुई उस नक्सलवादी धारा को देश के बहुतेरे बुद्धिजीवियों ने समर्थन दिया। खुद मनमोहन सिंह उस समय चंड़ीगढ़ में अर्थशास्त्र के प्रोफेस्रर थे और उन्हें पुलिस वाले नक्सलवादियों के करीबी मानते थे। पंजाब में लोकप्रिय नक्सलवादी नेता हाकाम सिंह समाऊ ने इस बात का उल्लेख किया है ।कोई तस्वीर कहां खड़े होकर ली जाती है ये तस्वीर को लेने के मकसद पर निर्भर करता है।पी चिंदंबरम ने दिल्ली में नाना पालिकावाला स्मृति व्याख्यान में कहा कि 2009 में नक्सलवादियों ने आर्थिक केन्द्रों पर 183 हमले किए। उनके अनुसार पंचायत भवन, स्कूल, रेलवे स्टेशन आदि आर्थिक केन्द्र हैं। नक्सलवादियों के लिए अभियानों के दौरान पंचायत भवन और स्कूल सैन्यकर्मियों के रहने के ठिकानों में तब्दील हो जाते हैं। पी चिदंबरम नक्सलवादियों को विकास विरोधी कहते है लेकिन विकास का क्या अर्थ है ? विकास किसी भी एक चीज का नाम नहीं है । विकास के क्या मायने होते हैं? सड़क, बिजली पानी विकास है ? कल कारखाने, बड़े बांध, बड़े पैमाने पर खादानों से निकासी विकास है? जंगलों की सफाई विकास है? जमशेदपुर विकास का एक मॉडल है। यह विकास आदिवासियों के लगभग दो सौ गांवों के कब्रगाह पर बना है। जमशेदपुर में आज आदिवासी चेहरा भी मुश्किल से दिखाई देता है।नक्सलवादियों को विकास विरोधी कहा जा रहा है लेकिन जिन इलाकों में नक्सलवादियों का प्रभाव नहीं रहा है वहां कौन विकास का विरोध करता रहा है? दरअसल विकास के विरोध में नक्सलवाद को खड़ा करने के लगभग वहीं उद्देश्य है जो अमेरिका का आतंकवाद के नाम पर प्रतिरोध विरोधी ढांचा और संस्कृति विकसित करने का रहा है। नक्सलवादियों को जिन इलाकों में सबसे सक्रिय बताया जा रहा है वो इलाके आदिवासियों के इलाके के रूप में जाना जाता है। क्या वहां विरोध और प्रतिरोध की संस्कृति नहीं रही है? नक्सलवाद के जन्म से पहले उन इलाकों में सत्ता द्वारा अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को थोपे जाने का सशस्त्र विरोध किया जाता रहा है। इस समय सरकार की क्या चिंता है। इसे एक आंकड़े से समझा जा सकता है। सरकार का कहना है कि देश में कुल 22 स्टील की ऐसी बड़ी बड़ी परियोजनाएं है जिन्हें खड़ी करने में दिक्कतें आ रही है. ये दिक्कत जमीन नहीं देने के लिए लोगों का जबरदस्त विरोध है। सरकार कहती है कि ये परियोजनाएं 82 बिलियन डालर की है । दुनिया भर की बड़ी बड़ी कंपनियां इन इलाकों में अपनी स्टील परियोजनों को लाना चाहती है। उद्योगपतियों के संगठन एसोचैम के अनुसार सरकार के एक अध्ययन में बताया गया है कि 190 ढांचागत परियोजनाएं है जिनका सत्तर प्रतिशत हिस्सा इसीलिए रूका पड़ा है क्योंकि जमीन की समस्या है।18 परियोजनाएं ऐसी है जिसमें दो लाख चौवालीस हजार आठ सौ पन्द्रह करोड़ रूपये का विनियोग तीन चार वर्षो से कागजों में ही पड़ा है। लोगों ने अपनी जमीनें दी है और उनका अस्तित्व मिट गया। विकास के लिए जमीन दी गई लेकिन वह विकास उसके किस काम का होता है ? अर्जून सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि 77 प्रतिशत आबादी 20 रूपये से कम पर रोजाना अपना जीवन बसर करती है।यहां देश के विकास का क्या अर्थ निकाला जा सकता है। विकास के नारे को राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। जवाहर लाल नेहरू ने पी सी मोहलनवीस की अध्यक्षता में जीवन के स्तर और आमदनी के वितरण का अध्ययन करने के लिए एक कमेटी बनाई थी । उस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 25 फरवरी 1964 को पेश कर दी और बताया कि आम लोगों के जवीन के स्तर में सुधार और आमदनी के वितरण की स्थिति बेहद गड़बड़ हैं।उन्होने बताया कि देश में आमदनी पर कुछ लोगों का नियंत्रण कसता जा रहा है। लोगों कीआमदनी के बीच खाई लगातार चौडी हुई है। औसत में किसी आंकड़े को निकालने से समाज की पूरी तस्वीर नहीं मिल पाती है।तब नक्सलवाद भी नहीं था। अर्जून सेन गुप्ता के अनुसार यदि देश के 88 प्रतिशत दलितों और 84 प्रतिशत मुसलमानों के सामने भीषण गरीबी का संकट है तो ये उस विकास का संकट है जो सरकारें देश पर लादती रही है।विकास के सवाल के साथ ही यदि वितरण के सवाल को भी रखा जाए तो विकास के इस नारे के राजनैतिक आयाम को समझा जा सकता है। नक्सलवाद को सबसे बड़ा खतरा मनाने की वजह हिंसा की घटनाएं भर नहीं है।देश में सरकार चलाने वाले लोग बड़े इत्मीनान से इतनी संख्या में होने वाली हिंसक घटनाओं को ये कहकर टालते रहे है कि इतने बड़े देश में ऐसी वारदातें तो होती रहती है। अगर इसके भाव को यहां ग्रहण किया जाए तो देश के दो तीन प्रतिशत गांवों को प्रभावित करने वाली विचारधारा और उसकी गतिविधियों को देश के आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानने और उसपर इस तरह से चिंता जाहिर करने की वजह समझ में नहीं आती है। क्योंकि इनके मुकाबले चुनाव परिमाणों के आधार पर देश में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की विचारधाराओं और उनका जो सांगठनिक प्रभाव दिखता है वह इनके मुकाबले में कई कई गुना ज्यादा है।नक्सलवाद चालीस वर्षों से ज्यादा समय से अपनी जमीन बनाए हुए हैं। लेकिन इसमें कई दौर ऐसे आए है जब नक्सलवाद को लेकर सरकारें बेहद चितित हुई हैं। उन तमाम दौर का अध्धयन किया जाना चाहिए। इसमें कई दौर ऐसे आए है जब नक्सलवाद के प्रभाव के बढ़ने का दावा किया गया है। लेकिन नक्सलवाद का उस दौर में जो बढ़ता प्रभाव दिखाया जाता है उसके कई दूसरे कारण रहे हैं। वर्षों पहले एक जानकारी मिली थी कि समाज का एक वर्ग अपने यहां ठेके का काम निकालने के लिए नक्सलवादी गतिविधियों को बढ़ा चढ़ाकर दिखाता था।

दरअसल नक्सलवादी गतिविधियों को सबसे बड़ा खतरा मानने और उसके समर्थक बुद्दिजीवियों को कोसने का एक कारण अर्जून सेन गुप्ता के इन वाक्यों से समझा जा सकता है। अर्जून सेन गुप्ता ने लिखा है कि सालों के आर्थिक सुधार ने हमारे देश की विकास दर को ऊंचा किया है लेकिन इसने जनसंख्या के बड़े भाग को गरीबी और भुखमरी के साये में डाल दिया है। इसके कारण वे असम्मानित तरह से जीने के गंभीर दौर से गुजर रहे हैं।लोग वैसे तो शांत दिखते है लेकिन जैसे ही मौका आता है वे हिंसक विरोध में शामिल हो जाते हैं। दरअसल सत्ता का खुद का भरोसा लोगों पर से खत्म हो रहा है वैसी स्थिति में यदि कोई भी ऐसा आंदोलन या गतिविधि विकसित होती है जिसके पास लोगों को प्रभावित करने के राजनीतिक औजार हो तो उसे बेहद खतरनाक माना जाता है। नक्सली गतिविधियों में होने वाली हिंसक घटनाओं को देखे तो रोजाना देश में होने वाली किसी आपराधिक घटनाओं की तुलना में कितनी होती है? शायद सौ में एक प्रतिशत का चौथाई हिस्सा भी नहीं होता है।संसदीय पार्टियों ने अपना भरोसा बुरी तरह से खोया है और दूसरी तरफ कोई भी राजनैतिक विचारधारा या संगठन नहीं है जो लोगों की दुख तकलीफों के लिए लड़ रहे हो।

सरकार नक्सलवादियों के खिलाफ अपने अभियान के अपने उद्देश्य को लेकर बहुत साफ हैं. सरकार कहती है कि वह पहले नक्सलवाद से निपटेगी और फिर विकास के कार्य करेगी।अमेरिका ने भी इराक पर हमला करने के बाद सके पुनर्निमाण का कार्यक्रम पेश किया था।सरकार ने एक जमाने में ये नीति बनायी थी कि जिन इलाकों में नक्सलवादी गतिविधियां बढ़ रही है वहां वे ऐसे अधिकारियों को तैनात करेगी जिसके पास लोगों का विश्वास जीतने का माद्दा हो।तब भूमि सुधार के कार्यक्रमों को लागू करने के बारे में भी विचार किया जाता था. लेकिन आज तो खुद प्रधानमंत्री कहते है कि वे भूमि के मालिकाने की अधिकमत सीमा को बढ़ाने के पक्षधर हैं। लोगों का विश्वास जीतना केवल प्रबंधन की पढ़ाई में ज्यादा से ज्यादा नंबर पाने से नहीं सीखा जा सकता है। इसके लिए राजनीतिक प्रतिबद्दता जरूरी है। सरकार ने ऐसे जिन अधिकारियों की ऐसे इलाके में तैनाती की है उनके बीच ये अध्ययन कराया जा सकता है कि क्या विकास के जिन कार्यक्रमों के साथ वितरण की तस्वीर स्पष्ट होती है वहां विकास के कार्य को लेकर विरोध किया जाता रहा है। ऐसे अधिकारियों ने कैसे विकास के विभिन्न कार्यक्रमों को पूरा किया। इस समय सरकार पहले सफाया और फिर विकास का जो नारा दे रही है लगभग यह उसी तरह का परिणाम वाला साबित होगा जिसमें ये देखा गया है कि विकास के बाद उसके हिस्सेदार में आम लोग नहीं होते हैं। सफाया के बाद विकास का अर्थ स्पष्ट है कि प्रतिरोध की संस्कृति का सफाया।विकास का वर्ग चरित्र कोई भिन्न नहीं है।नक्सलवाद को प्रतिरोध की संस्कृतिके ल पर्याय के रूप में पेश किया जा रहा है।इसीलिए ये देखा गया है कि जहॉ कहीं भी विरोध की आवाज उठी है वहां हर विरोध को माओवाद का नाम दिया गया है और विरोधियों को माओवादी करार दिया गया है। यही आसान रास्ता है क्य़ोंकि नक्सलवादियों की गतिविधियों को कानून एवं व्यवस्था की सुरक्षा के दायरे में लाया जा सकता है।विरोध की विचारधाराओं से निपटने के लिए तो भूमि सुधार जैसे कार्यक्रमों पर जोर देना होगा। विकास के साथ वितरण की तस्वीर भी स्पष्ट करनी होगी।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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