हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

ऑपरेशन ग्रीन हंट बुरी तरह से असफल साबित होगा

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/05/2009 12:10:00 PM

हरिंदर बवेजा पंजाब से उग्रवाद को उखाड़ फेंकने वाले केपीएस गिल से आपरेशन ग्रीन हंट के बारे में जजाने की कोशिश कर रही हैं. केपीएस गिल की सबसे बड़ी पहचान पंजाब में अलगाववादी आन्दोलन के खात्मे से जुड़ी रही है. इसके अलावा उन्हें दोसरे राज्यों में भी सशस्त्र आंदोलनों से निबटने के लिए भेजा गयावे हाल में छत्तीसगढ़ में भी सुरक्षा सलाहकार बनाये गए थे।हालांकि उनकी इस सफलता के कुछ स्याह पहलू भी रहे। सुपर कॉप के साथ-साथ उन्हें किलर कॉप भी कहा गया. वे देश के हीरो बन गए मगर उग्रवाद से निपटने के उनके तरीकों पर विवाद भी हुए. कहा गया कि उन्होंने अपने अधिकारियों को ये सिखाया कि किस तरह फर्जी मुठभेड़ को असल मुठभेड़ का रंग दिया जाता है. तहलका से साभार प्रस्तुति.

आपको उस शख्सियत के तौर पर जाना जाता है जिसने पंजाब में उग्रवाद का खात्मा किया. आपकी राय में नक्सलवाद से निपटने का सबसे अच्छा तरीका क्या है? क्या सरकार का अपने ही नागरिकों के खिलाफ युद्ध इसका एकमात्र हल है?

आपको इस पूरे मसले को अपने ही नागरिकों के खिलाफ युद्ध जैसी सीधी लाइनों में नहीं समेटना चाहिए. नक्सलवादी विचारकों को लगता है कि इस देश के लिए उनके पास एक वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था है. उन्हें लगता है कि वे दबे-कुचलों के मददगार और उनकी आवाज हैं. दुर्भाग्य से सच्चाई इसके उलट है. नक्सली देश के सबसे बड़े फिरौती माफियाओं में से एक हैं, शायद दाऊद से भी बड़े. मुझे लगता है कि दाऊद को पहले कुछ राजनैतिक गुटों ने संरक्षण दिया और बाद में उन्हें उससे परेशानी होने लगी. फिर जब उसने अलग होकर अपने बूते काम चलाने की कोशिश की होगी तो उसे देश से बाहर कर दिया गया. मगर इसके बावजूद भारत में आज भी उसका नेटवर्क चल रहा है. राजनीति अपने आप में ही एक फिरौती नेटवर्क है--आज के दौर में तो और भी ज्यादा जब ये काम विकास, औद्योगीकरण, भूमि अधिग्रहण और विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के नाम पर हो रहा है.

जब नेता ये कहते हैं कि नक्सलवाद का मुकाबला करने में विकास की भी कुछ भूमिका होनी चाहिए तो उनसे पूछिए कि छत्तीसगढ़ में विकास से उनका क्या तात्पर्य है? बढ़िया सड़क बन जाएगी तो उस आदमी को क्या फायदा होगा जिसके पास किसी भी तरह के यातायात की सुविधा नहीं है? नंगे पांव चलने वाला आदिवासी सड़क का क्या करेगा? मुझे याद आ रहा है कि छत्तीसगढ़ में मेरी एक अधिकारी के साथ बहस हो रही थी और मैंने उससे कहा था कि अगर मैं जवान हूं और मेरे पास नौकरी है तो अगर काम पर जाने के लिए मुझे खराब सड़क पर भी चलना पड़े तो मुझे कोई शिकायत नहीं होगी. हम हिंसा के एक विशाल दुश्चक्र में फंस चुके हैं क्योंकि आज विकास के नाम पर भ्रष्टाचार हो रहा है. ऐसे में सरकार नक्सलवाद की इस चुनौती का सामना कैसे करेगी?

तो क्या वंचित आदिवासियों को नक्सलवाद आकर्षक लगता है?

आकर्षक तो नहीं लगता पर वे नक्सलियों के प्रोपेगेंडा पर यकीन कर लेते हैं. इसमें नुकसान किसे होता है? आदिवासियों को. जो लोग मारे जा रहे हैं वे कौन हैं? वहां मर रहे ज्यादातर लोगों को नक्सली भी मार रहे हैं और वे भी जो आदिवासियों को नक्सलियों से बचाने की कोशिश कर रहे हैं. दोनों तरफ से मार आदिवासियों पर पड़ रही है. नक्सलियों की कोई विचारधारा नहीं है. कहां है विचारधारा? आदिवासी जिन जंगलों में रहते हैं वहां सबसे ज्यादा संसाधन हैं मगर क्या उन्हें इन संसाधनों में हिस्सेदारी मिल रही है? नहीं.

नक्सलवादी दरअसल फिरौती वसूलने वाले तत्व हैं जो तेंदू पत्ता इकट्ठा करने के एवज में बीड़ी माफिया तक से पैसा वसूलते हैं. और बीड़ी माफिया सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों में भी हैं. अगर नक्सलवादियों की कोई विचारधारा ही नहीं है तो साधारण आदिवासी सरकार से ज्यादा उन पर भरोसा क्यों करता है? क्या इसलिए क्योंकि सरकार जैसी कोई चीज वहां दिखती ही नहीं? अगर नक्सलवाद को किसी तरह का समर्थन मिल रहा है तो वो सिर्फ डर की वजह से. जब हम आदिवासियों की बात करते हैं तो हमें याद रखना चाहिए कि आदिवासी सिर्फ चार राज्यों में ही नहीं रहते. पूर्वोत्तर में भी आदिवासियों की बड़ी जनसंख्या है. वे अरुणाचल में भी हैं. मगर नक्सली हिंसा सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही क्यों है? और जगहों पर क्यों नहीं? आप ये नहीं कह सकते कि वहां पर सरकार ज्यादा सक्षम है और यहां पर नहीं.

बस्तर का ही उदाहरण लें जो खनिज संसाधनों से समृद्ध जिला है. ये एक विशाल इलाका है. मैंने रात में सारे छत्तीसगढ़ की यात्रा की है और बस्तर के लिए मुझसे अपना रूट बदलकर दूसरा रूट लेने के लिए कहा जाता था. आपको पता है वहां प्रशासन का क्या हाल था? पूरे बस्तर में पुलिसकर्मियों की कुल संख्या 3000 से भी कम थी और ये आंकड़ा भी बढ़ोतरी के बाद था. उनके पास नक्सलियों से लड़ने लायक क्षमताएं नहीं थीं. न ही अर्धसैनिक बल इस हालत में थे कि नक्सलियों से निपट पाएं. अगर आप नक्सलियों से मुकाबला करना चाहते हैं तो आपको एक बहुस्तरीय कवायद अपनानी होगी. कानून-व्यवस्था और विकास के बारे में फिर से सोचना होगा. ये जरूरी है कि विकास उस इलाके की जरूरतों के हिसाब से हो. कोई नौकरशाह दिल्ली में बैठे-बैठे कैसे ये फैसला ले सकता है कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी के लिए विकास का कौन सा मॉडल ठीक है.

योजना आयोग के पास वे साधन नहीं कि वह किसी खास इलाके के खास समुदाय को ध्यान में रखकर योजनाएं बना सके. वह सब धान बाईस पसेरी वाली बात करता है. मुझे याद है कि मैं जब पंजाब में था तो हमने पाया कि कुल उग्रवादियों में से लगभग 75 फीसदी 125 गांवों से ताल्लुक रखते थे. मैंने कहा कि इन गांवों पर ध्यान दीजिए. आप इन गांवों पर ध्यान क्यों नहीं देते? योजना आयोग का कहना था कि वह ऐसा नहीं कर सकता.

ये तो बड़ी दिलचस्प बात है. 75 फीसदी उग्रवादी 125 गांवों से आ रहे थे और दिल्ली में कहा जा रहा था कि वे इसका कुछ नहीं कर सकते?

मैंने कहा कि इन गांवों पर ध्यान दीजिए. उनका कहना था कि हम ऐसा नहीं कर सकते. हम अलग-अलग इलाकों के हिसाब से योजनाएं क्यों नहीं बनाते? मुद्दा सिर्फ कमांडो या बटालियन भेज देने का नहीं है. समुदायों का क्या होगा? छत्तीसगढ़ में मुद्दा बनिया-आदिवासी का है और इसकी वही भूमिका है जो पंजाब में जाट सिख-बनिया मुद्दे की थी. ऐसे में इस तरह के कानूनों की जरूरत होती है जो शोषित होने वाले तबके को सुरक्षा का अहसास कराएं.

हाल ही में एक कानून बनाकर आदिवासियों से उनके अधिकार छीन लिए गए. अब उनके ये अधिकार बहाल करने में लंबा वक्त लग रहा है. इसमें इतना ज्यादा वक्त लगाने की क्या जरूरत है? आप उनके अधिकार बहाल क्यों नहीं करते?

मगर पांचवां शेडच्यूल तो अधिकारों के मुद्दे पर साफ कहता है कि..

ये सिर्फ कागजों पर दिखता है

तो आप ये तर्क दे रहे हैं कि ऑपरेशन ग्रीन हंट एक बुरा आइडिया है?

पहली बात यह है कि ये नामकरण ही गलत है. यहां आप किसी को हंट (शिकार) नहीं कर रहे. इसे हंट नहीं कहा जाना चाहिए. आप वहां किसका शिकार कर रहे हैं? उन इंसानों का जो वहां रह रहे हैं? इसीलिए जब ऐसा होता है तो मानवाधिकार उल्लंघन की बातें शुरू होने लगती हैं. यह एक दुश्चक्र है. चाहे नक्सलवादियों की प्रतिक्रिया हो या सरकार की, दोनों ही बेवकूफी भरी हैं. इस सबमें सिर्फ आदिवासी पिस रहा है और बुरी तरह से पिस रहा है. सभी प्रतिक्रियाएं पूरी तरह से बेतुकी रही हैं.

मुझे याद है एक बार एलके आडवाणी ने कहा था कि वे आदिवासियों को रबर के जूते और चप्पल देंगे ताकि उन्हें पेड़ों पर चढ़कर फल-फूल लाने में आसानी हो. लेकिन आदिवासी जानते हैं कि जंगल में कैसे रहा जाए. हां, वे हमेशा ऐसी जिंदगी जीना नहीं चाहते. वे अपनी जिंदगी में बदलाव चाहते हैं लेकिन शिक्षा से और स्थायी सुविधाओं द्वारा. आदिवासियों को संपत्ति का मालिकाना हक मिलना बहुत जरूरी है. लेकिन ऐसा नहीं लगता कि सरकार इस बड़े जंगली इलाके में संपत्ति का मालिकाना हक देने के तरीके खोज पा रही है.

इस आपरेशन के नाम को छोड़ भी दिया जाए तो आप बता सकते हैं कि यह एक बेकार की कवायद कैसे है?

देखिए नक्सलवाद का सामना कई तरीकों से किया जा रहा है. उनमें से एक आंध्र प्रदेश का मॉडल भी है. यह विकास व कानून और प्रशासन का मिलाजुला रूप है. हालांकि उनका विकास मॉडल वैसा नहीं है जैसा होना चाहिए, लेकिन कानून और प्रशासन के मामले में उन्होंने बेहतर काम किया है और ये कई साल से जारी है. उन्होंने नक्सलियों का मुकाबला करने के लिए बाहर से सुरक्षा बल बुलाने की बजाय एक नया बल बनाया. आंध्रप्रदेश के डीजीपी पंजाब आया करते थे ताकि हमारी कार्यप्रणाली और रणनीति को समझ सकें.

इसके विपरीत छत्तीसगढ़ में किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं है. मैं बतौर सलाहकार वहां एक साल तक रहा लेकिन तीन-चार दिनों के भीतर ही मुख्यमंत्री रमन सिंह ने मुझसे कहा कि आप आराम करें और यहां अपने प्रवास का आनंद लें. मैं पुलिस थानों को मजबूत करना चाहता था. क्योंकि नक्सलवाद पर पहली कार्रवाई हमेशा पुलिस स्टेशन से ही होती है. यदि पहली कार्रवाई करने वाला ही कमजोर हो, आपके पास पर्याप्त मानव संसाधन न हों, हथियार न हों, तो आप कार्रवाई कैसे करेंगे? मुझे याद है कि एक बार मैंने छत्तीसगढ़ के भीतरी इलाके में पुलिस वालों की एक मीटिंग बुलाई थी. कई पुलिस कर्मी वहां पुलिस के वाहनों से नहीं आए, उन्होंने वर्दी भी नहीं पहनी थी ताकि कोई उन्हें पहचान न ले.

इस तरह की प्रतिक्रिया से जनता का मनोबल नहीं बढ़ता. इन स्थितियों में पुलिसकर्मी सिर्फ मर सकते हैं. दूसरी तरफ नक्सलवादी अपनी योजनाएं बदलते रहते हैं. यही हाल झारखंड का है जहां एक ऐसे राज्यपाल बैठे हैं जिनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भ्रष्टाचार है. मैं हमेशा कहता रहा हूं कि जब तक इन इलाकों में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहेगा इस तरह के संगठनों के खिलाफ उचित कार्रवाई नहीं हो सकती. एक ईमानदार प्रतिक्रिया बेहद अहम होती है. मुझे पता है कि बस्तर का इंचार्ज एक पुलिस अधिकारी क्या कर रहा था. वो बस्तर के बाहर ट्रांसफर करवाने के एवज में हर आदमी से 35 हजार रुपए वसूल रहा था. ये बात सबको पता थी. और क्या आप जानते हैं कि कांस्टेबलों का स्थानांतरण कौन करता है? राज्य सचिवालय. मुख्यमंत्री कहेंगे कि वो नक्सलवाद से कैसे निपटा जाए इसके लिए सब-इंस्पेक्टर्स की सलाह लेते हैं. यह कहते हुए मुझे दुख है लेकिन राज्य और उसके नेतृत्व में इसके लिए जरूरी मानसिक क्षमता या जमीनी हालात की समझ का अभाव है. यहां नीचे से ऊपर तक हर कोई झूठ बोल रहा है. यह राज्य के मुखिया की जिम्मेदारी है कि रोजमर्रा के हालात के आधार पर स्थिति का मूल्यांकन करे. हजारों मील दूर दिल्ली में बैठकर ये काम नहीं हो सकता. अब सुरक्षा मामलों पर केंद्रीय समिति की रिपोर्ट बाइबल बन चुकी है. इसमें बदलाव की कोशिश करिए और आपको बताया जाता है कि ये मुमकिन नहीं है. लेकिन इन मामलों पर आपको स्थितियों के हिसाब से रोजाना बदलाव की जरूरत होती है. ये जानने की जरूरत होती है कि कल हमसे क्या गलती हुई? हमें क्या करना चाहिए? क्या बदलाव होना चाहिए? क्या आप रोज दिल्ली का मुंह ताकेंगे?

क्या आपको लगता है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट को शुरू करने में जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए?

किसी ऑपरेशन को अंजाम देने का यह कोई तरीका नहीं है. ऑपरेशन ग्रीन हंट बुरी तरह से असफल साबित होगा. यहां सरकार किसको निशाना बनाना चाहती है? एक बार जब कोई ऑपरेशन नाकाम होता है तो उसे दोहराना बहुत मुश्किल काम होता है. अफगानिस्तान में अमेरिकी फौज को भी इसी तरह की स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है. हमें ध्यान देना होगा कि क्या हम भी ऐसे ही हालात में फंसना चाहते हैं?

पंजाब में आपके नेतृत्व में चले आतंकवाद विरोधी अभियान के समय मैंने वहां से रिपोर्टिग की है, तब आप अलग जबान में बोलते थे, वहां आपकी छवि ‘किलर कॉप’ की थी. लेकिन छत्तीसगढ़ की नक्सली समस्या पर आपके विचार इतने अलग क्यों हैं?

मैंने पंजाब पुलिस की ताकत दोगुनी कर दी थी और उन्हें लड़ना सिखाया था क्योंकि ऐसी लड़ाई में स्थानीय बलों को आगे रहना पड़ता है. बीएसएफ, सीआरपीएफ और सेना की मौजूदगी वहां सिर्फ अतिरिक्त बल के रूप में थी. दिल्ली में कई सलाहकार होते हैं, मुझे नहीं पता कि इस वक्त गृहमंत्री पी चिदंबरम को कौन सलाह दे रहा है लेकिन ये साफ है कि वो सही रास्ते पर नहीं हैं. गृहमंत्री पी चिदंबरम को छत्तीसगढ़ के हालात समझने के लिए 1904 में लिखा गया डब्ल्यू एच हडसन का उपन्यास ग्रीन मैंशंस जरूर पढ़ना चाहिए.

आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया कि क्यों एक ऐसा आदमी जिस पर मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप लगते रहे हैं वो अब अहिंसा की बात कर रहा है?

पंजाब और छत्तीसगढ़ में बहुत अंतर है. पंजाब तब भी विकसित राज्य था. छत्तीसगढ़ में हम उस समाज के बारे में बात कर रहे हैं जो अभी विकास की तरफ बढ़ रहा है. आपको पता होना चाहिए आतंकवाद के दौर में भी औद्यौगीकरण के मामले में पंजाब का दूसरा स्थान था.

किसी विकसित राज्य की जनता भी राज्य प्रायोजित हिंसा पर आपत्ति और विरोध जताएगी.

देखिए सवाल बदलाव और हिंसा का है. आप समाज में बदलाव चाहते हैं और ऐसा करने के लिए हिंसा को जरिया बनाना चाहते हैं. उसके लिए तानाशाही की जरूरत होगी या आप मार्क्स और एंगेल्स के रास्ते पर चलकर कामगारों की ताकत के आधार पर बदलाव करेंगे. लेकिन छत्तीसगढ़ औद्योगीकृत समाज नहीं है. ये समाज तो अभी खेती से भी पहले वाले दौर में है. तो आप इसका विकास कैसे करेंगे? जाहिर है इस प्रक्रिया में कुछ गलतियां भी होंगी लेकिन ये सहज गलतियां होनी चाहिए.

जब विकास प्रक्रिया भ्रष्टाचार से चलती है, तब इसका फायदा जरूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पाता. इसके अलावा ये भी बेहद अहम है कि विकास और आतंकवाद के मुद्दे पर राजनीतिक सहमति हो. आजकल चीजें इतनी राजनीतिक हो चुकी हैं कि यदि कोई घटना कांग्रेसशासित राज्य में होती है तो उसकी प्रतिक्रिया भाजपाशासित राज्य में होनी वाली घटना से भिन्न होगी. इस समय तो नौजवानों में बढ़ती बेरोजगारी के चलते हम शहरी क्षेत्रों में भी नक्सलवादियों को अपना प्रोपेगैंडा फैलाने का मौका दे रहे हैं. छत्तीसगढ़ में आदिवासियों को क्या चाहिए? उन्हें अच्छी शिक्षा की जरूरत है, वे पेयजल की सुविधा चाहते हैं, उन्हें दो वक्त की रोटी चाहिए, मलेरिया जैसी बीमारियों से सुरक्षा चाहिए और अपने मालिकाना अधिकार चाहिए. उन्हें ऑपरेशन ग्रीन हंट की जरूरत नहीं है.

सरकार को नक्सलवादियों द्वारा पैदा की गई बौद्धिक बहस में पड़ने की जरूरत नहीं है. आदिवासियों की बेहतरी के लिए सरकार को अपना वक्त एक उचित विकास मॉडल बनाने में लगाना चाहिए. जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक नक्सलियों को अपना दायरा फैलाने के लिए जगह मिलती रहेगी. अगर ये इतनी ही बढ़िया विचारधारा होती तो नक्सलियों को इसका प्रचार करने के लिए हिंसा की जरूरत ही नहीं होती.

सरकार को आगे क्या करना चाहिए?

गृहमंत्री की फील्ड मार्शल बनने की कोशिश का कोई मतलब नहीं है. आपकी प्रतिक्रिया एक छोटे से कमांडो युद्ध के रूप में होनी चाहिए. आपको पता है पंजाब में लड़ाई किसने लड़ी? सब-इंस्पेक्टर, इंस्पेक्टर और हवलदारों ने, मैंने तो बस उन्हें इसके लिए एक माहौल दिया.

आप छत्तीसगढ़ की तुलना में पंजाब के विकसित समाज होने की बात कर रहे थे. तो कानून और व्यवस्था का आपका जो तरीका पंजाब में सफल हुआ वो छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं होगा?

छत्तीसगढ़ के पास न क्षमताएं हैं और न पैसा. पंजाबी लोग छत्तीसगढ़ के आदिवासियों से अलग हैं. नरेगा (ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) का उदाहरण लें पंजाब में कोई भी 100 रुपए रोजाना के लिए मजदूरी नहीं करेगा. और दुर्भाग्य से आजकल विकास का मतलब कई सारे पुल, सड़कें और ऐसी ही चीजें बनाने तक सिमट गया है. नौजवान लोगों के लिए रोजगार पैदा नहीं हो पा रहे हैं और हमारी शिक्षा कार्यक्रम भी रोजगार को ध्यान में रखकर नहीं बनाए जा रहे. हमारे यहां एक मैट्रिक पास का मतलब क्या है? यही कि उसने अपनी 10 साल की जिंदगी स्कूल में बिताई है. अब वो क्या काम करने लायक है? एक बाबू बनने के. जब कि हमारे यहां प्लंबर, कारपेंटर जैसे काम करने वाले कुशल लोगों की कमी है. इस बारे में हमारी शिक्षा व्यवस्था कुछ नहीं सोच रही.

सलाहकार नियुक्त करने के बाद मुख्यमंत्री रमन सिंह ने आपको आराम करने की सलाह क्यों दी?

हिंसा रायपुर में नहीं होती, हिंसा का असर आदिवासियों और सुरक्षा बलों पर पड़ता है. मुझे लगता है कि राज्य सरकार में पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं थी.

क्या आपको लगता है कि कश्मीर में जारी उथल-पुथल की मुख्य वजह कश्मीरियों का भारत सरकार से कट जाना है? क्या कश्मीर में पिछले 20 साल से सुरक्षा बलों की मौजूदगी का कोई फायदा नहीं हुआ है?

कश्मीर में तो आपको ज्यादा से ज्यादा ताकत का इस्तेमाल करना होगा.

अब आप वापस पंजाब वाले तरीके पर आ गए, आखिर कश्मीरियों के मसले को छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की तरह क्यों नहीं सुलझाया जा सकता?

आप भारत और चीन को लें, तिब्बत और कश्मीर को लें. अब देखें कि ओबामा ने दलाई लामा से मिलने से इनकार कर दिया. उन्हें शांति का नोबल पुरस्कार मिल गया. यहां आप दोनों स्थितियों में दोहरे व्यवहार को समझें. पिछले कई सालों से अमेरिका और ब्रिटेन का प्रोपेगैंडा कश्मीरी अलगावादियों के पक्ष में चल रहा है. अब आप देखिए कि अमेरिका कैसे पाकिस्तान से तालिबान के खिलाफ कार्रवाई चाहता है. आज अमेरिका के विमान जहां चाहे बम गिराकर 60-70 लोगों की जान ले लेते हैं. लेकिन मीडिया में कोई भी सवाल नहीं उठा रहा.

क्या आपको ये नहीं लगता कि कश्मीर समस्या का समाधान इस क्षेत्र को वृहद् स्वायत्ता देने में है?

मुझे नहीं पता कि आप इसे छापेंगी कि नहीं. जसवंत सिंह ने हाल ही में एक मीटिंग बुलाई थी जिसमें मैं था और भी लोग थे जैसे एके डोवल (पूर्व आईबी प्रमुख). वहां वजाहत हबीबुल्लाह आए थे. उनका कहना था कि जम्मू जहां कानून और व्यवस्था से जुड़ा मसला है, वहीं कश्मीर राजनीतिक समस्या है जिसका समाधान भी राजनीतिक तरीके से होना चाहिए. अगले दिन एक और वक्ता थे उनका नाम मैं भूल रहा हूं, वो हिंदू थे. उनका कहना था कि श्रीनगर कानून और व्यवस्था से जुड़ा मसला है जबकि जम्मू राजनीतिक समस्या है. अब यदि एक ही मुद्दे पर ऐसे विरोधाभासी विचार होंगे तो आप समाधान कैसे ढूंढ़ेंगे?

चलिए मैं दूसरे तरीके से कहती हूं. जवाहरलाल नेहरू ने यहां जनमत संग्रह का वादा किया था तो कश्मीरियों की शिकायत पर बलप्रयोग क्यों किया जाए?

कश्मीरयों की शिकायत ये है कि हम मुसलमान हैं इसलिए हमें पाकिस्तान में शामिल होना चाहिए. कोई भी सभ्य समाज इस तरह की मांग को स्वीकार नहीं कर सकता. इसकी ताजा कड़ी में मुस्लिमों राष्ट्रों का संगठन इस्लामिक कांफ्रेंस कह रहा है कि कश्मीर मामलों के लिए एक दूत नियुक्त किया जाए. यदि आप धर्म को राजनीति से जोड़ेंगे तो यह लोकतंत्र को देखने का गलत तरीका होगा.

जैसे आप चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ में आदिवासियों को भागीदारी दी जाए वैसे ही दिल्ली, कश्मीरियों को एक वृहद् स्वायत्ता देने पर राजी क्यों नहीं है?

कश्मीर में भारत को भी वही करना चाहिए जो चीन ने किया. गैर-कश्मीरियों को यहां बसाया जाए. छत्तीसगढ़ में हर हाल में आदिवासियों को भागीदारी देनी होगी. मुझे नहीं लगता कि अब भी नक्सली उनके दिमाग पर कोई पकड़ बना पाए हैं. आदिवासी बुरी तरह डरे हुए हैं. उनके पास कुछ हथियारबंद कैडर हैं लेकिन इस तरह कोई क्रांति नहीं की जा सकती.

क्या आपको लगता है कि सरकार को नक्सलवादियों से बातचीत करना चाहिए?

यदि नक्सलवादी गंभीर हों तो बातचीत की जा सकती है. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है. वो ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं जो वास्तविकता से कोसों दूर है और वो अपने इस विचार को सारी दुनिया पर थोपना चाहते हैं. आप आदिवासियों की हत्या करके वो दुनिया नहीं बना सकते.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ ऑपरेशन ग्रीन हंट बुरी तरह से असफल साबित होगा ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें