हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जब ज़मीन पक रही थी : लालगढ़ से लौटकर एक रिपोर्ट

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/05/2009 03:05:00 PM

लालगढ़ से लौट कर रेयाज़ उल हक

अब कादोशोल के गोपाल धवड़ा को शाम ढ़लने के बाद अपने मवेशियों को जंगल में खोजने जाने से पहले सौ बार सोचना पडेगा. सिजुआ की पांचू मुर्मू को सुबह शौच के लिए जाना पहले जितना ही आतंक से भर देने वाला काम होगा. मोलतोला के दिलीप को फिर से स्कूल जाने में डर लगेगा. 17 जून के बाद लालगढ़ में सीआरपीएफ़, पुलिस और हरमादवाहिनी के घुसने के साथ ही सात महीने से चला आ रहा पुलिस बायकाट खत्म हो गया. और इसी के साथ लालगढ़ के लोगों के शब्दों में उनके पुराने दिन शायद फिर से लौट आये हैं, पुलिसिया जोर-ज़ुल्म के, गिरफ़्तारियों के, यातना भरे वे दिन, जब…

लालगढ़ के रास्तों पर फिर से पुलिस और अर्धसैनिक बलों की गाडि़यां दौड़ने लगी हैं. थाने फिर से आबाद हो गये हैं. स्कूलों, पंचायत भवनों और अस्पतालों में पुलिस और अर्धसैनिक बलों के डेरे लग गये हैं. लालगढ़ में पहले भी बाहरी लोगों के जाने पर रोक थी, लेकिन तब भी पत्रकार और बुद्धिजीवी, छात्र आदि जा सकते थे, राज्य के शब्दों में ‘आतंकवादी’ माओवादियों के नियंत्रणवाले लालगढ़ में क्या हो रहा है, यह जो देखना चाहे उसकी आंखों के सामने था. लेकिन अब सरकार के नियंत्रण में आने के बाद लालगढ़ में क्या हो रहा है, किसी को नहीं पता. वहां जाने पर अब पूरी पाबंदी है. लालगढ़ में ‘लोकतंत्र’ को बहाल किये जाने की प्रक्रिया के बारे में हम अब भी कम ही जान पाये हैं. कभी-कभा आ रही खबरें बताती हैं कि किस तरह लोग अभी चल रही कार्रवाई से आतंकित होकर भाग रहे हैं. लोगों के घर, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल जलाये जा रहे हैं. उपयोग में लाये जानेवाले पानी के स्रोत गंदे किये जा रहे हैं. और अनगिनत संख्या में लोगों को माओवादी कह कर प्रताड़ित किया जा रहा है. कुछ हफ़्ते पहले के लालगढ़ में ऐसा कुछ भी नहीं था. माओवादियों से ‘आतंकित’ और उनकी ‘यातनाएं सह रहे’ लालगढ़ के लोग निर्भीक होकर कहीं भी आ जा रहे थे. बच्चे स्कूल जा रहे थे. महिलाएं अपने जीवन में पहली बार बिना किसी डर के जंगलों में जा रही थीं. गांवों में शाम ढले घर से निकलने पर किसी को कोई डर नहीं था. अब ‘मुक्त’ लालगढ़ में ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता.

लेकिन लालगढ़ में ‘मुक्ति’ से पहले की, लालगढ़ के लोगों के शब्दों में ‘आज़ादी’ हमेशा से नहीं रही. कुल सात महीने थे, जिनमें पुलिस और अर्धसैनिक बलों को लोगों ने बेहद शांतिपूर्ण तरीके से इलाके से बाहर कर दिया था. यह हुआ था इलाके में पुलिस के आम बायकाट से, जो शुरू हुआ था छोटोपेलिया की चिंतामणि मुर्मु की आंख पुलिस द्वारा फोड़ देने की घटना के बाद.

पूरी रिपोर्ट पढ़िए रविवार पर। यहां क्लिक करिए.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 6 टिप्पणियां: Responses to “ जब ज़मीन पक रही थी : लालगढ़ से लौटकर एक रिपोर्ट ”

  2. By दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi on July 5, 2009 6:37 PM

    लालगढ़ का अनुभव सामने आने में और देश व दुनिया को उसे समझने में समय लगेगा।

  3. By अभिषेक मिश्रा on July 5, 2009 8:08 PM

    dinesh ji aap ki baat samajh nahi aai.lalgarh men to bat saf hai janta krantikari vikalp ki or dekh rahi hai.aur hamari sarkaron ko yah pasand nahi hai.yaha kheme saaf saaf hain aur koi sandeh nahin hai. buddhijeevion ki duvidha yah hai ki vo na to police daman ka samarthan karna chahte hain aur na hi maovadi jan pratirdh ka. is duvidha ne unhen napunsak bana diya hai.

    बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास,
    किराये के विचारों का उद्भास।
    बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियाँ पुत गयीं।
    नपुंसक श्रद्धा
    सड़क के नीचे की गटर में छिप गयी,
    कहीं आग लग गयी, कहीं गोली चल गयी।

  4. By राज भाटिय़ा on July 6, 2009 12:33 AM

    हमे इस बारे कुछ नही पता, अब आप का लेख पढा तो टिपईया भी दे.

  5. By Science Bloggers Association on July 6, 2009 2:32 PM

    क्या कहा जाए इस सब पर।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

  6. By jeevan on July 6, 2009 7:29 PM

    lalgarh par Itani halki report. lalgarh itani halki kahani nahi hai jaise apne pesh karne ki koshish ki hai. reyaz ne likha hai ye sonchkar chinta hui. lagta hai ki reyaz pahle vala reyaz nahi hai.

  7. By rubina on July 10, 2009 2:18 PM

    इस तरह के मुद्दो पर अक्सर हमारे बुद्धिजीवि टिप्पणी करने से हिचकिचाते है.ऐसे मुद्दो पर वह चुप ही रहना पसंद करते है.क्योकि वह प्रगतिशीलता का भी जामा पहने रहना चाहते है और कोई खतरा भी नही उठाना चाहते है.

सुनिए : हम देखेंगे/इकबाल बानो

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

फीड पाएं

रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:
अपना ई मेल लिखें :

कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

हाशिये में खोजें

Loading...