हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मेरा जुर्म और तुम्हारी वीरता

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2009 01:20:00 AM

कुलदीप प्रकाश की कविताएँ

मेल खोला तो एक मित्र की चिट्ठी पर नज़र गयी...कुछ कविताएँ किसी भूमिका-परिचय के बिनाशुरुआती पंक्तियाँ ही खरोच छोड़ती हैं...बिना एक मिनट का समय गंवाए उन्हें प्रस्तुत कर रहा हूँ...कवि का परिचय आपमे से किसी के पास हो तो बताएं, आगे शामिल कर लेंगे. कुछ कविताओं में शीर्षक नहीं दिए गए हैं


पहले तुम्हारे हाथ में थी बन्दूक
तो यह तुम्हारी वीरता थी
अब मेरे हाथ में है बन्दूक
तो यह मेरा जुर्म है.

--



वे शांति स्थापना के लिए निकले हैं
ज़ाहिर है
कब्रिस्तान में शोर नहीं होता

--

कब्रगाह

सफ़ेद कबूतरों से भरे
आसमान
के नीचे की जमीन

--


समय

मैं उनसे कुछ नहीं कहना चाहता
की समय जिनके लिए
किसी बुढ़िया की आँखों की तरह है
और उनसे भी नहीं
जिनके लिए वह
कलेण्डर में पड़ी तारीखों के बीच की खाली जगह है

मैं उनकी ओर मुखातिब हूँ
की जिनकी ताम्बई बाँहों में
समय ने
पिघला पिघला के भरा है इस्पात
की घड़ी और सुइओं का मतलब
जिनके लिए
आदमी से मशीन
और मशीन से आदमी में बदलने का आदेश है

मैं उनसे भी कुछ कहना चाहता हूँ
जो दावा करते हैं
समय पर समय को समझ लेने का
की साथियों
यह समय
समय के बारे में सोचते हुए समय गुजारने का नहीं
बल्कि
समय रहते
समय को बदल देने का समय है.

--


यूँ तो इस मौसम की
सबसे तल्ख़ हकीकत है सन्नाटा
मगर आने से पहले
तूफान कभी मुनादी नहीं करते


--


पहाड़

बड़े से बड़े तूफान के आने पर भी
पहाड़
नहीं बदलते अपनी जगह
लेकिन जब उतरती है शाम
तो वे बदल लेते हैं अपना रंग


--

कत्ल
कत्ल करने के कितने तरीके ढूंढ लिए हैं तुमने
हैरत है मौत होती है लेकिन एक सी


--

एक भुला दी गई कहावत

अगर कोई सही बात कहता है
तो तुम उसका समर्थन करो
अगर कोई भी सही बात नहीं कहता
तो तुम खुद उसे कहो


--


कॉमरेड
इस सबसे बेहतरीन शब्द को
सबसे बेहतरीन आवाज में
तुमसे कहता हूँ मैं
कॉमरेड

सर्दियाँ जाने वाली हैं
और बसंत आने वाला है
हौसला रखो
ओ दोस्त
सर्द हो गए लोगों
और सर्द हो गए संबंधों पर
अफ़सोस करते हुए वक़्त जाया मत करो

इस सर्द रात की हवा में
आने वाले बसंत की खुशबु सूंघ लेना ही
क्रांति
और सबसे बढ़ कर जीवन है

मैं मानता हूँ की बहुत कठिन है रास्ता
और लोहे के दांतों वाली है बर्बरता
लेकिन यकीन करो मेरे दोस्त
हमारे जलते सीनों में धंसे उसके पाँव
मोम के हैं

मेरे साथी
हमें चलना है दिगंत तक
अपनी ही राख से
कई कई बार लेना है जन्म
हमें दौड़ना है
बिजली के तार को मोड़कर बनाये गए चक्के के पीछे भागते हुए बच्चे की तरह
नंगे पाँव
थपाथप
धरती पर अपने होने की मोहर लगाते हुए.

--


हम फिर हो गए हैं अजनबी
एक लम्बे महीने के बाद
जिसमें हमने समेटने चाहे
कई वर्ष
बहुत सारे अतीत के
और कुछ एक भविष्य के
कई वर्षों
के डर
हादसे
और रुलाइयां
फूट पड़ते रहे बीच बीच में
हम अभिशप्त हैं
अतीत और भविष्य के अथाह समुद्र के बीच
अभी के छोटे से टापू पर डरते हुए रहने को
दिन में कई कई बार इस टापू को लील जाता है समुद्र
अपनी दानवी जकड में
हम अभिशप्त हैं
क्योंकि हमने किया है प्यार
वक़्त की इजाज़त के बिना
जैसे प्रोमिथियास चुरा लाया था अग्नि
देवताओं के राज्य से
इस लम्बे महीने में
कुछेक क्षन
हमने रोक दिया था
बहते वक़्त को
उसकी मर्ज़ी के खिलाफ
हमने विद्रोह किया
शाश्वत समुद्र के खिलाफ
उन नश्वर क्सानों में
अब एक लम्बे महीने के बाद
हम फिर हो गए हैं अजनबी
अच्छा है
क्योंकि अजनबी ही बनते है दोस्त
और प्रेमी
आओ कुछ समय
समय की मर्ज़ी मानें
और जुटाएं इतनी शक्ति
की अगली बार रोकें समय को
और भी मुकम्मल तरीके से.


--


आओ एक नई शुरुआत करें
वैंसे नहीं
जैंसे
बजट पेश करते हुए
हर साल करता है वित्तमंत्री
आंकडों की बाजीगरी पर
शाब्दिक लफ्फाजी का रंगरोगन चढाते हुए
बल्कि
वैसे
जैसे
पंखो को चोंच से खुजलाते हुए
तैयार होते है पक्षी
एक लम्बी उडान के लिए .


--


बैसाख के तप्त महीने में
चिलचिलाती हुई गर्मी है
लू ने सोख लिया है नमी के हर पोर को
फिर भी
नाली के किनारे उग आयें हैं
पुदीने के हरे हरे पौधे.

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  1. 12 टिप्पणियां: Responses to “ मेरा जुर्म और तुम्हारी वीरता ”

  2. By vijay gaur/विजय गौड़ on May 23, 2009 at 6:41 AM

    कविताएं पढी, यूं तत्काल दी गई राय का कोई विशेष मायने नहीं पर कई बार ऎसा लगता है कि कहीं कोई बात शुरू होती है और झट से खत्म। एक मुक्कमिल तस्वीर, जो भी कविता में व्यक्त किया गया है, पूरा आकार ग्रहण करने से पहले और पाठक को उसके भीतर जाने देने से पहले ही टूट जा रही है।

  3. By kuldeep prakash on May 24, 2009 at 4:00 PM

    ye kavitayen to maine ek mitra ko bheji thi. yahan kainse chap gai pata nahin. aapko kanise mili?
    sheershak na hone se aur paryapt gap na dene kan bhi pathak ki manasthiti ban nahin pati.

  4. By kuldeep prakash on May 24, 2009 at 4:00 PM

    ye kavitayen to maine ek mitra ko bheji thi. yahan kainse chap gai pata nahin. aapko kanise mili?
    sheershak na hone se aur paryapt gap na dene kan bhi pathak ki manasthiti ban nahin pati.

  5. By रंगनाथ सिंह on May 27, 2009 at 12:03 AM

    kavitaye thik hai. jis asar me ye kavitaye likhi gyi h wo tewar hindi me gayab hi ho gya h. isliye achhi lagi. kuldeep ka kuchh parichay bhi dete to behtar hota.

  6. By abhishek on May 27, 2009 at 2:14 PM

    kavitayen bahut pasand aain. inmen brekht ki shaili ki jhalak milti hai.

  7. By विजय प्रताप on May 28, 2009 at 9:28 PM

    hausala dene wali kavitae. andar tak utarti hain aur naye jiwan ke prerna de rahi hai. sundar!

  8. By दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi on May 29, 2009 at 4:18 PM

    सारी कविताएं खम ठोक कर अपनी बात कहती हैं।

  9. By श्याम कोरी 'उदय' on May 31, 2009 at 10:29 PM

    ...सुन्दर-सुन्दर, उम्दा-उम्दा कविताएँ हैं !!!

  10. By भूतनाथ on June 7, 2009 at 12:06 PM

    kyaa baat hai....kuchh kah hi nahin paa rahaa main....!!

  11. By चन्द्रिका on July 1, 2009 at 10:39 AM

    bhai sahab achanak kaha gayab ho gaye hai na phon na mail koi bat hoti hai ye sidha seedha nikammapan hai aap jald sampark kare nahi to mai kar hi loonga.

  12. By sunil on July 29, 2009 at 11:56 AM

    (kuldeep जी की कुछ kavitaaye हमारे पास हैं, अभी मैं एक ही bhej रहा हूँ. anya कविताओं की तरह ये कविता भी मुझे kaafi pasand है, )

    परसों से परसों तक

    परसों
    हमने पैदा किये जंगल
    और जंगलों ने पैदा किया हमको
    परसों
    हमने बसाए गाँव
    और गांवों ने बसाया हमको
    परसों
    हमने रचे शब्द
    और शब्दों ने रचा हमको

    कल
    उन्होंने बनाई बंदूकें
    हमारे जंगल से ही
    और लूट लिया
    पत्तों का पोर-पोर हरापन
    कल उन्होंने बसाई छावनी
    उजाड़ने के लिए
    हमारे गाँव
    कल
    हमारे ही शब्दों से
    उन्होंने गढे आदेश
    और लगा दिया प्रतिबन्ध
    हमारे गीत और कविताओं पर

    आज
    हम भी ढाल रहें हैं बंदूकें
    बना रहें हैं छावनियां
    गढ़ रहें हैं आदेश

    आज से
    हम ऐलान करते हैं
    साफ़-साफ़
    आज से
    जंगलों को ही बना देंगे
    हम बंदूकें
    आज से हमारे गाँव ही
    बन गए हैं छावनी
    आज से हमारे गीत और कवितायें
    ही हमारे आदेश होंगे

    कल
    बंदूकें भी hamaari hongi
    और
    जंगल भी
    कल
    छावनियां hamaari hongi
    और गाँव भी
    कल
    आदेश हमारे होंगे
    और शब्द भी

    परसों
    उस दिन का suraj
    नहीं देख paayenge
    वे .........

    Kuldeep Prakash

  13. By sunil on August 5, 2009 at 11:46 AM

    रेयाज भाई मैंने कमेन्ट बॉक्स में कुलदीप की जो कविता भेजी है उसे ब्लॉग पर मत डालियेगा, मैंने कुलदीप से पूछे बिना ही कमेन्ट बॉक्स में डाल दिया है, plz आप उसे वहां से हटा दें तो बड़ी मेहरबानी होगी ,

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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