हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

यह लोकतंत्र है, विवाद है, गुंडई है या उनका पागलपन है

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/30/2009 08:37:00 PM

यह शायद लोकतंत्र है। या शायद उनके संस्कार। या शायद उनकी देशभक्ति। या शायद उनका नीचता के हद पर उतरा पागलपन। वे क्या कर रहे हैं, यह शायद वे ही बेहतर बता सकते हैं? असगर अली इंजीनियर की बातचीत पर आए कमेंट्स के जवाब में संजय काक से एक बातचीत के अंश हाशिया पर पोस्ट किए गए तो अपने दिमाग का संतुलन खोते ये 'देशभक्त' धमकाने की हद तक उतर आए। यह उनका लोकतंत्र और संविधान और देश की उनकी यह समझ है। इसमें संदेह भी नहीं क्योंकि अयोध्या से लेकर गुजरात और उडीसा में उनकी समझ का यही सिलसिला रहा है. ये टिप्पणियां आप भी देखें.


  1. By Ravi Singh on April 30, 2009 8:04 PM

    वाह रेयाज भाई, वाह, क्या खूब कहा है
    महाराज, आपको इन बैंगानियों और जयन्तों से क्या काम..., इन्हें मिर्ची लगे सो लगने दीजिये, आप तो अपनी दुकान चलाईये और इन्शा अल्लाह खूब चल रही है..., चलाते रहिये अपनी दुकान...

    आपने संजक काक का इन्टरव्यू दिखाया, कसम से बहुत मज़ा आया, बहुत दिनों बाद कोई बेशर्म आदमी देखने को मिला.... मैंने तो एसे एसे देशद्रोहियों, मक्कारों, मीरजाफरों को देखा है कि हमारे संजक काक भाई तो उनके बहुत कम बेशर्म है..., दिखाते रहिये..., हमें तो बेशर्मों और बेईमानों को देखने की आदत हो गई है,

    अंग्रेज हमारे देश पर इतने साल राज यूही नहीं कर गये...

    अगर किसी की मौत पर खुशी का माहौल देखना है तो हमारे छत्तीसगढ़ में जब नक्सलवादी आतंकवादी मरते हैं... तब उस माहौल को देखना..., अल्ला कसम. इन घाटी के माहौल को शर्तिया भूल जाओगे

    आप क्या सोच रहे हो आपकी ये दुकानदारी हमेशा यूहीं चलती रहेगी?
    बैंगानियों और जयन्तों की राष्ट्रवादिता यूहीं गालियां खातीं रहेगी?

    अगर हां तो तुम बस मुंगेरीलाल हो...

  2. By Ravi Singh on April 30, 2009 8:14 PM

    रियाज भाई, विनायक सेन के क्या हाल है? आप न बता सकें तो कपिल भाई से ही पूछ कर बता दीजिये...

  3. By अनुनाद सिंह on April 30, 2009 8:17 PM

    वाह 'भाई' वाह !

    इस इंटरब्यू में प्रश्नो के उत्तर कहाँ हैं? मैं तो ढ़ूंढ़ते रह गया।

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 11 टिप्पणियां: Responses to “ यह लोकतंत्र है, विवाद है, गुंडई है या उनका पागलपन है ”

  2. By Ravi Singh on April 30, 2009 at 9:18 PM

    शुभ संकेत हैं रियाज भाई...., दिखावे को ही सही..., बंन्दूक की हिमायत करने वाले हत्यारे नक्सलवादी लोकतंत्र का नाम तो लेने लगे!

    बिल्कुल पागलपन है हमारा..., तुम हमारे देश के जवानों के शहादत के बाद कोई माहौल की खुशी की बात करो... और हम चुपचाप अपनी कांखों में हाथ डाल कर बैठ कर संजक काकों की बकबास सुनते रहें... ये तो हमारा पागलपन है

    हमारे लोकतंत्री संस्कार ही है जो हम ये सब चुपचाप सहन कर लेते है..., हम तो हमेशा ही एसे ही दब कर बैठे रहेंगे...,

    आतंकवादियों के आगे हम वेबसों की गुंडई कहा चल पायेगी भाई,...

  3. By Reyaz-ul-haque on April 30, 2009 at 9:28 PM

    नक्सलियों की तो मैं नहीं जानता, लेकिन जिस लोकतंत्र को मैं जानता हूँ, वह आप जैसों का सबसे बड़ा दुश्मन है और आप सब उसके लिए

  4. By Reyaz-ul-haque on April 30, 2009 at 9:33 PM

    और धमकियां देने वाले बड़े बेबस होने लगे...उफ़ दुर्भाग्य

  5. By Pak Hindustani on April 30, 2009 at 9:44 PM

    यह सारा प्रकरण बड़ा दिलचस्प रहा. मैंने काक का इंटरव्यु पढ़ा, समस्या का एक नया ही विश्लेषण किया है उन्होंने, मुझे लाजिक भी पसंद आया.

    "मेरा कहना है कि पहले आप सबसे बड़े और पहले सवाल को देखें कि कश्मीर में क्या हुआ. इसके बाद ही तो कश्मीरी पंडित निकले न. कश्मीरी पंडितों का मामला कश्मीर समस्या के साथ जुड़ा हुआ है."

    चलिये आप cause and consequence की बात अब अपने ब्लाग पर करने तो लगे. अब जो समझ आपको यह बात स्वीकार करने की इजाजत दे रही है कि कश्मीर की 'समस्या' का परिणाम हजारों कश्मीरी पंडितों की मौत और लाखों (5-6 हजार बचें है कश्मीर में काक ने कहा) का पलायन था वही समझ आप यह भी समझने में लगायें कि गोधरा के ट्रेन हत्याकांड में 300 से ज्यादा लोगों की मौतों का परिणाम गुजरात के वो दंगे थे जो आपको वीभत्स लगे (बेशक कश्मीरी पंडितों की मौतें वीभत्स न लग रही हों)

    अब मेरे कहने का मतलब यह न निकाल लेना कि मैं दंगो को जायज ठहरा रहा हूं, मैं बस आपके लल्लू लाजिक की सच्चाई को आईना दिखा रहा हूं.

    एक और कोशिश बड़ी अजीब लगी, आपने तो देशभक्ति को भी गाली बना दिया. बड़े-बड़े quotes में देशभक्ति लिख दिया ('देशभक्ति'), तो क्या विचारधारा स्वीकार्य है आपको देश से ऊपर? यह भी बतायें.

    वैसे एक बात और नोटिस करने लायक है, जो आतंक, धमकी, हथियार और अत्याचार का सहारा लेने में विश्वास करते हैं (आतंकी, नक्सली) उन्हें आपका समर्थन है, और सेना के जवानों के मारे जाने की खुशी में भागीदारी दे रहे हैं आप, लेकिन बैंगाणियों और रवि सिंहो जैसे निरीहों कि 'धमकी' से इतने कंपित हो गये कि पोस्ट पर पोस्ट लिख मारीं.

    मुझे धमकी कहीं नहीं दिखी, दिखा तो सिर्फ वह सच जिसने आपको डरा दिया.

    डर के आदमी बड़ा defensive हो जाता है, इसलिये आपके प्रलाप का बुरा तो मुझे भी नहीं लगा.

  6. By Kapil on May 1, 2009 at 8:23 AM

    गुड। हमें मालूम है विनायक सेन का समर्थन करना हो या कश्‍मीर के मसले पर सच को सामने लाना, ये काम करते ही कई सारे खिताब मिलने का इंतजाम पक्‍का हो जाता है। सो इन खिताबों के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया दोस्‍तो।
    पर जरा फिर सोच लीजिए अगर विनायक सेन का समर्थन करने वाले सारे लोग नक्‍सलवादी हैं या सशस्‍त्र संघर्ष के हामी हैं तो भारत को ही नहीं दुनिया को बहुत बड़ा खतरा है मेरे भाई।
    पाक हिन्‍दुस्‍तानी ने बौद्धिक चाशनी में लपेट कर कुछ नायाब पेश करने के लिए काफी जोर-आजमाइश की पर निकला आखिर चूं-चूं का मुरब्‍बा। ऐसी ही उम्‍मीद थी। वैसे कोशिश करते रहिए। इस बार थोड़ा तेवर नर्म रह गया।

  7. By अनुनाद सिंह on May 1, 2009 at 9:17 AM

    काक का साक्षात्कार पेश कर आपने अपने ही पाले में गोल मार दिया। असगर अली और काक के साक्षात्कारों में 'कांट्रास्ट' देखिये। इन दोनो साक्षात्कारों को पढ़ने के बाद एक साधारण बुद्धि का बालक भी निष्कर्ष निकाल सकता है कि -

    * भारत में सेक्युलरिज्म दो तरह का होता है - एक 'जिहादी सेक्युलरिज्म' और दूसरा 'अपने-पाँव-कुल्हाड़ी-मार सनातनी सेक्युलरिज्म'।

    * काक इस बात को सिद्ध करने में सर्वथा सफल रहे हैं कि काश्मीर के हिन्दू वहाँ के मुसलमानों को बदनाम करने के लिये अपना घर-नार छोड़कर (और कुछ मामलों में अपने घरों/मन्दिरों को आग लगाकर) जम्म और दिल्ली चले आये। उनकी यह फिल्म हर 'सेक्युलर' को देखनी चाहिये।

  8. By Pak Hindustani on May 1, 2009 at 10:27 AM

    कपिल,

    कोशिश न चाशनी को चढ़ाने की है, न कुछ भी पेश करने की है. मैं तो सिर्फ आपके खुद के अंदर में छिपें contradictions को बाहर लाया हूं.

    जहां तक विनायक सेन का मामला है आप अपनी लड़ाई जारी रखिये, जो सत्य है जीत उसी की होगी. लेकिन credibility अब बहुत लोगों की नहीं रही. कुछ ऐसे जो दिखावे में तो इंसाफ के लिये जंग कर रहे थे अब फ्राड दिख रहे हैं (तीस्ता देखें)

    बहरहाल जो बात आपके पक्ष में न हो उसे आप चूं-चूं के मुरब्बे के रूप में भी acknowledge कर लो तो बड़ी जीत है.

    मेरी कोशिश वैसे भी आपको समझाने या बताने की नहीं है, जिनके के लिये लिखा था वो बात आपसे बेहतर समझते हैं.

  9. By Pak Hindustani on May 1, 2009 at 10:35 AM

    वैसे आपने कोई तर्क नहीं दिये, सिर्फ आरोप लगाये. उनके पक्ष में तर्क देते तो बात दमदार होती. अभी तो माफ कीजिये...

  10. By संदीप on May 1, 2009 at 12:33 PM

    रेयाज़ भाई, आपकी इस पोस्‍ट ने तो सभी ''देशभक्‍तों'' को इकट्ठा कर दिया है...

    जो आरएसएस अंग्रेजों के धमकाने पर अगले ही दिन अपनी कमीज का रंग बदल देती है, गांधी की हत्‍या में शामिल रहती है, आजादी के आंदोलन में केवल ''शक्ति संचय'' में व्‍यस्‍त रहती है और आजादी के लिए जान देने वालों को अंग्रेजों और साम्राज्‍यवादियों का पिट्ठू बताती है, अब उसी संघ के मानस पुत्र उनके खिलाफ बात करने वालों को, उनका असली चरित्र उजागर करने वालों को देशद्रोही, मीर ज़ाफर, जयचंद करार दे रहे है।
    इनसे यह पूछिए कि ये लोग गुजरात के दंगों को देशभक्ति कहते हैं, या मालेगांव के विस्‍फोट को देशभक्ति कहते हैं, या जब टीवी पर हिंदुत्‍व के पहरुए नोट की गड्डि‍यां चूमते हैं, मुसलमानों को जलाने का बखान करते हैं, उसको देशभक्ति कहते हैं????

    और जनाब पाक हिंदुस्‍तानी सोचते हैं कि इनके कुतर्कों को तर्क मान कर इनका जवाब दिया जाए

  11. By Reyaz-ul-haque on May 1, 2009 at 7:42 PM

    संदीप भाई, आपकी टिप्पणी तथ्यों पर आधारित थी और देखिये, 'देशभक्तों' को जब अपना असली चेहरा दिखा तो खिसक लिए. यही इनकी देशभक्ती है. इन लोगों ने देशभक्ति को गाली गलौज में बदल कर रख दिया है. और उस पर भी शर्म नहीं आती इन्हें...

  12. By रंगनाथ सिंह on May 22, 2009 at 3:09 PM

    itni vicharotejjak blog post pe bhagidari jarooor karunga. thoda vichar karne ke bad. abhi sankshep me, mai apna paksh rakh du...ravi singh ji ki bhavnao ka mai pura samman karta hu. ravi ji ko samajhna chahiye ki naxal aur sainik dono ek hi biradar h. ye to sarkar h jo dono ko ek dusare ka khoon bahane par vivas karti h. naxalvad ka samarthan un sipahiyo ke prati asavedansilata nhi h. naxal ka samarthan kamobesh sarkar ka virodh h. naxal andolan ki kamiiyo ko jante samajhte huye bhi mujh jaise log manmohan singh jaisi behayayi se unhe aatankvadi nhi kah sakte.dilli mahanagar ko jitna jana, dilli ke karta dharta logon ke bare me jitna jana utna hi naxalvad ke prati naram hua hu.aatm raksha me hatya to bharat samet kyi desho me kanooni h ....

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें